Aacharya Shri 108 Virag Sagar Ji Sansmaran5

SANSMARAN

41. सावन बरसा वात्सल्य का

सन् 1980 दुर्ग चातुर्मास की बात है प.पू. आ. श्री के अष्टाहिका पर्व आठ उपवास चल रहे थे, तब मैना बाई वैयावृत्ति हेतु घी- कपूर मथकर लाती थी | एकबार पू. क्षु. जी का आहार के प्रारंभ में ही अंतराय हो गया, वे जैसे ही पू.आ. श्री के पास पहुँचे तो पू.आ. श्री अपने सिर में लगे हुए घी को निकाल कर, स्वयं क्षु.जी के सिर पर लगा दिया, तथा कहा अब तुम्हें परेशानी नहीं होगी। ऐसे अनेकों बार लगाया।

रायपुर में वास्तव्य था, भीषणगर्मी का समय, दिनभर गर्म-2 धूप-लपट और रात को भी गर्म-2 हवा, स्थान भी गर्म-2 तपता था। एक दिन रात्रि को पू.आ. श्री ने देखा की क्षु. जी सो रहे हैं| उन्होंने धीरे से उनका दुपट्टा उठाया, कमण्डल के पानी से भिगोकर, निचोया और खोलकर क्षु.जी के ऊपर ओडा दिया, यद्यपि क्षु. जी की नींद आहट से खुल गई थी, पर डरते थे, मना कैसे करूँ, अत: वे बन कर सोते-2 सब देखते रहे, तब पू.आ. श्री दुपट्टा उड़ाकर चले गये तो क्षु.जी को अच्छी नींद आ गई। 

 

धन्य है क्षु. जी के प्रति पू.आ. श्री का असीम वात्सल्य जो उनके ऊपर सदैव सावन के बादलों की तरह बरसता रहता है।

42. गुरु आज्ञा सर आँखों पर

क्षुल्लक पूर्ण सागर जी अपने गुरुवर आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज के साथ सन् 1981 में विराजमान थे फाफाडीह मन्दिर रायपुर में, एक अंतेवासिन आज्ञाकारी शिष्य की तरह, तभी अचानक एक दिन एक घटना घट गई, हुआ यों – एक दिन पूज्य आचार्य सन्मति सागर जी क्षुल्लक पूर्ण सागर जी से बोले-आज आपको एक काम करना है। क्षुल्लक जी अति प्रसन्न, क्या आज्ञा है गुरुदेव तुम्हें यह पुरानी चटाईयों का गट्ठा दूसरे मन्दिर तक रख कर आना है, गुरु समय-समय पर अपने शिष्यों की परीक्षा भी लेते हैं कि इसने अभिमान को कितना जीता है, यों लगता है शायद क्षुल्लक जी की भी परीक्षा हो रही है, जब गुरु की अटपटी सी आज्ञा सुनी तो क्षुल्लक जी अचंभे में पड़ गये परन्तु फिर सोचा – गुरु आज्ञा जीवन में सर्वोपरि होती है चाहे वह आज्ञा कैसी भी क्यों न हों, अत: उठाया गट्ठा ओर चल दिये, रास्ते में बाजार में होकर गुजरना हुआ, जैसे ही किसी श्रावक की नजर पहुँची, वह बोला -महाराज इस   को आप यही रख दे मैं लेकर जाता हूँ, गुरु आज्ञा पालन करने में दृढ क्षुल्लक जी बोले- इसे ले जाने की गुरु आज्ञा को सर्वश्रेष्ठ उपहार मान स्वीकार किया है, मेरा सौभाग्य जो गुरु ने कुछ आज्ञा दी। गुरु आज्ञा तो शेषाक्षत की तरह मंगल होती है। और कोई होता तो सोचता मैं यह गट्ठा लेकर बाजार से कैसे निकलूं, लोग देखकर हँसेंगे। परन्तु क्षुल्लक जी ने तो गुरु आज्ञा का पालन सौभाग्य मानकर किया, शायद उसी का प्रतिफल कि आज आप प्रत्येक कष्ट को आसानी से सहने में अपने आप को समर्थ पाते हैं और उपलब्धियाँ  आपके कदम चूमती हैं।

43. शराबी से हो गई मुलाकात

क्षुल्लक पूर्ण सागर जी अपने गुरुवर परम पूज्य आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज के साथ नागपुर चातुर्मास के बाद दर्शनार्थ चल दिये मुक्तागिरि की ओर, सन् 1981 में। एक दिन क्षुल्लक पूर्ण सागर जी, एक वयोवृद्ध क्षुल्लक रवि सागर जी को सहारा देते हुए चल रहे थे परिणाम यह निकला कि उस दिन क्षुल्लक जी रह गये पीछे धीरे-धीरे चलने के कारण शाम होने लगी, तब साथ चल रहे श्रावक गुलाबचन्द जी परतवाड़ा क्षुल्लक जी के पास अपनी राजदूत लेकर आये और बोले- रास्ता लंबा है रात्रि न हो जाए अत: आप इस पर बैठ जाइए, चूंकि क्षुल्लक रवि सागर जी वृद्ध थे अत: वे बैठ गए | परन्तु पूर्ण सागर जी बोले – आप चलिए मैं द्रुतगति से चलकर आता हूँ। क्षुल्लक जी द्रुतगति से आगे बढ़ दिये, तभी किसी ने पीछे से आवाज लगाई – है शांति सागर रुकिये! क्षुल्लक जी ने समझा कि शायद कोई भक्त होगा इसलिए दर्शनार्थ दौड़ा आ रहा है अत: वे रुक गये परन्तु ये क्या जैसे ही वह आया उसने क्षुल्लक जी के पैर पकड़ लिये क्षुल्लक जी ने पैर छोड़ने को कहा, तो वह बोला- पहले मुझे अपने जैसा बनाओ तभी छोडूंगा।

क्षुल्लक जी समझ गये – यह कोई शराबी है नशे में है अत: बोले – ठीक है, मैं तुम्हें अपने जैसा अभी बनाता हूँ, पर मुझे छोड़ो तभी तो बनाऊँगा, जैसे ही उसने पैर छोड़े क्षुल्लक जी उल्टी परिक्रमा लगा तेजी से आगे बढ़ दिये, पहले तो वह शराबी अचम्भे में पड़ गया कि बाबा कहाँ गायब हो गये, पर जैसे ही उसकी नजर पड़ी क्षुल्लक जी पर तो वह बोला – अरे कहाँ जाते हो रुको नहीं तो भस्म कर दूंगा, क्षुल्लक जी तो तेजी से कदम बढ़ाते हुए चले जा रहे थे परन्तु शराबी तेज़ी से दौड़ा और क्षुल्लक जी का दुपट्टा जैसे ही खींचा क्षुल्लक जो ने तुरन्त पकड़ लिया, अब एक छोर उस शराबी के हाथ में और दूसरा छोर क्षुल्लक जी के हाथ में था,खींचातानी जारी थी क्षुल्लक जी ने सोचा यदि दुपट्टा चला गया तो आचार्य श्री डाटेंगे की दुपट्टा भी नहीं संभाल सकते। इतने में सामने  से आती गायों का झुण्ड दिखा, क्षुल्लक जी तुरन्त उन्हें बीच में कर स्वयं एक तरफ व शराबी दूसरी तरफ हो गया और दुपट्टा छुड़ा पुनः आगे बढे  परन्तु उस शराबी ने पुनः आगे दौड़ कर अबकी बार तो दुपट्टा छीन लिया और भाग गया तब क्षुल्लक जी बिना दुपट्टे के ही आगे बढः दिये।

वहाँ जब तक गुलाबचन्द जी रवि सागर जी को छोड़कर आ गये पर ये क्या क्षुल्लक जी के पास तो दुपट्टा ही नहीं है अत: प्रमोद भाव से बोले – अरे क्षुल्लक जी, अपने दुपट्टे का त्याग कब कर दिया। क्षुल्लक जी बोले – आपको मजाक सूझ रही है और सारी  घटना कह सुनायी, गुलाबचन्द जी बोले महाराज! आप पहुँचने ही वाले हैं कुछ ही दूरी बची है आप चलिये तब तक मैं उस शराबी से दुपट्टा लेकर आता हूँ। यहाँ क्षुल्लक जी शीघ्र ही मुक्तागिरि पहुंच गये और वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले आचार्य श्री के पास जाकर सारी घटना सुनायी, आचार्य श्री ने नया दुपट्टा दे दिया तब तक टेक्सी वाला आ गया पर क्षुल्लक जी बोले – इसे तुम्ही रखे लो मुझे तो दुसरा मिल गया है।

 

गुरुवर के जीवन की इस घटना से ज्ञात हुआ कि वे बाह्य परिस्थितियों या परेशानियों से नहीं डरते अपितु गुरु की नजरों से | गिरने का भय उन्हें अधिक रहता था, गुरु के प्रति इसी आदर भाव ने क्षुल्लक जी को पहुंचा दिया उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर।

44. वृद्ध सेवा प्रेमी

यह घटना है सन् 1981 की, जब क्षुल्लक पूर्ण सागर जी विहार कर रहे थे अपने गुरुवर तपस्वी सम्राट प. पू. आचार्य सन्मति सागर जी के साथ, पूज्य गुरुवर ने विहार प्रारम्भ किया और चलते-चलते एक कि.मी. दूर निकल गए, पीछे मुड़कर देखा तो क्षुल्लक जी गायब, अरे क्षुल्लक पूर्ण सागर कहाँ रह गया, गुरुवर ने कुछ लोगों को पीछे भेजा क्षुल्लक जी को देखने, तो लोगों ने देखा क्षुल्लक पूर्ण सागर जी तो एक वृद्ध क्षुल्लक रवि सागर जी को डोली में बिठा रहे हैं क्योंकि वे पैदल चलने में असमर्थ थे क्षुल्लक जी वृद्ध सेवा प्रेमी थे उनका विचार था कि आज के समय में वृद्धों की सेवा कोई नहीं करना चाहता है इसलिये वे ही ध्यान रख लेते थे उनकी उसी वृद्ध कल्याण की भावना ने अनेक वृद्धों को मुक्ति पथ पर लगाया दीक्षा दी तथा आज भी वृद्ध सेवा में संलग्न हैं।

 

आचार्य बनने के उपरान्त जब गुरुवर ने वृद्धों को दीक्षा देना प्रारम्भ किया तब एक व्यक्ति ने आकर कहा- आचार्य श्री! आप वृद्धों को दीक्षा क्यों देते हैं? वृद्धों का अधिक ध्यान रखना पड़ता है तथा परेशानी भी होती है, तब पूज्य गुरुवर ने सहज भाव से कहा वृद्धों की सेवा साधु जीवन में अनेक उपलब्धियां प्रदान करती है, उनके साथ उठने-बैठने से हमें जीवन के बहुमूल्य अनुभव प्राप्त होते हैं, जिससे वैराग्य और संयम दृढ़ होता है, वृद्धों के साथ सदा धर्म ध्यान की वृद्धि ही होती है वे एक-एक समय की कीमत समझते हैं, कुछ न कुछ सुनने-पढ़ने की भावना रखते हैं जिससे हमारा विषय भी Complete (पूर्ण) होता है तथा उनके सम्पर्क से विनय, नम्रता आदि गुण सहजता में ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही मोक्षमार्ग कल्याण का पथ है और आत्म-कल्याण का अधिकार सबको समान है चाहे वह बाल हो या वृद्ध । संसार रुपी कीचड़ से निकलकर जो आत्म कल्याण की भावना रखते हैं उनका वैराग्य यौवनावस्था वाले से अधिक गाढ़ है क्योंकि जिसने कीचड़ में पैर ही नहीं दिया उसका निकलना आसान है परन्तु कीचड़ में लिप्त होने के बाद निकलना कठिन है। मुझे विश्वास है कि वृद्धों की सेवा से संवर व निर्जरा अधिक होती है। अत: हमें ऐसे वृद्धों की उपेक्षा नहीं अपितु मोक्षपथ पर बढ़ने वाले वृद्धों का सम्मान करना चाहिए।

आज आपकी यही वृद्ध सेवा की कामना विराट रुप ले चुकी है। अत: आप अनेकों वृद्धों की लाठी का सहारा हैं। उन्हें संयम पर चलाने में अटूट संबल प्रदाता हैं । बालकों के साथ-साथ वृद्धों के भी चहेते हैं।

45. प्रतिज्ञा दृढि

1981 नागपुर चातुर्मास की बात है जब क्षु. पूर्ण सागर जी अपने गुरु आ. श्री सन्मतिसागर जी आज्ञा-अनुशासन के पालन में पूर्णता दत्तचित्त रहते थे। एक बार चन्द्रमति माताजी जब गृहस्थ अवस्था में थी तो अड़ गई कि क्षुल्लक तो श्रावक है उनकी पादपूजा अर्घ नहीं चढ़ाऊँगी। जब यह खबर पू.आ. श्री को ज्ञात हुई तो उन्होंने सारे क्षुल्लकों को बुलाया था तथा कहा- ये महिला जब तक अर्घ पादपूजा करना प्रारंभ न करे, तब तक कोई इसके चौके में मत जाना। क्योंकि प्रतिज्ञाएँ-नियम साधु जीवन के प्राण है एक बार भूखे रह जाना, उपवास कर लेना अच्छा पर आगमिक नियमों को तोड़कर आहार लेना अच्छा नहीं। तो क्षु.जी तो प्रतिज्ञाओं का निर्वाह बड़ी दृढ़ता से करते थे, कई दिन तक उनके चौके में क्षु.जी का आहार नहीं हुआ फिर एक दिन स्वयं आई और फिर पू.आ. श्री की आज्ञा से मना-मनाकर (खुश करके) चौके में ले गई, पादपूजा अर्घ किया। तब क्षुल्लक जी ने आहार प्रारंभ किया। और बाद में इतनी पू.आ. श्री से प्रभावित हुई कि दीक्षा का श्रीफल चढ़ाकर चन्द्रमति माता जी बन गई।

46. आप जीते मैं हारा

1982 में आ.श्री सन्मतिसागर जी की आज्ञा व आशीर्वाद से क्षु. पूर्णसागर का चातुर्मास कारंजा में सम्पन्न हो रहा था। वहाँ पर एक सज्जन श्री धन्यकुमार जी थे बड़े कट्टर सोनगढ़ी थे मुनिराजों को तो मानते नहीं थे, पर न मालूम क्यों छोटी अवस्था के नाते क्षु.जी की परिचर्या  से बड़े प्रभावित थे फिर भी क्षुल्लकों के पादप्रक्षालन पूजा के विरोधी थे। उनके घर जब चौका लगा तो क्षुल्लक जी का उनके यहाँ आहार नहीं हो पा रहा था तभी गाँव में खबर फैल गई कि ये धन्यकुमार जी खड़े नहीं होते इसलिए महाराज नहीं आ रहे हैं। तो उनकी माँ ने कहा- क्यों रे ! क्यों खड़ा नहीं होता। वे क्षु.जी के पास आये और बोले महाराज क्या आपका आहार तभी होगा, जब मैं खड़ा होऊँगा। पर क्षु.जी के मन में ऐसा कुछ विचार था ही नहीं, फिर भी क्षु.जी ने कुछ नहीं कहा- क्योंकि वे अपनी प्रतिज्ञाओं के पालन में दृढ़ थे। दूसरे दिन वे स्वयं पड़गाहन हेतु खड़े हुये, और योगायोग क्षु.जी को दिख गये, वे भी पड़ग गए। चौके में पहुँचे तो बड़ी संकोच-हिचहिचाहट के साथ पाद पूजा की और अर्घ भी चढ़ाया और हँसने लगे तथा बोले महाराज जी आप जीते तथा मैं हारा।

अतः पू.क्षु. जी की व्यस्थित परिचर्या तथा दृढ़ नियमों का प्रभाव कि अच्छे-2 कट्टर लोग भी श्रद्धा सहजता से नम्रीभूत हो जाते थे।

47. देवी के डर से भागा पिशाच

जो संयम के पथ पर अग्रसर होते हैं तो नियम से उन्हें परीक्षाओं के दौर से गुजरना ही पड़ता है, बात है सन् 1982 की जब अध्ययन हेतु अल्पवयी क्षुल्लक पूर्ण सागर जी विराजे थे कारंजा नगर में, तभी कर्म रुपी पिशाच ने क्षुल्लक जी के संयम की परीक्षा हेतु आक्रमण किया, और तपेदिक बनकर छोटे क्षुल्लक जी के शरीर में प्रवेश कर गया, परिणाम स्वरूप क्षुल्लक जी की हालत नाजुक हो गई, श्रावक जन भी घबरा गये कि अब क्या होगा? स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरा  ही जा रहा था फलस्वरुप शरीर क्षीण हो गया और इतना क्षीण होट गया कि क्षुल्लक जी न तो उठ-बैठ पाते, न ही आहार होता और न ही निद्रा आती, साथ ही चक्कर भी आने लगे। प्रायः लोगों की आँखों से आँसू आ जाते कि इतनी छोटी उम्र, इतनी कठिन तपस्या और ऊपर से बीमारी, परंतु क्षुल्लक जी अपनी साधना में तल्लीन रहते।

क्षुल्लक जी के द्वारे लगी रहती हितैषियों की भीड़ कोई कहता रोग असाध्य है, यदि उसका उपचार न किया गया तो बड़ा रुप ले सकता है अत: उचित इलाज करवा लें, आग्रह किया गया अंग्रेजी दवाइयों के सेवन का। क्षुल्लक जी की दृढ़ता से अनजान लोगों ने कहा कि अंग्रेजी दवा यदि आप लेंगे तो एक ही महीने में आराम हो जायेगा तथा देशी दवाई से 1 वर्ष लगेगा। अतः अभी दीक्षा छेद कर इलाज करवा लें पश्चात् दीक्षा लेकर पुनः संयम साधना में तत्पर हो जाना। क्षुल्लक जी इन मर्म भेदी शब्दों में सुन फटकारते हुए बोले आप लोग मुझे संयम से गिराना चाहते हैं, आपको तो चाहिए था कि मुझे साहस देते, संबल देते, सत्य ही है असंयमी क्या जाने संयम की कीमत, उसकी दुर्लभता। और क्षुल्लक जी पहुँच गये चन्द्रप्रभु भगवान की शरण में, तथा प्रभु की चरण सन्निधि में अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति का परिचय देते हुए प्रतिज्ञा की कि यदि मैं स्वस्थ हो गया तो जैनेश्वरी दीक्षा लँगा अन्यथा समाधि मरण करूँगा । परंतु संयम मार्ग से कभी चलायमान नहीं होऊँगा।

क्षुल्लक जी की प्रतिज्ञा को देख हतप्रभ था सारा कारंजा कि धन्य है इनकी दृढ़ता, इनकी संकल्प शक्ति । अतः श्रावकों ने देशी दवाइयों आदि के द्वारा सुश्रुषा प्रारंभ की। निर्मला ताई एक माँ की तरह  क्षुल्लक जी की सेवा में संलग्न रहती। फिर क्या था व्रतों के प्रति दृढ़ता रुप भाव, भगवान के नाम मंत्र की जाप, गुरु का आशीष तथा हितैषी लोगों की भावनाओं व सेवा का इतना श्रेष्ठ प्रभाव हुआ कि कर्मों को छोटे क्षुल्लक जी के समक्ष अपने घुटने टेकने पड़े, चले थे परीक्षा लेने, क्षुल्लक जी को संयम से डिगाने परन्तु क्षुल्लक जी की दृढ़ संकल्प शक्ति रुपी देवी के डर से कर्म रुपी पिशाच वहाँ से शीघ्र ही नौ दो ग्यारह हो गया। और 6 माह में ही स्वस्थ हो गये क्षुल्लक जी।

48. साधु तो साधु है स्वादु नहीं

एक बार क्षुल्लक पूर्ण सागर जी का सन् 1982 कारंजा में स्वास्थ्य अत्यन्त खराब हो गया था स्थिति ऐसी हो गई कि न तो क्षुल्लक जी का आहार होता, न ही निद्रा आती। फलस्वरुप कमजोरी बढ़ती जा रही थी। क्षुल्लक जी की अवस्था देख एक वृद्ध अम्मा आयी और क्षुल्लक जी से बोली- महाराज! आपको जो वस्तु खाने में रुचिकर हो, मुझे धीरे से बता दें, मैं किसी से नहीं कहूँगी व आप जो बताएँ मैं व्यवस्था बनाऊँगी, जिससे आपका आहार ठीक होगा और आहार ठीक होने से स्वास्थ्य लाभ भी होगा क्षुल्लक जी अम्मा की बातों को सुनकर मुस्कुराये और बोले- अम्मा! मेरा शरीर कमजोर है वैराग्य नहीं । ज्ञानामृत रूपी भोजन ही मेरे लिए सुस्वादु भोजन है। इन्द्रियों के विषयों के पोषण के लिए मैंने दीक्षा नहीं ली, साधु तो साधु होते हैं स्वादु नहीं, आपको तो मेरी साधना से संबल प्रदान कर साधक बनना चाहिए। अम्मा क्षुल्लक जी का उत्तर सुन आश्चर्य में डूब गई कि धन्य है यह छोटा सा क्षुल्लक। इसकी अवस्था छोटी है परंतु दृढ़ता बहुत बड़ी है और कहाँ हम जो जीवन की अंतिम अवस्था में आकर भी जीभ के स्वाद में अटके हैं। जरा सी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाए तो हम झुंझला जाते हैं लेकिन अनेक प्रतिकूलताओं में भी इसका वैरागी मन पुष्प की तरह खिल रहा है।

49. मैं घर क्यों छोड़ता

एक बार अपनी साधना में कठोर, दृढ़ निश्चयी क्षुल्लक पूर्ण सागर जी का सन् 1982 कारंजा (महाराष्ट्र) काष्ठा मन्दिर में अचानक स्वास्थ्य खराब हो गया था तब अनुभव हुआ संयम की परीक्षा लेने हेतु तपेदिक ने पैर जमाये है। फलत: न तो क्षुल्लक जी आहार करते, न ही उन्हें कुछ रुचता, दिन-प्रतिदिन कमजोरी बढ़ती जा रही थी, डॉक्टरों ने साफ हिदायत दे दी कि अब आपको न तो अध्ययन अधिक करना है न ही कोई मेहनत, मात्र आराम करना है। संयम पथ पर अडिग क्षुल्लक जी लेटे-लेटे ही स्वाध्याय सुनते तथा सभी के आग्रहानुसार आराम भी करना पड़ता, परन्तु लगातार काष्ठ के पाटे पर लेटे-लेटे उन्हें तकलीफ होती थी, यह देख एक भक्त क्षुल्लक महाराज के पास आया, बोला-महाराज! आपको काष्ठ का पाटा तकलीफ देता है मैं आपके लिए कपास का गट्ठा लाता हूँ जिससे तकलीफ नहीं होगी। अल्पवयी परन्तु ज्ञान वृद्ध क्षुल्लक जी अपने तेजस्वी स्वर में बोले – यह मोक्ष पथ वैराग्य का पथ है, आराम का नहीं, कष्ट सहूँगा तभी तो संवर व निर्जरा होगी, यदि आराम करना होता तो मैं घर क्यों छोड़ता? शब्द सुनते ही उस भक्त का मन क्षुल्लक जी की दृढ़ता देख अत्यन्त हर्षित हो गया, धन्य थी आपकी दृढ़ता जो आपके उज्ज्वल भविष्य का परिचय दे गयी।

50. खुन्खार कुता हुआ शांत

पूज्य गुरुवर जब थे क्षुल्लक पूर्ण सागर के रूप में तब सन् 1982 में आप विराजे थे परभणी (महाराष्ट्र) में क्षुल्लक जी शौच के लिए प्रतिदिन जाते थे गाँव के बाहर, जहाँ से निकलकर जाना होता था वहाँ सरकारी मकान  (Government Quarters) बने थे उनमें रहने वाला एक व्यक्ति विदेशी कुत्ता पालता था, उन कुत्तों में से एक कुत्ता बड़ा ही खूंखार और डरावना , इतनी तेज आवाज में भौंकता कि सभी डरते थे, प्राय: वह जंजीर से बँधा रहता था।

एक दिन क्षुल्लक जी दो-तीन लड़कों के साथ शौच हेतु जा रहे थे, तभी किसी ने उस कुत्ते को खोल दिया फिर क्या था वह तेजी से दौड़कर पीछे आने लगा, बच्चों ने पत्थर मारकर उसे भगाना चाहा परन्तु वह दौड़ा आ रहा था क्षुल्लक जी के पीछे, सब लड़के तो भागकर दूर खड़े हो गये क्षुल्लक जी ने सोचा अब तो वह समीप आ ही गया है अत: भागने से क्या फायदा, अब तो जो होगा देखा जायेगा, निर्भय क्षुल्लक जी कार्योत्सर्ग पूर्वक णमोकार मंत्र का ध्यान करते हुए खड़े हो गये, पर आश्चर्य उत्पन्न करने वाली घटना घटी कि क्षुल्लक जी के शरीर से निःसृत पवित्र आभामण्डल से प्रभावित हो वह कुत्ता एकदम शान्त हो गया और पालतू कुत्ते की तरह पूंछ हिलाने लगा और क्षुल्लक जी के पैर के पास उछल-कूद करने लगा, मानो क्षुल्लक जी का पूर्व से ही परिचित हो और उनके साथ खेलने हेतु ही आया हो।

यह था क्षुल्लक जी का श्रद्धा सहित णमोकार मंत्र पढ़ने का तथा पवित्र आभामण्डल प्रभाव, जिससे खूंखार प्राणी भी शांत चित्त हो गया।

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