13. Muni Aahar Procedure

(M) आहार सामग्री के भक्ष्य, अभक्ष्य की जानकारी एवं आवश्यक निर्देश:-

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(M) आहार सामग्री के भक्ष्य, अभक्ष्य की जानकारी एवं आवश्यक निर्देश:-

सभी ऋतुओं में एक समान मर्यादा वाले पदार्थ:

  1. ४८ निनिट- दूध (बिना उबला), छौछ (बाद में जल अथवा मीठा मिलाने पर), पिसा नमक (बूरे, मिर्ची, खारक, किशमिश आदि से मिला दहीं)
  2. घंटे- पिसा नमक (मसाला मिलाने पर), खिंचडी, रायता, कढ़ी, दाल, सब्जी, चावल
  3. १२ घंटे- छाँछ (विलौते समय जल डालने पर), रोटी, पुडी, हलवा, बड़ा, कचौडी, सीरा, पुआ, पपड़िया, खाजा, लड्डू, घेवर आदि। (जिसमें पानी का अंश अधिक हो)
  4. २४ घंटे– दूध (उबला), दहीं (गर्म दूध का), नमक (पिसा गर्म), मौन वाले पकवान, आधार, मुरब्बा, पापड़, मंगोडी।
  5. आटा (सभी प्रकार का), पिसे मसाले, लाई, काजू, कुटे अति गर्म किये हुये मेवे, मनगद आदि के लड्‌डू (जिसमें जल नहीं रहता है) तथा मसाला मिला हुआ गुड़ आदि- शीतकाल ७ दिन, ग्रीष्मकाल ५ दिन, वर्षाकाल ३ दिन
  6. बुरा शक्कर का- शीतकाल १ माह, ग्रीष्मकाल १५ दिन, वर्षाकाल ७ दिन
  7. घी, तेल, गुड- १ वर्ष अथवा जब तक स्वाद न बिगड़े
  8. गृड मिला हुआ दहीं/छाछ- सर्वथा अभक्ष्य है, मीठा मिले दूध का जमाया हुआ दहीं भी अभक्ष्य है।
  9. रस चलित- स्वाद बदल गया हो, बदबूदार पदार्थ तथा फटा हुआ दूध आदि त्याज्य है।
  10. अजान फर- जिसको हम पहचानते नहीं है, ऐसे फन, पत्ते आदि संयमी के लिये योग्य नहीं हैं।
  11. अति तुच्छ फल- जिसमें बीज नहीं पड़े ही, ऐसे बिल्कुल कच्चे छोटे-छोटे पाल भी लेने योग्य नहीं है।
  12. अभक्ष्य के भेद- त्रय हिंसाकारक, बहुस्थावर हिंसाकारक, प्रमाद कारक, अनिष्ट और अनुपसेव्य
  13. दूध अभक्ष्य (अशुद्ध)- प्रसूति के बाद भैंस का दूध १५ दिन, गाय का दूध १० दिन, बकरी का दूध ८ दिन तक अभक्ष्य हैं।

अमृतधारा बनाने की विधि:

एक काँच की धुली शीशी में कपूर, पिपरमेंट, अजवायन का फूल तीनों को बराबर मात्रा में शीशी में कुछ देर रखने के बाद पानी बन जाता है। यहीं अमृतधारा कहलाती है। इसे दो से पाँच बूंद देने से कालरा, दस्त, मंदाग्नि, पेट का दर्द, वमन तथा इसमें रूई भिगोकर दाँत, दाढ के दर्द की जगह रखने से आराम होता है। पेट दर्द, गैस व अपच में ५-७ बूंदे सौफ के अर्क अथवा जल के साथ के (उल्टी) व मतली में अनार के रस के साथ दस्त (हैजा) एवं पेचिस में ५-७ बूंदे जल के साथ।

निर्देश:

१. कमण्डल में जल २४ घंटे की मर्यादा (उबला हुआ) वाला ही भरें ठंडा या कम मर्यादा वाला नहीं।

२. जल को तीन बर्तनों में तीन जगह रखना चाहिये, जिसकी गर्माहट में थोड़ा-थोड़ा अंतर हो, जिससे श्रावक साधु की अनुकूलता के अनुसार दे सके।

३. आहार दान यदि दूसरे के चौके में देवें, तो अपनी आहार सामग्री हाथ में अवश्य ले जायें।

४. चक्की से जब भी पीसें या पिसवाये तो वह साफ होना चाहिये, क्योकि उसमें कोई जीव-जन्तु भी हो सकते हैं तथा उसमें अमर्यादित आटा भी लगा रहता है। अत्तः शीत, ग्रीष्म, वर्षा ऋतु में क्रमश: ७, ५, 3 दिन में चक्की अवश्य साफ करें।

५. हाथ में कोई आहार सामग्री लगी हो तो उन हाथों से आहार सामग्री न दें।

६. हरी क्या है? जो फल, साग आदि वनस्पति जो अभी गीली है, हरी कहलाती है तथा धूप में पूर्णतः सूख जाने पर हरी नहीं रहती। जैसे सौंठ, हल्दी आदि।

७. अतिधि संविभाग व्रत वैया वृत्त के समान फलदायी है। पड़गाहन के लिये द्वार पर प्रतीक्षा/अपेक्षा करने से ही सपूर्ण आहार का फल मिलता है। साधु नहीं आने पर संक्लेश नहीं करना चाहिए। निरंतराय आहार हो ऐसी भावना भानी चाहिये।

८. परिवार में सूतक- पातक होने पर तथा शवदाह में सम्मिलित होने पर भी आहार दान नहीं देवे।

नोट: यह लेख अनेक पुस्तकों से पढ़कर, साधुओं के उपदेशों को सुनकर एवं वैयावृत्ति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। प्रासुक विधि की अधिक जानकारी के लिये सचित्त विवेचन, सचित्त विचार पुस्तक से देख सकते हैं। यह लेख उसी के आधार पर लिखा गया है। इस प्रासुक विधि का उपयोग आप स्वयं करें। एवं दूसरे लोगों को बताकर करवायें। इस लेख की तभी पूर्ण सार्थकता हो सकती है। लेख की अशुद्धियों पर ध्यान न दें। कमियों को सूचित करें, जिससे और सुधार किया जा सके।

विशेष नीट – कृपया इसे पढ़कर इसकी फोटोकॉपी अथवा प्रिंट करवाकर वितरण करके आहार दान की अनुमोदना करें।

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Shashank Shaha

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