
श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दुखहरन तुम्हारा बाना है मत मेरी बार अबार करो, मोहि देहु विमल कल्याना है ॥टेक॥
वंदो पांचो परम - गुरु, चौबिसों जिनराज करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धि करन के काज ॥१॥
तुम चिरंतन, मैं लघुक्षण लक्ष वंदन, कोटी वंदन ॥
मैं देव नित अरहंत चाहूँ, सिद्ध का सुमिरन करौं । मैं सुर गुरु मुनि तीन पद ये, साधुपद हिरदय धरौं ॥
मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकासवे को, आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है ।
सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि, निजानंद रसलीन सो जिनेन्द्र जयवंत नित, अरि-रज-रहस विहीन ॥