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अहो जगत गुरु देव, सुनिये अरज हमारी तुम प्रभु दीन दयाल, मैं दुखिया संसारी ॥१॥
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ॥१॥
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ॥१॥
बिन जाने वा जानके, रही टूट जो कोय । तुम प्रसाद तैं परमगुरु, सो सब पूरन होय ॥
शास्त्रोक्त विधि पूजा महोत्सव, सुरपति चक्री करें हम सारिखे लघु पुरुष कैसे, यथाविधि पूजा करें ॥
शांतिनाथ मुख शशि उनहारी, शीलगुणव्रत संयमधारी लखन एक सौ आठ विराजे, निरखत नयन कमल दल लाजै ॥
क्षण-भर निज-रस को पी चेतन, मिथ्या-मल को धो देता है । काषायिक-भाव विनष्ट किये, निज आनन्द-अमृत पीता है ॥
पूजूँ मैं श्री पंच परमगुरु, उनमें प्रथम श्री अरहन्त । अविनाशी अविकारी सुखमय, दूजे पूजूँ सिद्ध महंत ॥
महावीर निर्वाण दिवस पर, महावीर पूजन कर लूँ वर्धमान अतिवीर वीर, सन्मति प्रभु को वन्दन कर लूँ ॥
प्रथम देव अरहंत, सुश्रुत सिद्धांत जू गुरु निर्ग्रन्थ महन्त, मुकतिपुर पन्थ जू ॥
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