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40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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2026-02-16 06:32:00 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*?॥ श्री तीर्थंकराय नम ॥?*
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*? प्रथमानुयोग*
*? सोलह कारण भावना– 76*
*? 11.आचार्य भक्ति भावना ?*
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साधु संघ के अधिनायक आचार्य कहलाते हैं उनकी भक्ति करना आचार्य भक्ति कहलाती है
‘आचार्य’ एक पद है जो कि मुनि संघ के सबसे अधिक तपस्वी, अनुभवी, देश, क्षेत्र, काल भाव के ज्ञाता, पाँच आचार्यों के पालक, प्रायश्चित शास्त्र के जानकार महान मुनि को समस्त मुनियों की अनुमति से प्रदान किया जाता है। संघ के समस्त मुनि आचार्य की आज्ञानुसार चर्या करते हैं। नवीन मुनि-दीक्षा आचार्य ही देते हैं। मुनिजन आचार्य महाराज के समक्ष अपने दोषों की आलोचना करते हैं और उनको उनकी शक्ति अनुसार प्रायश्चित भी आचार्य ही देते हैं। इसके सिवाय संघ में यदि कोई साधु बीमार हो जाये तो उसकी वैयावृत (सेवा) का प्रबन्ध भी आचार्य ही करते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का अनुमान करके आचार्य ही अपने मुनि संघ को किसी स्थान पर ठहरने और कितने समय ठहरने तथा वहाँ से कब और किस ओर विहार करने का आदेश देते हैं। यदि किसी स्थान पर संघ के ऊपर आता हुआ कोई भीषण उपद्रव देखते हैं तो उस समय मुनि संघ में उस उपद्रव के समय समस्त मुनियों का कर्तव्य निर्धारण भी आचार्य ही करते हैं। तथा किसी मुनि को संघ से पृथक करना किसी को अपने संघ में सम्मिलित करना भी आचार्य के ही अधिकार की बात है। यदि कोई मुनि समाधिमरण ग्रहण करना चाहे तो आचार्य महाराज ही उसकी शारीरिक योग्यता, उसकी परिषह सहन करने की क्षमता तथा उसके स्वास्थ्य आदि बातों का विचार करके उसको समाधिमरण की अनुमति देते हैं।
इस तरह आचार्य अपने मुनि संघ के नायक होते हैं। जिस तरह बिना नायक के घर की व्यवस्था, समाज की दशा और देश की अवस्था बिगड़ जाती है, छिन्न भिन्न हो जाती है, उसी तरह बिना आचार्य के मुनि संघ में भी अनेक तरह की समस्याएँ आ खड़ी होती हैं, उन्हें सुलझाकर पथ प्रदर्शन करने के लिये मुनि संघ का नायक होना परम आवश्यक है।
*भद्रबाहु मुनिराज की कथा*
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संसार का कल्याण करने वाले और देवों द्वारा नमस्कार किये गये श्री जिनेश भगवान को नमस्कार कर पंचम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहु मुनिराज की कथा लिखी जाती है, जो कथा सबका हित करने वाली है।
पुण्ड्रवर्धन देश के कोटिपुर नामक नगर के राजा पद्मरथ के समय में वहाँ सोमशर्मा नाम का एक पुरोहित ब्राह्मण था। इसकी स्त्री का नाम श्रीदेवी था। कथा-नायक भद्रबाहु इसी के लड़के थे। भद्रबाहु बचपन से ही शान्त और गम्भीर प्रकृति के थे। उनके भव्य चेहरे को देखने से वह झट से कल्पना होने लगती थी कि ये आगे चलकर कोई बड़े भारी प्रसिद्ध महापुरुष होंगे। क्योंकि यह कहावत बिल्कुल सच्ची है कि “पूत के पग पालने में ही नजर आ जाते हैं।” अतः
जब भद्रबाहु आठ वर्ष के हुए और इनका यज्ञोपवीत और मौंजीबन्धन हो चुका था तब एक दिन की बात है कि ये अपने साथी बालकों के साथ खेल रहे थे। खेल था गोलियों का। सब अपनी-अपनी होशियारी और हाथों की सफाई से गोलियों को एक पर एक रखकर दिखला रहे थे। किसी ने दो, किसी ने चार, किसी ने छह और किसी-किसी ने अपनी होशियारी से आठ गोलियाँ तक ऊपर तले चढ़ा दी। पर हमारे कथानायक भद्रबाहु इन सबसे बढ़कर निकले। इन्होंने एक साथ चौदह गोलियाँ तले ऊपर चढ़ा दी। सब बालक देखकर दंग रह गये। इसी समय एक घटना हुई वह यह कि—श्रीवर्धमान भगवान को निर्वाण लाभ किये बाद होने वाले पाँच श्रुतकेवलियों में चौदह महापूर्व के जानने वाले चौथे श्रुतकेवली श्री गोवर्धनाचार्य गिरिनार की यात्रा को जाते हुए इस ओर आ गये। उन्होंने भद्रबाहु के खेल की इस चकित करने वाली चतुरता को देखकर निमित्तज्ञान से समझ लिया कि पाँचवें होने वाले श्रुतकेवली भद्रबाहु ही हैं। उन्होंने भद्रबाहु को पढ़ाने के लिए माँगा। सोमशर्मा ने कुछ आनाकानी न कर अपने लड़के को आचार्य महाराज के सुपुर्द कर दिया। आचार्य ने भद्रबाहु को लाकर खूब पढ़ाया और सब विषयों में उसे आदर्श विद्वान बना दिया। जब आचार्य ने देखा कि भद्रबाहु अच्छा विद्वान हो गया तब उन्होंने उसे वापस घर लौटा दिया इसलिए कि कहीं सोमशर्मा यह न समझ ले कि मेरे लड़के को बहका कर इन्होंने साधु बना लिया। भद्रबाहु घर गये सही, पर अब उनका मन घर में न लगने लगा। उन्होंने माता-पिता से अपने साधु होने की प्रार्थना की। माता-पिता को उनकी इस इच्छा से बड़ा दुःख हुआ। भद्रबाहु ने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और आप सब माया-मोह छोड़कर गोवर्धनाचार्य द्वारा दीक्षा ले योगी हो गये। सच है, जिसने तत्वों का स्वरूप समझ लिया वह फिर गृहजंजाल को क्यों अपने सिर पर उठायेगा? जिसने अमृत चख लिया है वह फिर क्यों खारा जल पियेगा? मुनि हुए बाद भद्रबाहु अपने गुरुमहाराज गोवर्धनाचार्य की कृपा से चौदह महापूर्व के भी विद्वान हो गये। जब संघाधीश गोवर्धनाचार्य का स्वर्गवास हो गया तब उनके बाद पट्ट पर भद्रबाहु श्रुतकेवली ही बैठे। जब भद्रबाहु आचार्य अपने संघ को साथ लिए अनेक देशों और नगरों में अपने उपदेशमृत द्वारा भव्यजनरूपी धन को बढ़ाते हुए उज्जैन की ओर आये और सारे संघ को एक पवित्र स्थान में ठहरा कर आप आहार के लिए शहर में गये। जिस घर में इन्होंने पहले ही पांव दिया वहाँ एक बालक पालने में झूल रहा था, और जो अभी स्पष्ट बोलना तक न जानता था; इन्हें घर में पांव देते देख वह सहसा बोल उठा कि “महाराज, जाइए! जाइए! जाइए!!” एक अबोध बालक की बोलना देखकर भद्रबाहु आचार्य बड़े चकित हुए। उन्होंने उस पर निमित्तज्ञान से विचार किया तो उन्हें जान पड़ा कि यहाँ बारह वर्ष का भयानक दुर्भिक्ष पड़ेगा और वह इतना भीषण रूप धारण करेगा कि धर्म-कर्म की रक्षा तो दूर रहे, पर मनुष्यों को अपनी जान बचाना भी कठिन हो जायेगा। भद्रबाहु आचार्य उसी समय अन्तराय कर लौट आये। शाम के समय उन्होंने अपने सारे संघ को इकट्ठा कर उनसे कहा—साधुओ, यहाँ बारह वर्ष का बड़ा भारी अकाल पड़ने वाला है, और तब धर्म-कर्म का निर्वाह होना कठिन ही नहीं, असम्भव हो जायेगा। इसलिए आप लोग दक्षिण दिशा की ओर जायें और मेरी आयु बहुत ही थोड़ी रह गई है। इसलिए मैं इधर ही रहूँगा। यह कहकर उन्होंने दशपूर्व के जानने वाले अपने प्रधान शिष्य श्रीविशाखाचार्य को चारित्र की रक्षा के लिए सारे संघ सहित दक्षिण की ओर रवाना कर दिया। दक्षिण की ओर जाने वाले उधर सुख-शान्ति से रहे। उनका चारित्र निर्विघ्न पला। और सच है, गुरु के वचनों का मानने वाले शिष्य सदा सुखी रहते हैं।
सारे संघ को चला गया देख उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त को उसके वियोग का बहुत रंज हुआ। उसने भी दीक्षा ले मुनि बन गये और भद्रबाहु आचार्य की सेवा में रहे। आचार्य की आयु थोड़ी रह गई थी, इसलिए उन्होंने रास्ते में ही किसी वन में समाधि ले ली और भूख-प्यास आदि की परीषह जीतकर अन्त में स्वर्ग लाभ किया। वे जैन धर्म के सार तत्व को जानने वाले महान तपस्वी श्रीभद्रबाहु आचार्य हमें सुखमयी सन्मार्ग में लगावें।
सोमशर्मा ब्राह्मण के वंश के एक चमकते हुए रत्न, जिनधर्मरूप समुद्र के बढ़ाने को पूर्ण चन्द्रमा और मुनियों, योगियों के शिरोमणि श्रीभद्रबाहु पंचम श्रुतकेवली हमें वह लक्ष्मी दें जो सर्वोच्च सुख की देने वाली है, सब धन-दौलत, वैभव-सम्पत्ति में श्रेष्ठ है
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*✍️ संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 16.02.2026*
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2026-02-16 06:30:33 |
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| 5496 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-02-16 06:29:28 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*निष्काम प्रेम ही सच्ची भक्ति है*
एक गाँव में एक बूढ़ी माई रहती थी । माई का आगे – पीछे कोई नहीं था इसलिए बूढ़ी माई बिचारी अकेली रहती थी । एक दिन उस गाँव में एक साधू आया । बूढ़ी माई ने साधू का बहुत ही प्रेम पूर्वक आदर सत्कार किया । जब साधू जाने लगा तो बूढ़ी माई ने कहा – “ महात्मा जी ! आप तो ईश्वर के परम भक्त है । कृपा करके मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिये जिससे मेरा अकेलापन दूर हो जाये । अकेले रह – रह करके उब चुकी हूँ ”
साधू ने मुस्कुराते हुए अपनी झोली में से बाल – गोपाल की एक मूर्ति निकाली और बुढ़िया को देते हुए कहा – “ माई ये लो आपका बालक है, इसका अपने बच्चे की तरह प्रेम पूर्वक लालन-पालन करती रहना। बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।
एक दिन गाँव के कुछ शरारती बच्चों ने देखा कि माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है । नटखट बच्चो को माई से हंसी – मजाक करने की सूझी । उन्होंने माई से कहा – “अरी मैय्या सुन ! आज गाँव में जंगल से एक भेड़िया घुस आया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है। और मारकर खा जाता है । तू अपने लाल का ख्याल रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये !
बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर पहरा लगाने के लिए बैठ गयी।
अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।
बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने की इच्छा हुई ।
भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर माई ड़र गई कि “कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरे लाल को उठाने !” माई ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई।
तब श्यामसुंदर ने कहा – “मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!”
माई ने कहा – “क्या ? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से ।
ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले – “अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ”
बुढ़िया माई ने कहा – “अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय” अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले – “तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।” इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।
दोस्तों ! भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान को प्रेम करो – निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया । इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि हमें अपने अन्दर बैठे ईश्वरीय अंश की काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी भेड़ियों से रक्षा करनी चाहिए । जब हम पूरी तरह से तन्मय होकर अपनी पवित्रता और शांति की रक्षा करते है तो एक न एक दिन ईश्वर हमें दर्शन जरुर देते है।
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(2) *कहानी*
*"अपनी क्षमता पहचानो "*
एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था. वह कुछ काम-धाम नहीं करता था. बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये.
एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया. वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे. रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया. लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा.
बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ. भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा. वह बुरी तरह से थक गया था. इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा.
तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी. उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी. लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ?
जिज्ञासा में वह एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?
कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा. जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे. लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी. वह वहीं खड़ी रही.
शेर लोमड़ी के पास आने लगा. आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा. लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था. शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया. उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया. लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी. थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया.
यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा है. उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का प्रबंध कर रखा है. वह अपने घर लौट आया.
घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था. वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी. आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा. घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े. वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है. लेकिन इंसानों के लिए नहीं.”
बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है. भगवान के पास सारे प्रबंध है. दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी. लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं.”
सीख ▼ हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है. बस अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं. स्वयं की क्षमता पहचानिए. दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए. इतने सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें.
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(3) *कहानी*
लोगो के बीच में मैं अपनी छवि को कैसे सुधारू?
*गुरुदेव कहते है .......*
समुद्र के किनारे जब एक लहर आयी तो एक बच्चे का चप्पल ही अपने साथ बहा ले गयी.. बच्चा रेत पर अंगुली से लिखता है
"समुद्र_चोर_है"?*
उसी समुद्र के एक, दूसरे किनारे कुछ मछुवारा बहुत सारी मछलियाँ पकड़ लेता है. ...
*वह उसी रेत पर लिखता है "समुद्र_मेरा_पालनहार है"*
एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है....उसकी मां रेत पर लिखती है,
*"समुद्र_हत्यारा है"*
एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था...उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया, वह रेत पर लिखता है
*"समुद्र_दानी_है"*
.... अचानक एक बड़ी लहर आती है और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है
*मतलब समंदर को कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा कि, लोगों की क्या राय हैं उस के बारे में ,अपनी लहरों में मस्त रहा आता है.. *
अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी की बातों पर ध्यान ना दें....अपने उफान और शांति समुंदर की भाँती अपने हिसाब से तय करो
*लोगों का क्या है .... उनकी राय कंडीशन के हिसाब से बदलती रहती है .... चाय मक्खी में गिरे तो चाय फेंक देते हैं और देशी घी मे गिरे तो मक्खी को फेंक देते हैं
*जो जितनी "सुविधा" में है*
*वो उतनी "दुविधा" में है।*
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(4) *कहानी*
*अगर सन्तो के मार्ग पर चलना चाहते हो तो*
*तन मन धन की कुर्बानी के लिए तैयार रहो अपनी इच्छाओं को रोको, मोह और ममता को त्यागो और निन्दा और तानो को सहने के लिए तैयार रहो। अगर इस आदर्श पर अपना जीवन नहीं ढाल सकते तो सफलता की आशा न करो।याद रखो। संसार में कोई भी चीज उसकी पूरी कीमत अदा किए बगैर न पा सकते हो और न ही पा सकोगे। केवल मूर्ख ही बिना कीमत दिए कुछ पाने की उम्मीद करते हैं। जो यह समझता है कि उसने बगैर मोल दिए कुछ पा लिया है। उसने असल में एक नये कर्ज का बोझ उठा लिया है। जब तक इस संसार में एक पाई का भी ॠण है, चुकाने के लिए वापस आना पड़ेगा। अगर अनाज का एक दाना भी, पडोसी के खेत से आपके घर में, अनजाने में आ गया है, तो उसका भी हिसाब चुकाना पड़ेगा। आप जो कुछ भी पाते हैं, उसकी कीमत अदा करनी ही पड़ेगी। यह कानून अटल हैं। इससे कोई बच नहीं सकता। यह भुगतान पैसे से किसी चीज़ या अपने शुभ कर्मों के कुछ अंश से हो सकता है। पर हिसाब तो चुकाना ही होगा*।
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(5) *चिंतन*
*किसी को मकान बनाने में आनन्द आता है तो बनाने दो अगर आपको अपने झोपड़े में प्रसन्नता है तो व्यर्थ में मकान बनाने की दौड़ में क्यों दौड़ रहे हो..???*
*अगर आप अपने वर्तमान से संतुष्ट हो प्रसन्न हो तो दूसरे क्या कर रहे है उनसे तुलना करके खुद को परेशान न करें* *क्योंकि कुछ पाने की आपकी यह दौड़ समय लेगी, शक्ति लेगी, जीवन लेगी और जो आप पा लोगे उससे आपको कभी तृप्ति सन्तुष्टि नही मिलेगी,*
*आजकल हम दूसरों को देख कर दौड़ रहे हैं दुसरो से तुलना कर रहे हैं इसीलिए तो हम सब मे इतनी अतृप्ति है।*
*प्रभावित होके देखा देखी में दौड़ने के बाद कुछ न मिले तो तकलीफ होती है और कुछ मिल जाए तो हम पाते है कि पाई हुई वस्तु में कोई सार ही नहीं है*
*!!!...कुचलने के बाद भी फूलों की पंखुड़ियों द्वारा दी हुई सुगंध ही वास्तव में "क्षमा" है...!!!*
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2026-02-16 06:27:53 |
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| 5494 |
40449663 |
? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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2026-02-16 06:27:51 |
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40449663 |
? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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2026-02-16 06:27:49 |
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40449663 |
? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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2026-02-16 06:27:48 |
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| 5491 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*निष्काम प्रेम ही सच्ची भक्ति है*
एक गाँव में एक बूढ़ी माई रहती थी । माई का आगे – पीछे कोई नहीं था इसलिए बूढ़ी माई बिचारी अकेली रहती थी । एक दिन उस गाँव में एक साधू आया । बूढ़ी माई ने साधू का बहुत ही प्रेम पूर्वक आदर सत्कार किया । जब साधू जाने लगा तो बूढ़ी माई ने कहा – “ महात्मा जी ! आप तो ईश्वर के परम भक्त है । कृपा करके मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिये जिससे मेरा अकेलापन दूर हो जाये । अकेले रह – रह करके उब चुकी हूँ ”
साधू ने मुस्कुराते हुए अपनी झोली में से बाल – गोपाल की एक मूर्ति निकाली और बुढ़िया को देते हुए कहा – “ माई ये लो आपका बालक है, इसका अपने बच्चे की तरह प्रेम पूर्वक लालन-पालन करती रहना। बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।
एक दिन गाँव के कुछ शरारती बच्चों ने देखा कि माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है । नटखट बच्चो को माई से हंसी – मजाक करने की सूझी । उन्होंने माई से कहा – “अरी मैय्या सुन ! आज गाँव में जंगल से एक भेड़िया घुस आया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है। और मारकर खा जाता है । तू अपने लाल का ख्याल रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये !
बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर पहरा लगाने के लिए बैठ गयी।
अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।
बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने की इच्छा हुई ।
भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर माई ड़र गई कि “कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरे लाल को उठाने !” माई ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई।
तब श्यामसुंदर ने कहा – “मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!”
माई ने कहा – “क्या ? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से ।
ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले – “अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ”
बुढ़िया माई ने कहा – “अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय” अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले – “तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।” इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।
दोस्तों ! भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान को प्रेम करो – निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया । इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि हमें अपने अन्दर बैठे ईश्वरीय अंश की काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी भेड़ियों से रक्षा करनी चाहिए । जब हम पूरी तरह से तन्मय होकर अपनी पवित्रता और शांति की रक्षा करते है तो एक न एक दिन ईश्वर हमें दर्शन जरुर देते है।
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(2) *कहानी*
*"अपनी क्षमता पहचानो "*
एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था. वह कुछ काम-धाम नहीं करता था. बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये.
एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया. वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे. रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया. लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा.
बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ. भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा. वह बुरी तरह से थक गया था. इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा.
तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी. उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी. लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ?
जिज्ञासा में वह एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?
कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा. जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे. लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी. वह वहीं खड़ी रही.
शेर लोमड़ी के पास आने लगा. आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा. लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था. शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया. उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया. लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी. थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया.
यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा है. उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का प्रबंध कर रखा है. वह अपने घर लौट आया.
घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था. वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी. आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा. घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े. वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है. लेकिन इंसानों के लिए नहीं.”
बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है. भगवान के पास सारे प्रबंध है. दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी. लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं.”
सीख ▼ हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है. बस अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं. स्वयं की क्षमता पहचानिए. दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए. इतने सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें.
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(3) *कहानी*
लोगो के बीच में मैं अपनी छवि को कैसे सुधारू?
*गुरुदेव कहते है .......*
समुद्र के किनारे जब एक लहर आयी तो एक बच्चे का चप्पल ही अपने साथ बहा ले गयी.. बच्चा रेत पर अंगुली से लिखता है
"समुद्र_चोर_है"?*
उसी समुद्र के एक, दूसरे किनारे कुछ मछुवारा बहुत सारी मछलियाँ पकड़ लेता है. ...
*वह उसी रेत पर लिखता है "समुद्र_मेरा_पालनहार है"*
एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है....उसकी मां रेत पर लिखती है,
*"समुद्र_हत्यारा है"*
एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था...उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया, वह रेत पर लिखता है
*"समुद्र_दानी_है"*
.... अचानक एक बड़ी लहर आती है और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है
*मतलब समंदर को कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा कि, लोगों की क्या राय हैं उस के बारे में ,अपनी लहरों में मस्त रहा आता है.. *
अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी की बातों पर ध्यान ना दें....अपने उफान और शांति समुंदर की भाँती अपने हिसाब से तय करो
*लोगों का क्या है .... उनकी राय कंडीशन के हिसाब से बदलती रहती है .... चाय मक्खी में गिरे तो चाय फेंक देते हैं और देशी घी मे गिरे तो मक्खी को फेंक देते हैं
*जो जितनी "सुविधा" में है*
*वो उतनी "दुविधा" में है।*
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(4) *कहानी*
*अगर सन्तो के मार्ग पर चलना चाहते हो तो*
*तन मन धन की कुर्बानी के लिए तैयार रहो अपनी इच्छाओं को रोको, मोह और ममता को त्यागो और निन्दा और तानो को सहने के लिए तैयार रहो। अगर इस आदर्श पर अपना जीवन नहीं ढाल सकते तो सफलता की आशा न करो।याद रखो। संसार में कोई भी चीज उसकी पूरी कीमत अदा किए बगैर न पा सकते हो और न ही पा सकोगे। केवल मूर्ख ही बिना कीमत दिए कुछ पाने की उम्मीद करते हैं। जो यह समझता है कि उसने बगैर मोल दिए कुछ पा लिया है। उसने असल में एक नये कर्ज का बोझ उठा लिया है। जब तक इस संसार में एक पाई का भी ॠण है, चुकाने के लिए वापस आना पड़ेगा। अगर अनाज का एक दाना भी, पडोसी के खेत से आपके घर में, अनजाने में आ गया है, तो उसका भी हिसाब चुकाना पड़ेगा। आप जो कुछ भी पाते हैं, उसकी कीमत अदा करनी ही पड़ेगी। यह कानून अटल हैं। इससे कोई बच नहीं सकता। यह भुगतान पैसे से किसी चीज़ या अपने शुभ कर्मों के कुछ अंश से हो सकता है। पर हिसाब तो चुकाना ही होगा*।
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(5) *चिंतन*
*किसी को मकान बनाने में आनन्द आता है तो बनाने दो अगर आपको अपने झोपड़े में प्रसन्नता है तो व्यर्थ में मकान बनाने की दौड़ में क्यों दौड़ रहे हो..???*
*अगर आप अपने वर्तमान से संतुष्ट हो प्रसन्न हो तो दूसरे क्या कर रहे है उनसे तुलना करके खुद को परेशान न करें* *क्योंकि कुछ पाने की आपकी यह दौड़ समय लेगी, शक्ति लेगी, जीवन लेगी और जो आप पा लोगे उससे आपको कभी तृप्ति सन्तुष्टि नही मिलेगी,*
*आजकल हम दूसरों को देख कर दौड़ रहे हैं दुसरो से तुलना कर रहे हैं इसीलिए तो हम सब मे इतनी अतृप्ति है।*
*प्रभावित होके देखा देखी में दौड़ने के बाद कुछ न मिले तो तकलीफ होती है और कुछ मिल जाए तो हम पाते है कि पाई हुई वस्तु में कोई सार ही नहीं है*
*!!!...कुचलने के बाद भी फूलों की पंखुड़ियों द्वारा दी हुई सुगंध ही वास्तव में "क्षमा" है...!!!*
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2026-02-16 06:27:44 |
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गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*भक्त और भगवान*
*एक बार एक भक्त मंदिर आता है और भगवान से कहता है*
*भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे ?*
*एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओl*
*भगवान मान जाते हैं*,
*लेकिन एक शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।*
*मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता हैl*
सबसे पहले *मंदिर में बिजनेस मैन आता है* और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे *खूब सफल करना।*
वह *माथा टेकता है*, तो उसका *पर्स नीचे गिर* जाता है l *वह बिना पर्स लिये ही चला जाता हैl*
*सेवक बेचैन हो जाता है*, वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि *पर्स गिर* गया,
*लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाताl*
*इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।*
तभी उसकी *नजर पर्स* पर पड़ती है, वह *भगवान का शुक्रिया अदा करता* है और पर्स लेकर चला जाता हैl
अब *तीसरा व्यक्ति* आता है, वह *नाविक* होता
है l वह *भगवान* से कहता है कि *मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं,यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान दया दृष्टि बनाये रखना..*
तभी पीछे से *बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता* है और कहता है कि मेरे बाद ये *नाविक* आया हैl
इसी ने *मेरा पर्स चुरा* लिया है, *पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता है नही इसने पर्स नही चुराया।*
*फिर किसने चुराया*
*वो जो इस नाविक से पहले एक गरीब आया था*
अब पुलिस सेवक के कहने पर उस *गरीब आदमी* को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।
*रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता हैl*
*भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा हैl*
*वो कैसे भगवन में तो बिल्कुल सही सही बोला*
सुन वह *व्यापारी गलत धंधे* करता है,अगर उसका *पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था।*
इससे उसके *पाप ही कम होते*, क्योंकि वह *पर्स गरीब इंसान को मिला था*. पर्स मिलने पर उसका भला होता *उसके बच्चे भूखों नहीं मरते !*
रही बात *नाविक* की, तो वह जिस *यात्रा* पर जा रहा था, वहां *तूफान आनेवाला है*, अगर वह जेल में रहता, तो उसकी जान बच जाती, और उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती, *तुमने सब गड़बड़ कर दीl*
*कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी परेशानी आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआl*
*लेकिन इसके पीछे कर्मो के हिसाब से भगवान या यूं कहो कि नियती की सब प्लानिंग होती हैl*
*शिक्षा: जब भी कोई परेशानी आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,अच्छे के लिए होता है..!!*
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(2) *कहानी*
*सोच में परिवर्तन*
*ट्रेन में दो बच्चे यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे, कभी आपस में झगड़ जाते तो कभी किसी सीट के उपर कूदते। पास ही बैठा पिता किन्हीं विचारों में खोया था। बीच-बीच में जब बच्चे उसकी ओर देखते तो वह एक स्नेहिल मुस्कान बच्चों पर डालता और फिर बच्चे उसी प्रकार अपनी शरारतों में व्यस्त हो जाते और पिता फिर उन्हें निहारने लगता।*
*ट्रेन के सहयात्री बच्चों की चंचलता से परेशान हो गए थे और पिता के रवैये से नाराज़। चूँकि रात्रि का समय था अतः सभी आराम करना चाहते थे। बच्चों की भागदौड़ को देखते हुए एक यात्री से रहा न गया और लगभग झल्लाते हुए बच्चों के पिता से बोल उठा - "कैसे पिता हैं आप ? बच्चे इतनी शैतानियां कर रहे हैं और आप उन्हें रोकते-टोकते नहीं, बल्कि मुस्कुराकर प्रोत्साहन दे रहे हैं। क्या आपका दायित्त्व नहीं कि आप इन्हें समझाएं ???*
*उस सज्जन की शिकायत से अन्य यात्रियों ने राहत की साँस ली कि अब यह व्यक्ति लज्जित होगा और बच्चों को रोकेगा परन्तु उस पिता ने कुछ क्षण रुक कर कहा कि - "कैसे समझाऊं बस यही सोच रहा हूं भाईसाहब"।*
*यात्री बोला - "मैं कुछ समझ नहीं"*
*व्यक्ति बोला - "मेरी पत्नी अपने मायके गई थी वहाँ एक दुर्घटना के चलते कल उसकी मौत हो गई। मैं बच्चों को उसके अंतिम दर्शनों के लिए ले जा रहा हूँ और इसी उलझन में हूँ कि कैसे समझाऊं इन्हें कि अब ये अपनी मां को कभी देख नहीं पाएंगे।"*
*उसकी यह बात सुनकर जैसे सभी लोगों को साँप सूंघ गया। बोलना तो दूर सोचने तक का सामर्थ्य जाता रहा सभी का।*
*बच्चे यथावत शैतानियां कर रहे थे। अभी भी वे कंपार्टमेंट में दौड़ लगा रहे थे। वह व्यक्ति फिर मौन हो गया। वातावरण में कोई परिवर्तन न हुआ पर वे बच्चे अब उन यात्रियों को शैतान, अशिष्ट नहीं लग रहे थे बल्कि ऐसे नन्हें कोमल पुष्प लग रहे थे जिन पर सभी अपनी ममता उड़ेलना चाह रहे थे।*
*उनका पिता अब उन लोगों को लापरवाह इंसान नहीं वरन अपने जीवन साथी के विछोह से दुखी दो बच्चों का अकेला पिता और माता भी दिखाई दे रहा था।*
*ऐसे ही एक बार मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _"शारीरिक विकलांग; कृपया धैर्य रखें"!_ और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया!!*
*मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया। यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।*
*कहने को तो यह एक कहानी है सत्य या असत्य। पर एक मूल बात यह एक अनुभूति/एहसास/सोच से व्यवहार में बदलाव आता है, क्षण भर में ही जिंदगी जीने का, किसी के प्रति सोच का दृष्टिकोण बदल जाता है।*
*हम सभी इसलिए उलझनों में हैं, क्योंकि हमने अपनी धारणाओं रूपी उलझनों का संसार अपने इर्द-गिर्द स्वयं रच लिया है। मैं यह नहीं कहता कि किसी को परेशानी या तकलीफ नहीं है... पर क्या निराशा या नकारात्मक विचारों से हम उन परिस्थितियों को बदल सकते हैं?*
*आवश्यकता है एक आशा, एक उत्साह से भरी सकारात्मक सोच की, फिर परिवर्तन तत्क्षण आपके भीतर आपको अनुभव होगा। उस लहर में हताशा की मरुभूमि भी नंदन वन की भांति सुरभित हो उठेगी। बस यही सकरात्मक सोच/एहसास/दृष्टिकोण देने का प्रयास मैं इन दैनिक कहानियों से करता आ रहा हूँ। आप सभी का इन कहानियों/सोच/विचारों को आगे साँझा करने लिए अग्रिम धन्यवाद!*
*एक सुंदर कहानी सुनने हैं पढ़ने के लिए समूह में सम्मिलित हो जाइए।*
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(3) *कहानी*
एक गरीब आदमी था।
वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने प्रभू से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।
एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।
उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।
बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि -- तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।*
युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।
कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।
ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा--क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो। वो व्यक्ति बोला--बहुत धन कमाया।
अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।
व्यक्ति बोला,हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया ?
प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था?
जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना।
फिर आज यहां क्या करने आए हो?
उसकी आंखों में आंसू भर आए, ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला --अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए। ठाकुर जी ने कहा--पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे।
ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है। वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला--मुझे कुछ नहीं चाहिए।
आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए। सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है।।और श्री हरि की किरपा जब बरसती है तो वो बरसती ही जाती है।
जब भी मैं बुरे हालातों से घबराती हूँ..!
तब मेरे प्रभु जी कि आवाज़ आती है "रुक .................. मैं आता हूँ"..!!
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(4) *कहानी*
*रोटी,*
*चार प्रकार की होती है।"*
*पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।*
*एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" उन्होंने आगे कहा "हाँ, वही तो बात है।*
*दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।", क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।*
*फिर तीसरी रोटी किस की होती है?" एक दोस्त ने सवाल किया।*
*"तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें सिर्फ "कर्तव्य" का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।*
*"लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-*
*"चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो कोई गारँटी ही नहीं है", तो फिर हमें क्या करना चाहिये यार?*
*माँ की हमेशा पूजा करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जिओ, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नज़रन्दाज़ कर दो बहू खुश रहेगी तो बेटा भी आपका ध्यान रखेगा।*
*यदि हालात चौथी रोटी तक ले ही आयें तो भगवान का शुकर करो कि उसने हमें ज़िन्दा रखा हुआ है, अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिये बहुत कम खाओ ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाये, और सोचो कि वाकई, हम कितने खुशकिस्मत हैं..!!*
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2026-02-16 06:27:09 |
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40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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Jai jinendra?? |
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2026-02-16 06:25:41 |
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