इनका गृहस्थ नाम वीरदास है और ये त्यागी होने के पश्चात् पासकोतिके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं। ये कारंजाके बलात्कारगणके भट्टारक धर्मचन्द द्वितीयके शिष्य हैं । इनका जन्म सोहित काल जाति में हुआ था। इन्होंने शक संवत् १५४९ में 'सुदर्शनचरित' की रचना की है और शक संवत् १६४५ में आवियाँकी । 'सुदर्शनचरित' में सेठ सुदर्शनकी कया अंकित है। इसमें शीलवत और पंच नमस्कार मन्त्रका माहात्म्य बतलाया गया है। इसमें २५ प्रसंग हैं। ओवियां में ७५ मोवियोंका संग्रह है। इसे बहत्तरी भी कहा गया है। इस ग्रन्थमें बका रादि कमसे धर्म विषयक स्फुट विचारोंका संकलन किया गया है ।
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परिचय
वीरदास या पासकीर्ति
इनका गृहस्थ नाम वीरदास है और ये त्यागी होने के पश्चात् पासकोतिके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं। ये कारंजाके बलात्कारगणके भट्टारक धर्मचन्द द्वितीयके शिष्य हैं । इनका जन्म सोहित काल जाति में हुआ था। इन्होंने शक संवत् १५४९ में 'सुदर्शनचरित' की रचना की है और शक संवत् १६४५ में आवियाँकी । 'सुदर्शनचरित' में सेठ सुदर्शनकी कया अंकित है। इसमें शीलवत और पंच नमस्कार मन्त्रका माहात्म्य बतलाया गया है। इसमें २५ प्रसंग हैं। ओवियां में ७५ मोवियोंका संग्रह है। इसे बहत्तरी भी कहा गया है। इस ग्रन्थमें बका रादि कमसे धर्म विषयक स्फुट विचारोंका संकलन किया गया है ।
इनका गृहस्थ नाम वीरदास है और ये त्यागी होने के पश्चात् पासकोतिके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं। ये कारंजाके बलात्कारगणके भट्टारक धर्मचन्द द्वितीयके शिष्य हैं । इनका जन्म सोहित काल जाति में हुआ था। इन्होंने शक संवत् १५४९ में 'सुदर्शनचरित' की रचना की है और शक संवत् १६४५ में आवियाँकी । 'सुदर्शनचरित' में सेठ सुदर्शनकी कया अंकित है। इसमें शीलवत और पंच नमस्कार मन्त्रका माहात्म्य बतलाया गया है। इसमें २५ प्रसंग हैं। ओवियां में ७५ मोवियोंका संग्रह है। इसे बहत्तरी भी कहा गया है। इस ग्रन्थमें बका रादि कमसे धर्म विषयक स्फुट विचारोंका संकलन किया गया है ।