Aacharya Shri 108 Virag Sagar Ji Sansmaran2

SANSMARAN

11. असहायों के सहारे

पूत के पाँव (लक्षण) पलने में नजर आने लगते है ये कहावत पूर्ण रूपेण अरविन्द पर चरितार्थ होती है । वे बचपन से ही उदासीन थे । गृहकार्यो में , दुकानदारी में मन ही नहीं लगता था । पथरिया सन 1973 में जब वे दुकान पर उदासीन भाव से बैठते थे । उनकी किराने की दुकान थी , जब कोई गाय आदि दुकान में घुसकर अनाज आदि खाने लगती तो, वे उसे भगाने की बजाय, वीतराग भाव से देखते और उसे खाने का पूरा मौका देते । सोचते , पता नहीं कितनी भूखी होगी , कब से नहीं खाया होगा । दयालु हृदय उसे पानी भी पीने को रख देते ।

यँहा तक दुकान पर यदि कोई ग्राहक आता तो बेचे गये सामान के पैसे भी नहीं माँगते, स्वेच्छा से दे गया तो ठीक है, अन्यथा परवाह नहीं, नहीं देने वाले की मज़बूरी को विचारते कि बेचारा गरीब  है , पैसे कँहा से देगा ? हमेशा चिंतन में खोये रहते कि इन सारे दुखी जीवों का दुख कैसे दूर होगा ।  काश ! मेरे पास वो शक्ति आ जाये जो हर किसी का दुःख दूर कर उन्हें सुख से भर दूँ ।

करुणा की पवित्र मूर्ति की वही दया आज विराट रूप में हमारे समक्ष विद्यमान है । जो दिगम्बर मुद्रा का बाना धारण कर अनुभव में रत रहते है तथा अनेक भव्यों के सहारे, शिष्यों के प्रिय आदर्श , जन-जन प्रभावक संत परम पूज्य गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के नाम से जगत विख्यात है ।

12. स्वाभिमानी

एक बार सन 1973 में अरविन्द की माँ का स्वास्थ्य अधिक ख़राब हो गया । अत: इलाज हेतु उन्हें पथरिया से बाहर ले जाना पड़ा । जाते समय पिता जी ने हिदायत दी की किसी से कुछ भी माँगना नहीं। अत : यदि उन्हें कोई कुछ देता , तो भी वह मना कर देते – आखिर पिता जी सिख जो देकर आये थे ।  जैसा भी कच्चा-पक्का भोजन बनता था वही चारो भाई – बहिनो को वे स्वयं बनाकर खिलाते थे । किन्तु किसी का दिया स्वीकार नहीं करते ।

एक बार सभी ने मिलकर भजिए बनाने की योजना बनाई , बस फिर क्या ? बेसन डाला तो गाढ़ा हो गया , अब छोटे भाई साहब तुनक कर बोले – चलो , मुझे दो मैं बेसन ठीक प्रकार से घोलता हूँ । उधर सभी भूख से व्याकुल हो रहे थे । पर यह क्या ? बेसन में थोड़ा पानी डालना था किन्तु पूरा पानी का बर्तन ही उसमे गिर गया । अब तो बेसन भी नहीं बचा था जो उसे गाढ़ा करते । बस फिर तो उसी घोल के भजिये बने । वो कच्चे-पक्के भजिये सभी ने बड़े चाव से खाये , किन्तु यह क्या , थोड़ी ही देर में किसी को पेट दर्द तो किसी को दस्त और लोगो का उपहास अलग ।  अत: इस घटना को देखकर अब भजिये नहीं बनायेँगे ऐसा उन्होंने संकल्प ले लिया ।

स्वाभिमान के कारण कच्चा-पक्का खाना स्वीकार किया किन्तु दुसरो का दिया नहीं ऐसे स्वाभिमानी थे अरविन्द ।

13. सुसंस्कारों का अचिन्त्य प्रभाव

अरविन्द की गंभीरता, विनयाचार और शिष्टता जिसका प्रभाव सर्वत्र द्रष्टव्य होता था,  सन 1973 मे जब वे पथरिया मे थे तो अपने छोटे-भाई- बहिनों के साथ- साथ रखते थे ध्यान मोहल्ले के बच्चो का भी, कभी स्कूल की पढाई तो कभी होमवर्क  परीक्षण करते कौन पढ़ता नहीं है, यदि कोई बुरी आदतों का शिकार है तो उसे भी रोकते, तथा कभी जाते मोहल्ले का निरीक्षण करने की आज कौन- कौन स्कूल नहीं गया, सभी बच्चो पर अरविन्द भैया का अच्छा प्रभाव था, सभी उनकी बात मानते थे, कारण था की अरविन्द भैया  जितना डाँटते- पीटते थे उतना ही बच्चो को स्नेह भी देते थे, वे बाजार से मिठाई लाते या घर पर बनती तो सभी को समान रूप से बाँटते थे, तथा कोई अनुपस्थित रहा तो उसके हिस्से की वस्तु को सुरक्षित रखते थे, दूसरे का दुःख  देखकर उनका कोमल हदय द्रवित हो जाता था अत: सभी लोगो के सरलता से स्नेह भाजक बन जाते थे,  मोहल्ले के बुजुर्गो व  ज्येष्ठ लोगो के प्रति  विनयाचार एवं  सेवाभाव रहता था जिससे सभी स्नेह करते थे अरविन्द से।

     आगे कदम बढे जब अरविन्द के कटनी बोर्डिंग की और तो सहपाठी व शिक्षकों को विनय व सम्मान से अपना बना लिया, तो क्षुल्लक अवस्था मे गुरु संघ मे रहकर बने अनुशासन मे सहयोगी, जब मुनि बने तो नवीन युवा पीढ़ी को धर्म मार्ग पर अग्रसर किया और आज वे आचार्य पद पर आसीन हो गणाचार्य श्री विराग सागर जी के रूप मे संपूर्ण भारत मे धर्म ध्वजा  को फहरा रहे है। बचपन के  सुसंस्कारों का प्रभाव जो उनके जीवन की ऊचाइयों का आधार स्तंभ बना तथा लाभांवित हुआ सारा परिवेश

14. कोमल ह्रदयी ने कराई सल्लेखना

अरविन्द भैया थे बचपन से ही कोमल ह्रदयी व गुण ग्रहण प्रकृति के । हर एक अच्छी बात को अपने हृदय पर शीघ्र ही उतार लेते थे । 

सन 1974-75 के मध्य में एक बार कटनी में पधारा पूज्य आचार्य सुपार्श्व सागरजी का चतुर्विध संघ, फिर क्या था सेवा भावी अरविन्द शीघ्र ही  सलंगन हो गए चतुर्विध संघ की सेवा में , एक दिन एक माताजी ने अरविन्द को पास बुलाया और कहा – अरविन्द जाओ रास्ते में एक कुत्ता मरणासन्न पड़ा है उसे उठा लाओ जैसे पार्श्व कुमार ने नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाकर उनकी सल्लेखना – समाधी करवाई थी वैसे हम भी उस कुत्ते की करायेंगे ।   अरविन्द शीघ्र ही  कुछ विद्यार्थियों की सहायता से उस कुत्ते को उठा लाये , माताजी ने उसे णमोकार मंत्र सुनाकर उसकी सल्लेखना-समाधी कराई ।

अरविन्द का हृदय इस दृश्य को देखकर इतना प्रभावित हुआ की अब उन्हें जब भी कोई मरणासन्न कबूतर , चिड़िया , गाय के बछड़े , चूहा , कुत्ता या पिल्ले देखते तो वे उन्हें णमोकार मंत्र सुनाकर करवाते सल्लेखना -समाधी व उनकी गति सुधरवाते ।

    बचपन के संस्कारों का ही प्रभाव है की आज वे एक महान निर्यापकाचार्य (श्री विराग सागर जी) बनकर अपने कुशल निर्देशन में अनेकों त्यागी -व्रतियों व ममुक्षाओ की करा रहे है सल्लेखना समाधी 

15. तुम तो देवता हो

करुणा, दया, सरलता, सर्वप्रियता आदि गुण जिन्हे विरासत से ही प्राप्त हुए ऐसे अरविन्द भैया जब ग्राम पथरिया मे रहते थे। तब वे प्राय:देखा करते थे की यदि वृद्ध अम्मा आदि काम करते दिखते थे तो वे झट से बिना बुलाये उनकी मदद करने, दौड़कर अपनी पढाई छोड़कर जाते थे।उनके वे संस्कार निरंतर वृद्धिगंत होते गए जब वे 1975 मे कटनी शांति निकेतन गुरुकुल मे पढ़ने आये तो यहाँ पर भी उन्होंने देखा कि एक वयोवृद्ध अम्मा, जिसका स्वास्थय भी ठीक नहीं रहता फिर भी स्कूल का सारा पानी भरती है तो उनका कोमल हदय यह पसीज गया वे उस अम्मा के सिर से पानी का बर्तन लेते और जल्दी से पानी भर देते थे। वह अम्मा मना करती बेटा तुम पढाई करो, मैं कर लूँगी तो वे कहते तुम आराम करो, मैं पानी भरुँगा और पढाई भी कर लूँगा। तब उस अम्मा के हदय से शुभभावनाओ -दुआओ के  उपहार रूप वचन निकलते थे कि बेटा तुम एक दिन बहुत महान- ऊँचे बनोगे। तुम तो देवता के रूप हो।

16. पिता की गोद

1975 मे जब अरविन्द कटनी से घर पथरिया आ रहे थे तब भीषण गर्मी मई का महीना । पिताजी ने सोचा – गाँव मे तो तांगा- रिक्शा नहीं है कटनी नगर की तरह कि रेल से उतरो तो मिल जाये। अतः वे ही उसे लेने पहुँच गये।  सुकोमल, नाजुक शरीर, भोला- चेहरा, कांधे पर बस्ता टांगे।  हाथ मे  झोला, चेहरे पर पसीना और होटो पर मुस्कान लिए पिता की वात्सल्यमयी आंखों ने स्टेशन की भीड़ में खोज लिया अपने चहेते पुत्र को।  अरविंद की नजर जब पिताजी पर पड़ी तो प्यार भरी आवाज लगा दी – बाबू जी।  भोली-भाली आवाज सुनकर पिताजी का हृदय वाग-वाग हो गया।  पिताजी ने लंबे – लंबे कदम बढ़ाए और अरविंद को तकलीफ ना हो इसलिए उसे सामान सहित गोद में उठा लिया। अरविंद बोले – अरे! यह क्या  बाबू जी छोड़िए, गोद मे अच्छा नहीं लगता।  वे  कुछ नहीं बोले -बस अरविंद को लेकर बढ़ते रहें घर की ओर। रास्ते मे कपूरचंद जी को सवारी बना  देखकर सभी हँसते, कोई कहता- सेठ  जी को क्या सूझी, जो 12 साल के लड़के को गोद में लेकर जा रहे है।  कोई कहता- पहलवानी दिखा रहे है।  परंतु कोई भी पिता के हृदय की वात्सल्यभरी भावना को नहीं समझ पा रहा था। 

पिता की गोद में चलने वाला वह अरविंद आज इतना बड़ा हो गया कि उसकी धर्मगोद  में/ शरण में सारे देश के भक्त, श्रावक, साधक  तथा स्वयं के माता-पिता भी दीक्षा लेकर अपूर्व  धर्म वात्सल्य को पा रहे है।

17. श्यामा के लाल का सेवा भाव

माँ श्यामा के लाल अरविंद, जो संसार की स्थितियों से था बहुत प्रभावित रोज-रोज पड़ोसियों का झगड़ा, तो कभी माँ  की शारीरिक हालत को देख वह  विचार में डूब जाता- वास्तव में यह संसार तो नश्वर है,कभी भी धोखा दे सकता है अत: समय रहते सावधान होना ही  बुद्धिमानी है।  जैसे-जैसे अरविंद भैया बड़े होते गये उनका वैराग्य भी प्राप्त हुआ निरंतर वृद्घि को। उनके वैराग्य रूपी वृक्ष को विकसित होने में पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी द्वारा धर्मरूपी नीर मिला सन 1975 में, जब कि वे विराजे थे कटनी नगर में। पूज्य आचार्य श्री का स्वास्थ्य अत्यधिक खराब था, अत: अरविंद भैया हो गये गुरुवर की सेवा में  तत्पर। 

एक दिन पूज्य आचार्य श्री को बहुत तेज बुखार था, सारा शरीर अग्नि की तरह तप रहा था, आचार्य श्री ने पंडित जगनमोहन लाल जी को आवाज दी, परंतु अरविंद की नींद खुल गई, आचार्य श्री ने कमण्डल की ओर संकेत किया, अरविंद ने पूछा- आचार्य श्री शौच  चलना है क्या? नहीं- लघु शंका। अरविंद ने एक हाथ में पकड़ा कमण्डल तथा दूसरे हाथ से दिया सहारा आचार्य श्री को। पास ही देहलान में आचार्य श्री लघु शंका हेतु बैठ गये। अरविंद कुछ समय तक तो पकडे रहे पर जेसे ही लघुशंका प्रारम्भ होने लगी  तो मर्यादा वश- अब छोड़ देना चाहिए ऐसा सोचकर जैसे ही छोड़ा तो यह क्या हुआ? आचार्य श्री गिर पड़े, देखते ही  अरविंद भैया चीख उठे तथा शीघ्र गुरुवर को सहारा दे घास पर लिटा दिया परंतु दुखित मना अरविंद के नेत्रों  से प्रभावित हो रहे थे, पश्चाताप के अश्रु।

पूज्य आचार्य श्री ने देखा तो बोले- कुछ नहीं।अरविंद भैया ने क्षमा माँगी  तो पूज्य आचार्य श्री ने अपना वात्सल्य भरा हाथ रख दिया अरविंद के ऊपर और कहा- शांत हो जाओ।

इस घटना से अरविंद का बाल मन बहुत प्रभावित हुआ कि धन्य है दिगंबर संत जो बाईस परिषहो को  हंसते-हंसते सहते हैं। किसी पर कुपित नहीं होते, भले ही कोई उनका कुछ भी अपकार करें। उनका हाथ सदैव आशीर्वाद व सहारा देने को उठता है। मानवीय गुणों की जीवंत प्रतिमा होते हैं वे।सच, तभी तो किसी ने कहा है- संत ना होते जगत में तो जल जाता संसार संत हमे इतना कुछ देते हैं पर हम उन्हें क्या दे पाते हैं? मैं इन्हीं के पद चिन्हों पर चलूंगा अगर नहीं चल सका तो भी तन-मन से तैयार रहूंगा इनके राह के कांटों को हटाने में, इन गुरुओं का उपकार चुका नहीं पाऊंगा पर आभारी रहूंगा जीवन भर। और मन में ठान लिया कि अब मैं तत्पर रहूंगा अहनिर्श साधु-संतों की सेवा मे।

वर्तमान में आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के मन में जो साधर्मी संतों के प्रति अपार श्रद्धा है उसकी नींव यही थी।

18. क्षमा का पाठ

1977 जब अरविंद भैया कटनी शांतिनिकेतन विद्यालय में अध्ययनार्थ दत्तचित थे। प्रायः वे स्कूल में शांत छात्रों में गिने जाते थे फिर भी एक दिन किसी लड़के से गलती ना होने पर भी झगड़ा हो गया, और उस लड़के ने अरविंद को गाली दे दी। गाली सुनकर उन्हें बहुत बुरा लगा फिर वे चुप हो गये। पर इस बात की शिकायत उन्होंने स्कूल के शिक्षक श्री धन्यकुमार जी से कर दी। तब उन्होंने देखा कि अरविंद का चेहरा उतरा हुआ है थे अतः वे प्रेम से समझाते हुए बोले कि- अच्छा उसने तुम्हें गाली दी। हां, पंडित जी! अच्छा, तो बताओ कि उसने गाली दी तो वह कहां है। सुनकर वे- आश्चर्य से देखने लगे। पंडित बोले- बताओ तो सही, जेब में रख ली या पेटी में। अरविंद ने कहा- पंडित जी गाली कोई दिखने की वस्तु तो है नहीं, जो मैं आपको दिखा दूं। पंडित बोले- इसका मतलब उसने गाली दी, तुम्हारे पास नहीं, तो तुमने ली नहीं, फिर क्यों तुम्हें बुरा लगा।

सुनो! घर में कोई रिश्तेदार तुम्हें पैसा- रुपया दे और तुम ना लो, तो वापस वे उसी के ही रहते हैं। उसी प्रकार उसने गाली दी, तुमने नहीं ली, तो वह तो उसी लडके के पास लौट गई। तुम्हें दुखीत होने की क्या बात। जो जैसा करता है उसका फल आज नहीं तो कल अवश्य मिलेगा। हमें तो सदैव उन्हें क्षमा करते रहना चाहिए। अरविंद ने उस दिन से एक ऐसा क्षमा का पाठ सीखा जो वृद्धिगंत होता हुआ अपकारियो के प्रति भी उत्तम क्षमा के रूप में फलीभूत हो रहा है।

19. त्यागी बना महात्यागी

सन 1977 में अरविंद जब अध्ययनरत थे कटनी के शांति निकेतन स्कूल में, तब वे अध्ययन के साथ-साथ बढ़ाते थे अपनी वैराग्य शक्ति को भी, उनके ऊपर पंडित धन्य कुमार जी शास्त्री के धर्म- संस्कारों का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने भी प्रारंभ कर दी पूजा, स्वाध्याय, सामाहिक आदि करना। खाना भी खाते तो मौन पूर्वक ही, साथ ही करते पर्व के दिन अष्टमी व चतुर्दशी को एकासन। इतनी छोटी उम्र और इतनी अच्छी चर्या देख करते सभी बड़े जन प्रशंसा, प्रमोदवश कुछ सहपाठी जी तो उनके आते ही कह उठते- लो, त्यागी जी आ गये। एक दिन अरविंद जब बैठे थे मौन पूर्वक भोजन करने तभी कुछ शरारती सहपाठी बाहर से झाड़ू और बाल्टी ले आये और रख दी अरविंद के सामने और बोले- लो महाराज,ये आपके पिच्छी कमण्डल। पर वे भोले सहपाठी क्या जानते थे कि ये अरविंद सचमुच ही एक बड़े महाराज बनने वाले हैं।

अरविंद सहपाठियों के द्वारा प्रमोद भाव में परेशान किए जाने पर भी कभी बुरा नहीं मानते थे, क्योंकि वे बहुत धैर्यशील व गंभीर थे वे मन में सोचते- ये नासमझ है, अनजान है, इसलिए शरारत कर रहे हैं सभी मेरे छोटे भाई की तरह है।

अरविंद का धैर्य अपूर्व ही था, बचपन के ये छोटे त्यागी जी आगे चलकर बनेंगे महत्यागी पूज्य गुरुदेव श्री विराग सागर जी, यह कोई न जानता था।

20. निडर अरविंद

अरविंद भैया थे एक गुणग्राही व श्रेष्ठ विद्यार्थी सन 1978 में जब वे थे कटनी में तब पंडित श्री धन्य कुमार जी के साथ रहा करते थे पंडित जी धार्मिक व स्वाध्यायशील थे, अरविंद भैया पंडित जी के साथ उन्हीं जैसी क्रियाओं को करते थे उन्हीं के साथ भोजन करते व लाइब्रेरी आदि भी जाते पंडितजी भी सुनाते समय समय पर अच्छी-अच्छी धार्मिक कहानियां । यही कारण था कि वे एक धार्मिक निडर छात्र थे ।

अरविंद भैया के कटनी शांति निकेतन स्कूल में लगा था एक वृक्ष, किसी ने अरविंद से कहा, देखो अरविंद उस वृक्ष के पास रात्रि में नहीं जाना वहां चुड़ैल रहती है, अरविंद भैया ने सोचा चुडैल कैसी होती है चलकर देखना चाहिए, निर्भीक अरविंद भैया मित्रों के साथ पहुंच गए चुड़ैल से मिलने, पर ये क्या? चुड़ैल से तो मुलाकात भी ना हो सकी। वे वापस आ गए तो अन्य मित्रों ने उन्हें उकसाया और बोले- अच्छा, तुम्हें चुड़ैल से डर नहीं लगता, तो रात्रि भर इस वृक्ष पर बैठकर दिखाओ, अरविंद भैया निर्भीकता से वृक्ष पर चढ़ गये तथा रात भर णमोकार मंत्र पढते बैठे रहे परंतु न तो कोई चुड़ैल आई और ना ही उसके भाई भूत-प्रेत। जो निर्भक होता है, णमोकार मंत्र पर दृढ श्रद्धान रखता है उसके पास आने से तो चुड़ैल भी डरती है।

अरविंद भैया की निडरता और दृढ़ श्रद्धा ने ही तो उन्हें बना दिया एक महान संत – आचार्य विराग सागर जी

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