WordPress database error: [Table 'digjainwi_hmlsod.wpstg0_aioseo_redirects' doesn't exist]
SELECT
*
FROM wpstg0_aioseo_redirects
WHERE 1 = 1 AND
`source_url_match_hash` = 'cb37684c308d0beaef90a128ef677f0990eb10fa'
AND `enabled` = 1
ORDER BY `id` DESC
/* 1 = 1 */
WordPress database error: [Table 'digjainwi_hmlsod.wpstg0_aioseo_redirects' doesn't exist]
SELECT
*
FROM wpstg0_aioseo_redirects
WHERE 1 = 1 AND
`source_url_match_hash` = 'd6a8e6cdd4cabc2934bca3497a954a09b02b3c74'
AND `enabled` = 1
ORDER BY `id` DESC
/* 1 = 1 */
अनादि अनंत काल से भरतक्षेत्र में अनंत चौबीसी अनंत-अनंत काल से होती आयीं हैं
इह विधि मंगल आरति कीजे, पंच परमपद भज सुख लीजे ।
वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर-नाय। कहूँ काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाया।।
गणपति गणीशवर गणेश गणनायक गणीश्चर नाम हैं। गणनाथ गणस्वामी गणाधिप आदि नाम प्रधान हैं।।
जनम जरा मृत्यु छय करै, हरै कुनय जड़ रीति। भव-सागरसौं ले तिरै, पूजै जिन वच प्रीति ।।
ॐ जय जय जय नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, नमोऽस्तु णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियांण। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।
पूजन करने से पूर्व अष्टद्रव्य तैयार कर एक चौकी पर रख लें।
उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं, सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं | आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं, चहुँगति -दुखतैं काढि मुक्ति करतार हैं ||
नित्याप्रकंपाद्भुत-केवलौघाः,स्फुरन्मनःपर्यय-शुद्धबोधा:। दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधा:, स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न:।१।
मैं देव श्री अर्हन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चावसों | आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१||
You cannot copy content of this page