WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 15398

Records Matching Filters: 15398

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
74889 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/5Rp8kcVuVxk?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/5Rp8kcVuVxk?feature=share</a> _*?55#निज अनादिअनन्त शुद्ध जीवत्व (निजध्रुवात्मा)में विशिष्टपर्यायसहित जीव&amp; पुद्गल=नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी ७/९-तत्व/पदार्थ का ' अभाव' तीनों कालों में होता ही होता हैं, उसी को तत् का अभावादि कहतें हैं ?सप्ततत्व- नवपदार्थ अधिकार गा २८ से ३८ का रहस्य-पं.अनिलजी, पुणे।* _ *?---नवतत्वगतेत्वेSपि यदेकत्वं न मुञ्चति।७।* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? चैतन्यभावरुपा जीवस्य विशेषा:। चैतन्य अभावरुपा अजीवस्य विशेषा:। विशेषा इत्यस्य कोSर्थ? पर्याया:।चैतन्या: अशुद्धपरिणामा जीवस्य,अचेतना: कर्मपुद्गलपर्याया अजीवस्य इति अर्थ:।?नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी जीवकी&amp;अजीवकी विशेष (पर्याये)हैं।चैतन्यरुप अशुद्धपरिणाम जीवकी &amp; अचेतनरुप कर्मपुद्गलकी याने अजीवकी पर्यायें हैं।?नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी इन पर्यायोंको ७ तत्व/९ तत्व/९ पदार्थ हैं, जैसे (१) जीव? विशिष्टपर्याययुक्त जीव (२) अजीव?निजजीवसे पृथक आकाशादिद्रव्ये, निज अनादिअनन्तशुद्ध जीवसे अन्य रहनेवाले विकारीभाव। (३)आस्त्रव?पुण्य-बंधसहित, पाप-बंधसहित, (४)बंध?पुण्य-आस्त्रवसहित, पाप- आस्त्रवसहित, (५)संवर-पुण्यपापास्त्रवका निरोध, (६)निर्जरा-संवरपूर्वक निर्जरा, आस्त्रवबंध पूर्वक निर्जरा, (७)मोक्ष?सादि-अनन्त शुद्धपर्याय?७ तत्व/९ तत्व/९ पदार्थ हैं, सादिसांत (अनित्य) होंनेंसे इनको यथायोग्य नित्यानित्यार्थक्रियामयी विशिष्ट पर्याय सहित रहनेवाला जीवत्व कहा जाता हैं,करके इनका निजध्रुवशुद्धात्मा में त्रिकाल अभाव वर्तता हैं।? आगमाधार समयसार गा ३८ की आत्मख्याति&amp;ता.वृ., बृहद द्रव्यसंग्रह सप्ततत्व-नवपदार्थ अधिकार की टीका सूत्र २८ से३८।* *#गाथा सूत्र२९?आत्माके जिस परिणामसे कर्मका आस्त्रव होता है उसे जिनेन्द्र कथित भावास्त्रव जानना और जो कर्मोंका आस्त्रव है वह द्रव्यास्त्रव हैं।?निज अनादि-अनंत शुद्ध जीवत्व में सहित रहनेवाला जीवत्व मानना इसकी सजा आजतक के दारुण दु:खका अनंत संसार रहा हैं। सव्वागम धारी होकर अनंत जन्मो में अनंतबार यह गलती सभी जीवोंने की हैं। ?नित्यानित्यार्थक्रियामयी विशिष्ट पर्यायों से रहित रहनेवाला जीवत्व प्रामाण्य संयुक्त स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे जाने बिना आस्त्रव का निरोध नहीं होता यह एक अकाट्य अबाधित सिद्धान्त हैं।* *#गाथा सूत्र३०?पहलेके (भावास्त्रवके) मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और क्रोधिदि कषाय इतने भेद जानना।उनमें मिथ्यात्व आदिके अनुक्रमसे ५,५,१५,३&amp; ४ भेद हैं।?अंतरंगमें जो अनादि-अनंत जीवत्व हैं जो सदैव पर्यायसहित जीवत्व से रहित हैं।किनसे रहित है? अनादि-अनंत जीवत्व? नित्यानित्यार्थक्रियामय ७/९ तत्व/पदार्थ मय विशिष्ट पर्यायसहित जीवत्व से रहित हैं। क्यौं रहित हैं? नित्यस्वभाव और अनित्यस्वभाव परस्पर अत्यन्त विरुद्ध होनेंसे उनका स्वरुप अस्तित्व भिन्न-भिन्न है़ं, एक प्रदेशी होते हुए ऐसा भिन्न-भिन्न पनाका जिनको विरोध है वे नियमसे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषायादि आस्त्रवके संयुक्त होते ही है ं यह भी एक अकाट्य सिद्धान्त हैं।* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २८ से ३०पृष्ठ क्रं ९८ से १०१।* 2026-04-10 15:08:37
74890 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/5Rp8kcVuVxk?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/5Rp8kcVuVxk?feature=share</a> _*?55#निज अनादिअनन्त शुद्ध जीवत्व (निजध्रुवात्मा)में विशिष्टपर्यायसहित जीव&amp; पुद्गल=नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी ७/९-तत्व/पदार्थ का ' अभाव' तीनों कालों में होता ही होता हैं, उसी को तत् का अभावादि कहतें हैं ?सप्ततत्व- नवपदार्थ अधिकार गा २८ से ३८ का रहस्य-पं.अनिलजी, पुणे।* _ *?---नवतत्वगतेत्वेSपि यदेकत्वं न मुञ्चति।७।* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? चैतन्यभावरुपा जीवस्य विशेषा:। चैतन्य अभावरुपा अजीवस्य विशेषा:। विशेषा इत्यस्य कोSर्थ? पर्याया:।चैतन्या: अशुद्धपरिणामा जीवस्य,अचेतना: कर्मपुद्गलपर्याया अजीवस्य इति अर्थ:।?नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी जीवकी&amp;अजीवकी विशेष (पर्याये)हैं।चैतन्यरुप अशुद्धपरिणाम जीवकी &amp; अचेतनरुप कर्मपुद्गलकी याने अजीवकी पर्यायें हैं।?नित्यानित्यार्थक्रियामय अनित्यस्वभावी इन पर्यायोंको ७ तत्व/९ तत्व/९ पदार्थ हैं, जैसे (१) जीव? विशिष्टपर्याययुक्त जीव (२) अजीव?निजजीवसे पृथक आकाशादिद्रव्ये, निज अनादिअनन्तशुद्ध जीवसे अन्य रहनेवाले विकारीभाव। (३)आस्त्रव?पुण्य-बंधसहित, पाप-बंधसहित, (४)बंध?पुण्य-आस्त्रवसहित, पाप- आस्त्रवसहित, (५)संवर-पुण्यपापास्त्रवका निरोध, (६)निर्जरा-संवरपूर्वक निर्जरा, आस्त्रवबंध पूर्वक निर्जरा, (७)मोक्ष?सादि-अनन्त शुद्धपर्याय?७ तत्व/९ तत्व/९ पदार्थ हैं, सादिसांत (अनित्य) होंनेंसे इनको यथायोग्य नित्यानित्यार्थक्रियामयी विशिष्ट पर्याय सहित रहनेवाला जीवत्व कहा जाता हैं,करके इनका निजध्रुवशुद्धात्मा में त्रिकाल अभाव वर्तता हैं।? आगमाधार समयसार गा ३८ की आत्मख्याति&amp;ता.वृ., बृहद द्रव्यसंग्रह सप्ततत्व-नवपदार्थ अधिकार की टीका सूत्र २८ से३८।* *#गाथा सूत्र२९?आत्माके जिस परिणामसे कर्मका आस्त्रव होता है उसे जिनेन्द्र कथित भावास्त्रव जानना और जो कर्मोंका आस्त्रव है वह द्रव्यास्त्रव हैं।?निज अनादि-अनंत शुद्ध जीवत्व में सहित रहनेवाला जीवत्व मानना इसकी सजा आजतक के दारुण दु:खका अनंत संसार रहा हैं। सव्वागम धारी होकर अनंत जन्मो में अनंतबार यह गलती सभी जीवोंने की हैं। ?नित्यानित्यार्थक्रियामयी विशिष्ट पर्यायों से रहित रहनेवाला जीवत्व प्रामाण्य संयुक्त स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे जाने बिना आस्त्रव का निरोध नहीं होता यह एक अकाट्य अबाधित सिद्धान्त हैं।* *#गाथा सूत्र३०?पहलेके (भावास्त्रवके) मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और क्रोधिदि कषाय इतने भेद जानना।उनमें मिथ्यात्व आदिके अनुक्रमसे ५,५,१५,३&amp; ४ भेद हैं।?अंतरंगमें जो अनादि-अनंत जीवत्व हैं जो सदैव पर्यायसहित जीवत्व से रहित हैं।किनसे रहित है? अनादि-अनंत जीवत्व? नित्यानित्यार्थक्रियामय ७/९ तत्व/पदार्थ मय विशिष्ट पर्यायसहित जीवत्व से रहित हैं। क्यौं रहित हैं? नित्यस्वभाव और अनित्यस्वभाव परस्पर अत्यन्त विरुद्ध होनेंसे उनका स्वरुप अस्तित्व भिन्न-भिन्न है़ं, एक प्रदेशी होते हुए ऐसा भिन्न-भिन्न पनाका जिनको विरोध है वे नियमसे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषायादि आस्त्रवके संयुक्त होते ही है ं यह भी एक अकाट्य सिद्धान्त हैं।* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २८ से ३०पृष्ठ क्रं ९८ से १०१।* 2026-04-10 15:08:37
74888 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन ? *"जो धर्म और समाज का नहीं, वो किसी काम का नहीं"* ? महाराष्ट्र के जैन मंत्री लोढ़ा जी द्वारा जैन धर्म की संवैधानिक स्वतंत्र पहचान को समाप्त कर अन्य धर्म से जोड़ने का निजी *राजनैतिक स्वार्थवश दिया गया बयान जब तक सार्वजनिक रूप से ही माफी सहित वापिस नहीं लिया जाता, तब तक इनका पुरजोर विरोध करते हुए इन्हें जैन समाज के किसी भी आयोजन में आमंत्रित न किया जाएं।* "जैनम जयतु शासनम" "गर्व से कहो, हम जैन है" 2026-04-10 15:06:57
74887 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन ? *"जो धर्म और समाज का नहीं, वो किसी काम का नहीं"* ? महाराष्ट्र के जैन मंत्री लोढ़ा जी द्वारा जैन धर्म की संवैधानिक स्वतंत्र पहचान को समाप्त कर अन्य धर्म से जोड़ने का निजी *राजनैतिक स्वार्थवश दिया गया बयान जब तक सार्वजनिक रूप से ही माफी सहित वापिस नहीं लिया जाता, तब तक इनका पुरजोर विरोध करते हुए इन्हें जैन समाज के किसी भी आयोजन में आमंत्रित न किया जाएं।* "जैनम जयतु शासनम" "गर्व से कहो, हम जैन है" 2026-04-10 15:06:56
74885 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन *यदि मैने जैन धर्म को बचाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया...* *तब तो मेरा जीवन, जीवन है अन्यथा ऐसे जीवन तो कितनी बार मिले, कितनी बार नष्ट हो जायेंगे...* *हम किसी का कुछ नहीं लेते, बस हमारा छीनने की कोशिश न करों...* "भगवान महावीर ने कहा है....तेरा सो तेरा, मेरा सो मेरा" -- मुनि श्री 108 अनुसरण सागर जी महाराज ?? महाराष्ट्र के मंत्री जैन समाज के लोढ़ा जी... *जैन धर्म भारत का स्वतंत्र धर्म है, अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए तथ्यहीन कुतर्को से जैन समाज को भ्रमित कर जैन धर्म को अन्य धर्म का हिस्सा बनाने की कोशिश न करों, राजनीति को धर्म में मत लाओ*....संजय जैन, विश्व जैन संगठन, व्हाट्सएप: 8800001532 2026-04-10 15:06:55
74886 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन *यदि मैने जैन धर्म को बचाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया...* *तब तो मेरा जीवन, जीवन है अन्यथा ऐसे जीवन तो कितनी बार मिले, कितनी बार नष्ट हो जायेंगे...* *हम किसी का कुछ नहीं लेते, बस हमारा छीनने की कोशिश न करों...* "भगवान महावीर ने कहा है....तेरा सो तेरा, मेरा सो मेरा" -- मुनि श्री 108 अनुसरण सागर जी महाराज ?? महाराष्ट्र के मंत्री जैन समाज के लोढ़ा जी... *जैन धर्म भारत का स्वतंत्र धर्म है, अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए तथ्यहीन कुतर्को से जैन समाज को भ्रमित कर जैन धर्म को अन्य धर्म का हिस्सा बनाने की कोशिश न करों, राजनीति को धर्म में मत लाओ*....संजय जैन, विश्व जैन संगठन, व्हाट्सएप: 8800001532 2026-04-10 15:06:55
74883 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ *?जिनागम पंथ जयवंत हो?* *परम पूज्य जिनागम पंथ प्रवर्तक, संघ शिरोमणि, भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (35 पिच्छी) का श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय ,मुरादनगर में हुआ…!* *?भव्य मंगल प्रवेश?* . 2026-04-10 15:04:39
74884 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ *?जिनागम पंथ जयवंत हो?* *परम पूज्य जिनागम पंथ प्रवर्तक, संघ शिरोमणि, भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (35 पिच्छी) का श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय ,मुरादनगर में हुआ…!* *?भव्य मंगल प्रवेश?* . 2026-04-10 15:04:39
74881 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? *?जिनागम पंथ जयवंत हो?* *परम पूज्य जिनागम पंथ प्रवर्तक, संघ शिरोमणि, भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (35 पिच्छी) का श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय ,मुरादनगर में हुआ…!* *?भव्य मंगल प्रवेश?* . 2026-04-10 15:04:28
74882 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? *?जिनागम पंथ जयवंत हो?* *परम पूज्य जिनागम पंथ प्रवर्तक, संघ शिरोमणि, भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (35 पिच्छी) का श्री मंशापूर्ण महावीर जिनालय ,मुरादनगर में हुआ…!* *?भव्य मंगल प्रवेश?* . 2026-04-10 15:04:28