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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*?॥ श्री तीर्थंकराय नम ॥?*
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*? प्रथमानुयोग*
*? सोलह कारण भावना– 73*
*? 8.साधु समाधि भावना ?*
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*साधुसमाधि भावना*
जन्म और मरण क्या है? जीव द्वारा नई पर्याय का धारण करना जन्म है और पहली पर्याय को छोड़ना मरण है। जन्म मरण से रहित सिद्ध पर्याय तक पहुँचने के लिए जीव को सोलह कारण भावनाएँ भानी श्रेयस्कर हैं।
समाधि का अर्थ है मरण। साधु का अर्थ है श्रेष्ठ, अच्छा। अतः श्रेष्ठ मरण को साधु समाधि कहते हैं। साधु का दूसरा अर्थ है सज्जन। ऐसा मरण यदि एक बार कर ले तो कल्याण हो जाता है। जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त हो जाता है। बच्चों व बड़ों सभी का जन्म दिन मनाते हैं, बच्चों के जन्म पर मिठाइयाँ बाँटते हैं किन्तु इसके साथ मरण का भय लगा रहता है। न जाने ऐसे जन्म मरण कितने बार किये। वस्तुतः जीवन मरण कोई चीज नहीं है यह तो पुद्गल का स्वभाव है। जन्मदिन मनाना महान अज्ञानता है, मिथ्यात्व है।
जैसे भंडार में लगी हुई आग को गृहस्थ अपनी उपकारी वस्तुओं का नाश होता जानकर बुझाता ही है क्योंकि अपनी उपकारी वस्तुओं की रक्षा करना बहुत आवश्यक है उसी प्रकार व्रत-शील आदि अनेक गुणों सहित जो व्रती संयमी को किसी कारण से विघ्न आ जाय तो विघ्नों को दूर करके व्रत शील की रक्षा करना साधुसमाधि है अथवा गृहस्थ अपने परिजनों को बिछाड़ने वाला मरण काल आ जाये, उपसर्ग आ जाये, रोग आ जाये, इष्ट वियोग हो जाये, अनिष्ट संयोग आ जाये उस समय व्यथित नहीं होना साधु समाधि है।
*साधु कथा*
एक अच्छे सेठ के एक अच्छा गुणी सुंदर युवक पुत्र था, उसके सिवाय उसकी कोई संतान न थी। अतः माता-पिता का उस पर बहुत अनुराग था। उसकी पत्नी भी उससे बहुत प्रेम करती थी। धनिक होने से उसके मित्र भी काफ़ी अधिक थे। सब परिवार उसके सुख-दुःख में और अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझते थे और कहते थे कि जहाँ पर तुम्हारा पसीना गिरेगा वहाँ हम अपना रक्त बहा देंगे। तुम्हारी रक्षा के लिये अपने प्राणों का बलिदान कर देंगे आदि-आदि। सेठ का पुत्र भी अपनी छोटी-सी दुनिया में आनंद विभोर होकर सोचता था, इससे अधिक और बढ़िया सुख मुक्ति में क्या होगा?
एक दिन एक साधु मित्र को यह कहता हुआ जा रहा था कि संसार झूठा है, इसमें कुछ भी सार नहीं है। साधु के ये वाक्य उस सेठ के सुखी पुत्र ने भी सुने, उसको साधु के वचन निःसार प्रतीत हुए। उसने सोचा कि प्रत्येक जीवन अपने दृष्टिकोण से देखता है, साधु के पास कुछ सुख साधन तो नहीं हैं, भीख माँगकर अपना जीवन निर्वाह करता है, इसी कारण उसके प्रयोजन भी नहीं, अतः इस साधु को यह सुखमय संसार निःसार दिखता है। मुझे तो संसार में सब सार दिखता है।
फिर भी सेठ के पुत्र के हृदय में साधु के वाक्य अंकित हो गये, उनको भुला न सका, बार-बार सोचता था कि साधु के कहने का कुछ अभिप्राय ज़रूर होगा। दूसरे दिन भी अलख जगाता हुआ ऊँचे स्वर में वही वाक्य कहता हुआ निकला। दूसरे दिन सेठ के पुत्र ने साधु की आवाज़ सुनी, यद्यपि उसदिन साधु की बातों पर विश्वास न हुआ, क्योंकि उसके चारों ओर सुख का अपार सागर लहरें मार रहा था, परन्तु फिर भी उसके हृदय में साधु की बातों को जानने की इच्छा हुई।
अतः वह अपने नित्य नियम से निपट कर दुकान पर गया। वहाँ कार्यों की देखभाल कर कर्मचारियों को आवश्यक बातें बतलाईं और दुकान से टाइम निकाल कर बड़ी खुशी के साथ साधु की कुटिया पर जा पहुँचा। वहाँ पर उसने देखा कि साधु अपनी भिक्षा में मिले हुए रूखे-सूखे भोजन को खाकर अपने पैर फैलाकर आराम से सो रहा है। यह देखकर उसके हृदय में यह शंका हुई कि साधु अपनी दरिद्रता से संसार को असार-असार मान रहा है।
साधु ने सेठ के पुत्र को देखा और संकेत से अपने पास बैठ जाने को कहा। तत्पश्चात लेटे-लेटे ही साधु ने पूछा कि बच्चा! तू यहाँ किस कार्य के लिये आया है? सेठ के पुत्र ने नम्रता के साथ साधु से कहा कि महाराज! आप नगर में भिक्षा माँगते समय अलख जगाते हुए संसार को झूठा और निःसार होने की बात कहते हैं, वह मुझे सत्य प्रतीत नहीं होता, अतः उसके विषय में सन्तोषजनक समाधान चाहता हूँ।
साधु उठकर बैठ गया और मीठी वाणी में बोला कि बच्चा! अपने प्रश्न का समाधान तो तू स्वयं अपने अनुभव से ही करेगा। मेरे कहने से समाधान नहीं होगा। सेठ ने कहा कि यह मार्ग ही दिखा दीजिये।
तब साधु बोला कि आज तेरे यहाँ सोना-चाँदी है, जिसको तू धन समझ रहा है, किन्तु हो सकता है कि इसे चोर डाकू चुरा या लूट लें, अग्नि इसे भस्म कर दे, या व्यापार में घाटा आ जाये, तेरे पास एक कौड़ी भी न रहे। उस समय तेरा यह सुख का सागर क्षण भर में गर्मियों में छोटे तालाब की तरह सूख जायेगा, बता उस समय संसार झूठा होगा या सच्चा? सेठ के पुत्र ने गम्भीरता से कहा कि ठीक है महाराज! मैं जिसे धन समझता हूँ, वह नष्ट हो सकता है, परन्तु मेरे सुख का सागर कैसे सूख सकता है, मेरे प्रियजन तो मेरे सब तरह सहायक हैं। साधु हँसते हुए बोला—भोले बच्चे! तेरा धन नष्ट होते ही तेरे प्रियजनों का प्रेम भी क्या ऐसा ही हरा-भरा बना रहेगा? अपने प्रियजनों के जिस प्रेम पर तुझे इतना गर्व है, यदि तू परीक्षा करना चाहे तो वह भी तुझे उतना नहीं मिलेगा, जितना की तू समझ रहा है।
सेठ के पुत्र ने विस्मय और कौतूहल से पूछा कि महाराज! किस विधि से उनके सच्चे प्रेम की परीक्षा लूँ? साधु ने मुस्कराते हुए उसे प्राण रोकने की तथा अपने शरीर को मृतक जैसा बना लेने की विधि बतलाई और कहा कि कल प्रातः तू अपने आपको इस विधि के अनुसार मरे के समान बना लेना, फिर तुझे अपने माता-पिता, पत्नी, मित्र आदि के अथाह प्रेम की परीक्षा हो जायेगी, तेरे प्रश्न का समाधान तेरे सामने आ खड़ा होगा। परन्तु यदि ठीक परीक्षा करना चाहता है तो यह बात अपने तक ही रखना।
सेठ के पुत्र ने भी मुस्कराते हुए विश्वास के साथ साधु की बात स्वीकार की और वैसा ही करने के लिये घर पर चला गया।दिन के सारे कार्य करने के बाद रात्रि को प्रतिदिन की तरह आराम से सो गया, परन्तु प्रभात होने की उत्सुकता उसे बनी रही। प्रभात होते ही वह शैया से उठा और उसने माता से कहा कि माँ! मुझे रात को बहुत बुरा स्वप्न आया है। इतना कहकर वह यह कहते हुए जमीन पर लेट गया कि मेरा हृदय घबरा रहा है। इतना कहते-कहते साधु द्वारा बताई विधि के अनुसार वह एक श्वास रोककर अकड़ गया, मृत जैसा बन गया।
उसकी माँ ने अपने पुत्र को मरे जैसी हालत देखी तो वह घबराई और दहाड़ मार-मारकर रोने लगी। अपनी सास का रोना सुनकर उसकी बहू भी आ गई, पिता भी आ गया, और क्षण भर में उसके सारे मित्र भी वहाँ एकत्र हो गये। सभी ने उसकी सच्ची मृत्यु समझकर जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया।
वह साधु भी नियत समय पर अलख जगाता हुआ उधर जा निकला। सेठ के घर में जोर-जोर से रोने का शब्द सुनकर साधु ने सारा मामला जान लिया और सेठ के घर में भीतर जा पहुँचा। रोने वाले लोगों से पूछा कि भाई! क्या बात है? लड़के के मित्रों ने सेठ के पुत्र की ओर संकेत करके कहा कि हमारा प्राण प्यारा मित्र मर गया है। साधु को वहाँ देखकर उस युवक के माता, पिता, पत्नी तथा उपस्थित मित्र और जोर-जोर से रोने लगे, और रोते-रोते यह कहने लगे कि तेरी बजाय हम मर जाते तो अच्छा था।
साधु उस लड़के के पास बैठ गया, और उसको देखकर रोने वालों से बोला कि ठहरो, रोना बंद करो, मैं इसे जीवित करता हूँ। साधु की बात सुनते ही सब चुप हो गये। साधु ने एक गिलास में पानी मंगवाया और कुछ मंत्र पढ़कर तथा थोड़ी-सी उसमें भस्म डालकर उन सब रोने वालों से कहा कि अब तुम में से कोई भी एक व्यक्ति इस पानी को पी लो। जो इस पानी को पियेगा वह मर जायेगा और यह सेठ पुत्र जीवित हो जायेगा।
साधु की बात सुनकर सब स्तब्ध (हक्के-बक्के) हो गये, किसी के मुख से स्वीकार का शब्द न निकला। तब साधु ने उसके माता-पिता से पूछा कि तुम दोनों में से एक व्यक्ति अपने प्राण देकर अपने प्राण प्यारे पुत्र को बचा लो। दोनों बूढ़े हो चुके थे। दोनों ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि महाराज! पुत्र तो और भी आ जायेगा, या किसी का गोद ले लेंगे, मगर प्राण तो नहीं आ सकते। तब साधु ने उसकी पत्नी से जलपीने को कहा। पत्नी बोली—महाराज! अभी मैंने संसार में कुछ नहीं देखा, आप मरें तो जग सूना। अपना वैधव्य (रांडापा) जैसे-तैसे काट लूँगी। तब साधु ने मित्रों से पूछा। सब बोले कि हम अपने घर वालों से पूछ कर जल पी सकते हैं। तब साधु ने कहा अच्छा इस जल को मैं पी लेता हूँ। साधु की बात सुनकर सब एक साथ बोल उठे—नहीं महाराज! आप ही पी लीजिये, बड़ी कृपा होगी।
तब साधु ने मुस्कराते हुए जल पी लिया, और सेठ पुत्र को हाथ का सहारा देकर कहा—उठ बच्चा! उठा। साधु की बात सुनते ही सेठ पुत्र मुस्कराता हुआ उठ बैठा और साधु से बोला—महाराज! आपका कहना सत्य है। यह स्वार्थमय संसार यथार्थ में असार है। उसने सर्व परिग्रह का त्याग कर दिगंबर मुनि दीक्षा लेकर आत्म-साधन किया, पंच पापों का त्याग कर महाव्रत धारण कर साधु समाधि साधन किया।
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*✍️ संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 13.02.2026*
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2026-02-13 06:42:48 |
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