इस अभिलेखमें तीर्थकर महाबीरके निर्वाणके बाद गौत्तम गणधर, लोहा चार्य, जम्बुस्वामि ये तीन केवली और विष्णुदेव, अपराजित, गोवर्द्धन, भद्रबाहु ये श्रुतकेवली तथा विशाख, प्रोष्टिल, कृतिकार्य, जग, नाग, सिद्धार्थ, धृतिपेण, बुद्धिल ये आठ आचार्य दश पूर्वके धारी हुए हैं। श्रुतकेवली भद्र बाहुस्वामिने अपने अष्टाङ्गनिमित्तज्ञानसे उज्जयिनी में यह अवगत कर लिया कि बारह वर्षका उत्तरापथमें दुष्काल होने वाला है । अतएव वे धन-धान्यसे सम्पन्न अपने संघके साथ दक्षिणापथको चले गये । इस परम्परामें प्रभाचन्द्र नामक एक बहुज्ञ आचार्य हुए !
इस अभिलेखमें इन्द्रभूति, गौतम गणधर, सुधर्म या लोहाचार्य और जम्बूस्वामि इन तीन केलियोंका उल्लेख है। इन केवलियोंके पश्चात् विष्णु, अपराजित, नन्दिमित्र, गोवर्द्धन और भद्रबाहु श्रुत केवली हुए हैं। पर प्रस्तुत अभिलेखमें विष्णुदेव, अपराजित, गोबद्धन और भद्रबाहु इन चार ही श्रुत केलियों के नाम आए हैं। अन्य अभिलेखों तथा हरिवंशपुराणादि ग्रन्थों में दशपूर्वी ग्यारह बतलाए हैं। पर इस अभिलेखमें आठही दापुर्वियोंका उल्लेख आया है। हरिवंशपुराण में तृतीय दशपूर्वीका नाम क्षत्रिय लिखा हुआ है जबकि इम अभिलेखमें कृत्तिकार्य बताया है | विजय, गंगदेव और धर्मसेन इन तीन दशवियों के नाम छुटे हुए हैं। अतः स्पष्ट है कि इस अभिलेखकी आचार्य परम्परा अपूर्ण है । इसमें ख्यातिप्राप्त आचार्योंका ही उल्लेख किया गया है ।