Summary

Taking initiation as a Digambara is the highest form of abstinence. In the twentieth century, the Jain sage tradition was somewhat blocked, especially in North India. The nature of the monarchs who studied in the scriptures, the philosophy of it became impossible. This impossible was made possible by three great Acharyas, who are

  • Acharya Adisagar Anklikar,
  • Acharya Shanti Sagar (Charitra Chakraborty) and
  • Acharya Shanti Sagar Chhani.

In this, the rise of both suns

Acharya Shanti Sagar (Charitra Chakravarti) and Acharya Shanti Sagar Chhani was synchronised. Today we get the privilege of seeing the monarchs by tradition and consider our birth to be blessed.

The walk of Life

What a coincidence in their names. Both the Acharyas have extended the Muni religion and the Muni tradition throughout India. Even in Vyabar (Rajasthan), the union of the two was also held together in Chaturmas.
Prashant Murti Acharya Shanti Sagar Ji Chharani (North) was born on Kartik Wadi Ekadashi Vikram Samvat 1975 (year 1979) in village Chhani District Udaipur (Rajasthan).

His childhood name was Kevaldas Jain. He tried to remove the evil practices in the society. After the death, he strongly opposed the practice of beating the chest, the dowry system, the sacrificial system, etc. The Zamindar of Chhani, after being influenced by his non-violence lectures, had banned violence in the state for ever and accepted the non-violence of Jainism

He wrote many books like Mularadhana, Agam Darpan, Shanti Shatak, Shanti Sudha Sagar etc., which were published by the society.

Social groups and Communities

 

 

Credits

https://www.jinaagamsaar.com/aacharya/shantisagars.php

Introduction
  • Honorific Prefix

    Acharya Shri 108

  • Name(Before Diksha)

    Kevaldas Jain

  • Mother's Name

    Shrimati Manik Bai

  • Father's Name

    Shri Bhagchand Jain

  • Birth Place

    Gram-Chani ,District - Udaypur

  • Birth Date

    1888

  • Birth Date( Indian Format)

    Kartik Vadi 11,Vikram Sanvat 1945

Religious Career
  • Name (After Diksha)

    Gyansagar

  • Kshullak Diksha Date

    1922

  • Kshullak Diksha Place

    District-Baasbaada,Rajasthan

  • Muni Diksha Guru

    Saaghbaada ,District - Dungarpur ,Rajsthan

  • Acharya Pad Date

    1926

  • Sallekhana Date

    17-May-1944)

Information

आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज (छाणी)

 

संक्षिप्त परिचय

जन्म: कार्तिक वदी एकादशी, विक्रम संवत १९४५ (सन १८८८ )
जन्म स्थान : ग्राम - छाणी जिला- उदयपुर ,राजस्थान
जन्म का नाम श्री केवलदास जैन
माता का नाम : श्रीमती माणिकबाई
पिता का नाम : श्री भागचन्द्र जैन
ऐलक दीक्षा : सन १९२२ , विक्रम संवत १९७९
दीक्षा का स्थान : गढी, जिला - बासबाड़ा , राजस्थान
मुनि दीक्षा : भाद्र शुक्ल चौदस , संवत १९८० ,सन १९२३
मुनि दीक्षा का स्थान : सागबाड़ा , जिला-डूंगरपुर , राजस्थान
आचार्य पद : सन १९२६
आचार्य पद का स्थान : गिरिडीह , झारखण्ड
समाधि मरण : १७ मई १९४४ ज्येष्ठ वदी दशमी
समाधी स्थल : सागबाड़ा , जिला-डूंगरपुर , राजस्थान

दिगंबर वेश धारण कर दीक्षा लेना संयम का सर्वोच्च रूप है|बीसवी सदी में जैन मुनि परंपरा कुछ अवरुद्ध सी हो गयी थी , विशेष रूप से उत्तर भारत मे । शास्त्रों में मुनि महाराजों के जिस स्वरुप का अध्ययन करते थे,उसका दर्शन असंभव सा हो गया था । इस असंभव को तीन महान आचार्यों ने संभव बनाया, जो आचार्य आदिसागर अंकलीकर ,आचार्य शांति सागर (चरित्र चक्रवर्ती ) और आचार्य शांति सागर छाणी है ।इसमें आचार्य शांति सागर (चरित्र चक्रवर्ती ) और आचार्य शांति सागर छाणी दोनों सूर्यों का उदय समकालिक हुआ ।जिनकी परम्परा से आज हम मुनिराजों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करते है और अपने जन्म को धन्य मानते है ।

आचार्य श्री का नाम जन्म ईस्वी सन क्षुल्लक दीक्षा मुनि दीक्षा आचार्य पद समाधि प्राप्ति
आचार्य श्री १०८ शांति सागर दक्षिण 1872 1915 1920 1924 1955
आचार्य श्री १०८ शांति सागर (छाणी ) (उत्तर ) 1888 1922 1923 1926 1944

केसा संयोग है की दोनों ही आचार्य शांति के सागर है । दोनों हीओ आचार्यों ने भारत भर में मुनि धर्म व मुनि परंपरा को बढाया है । यहाँ तक की व्याबर (राजस्थान) में दोनों का ससंघ एक साथ चातुर्मास भी हुआ था ।
प्रशांत मूर्ति आचार्य शांति सागर जी छाणी (उत्तर) का जन्म कार्तिक वादी एकादशी विक्रम संवत १९४५ (सन १९८८)को ग्राम छाणी जिला उदयपुर (राजस्थान) में हुआ था । सम्पूर्ण भारत में परिभ्रमण कर भव्य जीवों को उपदेश देते हुए सम्पूर्ण भारतवर्ष में विशेष कर उत्तर भारत में इन्होने अपना भ्रमण क्षेत्र बनाया । उनके बचपन का नाम केवलदास जैन था जिसे उन्होंने वास्तव में सर्तक कर दिया । विक्रम संवत १९७९ (सन १९२२ ) में गढी , जिला बांसवाडा में क्षुल्लक दीक्षा एवं भाद्र पद शुक्ल चौदस संवत १९८० (सन १९२३ ) सागवाडा में मुनि दीक्षा तदुपरांत विक्रम संवत १९८३ (सन १९२६) में गिरिडीह में आचार्य पद प्राप्त किया ।दीक्षा उपरांत आचार्य महाराज ने अनेकत विहार किया।वे प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे । उन्होंने समाज में फेली कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया । मर्त्यु के बाद छाती पीटने की प्रथा ,दहेज़ प्रथा , बलि प्रथा आदि का उन्होंने डटकर विरोध किया ।छाणी के जमींदार ने तो उनके अहिंसा व्याख्यान से प्रभावित होकर राज्य मे सदेव के लिए हिंसा का निषेध करा दिया था और अहिंसा मय जैन धर्म अंगीकार कर लिया था ।

आचार्य श्री पर घोर उपसर्ग भी हुए जिन्हें उन्होंने समता भाव से सहा। उन्होंने मुलाराधना , आगम दर्पण , शांति शतक , शांति सुधा सागर आदि ग्रंथो का संकलन किया जिन्हे समाज ने प्रकाशित कराया ,जिस से आज हमारी श्रुत परंपरा सुरक्षित और वर्द्धिगत है । ज्येष्ठ वादी दशमी विक्रम संवत २००१ (सन १९४४ ) सागवाडा (राजस्थान) में आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी का समाधि मरण हो गया ।
क्षाणी परंपरा में आचार्य श्री सूर्यसागर जी, आचार्य श्री विजयसागर जी हुए|
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