WordPress database error: [Table 'digjainwi_hmlsod.wpstg0_aioseo_redirects' doesn't exist]
SELECT * FROM wpstg0_aioseo_redirects WHERE 1 = 1 AND `source_url_match_hash` = '05ebe3f16ce9b43eaa84c717f55141b94f9630ec' AND `enabled` = 1 ORDER BY `id` DESC /* 1 = 1 */

WordPress database error: [Table 'digjainwi_hmlsod.wpstg0_aioseo_redirects' doesn't exist]
SELECT * FROM wpstg0_aioseo_redirects WHERE 1 = 1 AND `source_url_match_hash` = 'd6a8e6cdd4cabc2934bca3497a954a09b02b3c74' AND `enabled` = 1 ORDER BY `id` DESC /* 1 = 1 */

Muni Shri 108 Pujya Sagarji Maharaj – Jeevan Gatha – 4 - DigJainWiki

Muni Shri 108 Pujya Sagarji Maharaj – Jeevan Gatha – 4

Previous

Next

1. Gatha 1

2. Gatha 2

3. Gatha 3

4. Gatha 4

मेरी जीवन गाथा ! मोक्ष मार्ग पर आरोहण - अंतर्मुखी मुनी श्री १०८ पूज्य सागरजी महाराज

(अंतर्मुखी मुनि श्री १०८ पूज्य सागर महाराज के ९वें दीक्षा दिवस पर श्रीफल जैन न्यूज में उन्हीं की कलम से उनकी जीवनगाथा प्रस्तुत की जा रही है।)

७. संघ में रोकने की कोशिश


बिजौलिया शहर में आने के कुछ दिन बाद ही मैंने आचार्य श्री को आहार देना शुरू कर दिया था। आचार्य श्री को आहार देने के लिए, शूद्र जल का त्याग करना होता है, बाहर की बनी वस्तुएं खाने का त्याग करना होता है, तो वह भी मैंने किया। अब मैं प्रतिदिन आचार्य श्री के साथ आहार देने जाने लगा। आर्यिका वर्धित मति माता जी बताती रहती थीं कि आहार कैसे देना चाहिए। आचार्य श्री क्या लेते हैं, क्या त्याग है, ये सब भी वह मुझे बताती थीं। जो पहले से ही आचार्य श्री के साथ दीदियां आहार देने जाती थीं, मैं उनके साथ जाता था। दीदियां आचार्य श्री के लिए जो दवाई और कुछ बनाती थी तो उस डब्बे को मैं ले जाता था और एक दीदी भी आती थीं।
मैं यही देखता था कि आचार्य श्री के आहार चर्या में लेने का क्रम क्या है, वह किसके बाद क्या लेते हैं। कभी दीदियां न आएं तो आहार अकेले दे सकूं। जब और आहार पर जाने लगा तो सब यह समझ रहे थे कि संघ में नए भैया आ गए हैं। मुझ से सब यही पूछते थे कि कहां से इतनी छोटी उम्र में घर छोड़ दिया। तुम कितने सुंदर हो, तुम्हारे माता पिता में तुम्हें संघ में कैसे आने दिया। सब सुन कर मुझे अंदर ही अंदर हंसी आती थी। मैं यही कहता था सभी को कि मैं कुछ दिन के लिए आया हूं, बाद में वापस चला जाऊंगा। मैं छोटा ही था तो अब चौके वाले खाने का कहते थे कि आज मेरे घर पर ही भोजन करना सुबह का तो कोई कहता शाम का मेरे घर करना।
इस प्रकार से श्रावकों का भी प्यार मिलने लगा। आचार्य श्री से ये सब बातें कहने में डर ही लगता था तो माता जी से कह देता था कि सब श्रावक ऐसा कह रहे हैं। माता जी कहती थीं कि अच्छा है, अब यही रुक जाओ संघ में, क्या कमी है। आचार्य इतने अच्छे हैं कि सभी की छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हैं और संघ के सभी साधु भी तो तुम्हें अच्छा रखते हैं। मुझे ऐसा लगा रहा था कि सभी लोग संघ में ऐसा वातावरण बना रहे थे कि मेरा मन संघ में रहने को हो जाए। संघ में मंजू दीदी, सरिता दीदी, शोभा दीदी, किरण दीदी भी जब भी बात करती धीं तो बातों-बातों में यही बात आती थी कि अब तो दोनों भैया की दीक्षा हो गई है, उनकी जगह तुम्हें लेनी है। दोनों भैया (राजू और विजय) ने आचार्य श्री और संघ की बहुत सेवा की है, तुम भी सेवा करो। घर में क्या रखा है।
हम तो छोटे छोटे थे, तभी संघ में आ गए थे। संघ के साधु भी पूछते थे कि कैसा लग रहा है तुम्हें संघ में, कोई परेशानी तो नहीं है। संघ में रहो, संसार में फंस कर क्या करोगे। सब की बातों से ऐसा लगा कि सब इसी काम में लगे है कि कैसे न कैसे मेरा मन बन जाए कि मैं संघ में रह जाऊं।

लेकिन पूरा दिन पढ़ने के बाद भी वह याद नहीं रहता था। आचार्य श्री ने तो पढ़ाना णमोकार मंत्र से ही शुरू किया था लेकिन वह भी याद नहीं होता था। मुझे याद करवाने में माता जी बहुत मेहनत करती थीं। आचार्य श्री के आशीर्वाद और माता जी मेहनत से मुझे पढ़ने में धीरे-धीरे आनंद आने लगा और फिर याद भी होने लगा।

८. धार्मिक शिक्षा की राह पर


वर्ष १९९८ के फरवरी माह में मैं बिजौलिया शहर में ही था। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्म का पहला भाग जैन बाल बोध पढ़ाना शुरू किया। यह णमोकार मंत्र से प्रारम्भ होता था, उसके बाद तीर्थंकरों के नाम, उनके चिह्न, जीव-अजीव सहित धर्म के प्रारंभिक जानकारी थी। आचार्य श्री रोज आधा घंटा पढ़ाते थे। मैं तो अपने आप को भाग्यशाली मानता था कि एक आचार्य मुझे पढ़ा रहे हैं। आचार्य श्री का कुछ पढ़ाया हुआ समझ नहीं आता था तो माता जी (आर्यिका वर्धित मति माता जी) से पूछ लेता था। माता उसे फिर से समझा देती थीं।
आचार्य श्री पढ़ाते थे तो वैसे भी एक बार में समझ नहीं आता था क्योंकि यह सब हमने पहले कभी पढ़ा नहीं था। मेरे लिए सब कुछ नया था। आचार्य श्री और माता जी बार-बार एक ही पाठ या विषय को समझाते थे तो धीरे- धीरे समझ में आने लग गया। आचार्य श्री आज्ञा से मैं माता जी से भी जैन धर्म के बारे में कुछ न कुछ पढ़ने लगा। दोनों गुरु पढ़ाने लगे लेकिन मैं कोई न कोई बहाना बनाकर पढ़ाई से बचना ही चाहता था क्योंकि समझ में कम आता था और जब आचार्य श्री और माता जी पूछते थे कि जो पढ़ाया है, उसमें से कुछ बताओ और मैं नहीं बता पाता था तो लगता था मेरा अपमान हो गया है।
जब पढ़ने नहीं जाता था तो आचार्य किसी न किसी को बुलाने भेज देते थे कि पढ़ाई का समय हो गया है। माता जी अलग से कहती थीं कि तुम खुद क्यों नहीं जाते आचार्य श्री के पास। उन्हें बुलाना पड़ता है पढ़ाई के लिए। यह तुम्हारा सौभाग्य है कि स्वयं आचार्य श्री तुम्हें पढ़ा रहे हैं। जो भी आचार्य श्री पढ़ाते थे तो मैं उसे याद करने की कोशिश करता था,

Previous

Next

author avatar
Shashank Shaha

You cannot copy content of this page