मैं देव श्री अर्हन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चावसों | आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१||
शांतिनाथ। मुख शशि-उनहारी, शील-गुण-व्रत, संयमधारी। लखन एकसौ-आठ विराजें, निरखत नयन-कमल-दल लाजें ॥१॥
ओम जय सन्मति-देवा, प्रभु जय सन्मति-देवा। वीर महा-अतिवीर, प्रभु जी वर्द्धमान-देवा।। टेक
ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया। तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाज्जिनेश्वर।१।
श्रीवृषभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजितः श्रीसंभवः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअभिनंदनः
श्रीमज्जिनेन्द्रमभिवंद्य जगत्त्रयेशम् । स्याद्वाद-नायक-मनंत-चतुष्टयार्हम् || श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतुर । जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि |1|
मंगलमूर्ति परमपद, पंच धरौं नित ध्यान। हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान् ।१।
ॐ जय! जय!! जय!!! नमोऽस्तु! नमोऽस्तु!! नमोऽस्तु!!! णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं। ।
इह विधि ठाड़ो होय के, प्रथम पढ़े जो पाठ। धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ।१।
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