दक्षिण भारतमें कन्नड़, तमिल, तेलगू, मलयालम एवं तुलु ये पांच भाषाएँ प्रचलित हैं। इनमेंसे कन्नड़ और तमिल भाषा में पर्याप्त जैन साहित्य लिखा गया है । कन्नड़ साहित्य में गम्भीर चिन्तन, समुन्नत हार्दिक विचार एवं हृदय को गहनतम भावनाओं को अभिव्यक्ति विद्यमान है। इस साहित्यको व्यापकता की परिधिकी रेखाए कावेरीसे गोदावरीके सुरम्य अंचलको समेटतो हैं। इस साहित्यमें कन्नड़ प्रदेशकी धरतीको धवा समाहित है। बाल साहित्यको अभिवृद्धिमें जैन कवियोंका पोगदान कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
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परिचय
कन्नड़ जैन कवि
दक्षिण भारतमें कन्नड़, तमिल, तेलगू, मलयालम एवं तुलु ये पांच भाषाएँ प्रचलित हैं। इनमेंसे कन्नड़ और तमिल भाषा में पर्याप्त जैन साहित्य लिखा गया है । कन्नड़ साहित्य में गम्भीर चिन्तन, समुन्नत हार्दिक विचार एवं हृदय को गहनतम भावनाओं को अभिव्यक्ति विद्यमान है। इस साहित्यको व्यापकता की परिधिकी रेखाए कावेरीसे गोदावरीके सुरम्य अंचलको समेटतो हैं। इस साहित्यमें कन्नड़ प्रदेशकी धरतीको धवा समाहित है। बाल साहित्यको अभिवृद्धिमें जैन कवियोंका पोगदान कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
दक्षिण भारतमें कन्नड़, तमिल, तेलगू, मलयालम एवं तुलु ये पांच भाषाएँ प्रचलित हैं। इनमेंसे कन्नड़ और तमिल भाषा में पर्याप्त जैन साहित्य लिखा गया है । कन्नड़ साहित्य में गम्भीर चिन्तन, समुन्नत हार्दिक विचार एवं हृदय को गहनतम भावनाओं को अभिव्यक्ति विद्यमान है। इस साहित्यको व्यापकता की परिधिकी रेखाए कावेरीसे गोदावरीके सुरम्य अंचलको समेटतो हैं। इस साहित्यमें कन्नड़ प्रदेशकी धरतीको धवा समाहित है। बाल साहित्यको अभिवृद्धिमें जैन कवियोंका पोगदान कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।