गणिनी आर्यिका श्री १०५ अन्तस्मती माताजी ने आचार्य श्री १०८ ज्ञान सागरजी महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर संयममय जीवन को अपनाया। अपने तप, त्याग, स्वाध्याय एवं आध्यात्मिक साधना के बल पर आप गणिनी पद से विभूषित हुईं तथा जैन धर्म के प्रचार-प्रसार, आर्यिका परम्परा के संवर्धन एवं आध्यात्मिक जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।