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78795 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-12 06:42:31
78796 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-12 06:42:31
78793 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-12 06:42:10
78794 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-12 06:42:10
78791 47534159 Maharstra (kartick) *प्रथमाचार्य शांतिसागरजी* ************************* *( एपिसोड - 320*) """"""""""""""""""""""""""""""""""""" ( *दूसरा भाग* ) प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज एक अलौकिक व्यक्तित्व थे। उनके बारे में कुछ खास जानकारी ले रहे है.. *45*) प्रथमाचार्य आ. श्री.108 शांतिसागरजी महामुनिराज का ससंघ चातुर्मास (सन् 1945 में ) फलटण (पुणे) में हुआ। इसी बीच एक दिन अचानक एक शिष्यने आचार्य श्री से पूछा, *"महाराज, क्या आपको अवधि ज्ञान है या कोई खास ज्ञान है क्या ?"* उस समय आचार्य श्री ने कहा, *"...इसके लिए किसी खास ज्ञान की जरूरत नहीं है। वैसे, ऐसी और कई जगहों पर हमें "अंतःप्रेरणा" होती थी। अगर हम उस आधार पर काम करते, तो मुसीबतें नहीं आतीं। मैं हमेशा अपनी अंदर की आवाज़ सुनता हूँ। लेकिन अगर हम दुनिया के असर में आ जाते हैं, तो मुसीबतों से बचा नहीं जा सकता। हमारा अनुभव है कि जिसका दिल साफ़ हो और सभी जीवों के लिए सच्ची चिंता हो, उसे यह अंदर की प्रेरणा मिल सकती है और यह मुसीबत के समय सुरक्षा भी दे सकती है।”* *” इसके अलावा, हम पर जो मुसीबतें आईं, वे हमारे कर्मों का नतीजा थीं। वे वजहें थीं। लेकिन, वे हमारे असली गुनहगार नहीं हैं। फिर, हम खुद ही दुख के गुनहगार हैं। हमें वजह बनना मंज़ूर नहीं है। हम नहीं चाहते थे कि हमारी वजह से किसी को सज़ा मिले, जेल हो, या परेशानी हो। इसलिए, हमने कभी किसी को ऐसा करने की इजाज़त नहीं दी। हमारे सुख-दुख की जड़ बाहरी चीज़ों में नहीं हो सकती, वह हमारे अंदर है।"* ..ऐसे थे प्रथमाचार्य शांतिसागरजी महामुनिराज, जो आगम से सरल, सुंदर, काम की बातें बताते हैं! *..और इसीलिए प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज अलौकिक, असाधारण आत्मवैभवशाली थे!* [ *प्रथमाचार्य श्री 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज ( दक्षिण ) आचार्य पदारोहण की शताब्दी के अवसर पर..*] *अलग से साप्ताहिक लेखों की सीरीज़..* *रविवार, ता. 12/04/2026* *--डॉ. अजीत जे. पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र* ??? (कु.9632/आ.3242) 2026-04-12 06:41:56
78792 47534159 Maharstra (kartick) *प्रथमाचार्य शांतिसागरजी* ************************* *( एपिसोड - 320*) """"""""""""""""""""""""""""""""""""" ( *दूसरा भाग* ) प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज एक अलौकिक व्यक्तित्व थे। उनके बारे में कुछ खास जानकारी ले रहे है.. *45*) प्रथमाचार्य आ. श्री.108 शांतिसागरजी महामुनिराज का ससंघ चातुर्मास (सन् 1945 में ) फलटण (पुणे) में हुआ। इसी बीच एक दिन अचानक एक शिष्यने आचार्य श्री से पूछा, *"महाराज, क्या आपको अवधि ज्ञान है या कोई खास ज्ञान है क्या ?"* उस समय आचार्य श्री ने कहा, *"...इसके लिए किसी खास ज्ञान की जरूरत नहीं है। वैसे, ऐसी और कई जगहों पर हमें "अंतःप्रेरणा" होती थी। अगर हम उस आधार पर काम करते, तो मुसीबतें नहीं आतीं। मैं हमेशा अपनी अंदर की आवाज़ सुनता हूँ। लेकिन अगर हम दुनिया के असर में आ जाते हैं, तो मुसीबतों से बचा नहीं जा सकता। हमारा अनुभव है कि जिसका दिल साफ़ हो और सभी जीवों के लिए सच्ची चिंता हो, उसे यह अंदर की प्रेरणा मिल सकती है और यह मुसीबत के समय सुरक्षा भी दे सकती है।”* *” इसके अलावा, हम पर जो मुसीबतें आईं, वे हमारे कर्मों का नतीजा थीं। वे वजहें थीं। लेकिन, वे हमारे असली गुनहगार नहीं हैं। फिर, हम खुद ही दुख के गुनहगार हैं। हमें वजह बनना मंज़ूर नहीं है। हम नहीं चाहते थे कि हमारी वजह से किसी को सज़ा मिले, जेल हो, या परेशानी हो। इसलिए, हमने कभी किसी को ऐसा करने की इजाज़त नहीं दी। हमारे सुख-दुख की जड़ बाहरी चीज़ों में नहीं हो सकती, वह हमारे अंदर है।"* ..ऐसे थे प्रथमाचार्य शांतिसागरजी महामुनिराज, जो आगम से सरल, सुंदर, काम की बातें बताते हैं! *..और इसीलिए प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज अलौकिक, असाधारण आत्मवैभवशाली थे!* [ *प्रथमाचार्य श्री 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज ( दक्षिण ) आचार्य पदारोहण की शताब्दी के अवसर पर..*] *अलग से साप्ताहिक लेखों की सीरीज़..* *रविवार, ता. 12/04/2026* *--डॉ. अजीत जे. पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र* ??? (कु.9632/आ.3242) 2026-04-12 06:41:56
78789 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-12 06:41:49
78790 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-12 06:41:49
78787 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-12 06:41:29
78788 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-12 06:41:29