ये पद्मावती पुरवाल जातिके थे और चन्दवारके पास टापू नामक ग्रामके निवासी थे । इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कृपणजगावनचरित' है । इस प्रन्यकी प्रशस्ति से अवगत होता है कि कविवर ब्रह्मगुलालजी भट्टारक जगभूषणके शिष्य थे। उस समय दापू गांवके राजा कीरसिह थे। यहींपर धरमदासजीके कुलमें मथुरामल्ल हुए थे । इन्हीं मथुरामल्लके उपदेशसे सगुणमार्गका निरूपण करनेफे लिए सं० १६७१ में इस ग्रन्यकी रचना की है । कविकी एक अन्य कृतिके "चपन किया' भी उपलब्ध है, जो वि० सं० १६५५ में लिखी गयी है।
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परिचय
ब्रह्म गुलाल
ये पद्मावती पुरवाल जातिके थे और चन्दवारके पास टापू नामक ग्रामके निवासी थे । इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कृपणजगावनचरित' है । इस प्रन्यकी प्रशस्ति से अवगत होता है कि कविवर ब्रह्मगुलालजी भट्टारक जगभूषणके शिष्य थे। उस समय दापू गांवके राजा कीरसिह थे। यहींपर धरमदासजीके कुलमें मथुरामल्ल हुए थे । इन्हीं मथुरामल्लके उपदेशसे सगुणमार्गका निरूपण करनेफे लिए सं० १६७१ में इस ग्रन्यकी रचना की है । कविकी एक अन्य कृतिके "चपन किया' भी उपलब्ध है, जो वि० सं० १६५५ में लिखी गयी है।
ये पद्मावती पुरवाल जातिके थे और चन्दवारके पास टापू नामक ग्रामके निवासी थे । इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कृपणजगावनचरित' है । इस प्रन्यकी प्रशस्ति से अवगत होता है कि कविवर ब्रह्मगुलालजी भट्टारक जगभूषणके शिष्य थे। उस समय दापू गांवके राजा कीरसिह थे। यहींपर धरमदासजीके कुलमें मथुरामल्ल हुए थे । इन्हीं मथुरामल्लके उपदेशसे सगुणमार्गका निरूपण करनेफे लिए सं० १६७१ में इस ग्रन्यकी रचना की है । कविकी एक अन्य कृतिके "चपन किया' भी उपलब्ध है, जो वि० सं० १६५५ में लिखी गयी है।