इन्द्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति, सुधर्मक, मौर्य, मौड्य, पुत्र, मित्र, अकंपन नामवाले तथा अन्धबेल, प्रभास इन ग्यारह गणधरोंकी में पूजा करता हूँ। मोक्षमार्गी गौतम, सुधर्म, जम्बूस्वामीको पूजा करता हूँ । विष्णु, नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु श्रुतकेवलियोंकी पूजा करता हैं । दशपूर्वधर श्रीविशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयसेन, नागसेन, सिद्धार्थ, तिषण, विजय, बुद्धिल्ल, गंगदेव, धर्मसेनाचार्यको मैं पूजा करता हूँ | नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु, ध्रुबसेन, कंसाचार्य, सुभद्र, यशोभद्र, भद्रबाह, लोहा चार्यमें ये पूर्वधर आचार्य हुए हैं । अहंबलि, भूतबलि, माघनन्दि, घरसेन, पुष्प दन्त, जिनचन्द्र-कुन्दकुन्द, उमास्वामी इन आचार्योंकी पूजा करता हूं। समन्त भद्र, शिवकोट्याचार्य, शिवायन, पूज्यपाद,ऐलाचार्य, वीरसेन, जिनसेन, नेमिचंद्र,इनके कालका प्रमाण पिण्डरूपसे दोसौ बीस वर्ष है। इनके स्वर्गस्थ होने पर फिर भरतक्षेत्रमें कोई ग्यारह अंगोंके घारक नहीं रहे ॥१४८९।। सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य ये चार आचारांगके धारक हुए ॥१४९०॥ उक्त चारों भाचार्य आचारांगके सिवाय शेष ग्यारह अंग और चौदह पूर्वोक एकदेशके घारक थे। इनके कालका प्रमाण एकसौ अठारह ११८ वर्ष है ।।१४५११॥
इनके स्वर्गस्थ होनेपर भरतक्षेत्रमें फिर कोई आचारांगके धारक नहीं हुए। गौतममुनि प्रभृतिके कालका प्रमाण छड्सो तेरासी वर्ष होता है ॥१४९२॥