Summary

Acharya Shri 108 Surya Sagar Ji Maharaj was born in 1883.

He took his Muni Diksha from Acharya Shanti Sagar ji Maharaj of Chani.

 

The walk of Life

Acharya Surya Sagarji Maharaj wrote 33 Granths ( Sacred books) in his life out of which the "Sayaam Prakash" is a very renowned Granth written by him

 

Social groups and Communities

 

 

 

Introduction
  • Honorific Prefix

    Acharya Shri 108

  • Name(Before Diksha)

    Shri Hajarimal Porwaal

  • Mother's Name

    Shrimati Gendabai

  • Father's Name

    Shri Heeralaal Jain

  • Birth Place

    Gram-Premsar,District - Gwalior M.P.

  • Birth Date

    1883

  • Birth Date( Indian Format)

    Kartik Shukl 9,Vikram Sanvat 1940,

Religious Career
  • Name (After Diksha)

    Surya Sagar

  • Ailak Diksha Date

    1924

  • Ailak Diksha Place

    Indore (M.P.)

  • Muni Diksha Place

    Haat Piplaya ;District -Dewas (M.P.)

  • Muni Diksha Guru

    Aacharya Shanti Sagar (Uttar)

  • Acharya Pad Date

    1928

  • Acharya Pad Place

    Kodarma (Jharkhand)

  • Sallekhana Date

    14-July-1952

  • Sallekhana Place

    Dalmiya Nagar (Jharkhand)

Information

संक्षिप्त परिचय

जन्म: कार्तिक शुक्ल नवमी विक्रम संवत १९४०,१८ नवम्बर १८८३
जन्म स्थान : प्रेमसर ,जिला - ग्वालियर (म.प्र.)
जन्म का नाम हजारीमल पोरवाल
माता का नाम : श्रीमती गेंदाबाई
पिता का नाम : श्री हीरालाल जैन
ऐलक दीक्षा : आसोज शुक्ल ६ विक्रम संवत १९८१ (सन १९२४ )
दीक्षा का स्थान : इंदौर (म.प्र.)
मुनि दीक्षा : मार्गशीर्ष वादी ११ विक्रम संवत १९८१ (२/११/१९२४ )
मुनि दीक्षा का स्थान : हाट पिपल्या जिला -देवास (म.प्र.)
मुनि दीक्षा गुरु : आचार्य शांति सागर छाणी
आचार्य पद : कार्तिक शुक्ल नवमी विक्रम संवत १९८५ (सन १९२८ )
आचार्य पद का स्थान : कोडरमा , झारखण्ड
समाधि मरण : श्रावण कृष्ण ८ विक्रम संवत २००९ (१४ जुलाई १९५२ )
समाधी स्थल : डालमिया नगर , झारखण्ड
साहित्य क्षेत्र में : ३३ ग्रंथो की रचना करी

आचार्य श्री १०८ सूर्य सागर जी महाराज ,आचार्य शांति सागर जी महाराज (छाणी) परंपरा के दुसरे महान आचार्य हुए ।ये बहुत बड़े विद्वान थे ।इन्होने ३३ ग्रंथो की रचना करी ।आचार्य सूर्य सागर जी का जन्म कार्तिक शुक्ल नवमी वि.सं. १९४० सन १८८३ में प्रेमसर,जिला ग्वालियर में हुआ था ।वि. सं. १९८१ में एलक दीक्षा इंदौर में औरिसके ५१ दिन बाद्मिनी दीक्षा हाट पिप्लाया देवास में हुई । दिग. जैन परंपरा में जैन साहित्य को सुद्रढ़ एवं स्थायी बना सकने वालो में से एक आचार्य सूर्य सागरजी भी है ।इन्होने ३३ ग्रंथो का संकलन किया जिसे समाज ने प्रकाशित कराया। " संयम प्रकाश " उनका अदिव्तीय ग्रन्थ है, जिसके दो भागों में (१० किरणों) श्रमण और श्रावक के कर्तव्यों का विस्तार से विवेचन है। संयम प्रकाश सचमुच में संयम का प्रकाश करने वाला है चाहे श्रावक का संयम हो या श्रमण का । वि. सं. २००९ (१४ जुलाई १९५२)में डालमिया नगर में आपका समाधि मरण हो गया।

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