| 245690 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*?? कहानी ??*
*?️ नजरिया ?*
*?अपना-अपना ?*
*द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। सरसंधान चल रहा था। बीच में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि देखकर आओ ये पास के गाँव के लोग कैसे हैं? दुर्योधन गया और वापस लौटकर उसने कहा- "गुरुदेव ! आपने मुझे कैसे गाँव में भेज दिया? यह गाँव तो बहुत बेकार है। यहाँ के लोगों के मन में न कोई शिष्टता है, न ही सभ्यता। सबके सब उदंड और अहंकारी लोग हैं। मुझे तो पूरे गाँव में एक भी विनम्र आदमी नहीं दिखा है।*
*द्रोणाचार्य ने थोड़ी देर बाद युद्धिष्ठिर को भेजा। युद्धिष्ठिर ने लौटकर कहा- "गुरुदेव! इस गाँव के लोग तो बड़े सभ्य, सरल और सुशील हैं।" अतिथि के सत्कार में बहुत आगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति विनम्रता की मूर्ति प्रतीत होता है। मुझे तो एक भी व्यक्ति गुणहीन दिखाई नहीं पड़ा।"*
*कितना अंतर है दोनों के कथनों में? यह दृष्टियों का अंतर है। यही अंतर होता है एक सम्यग्दृष्टि और एक मिथ्यादृष्टि में। अभिमानी को सब घमंडी और विनम्र को सब सरल प्रतीत होते हैं।*
*_?? संकलन कर्ता ??_*
> _*✍?......जिस जीव की जैसी होनहार होती है उसे उसी के अनुरूप ही सामने वाले व्यक्ति,व्यवस्थाएं और सभी प्रसंगों में वही दिखाई देता है जैसी उसकी भविष्य में गति होनी होती है क्योंकि किसी को तो कागज पर बनी हुई भगवान की फोटो भी भगवान दिखते हैं और किसी को मंदिरों में विराजमान भगवान भी स्टैचू इसलिए अपनी बुद्धि और विवेक से सच्चे देव शास्त्र गुरुओं द्वारा बताएं शास्त्रों का स्वाध्याय करें फिर निर्णय लें क्योंकि इस एक कार्य के बिना कोई भी आपको मूर्ख बनाता रहेगा जिसकी अंधभक्ति में मात्र अपना ही अनर्थ होंगा अब हम सब सत्य को पहचानकर अन्याय का विरोध करें और जिनशासन की प्रभावना की भावना पूर्वक आत्म कल्याण के लक्ष्य से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ें और परंपरा से निर्वाण को प्राप्त कर सच्चे सुखी हों।*_ |
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2026-06-20 04:46:59 |
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| 245691 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*?? कहानी ??*
*?️ नजरिया ?*
*?अपना-अपना ?*
*द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। सरसंधान चल रहा था। बीच में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि देखकर आओ ये पास के गाँव के लोग कैसे हैं? दुर्योधन गया और वापस लौटकर उसने कहा- "गुरुदेव ! आपने मुझे कैसे गाँव में भेज दिया? यह गाँव तो बहुत बेकार है। यहाँ के लोगों के मन में न कोई शिष्टता है, न ही सभ्यता। सबके सब उदंड और अहंकारी लोग हैं। मुझे तो पूरे गाँव में एक भी विनम्र आदमी नहीं दिखा है।*
*द्रोणाचार्य ने थोड़ी देर बाद युद्धिष्ठिर को भेजा। युद्धिष्ठिर ने लौटकर कहा- "गुरुदेव! इस गाँव के लोग तो बड़े सभ्य, सरल और सुशील हैं।" अतिथि के सत्कार में बहुत आगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति विनम्रता की मूर्ति प्रतीत होता है। मुझे तो एक भी व्यक्ति गुणहीन दिखाई नहीं पड़ा।"*
*कितना अंतर है दोनों के कथनों में? यह दृष्टियों का अंतर है। यही अंतर होता है एक सम्यग्दृष्टि और एक मिथ्यादृष्टि में। अभिमानी को सब घमंडी और विनम्र को सब सरल प्रतीत होते हैं।*
*_?? संकलन कर्ता ??_*
> _*✍?......जिस जीव की जैसी होनहार होती है उसे उसी के अनुरूप ही सामने वाले व्यक्ति,व्यवस्थाएं और सभी प्रसंगों में वही दिखाई देता है जैसी उसकी भविष्य में गति होनी होती है क्योंकि किसी को तो कागज पर बनी हुई भगवान की फोटो भी भगवान दिखते हैं और किसी को मंदिरों में विराजमान भगवान भी स्टैचू इसलिए अपनी बुद्धि और विवेक से सच्चे देव शास्त्र गुरुओं द्वारा बताएं शास्त्रों का स्वाध्याय करें फिर निर्णय लें क्योंकि इस एक कार्य के बिना कोई भी आपको मूर्ख बनाता रहेगा जिसकी अंधभक्ति में मात्र अपना ही अनर्थ होंगा अब हम सब सत्य को पहचानकर अन्याय का विरोध करें और जिनशासन की प्रभावना की भावना पूर्वक आत्म कल्याण के लक्ष्य से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ें और परंपरा से निर्वाण को प्राप्त कर सच्चे सुखी हों।*_ |
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2026-06-20 04:46:59 |
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| 245688 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*?? कहानी ??*
*?️ नजरिया ?*
*?अपना-अपना ?*
*द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। सरसंधान चल रहा था। बीच में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि देखकर आओ ये पास के गाँव के लोग कैसे हैं? दुर्योधन गया और वापस लौटकर उसने कहा- "गुरुदेव ! आपने मुझे कैसे गाँव में भेज दिया? यह गाँव तो बहुत बेकार है। यहाँ के लोगों के मन में न कोई शिष्टता है, न ही सभ्यता। सबके सब उदंड और अहंकारी लोग हैं। मुझे तो पूरे गाँव में एक भी विनम्र आदमी नहीं दिखा है।*
*द्रोणाचार्य ने थोड़ी देर बाद युद्धिष्ठिर को भेजा। युद्धिष्ठिर ने लौटकर कहा- "गुरुदेव! इस गाँव के लोग तो बड़े सभ्य, सरल और सुशील हैं।" अतिथि के सत्कार में बहुत आगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति विनम्रता की मूर्ति प्रतीत होता है। मुझे तो एक भी व्यक्ति गुणहीन दिखाई नहीं पड़ा।"*
*कितना अंतर है दोनों के कथनों में? यह दृष्टियों का अंतर है। यही अंतर होता है एक सम्यग्दृष्टि और एक मिथ्यादृष्टि में। अभिमानी को सब घमंडी और विनम्र को सब सरल प्रतीत होते हैं।*
*_?? संकलन कर्ता ??_*
> _*✍?......जिस जीव की जैसी होनहार होती है उसे उसी के अनुरूप ही सामने वाले व्यक्ति,व्यवस्थाएं और सभी प्रसंगों में वही दिखाई देता है जैसी उसकी भविष्य में गति होनी होती है क्योंकि किसी को तो कागज पर बनी हुई भगवान की फोटो भी भगवान दिखते हैं और किसी को मंदिरों में विराजमान भगवान भी स्टैचू इसलिए अपनी बुद्धि और विवेक से सच्चे देव शास्त्र गुरुओं द्वारा बताएं शास्त्रों का स्वाध्याय करें फिर निर्णय लें क्योंकि इस एक कार्य के बिना कोई भी आपको मूर्ख बनाता रहेगा जिसकी अंधभक्ति में मात्र अपना ही अनर्थ होंगा अब हम सब सत्य को पहचानकर अन्याय का विरोध करें और जिनशासन की प्रभावना की भावना पूर्वक आत्म कल्याण के लक्ष्य से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ें और परंपरा से निर्वाण को प्राप्त कर सच्चे सुखी हों।*_ |
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2026-06-20 04:46:14 |
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| 245689 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*?? कहानी ??*
*?️ नजरिया ?*
*?अपना-अपना ?*
*द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। सरसंधान चल रहा था। बीच में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि देखकर आओ ये पास के गाँव के लोग कैसे हैं? दुर्योधन गया और वापस लौटकर उसने कहा- "गुरुदेव ! आपने मुझे कैसे गाँव में भेज दिया? यह गाँव तो बहुत बेकार है। यहाँ के लोगों के मन में न कोई शिष्टता है, न ही सभ्यता। सबके सब उदंड और अहंकारी लोग हैं। मुझे तो पूरे गाँव में एक भी विनम्र आदमी नहीं दिखा है।*
*द्रोणाचार्य ने थोड़ी देर बाद युद्धिष्ठिर को भेजा। युद्धिष्ठिर ने लौटकर कहा- "गुरुदेव! इस गाँव के लोग तो बड़े सभ्य, सरल और सुशील हैं।" अतिथि के सत्कार में बहुत आगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति विनम्रता की मूर्ति प्रतीत होता है। मुझे तो एक भी व्यक्ति गुणहीन दिखाई नहीं पड़ा।"*
*कितना अंतर है दोनों के कथनों में? यह दृष्टियों का अंतर है। यही अंतर होता है एक सम्यग्दृष्टि और एक मिथ्यादृष्टि में। अभिमानी को सब घमंडी और विनम्र को सब सरल प्रतीत होते हैं।*
*_?? संकलन कर्ता ??_*
> _*✍?......जिस जीव की जैसी होनहार होती है उसे उसी के अनुरूप ही सामने वाले व्यक्ति,व्यवस्थाएं और सभी प्रसंगों में वही दिखाई देता है जैसी उसकी भविष्य में गति होनी होती है क्योंकि किसी को तो कागज पर बनी हुई भगवान की फोटो भी भगवान दिखते हैं और किसी को मंदिरों में विराजमान भगवान भी स्टैचू इसलिए अपनी बुद्धि और विवेक से सच्चे देव शास्त्र गुरुओं द्वारा बताएं शास्त्रों का स्वाध्याय करें फिर निर्णय लें क्योंकि इस एक कार्य के बिना कोई भी आपको मूर्ख बनाता रहेगा जिसकी अंधभक्ति में मात्र अपना ही अनर्थ होंगा अब हम सब सत्य को पहचानकर अन्याय का विरोध करें और जिनशासन की प्रभावना की भावना पूर्वक आत्म कल्याण के लक्ष्य से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ें और परंपरा से निर्वाण को प्राप्त कर सच्चे सुखी हों।*_ |
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2026-06-20 04:46:14 |
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| 245687 |
40449705 |
☸️ अच्छीबातेअमृतवाणी ग्रुप |
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2026-06-20 04:45:09 |
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| 245686 |
40449705 |
☸️ अच्छीबातेअमृतवाणी ग्रुप |
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2026-06-20 04:45:08 |
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| 245685 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-06-20 04:39:55 |
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| 245684 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-06-20 04:39:54 |
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| 245682 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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?️ *जय जिनेंद्र* ?
*सन्माननीय धर्मानुरागी -*
*श्रावक - श्राविकांनो , आज ...*
*कोल्हापूर येथील श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठाचे मठाधिपती , धर्म दिवाकर सहितासूरी , जिन आगम व श्रमण संस्कृतीचे परम संरक्षक , स्याव्दात प्रतिष्ठापना भ़ूषण , विद्या वाचस्पती , जैन साहित्य रत्न शिरोमणी , बारा भाषा अख्खलीतपणे बोलणारे , जैन तत्वज्ञाना बरोबरच शैक्षणिक , सामाजिक व जैन इतिहास साहित्य चळवळीचे प्रणेते , तेजस्वी - ओजस्वी शांत मूर्ती असे परम पूज्य महास्वामी डाॅ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक यांचा आज ...*
*" ७ वे वर्ष समाधिस्त दिवस "*
*सन १९८४ पासून " महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषदेचे " संस्थापक अध्यक्ष म्हणून त्यांनी महाराष्ट्र व कर्नाटक मधील विविध भागात तब्बल २३ जैन साहित्य संमेलने पार पाडलीत ,*
*श्री लक्ष्मीसेन विद्यापीठा मार्फत कोल्हापूर , रामबाण , व बेळगांव येथे विविध प्रकारच्या शिक्षण संस्था चालविल्या जात आहेत , वयाच्या २३ व्या वर्षी त्यांनी भट्टारक पदाची दीक्षा घेतली , त्यानंतर ही त्यांनी आपल्या शिक्षणात खंड पडू न देता हिंदी मध्ये प्राविण्य , संस्कृत मध्ये काव्यतीर्थ , अर्धमागधी + प्राकृत मध्ये एम् ए ची पदवी प्राप्त केली , अती विशेष बाब म्हणजे वयाच्या ७५ व्या वर्षी त्यांनी शिवाजी विद्यापीठातून जैनालाॅजीची पीएचडी प्राप्त केली , डाॅक्टरेटची पदवी मिळविणारे पहिलेच ते भट्टारक अशी त्यांची ख्याती आहे , श्री लक्ष्मीसेन दिगंबर जैन ग्रंथमाला प्रकाशन संस्थेच्या माध्यमातून त्यांनी १२ ग्रंथे लिहून ती प्रकाशित केली , त्याच बरोबर " रत्नत्रय " मासिकाचे देखील प्रकाशन केले ,*
*अनेक ठिक ठिकाणच्या पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव , श्री जिनालयाचे जिर्णोद्धार , मौंजीबंधन , प्रायश्चित्त संस्कार अशा विविध धर्म कार्यात ते सक्रिय होते , अहिंसा , पर्यावरण , व्यसनमुक्तीने सुसंस्कारक्षम अशी पिढी निर्माण व्हावी म्हणून संपूर्ण भारत देशात व परदेशात - अमेरिका , इंग्लंड , कॅनडा , नेपाळ आदि देशात दौरे करुन अखेरच्या श्वासापर्यंत प्रबोधनपद प्रवचने दिलीत , असो ...*
*अशा सर्वंकष ज्ञानी व विजीगीषु प्रवृत्तीचे ज्ञानभास्कर अखेर वयाच्या ७८ व्या वर्षी " २० जून २०१९ " रोजी पहाटेच्या सुमारास " समाधिस्त " झाले , अशा जिन आगम व श्रमण संस्कृतीचे परम संरक्षक , जैन इतिहास साहित्य परिषदेचे प्रणेते , परम पूज्य डाॅ. श्री लक्ष्मीसेनजी भट्टारक महास्वामी यांच्या चरणी आपणा सर्वान् तर्फे कोटिशः इच्छामि ... ???♂️*
*विमलकुमार...✍️* |
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2026-06-20 04:39:52 |
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| 245683 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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?️ *जय जिनेंद्र* ?
*सन्माननीय धर्मानुरागी -*
*श्रावक - श्राविकांनो , आज ...*
*कोल्हापूर येथील श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठाचे मठाधिपती , धर्म दिवाकर सहितासूरी , जिन आगम व श्रमण संस्कृतीचे परम संरक्षक , स्याव्दात प्रतिष्ठापना भ़ूषण , विद्या वाचस्पती , जैन साहित्य रत्न शिरोमणी , बारा भाषा अख्खलीतपणे बोलणारे , जैन तत्वज्ञाना बरोबरच शैक्षणिक , सामाजिक व जैन इतिहास साहित्य चळवळीचे प्रणेते , तेजस्वी - ओजस्वी शांत मूर्ती असे परम पूज्य महास्वामी डाॅ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक यांचा आज ...*
*" ७ वे वर्ष समाधिस्त दिवस "*
*सन १९८४ पासून " महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषदेचे " संस्थापक अध्यक्ष म्हणून त्यांनी महाराष्ट्र व कर्नाटक मधील विविध भागात तब्बल २३ जैन साहित्य संमेलने पार पाडलीत ,*
*श्री लक्ष्मीसेन विद्यापीठा मार्फत कोल्हापूर , रामबाण , व बेळगांव येथे विविध प्रकारच्या शिक्षण संस्था चालविल्या जात आहेत , वयाच्या २३ व्या वर्षी त्यांनी भट्टारक पदाची दीक्षा घेतली , त्यानंतर ही त्यांनी आपल्या शिक्षणात खंड पडू न देता हिंदी मध्ये प्राविण्य , संस्कृत मध्ये काव्यतीर्थ , अर्धमागधी + प्राकृत मध्ये एम् ए ची पदवी प्राप्त केली , अती विशेष बाब म्हणजे वयाच्या ७५ व्या वर्षी त्यांनी शिवाजी विद्यापीठातून जैनालाॅजीची पीएचडी प्राप्त केली , डाॅक्टरेटची पदवी मिळविणारे पहिलेच ते भट्टारक अशी त्यांची ख्याती आहे , श्री लक्ष्मीसेन दिगंबर जैन ग्रंथमाला प्रकाशन संस्थेच्या माध्यमातून त्यांनी १२ ग्रंथे लिहून ती प्रकाशित केली , त्याच बरोबर " रत्नत्रय " मासिकाचे देखील प्रकाशन केले ,*
*अनेक ठिक ठिकाणच्या पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव , श्री जिनालयाचे जिर्णोद्धार , मौंजीबंधन , प्रायश्चित्त संस्कार अशा विविध धर्म कार्यात ते सक्रिय होते , अहिंसा , पर्यावरण , व्यसनमुक्तीने सुसंस्कारक्षम अशी पिढी निर्माण व्हावी म्हणून संपूर्ण भारत देशात व परदेशात - अमेरिका , इंग्लंड , कॅनडा , नेपाळ आदि देशात दौरे करुन अखेरच्या श्वासापर्यंत प्रबोधनपद प्रवचने दिलीत , असो ...*
*अशा सर्वंकष ज्ञानी व विजीगीषु प्रवृत्तीचे ज्ञानभास्कर अखेर वयाच्या ७८ व्या वर्षी " २० जून २०१९ " रोजी पहाटेच्या सुमारास " समाधिस्त " झाले , अशा जिन आगम व श्रमण संस्कृतीचे परम संरक्षक , जैन इतिहास साहित्य परिषदेचे प्रणेते , परम पूज्य डाॅ. श्री लक्ष्मीसेनजी भट्टारक महास्वामी यांच्या चरणी आपणा सर्वान् तर्फे कोटिशः इच्छामि ... ???♂️*
*विमलकुमार...✍️* |
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2026-06-20 04:39:52 |
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