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जिनोदय?JINODAYA |
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*विश्वास की बस्तियाँ और आग लगाते हाथ*
“तुम्हारे हाथों में हम कैसे बस्तियाँ सौंपें,
तुम्हारे हाथों को आदत है घर जलाने की।”
यह शेर केवल शब्द नहीं है, यह एक चेतावनी है। समाज जब किसी को अपना मार्गदर्शक मानता है, तो वह केवल सम्मान नहीं देता, वह अपना विश्वास, अपनी आस्था और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सौंप देता है। जैन समाज में साधु का स्थान अत्यंत ऊँचा माना गया है। साधु त्याग, तप, संयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक होता है। वह समाज से लेने नहीं, बल्कि देने के लिए होता है।
लेकिन जब कुछ साधु इस पवित्र पद की मर्यादा भूल जाते हैं, तब सबसे बड़ी चोट धर्म पर नहीं, बल्कि समाज के विश्वास पर लगती है। साधु का जीवन सादगी, अपरिग्रह और विनम्रता से भरा होना चाहिए। यदि उसके आचरण में प्रदर्शन, पक्षपात, समूहबाजी, आर्थिक प्रभाव या दबाव की राजनीति झलकने लगे, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
समाज साधु को इसलिए पूजता है क्योंकि वह मानता है कि यह व्यक्ति मोह-माया से ऊपर उठ चुका है। परंतु यदि वही व्यक्ति समाज के भीतर विभाजन की रेखाएँ खींचने लगे, अपने प्रभाव का उपयोग व्यक्तिगत निर्णयों को थोपने में करने लगे, या आलोचना को अपमान समझने लगे, तो यह स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
जैन धर्म आत्मसंयम और अहिंसा का मार्ग है। यहाँ विचारों की शुद्धता को सर्वोपरि माना गया है। यदि साधु स्वयं ही कटुता, अहंकार या प्रतिशोध की भावना से प्रेरित दिखाई दे, तो समाज के युवा वर्ग के मन में प्रश्न उठेंगे। और जब युवा प्रश्न पूछना शुरू करता है, तो उसे दबाया नहीं जा सकता।
विश्वास बहुत कठिनाई से बनता है, परंतु एक गलत आचरण उसे पलभर में तोड़ सकता है। समाज की बस्तियाँ केवल ईंट-पत्थर की नहीं होतीं, वे विश्वास, संस्कार और परंपराओं की नींव पर खड़ी होती हैं। यदि मार्गदर्शक ही उन नींवों को कमजोर करने लगें, तो भविष्य असुरक्षित हो जाता है।
यह लेख किसी के विरोध में नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है। जो सच्चे साधु हैं, वे इस पीड़ा को समझेंगे। उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, उनका जीवन ही उनका प्रमाण है। परंतु जो अपने पद का उपयोग प्रभाव, नियंत्रण या प्रतिष्ठा के विस्तार के लिए करते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समाज अब मौन नहीं रहेगा।
समाज को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। अंधभक्ति कभी भी धर्म की रक्षा नहीं कर सकती। श्रद्धा हो, परंतु विवेक के साथ। सम्मान हो, परंतु प्रश्न पूछने का साहस भी हो। साधु को ऊँचा स्थान दें, परंतु उसे भगवान न बना दें। क्योंकि जब इंसान को भगवान बना दिया जाता है, तो उसके दोषों पर पर्दा डाल दिया जाता है, और वही दोष आगे चलकर बड़ी आग का रूप ले लेते हैं।
हमारी जिम्मेदारी है कि हम धर्म की गरिमा बनाए रखें। साधु का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब साधु स्वयं अपनी मर्यादा की रक्षा करेगा। यदि हाथों को घर जलाने की आदत लग जाए, तो बस्तियाँ सौंपने से पहले सोचना ही बुद्धिमानी है।
यह समय कटुता फैलाने का नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकार करने का है। जो साधु त्याग और तपस्या की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, वे समाज की सच्ची धरोहर हैं। और जो इस परंपरा को आडंबर में बदल रहे हैं, उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए।
समाज की बस्तियाँ विश्वास से बनती हैं, भय से नहीं। यदि नेतृत्व भय या दबाव से चलेगा, तो वह टिकेगा नहीं। धर्म की रक्षा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई से होती है।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-15 21:07:56 |
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