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227402 40449689 ? विद्या शरणम ०१ ? 2026-06-13 14:55:20
227400 48340398 ???गुरु भगवान??? 2026-06-13 14:55:08
227399 48340398 ???गुरु भगवान??? 2026-06-13 14:55:07
227397 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-13 14:55:05
227398 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-13 14:55:05
227395 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी _*आहार चर्या* (पड़गाहन), 13/6/26, इतवारी, नागपुर, प्रातः स्मरणीय परम पूज्य वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_ ??? _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आज्ञा के पालन में अपना जीवन समर्पित कर *'कर्तव्य दीक्षा' से दीक्षित 'प्रतिभा मंडल की समस्त ब्रह्मचारिणी बहनों' को आज नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ* आपके पुण्य की खूब-खूब अनुमोदना_ ???? *आज के मंगल प्रवचन* <a href="https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8" target="_blank">https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8</a> 2026-06-13 14:53:59
227396 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी _*आहार चर्या* (पड़गाहन), 13/6/26, इतवारी, नागपुर, प्रातः स्मरणीय परम पूज्य वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_ ??? _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आज्ञा के पालन में अपना जीवन समर्पित कर *'कर्तव्य दीक्षा' से दीक्षित 'प्रतिभा मंडल की समस्त ब्रह्मचारिणी बहनों' को आज नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ* आपके पुण्य की खूब-खूब अनुमोदना_ ???? *आज के मंगल प्रवचन* <a href="https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8" target="_blank">https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8</a> 2026-06-13 14:53:59
227394 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा _*आहार चर्या* (पड़गाहन), 13/6/26, इतवारी, नागपुर, प्रातः स्मरणीय परम पूज्य वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_ ??? _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आज्ञा के पालन में अपना जीवन समर्पित कर *'कर्तव्य दीक्षा' से दीक्षित 'प्रतिभा मंडल की समस्त ब्रह्मचारिणी बहनों' को आज नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ* आपके पुण्य की खूब-खूब अनुमोदना_ ???? *आज के मंगल प्रवचन* <a href="https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8" target="_blank">https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8</a> 2026-06-13 14:53:37
227393 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा _*आहार चर्या* (पड़गाहन), 13/6/26, इतवारी, नागपुर, प्रातः स्मरणीय परम पूज्य वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_ ??? _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आज्ञा के पालन में अपना जीवन समर्पित कर *'कर्तव्य दीक्षा' से दीक्षित 'प्रतिभा मंडल की समस्त ब्रह्मचारिणी बहनों' को आज नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ* आपके पुण्य की खूब-खूब अनुमोदना_ ???? *आज के मंगल प्रवचन* <a href="https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8" target="_blank">https://youtu.be/7fUMsB9NtZ8</a> 2026-06-13 14:53:36
227391 40449704 158 ?☀️श्रीविद्यासमयशरणं ?☀️ *?पूत के गुण पालने में?* 13-6-2026 शनिवार _______________________ *आज अक्सर जहाँ दिखावट और बनावट में असीम फर्क दिखाई देता है, हमारी लिखावट कुछ और है और सजावट कुछ और है, ऐंसे भ्रमित वातावरण में भी आत्मस्थ हो सत्य के दर्शन करना कठिन है, वह सत्यालोकन केवल विशुद्ध अंत: चक्षुओं से ही सम्भव है...* _उस ज्ञान चक्षु की स्वामी यह विद्याकुल आचार्य परम्परा रही है, एक कहावत है "पूत के गुण पालने में दिख जाते हैं" इस कहावत के आचार्य श्री विद्यासिंधु नें दो अर्थ बताये थे, दोनों अर्थो में एक अर्थ मुझ माँ के रूप में था और एक अर्थ गुरु के रूप में, गुरु भी तो एक माँ समान ही होता है वह अपने शिष्यों का पालन करता है मातृत्व भाव से किन्तु स्वामित्व भाव से नहीं! और दीक्षा देने के पूर्व गुणों का अवलोकन करता है, और दीक्षा के बाद उसे तपाकर शुद्ध स्वर्ण में बदलता है, तुम्हारे महान गुणों को विद्या रूपी माँ नें बचपन के पालने में भी देखा था और फिर गुरु रूप में तुमको पालने में भी, तुम ज़ब केवल 1 माह के हुए थे तब पालने से नीचे गिरे थे, गिरकर भी नहीं रोना तुम्हारी शांत प्रकृति का प्रथम दर्शन था!_ _एक महान आचार्य शिष्यों के अपराध पर प्रथम तो उपगूहन और स्थितिकरण का प्रयास करता है, और अपराध की लय न बदलने पर अंतिम उपचार कुछ प्राश्चित के रूप में करता है, आचार्य श्री जी नें जीवन में किसी शिष्यों को कोई दंड नहीं दिया, उनके द्वारा शिष्यों को गलती का एक दंड ही काफ़ी था की वे उसे आज्ञा मुक्त कर देते थे, और यही सबसे बड़ा उस शिष्य के लिए प्रायश्चित हो जाता था, और दिशा सूचक भी और दशा परिवर्तन का एक अवसर भी...._ *गुरु का उत्तम शिष्य उसे माना जाता है जिसने सदा केवल गुरु का आशीर्वाद पाया हो, दंड नहीं! और तुम इन्ही उच्चतम शिष्यों में हो जिसने गुरु से बस ज्ञान और आशीर्वाद पाया है कभी कोई दंड / प्रायश्चित नहीं, पुरे जीवन काल में कोई शिष्य कैसे इतना सजग, समर्पित, और अनाशक्त हो सकता है यह शिष्यों की पीढ़ी को शोध एवं बोध का विषय है.* _मुझे आज भी वह घटना भय से भर देती है ज़ब मुझे संदेश मिला की तुम कटनी में क्षुल्लक अवस्था में अत्यंत व्याधि से घिर चुके थे, इस खबर नें मुझे मेरे अतीत के घटनाक्रम को याद दिला दिया ज़ब मेरा पुत्र सुकांत और मेरी पुत्री सुमति अल्पआयु में स्वर्गीय हो गए थे, तुम स्वयं के प्रति बड़े कठोर थे बड़े निर्दयी थे खुद के लिए, तुमने कुण्डलपुर में विराजित अपने विद्यागुरु के पास बिना डरे समाधि की भावना का संदेश भेज दिया था, और गुरु नें भी निर्मोही होकर कटनी के पंडित जी के द्वारा परिस्थिति अनुसार निर्णय लेने की स्वीकृति तुम्हें भेज दी थी, किन्तु गुरु कटनी नहीं गए और न तुम्हें बुलाया, ज़ब इस बात पर उन पंडित जी में कारण पूंछा तो गुरु नें कहा की अगर अवस्था समाधि की है तो मेरा सामने रहना उचित नहीं क्षपक में मोह जाग्रत हो सकता है जो उत्कृष्ट समाधि में बाधा बन सकता है, तुम्हारे गुरु के इस निर्णय से यह तय हो गया था की तुम दोनों में वात्सल्य तो है किन्तु राग नहीं, स्नेह तो है किन्तु मोह नहीं, आगम से बढ़कर और मूलगुणों से ऊपर कुछ भी तुम्हें और तुम्हारे गुरु को स्वीकार नहीं!_ _*जानती थी तुम उन महायोगी के चरणों में रहकर, क्षुल्ल्क अवस्था में भी महायोगी हो चुके थे, देह या जीवन तुम्हें महावृतों से मूल्यवान नहीं है, अपनी हर आकुलता पर तुम पहले ही विजय पा चुके थे!*_ _समाधि तो पल भर में तुम स्वीकार कर लोगे किन्तु व्रतो में अंश मात्र भी दोष तुम्हें स्वीकार नहीं होगा ये बात मुझे ज्ञात थी, मैं जितना तुम्हें जानती थी उतना आचार्य श्री जी को भी, मैं माँ हूँ न तो मैं मानती थी की तुम दोनों मेरे पुत्र हो, दोनों भाई हो किन्तु आचार्य श्री जी के लिए तुम केवल एक मोक्षमार्गी साधक हो, जिसका कल्याण करना ही उनका एक मात्र लक्ष्य है, और वे बिना प्रेम में जकड़े तुम्हें समाधि तक की स्वीकृति दे चुके थे, वो वात्सल्य के सागर हैं मगर निर्मोही भी हैं, वो दया के हिमालय भी हैं किन्तु चर्या एवं अनुशासन में चट्टान से भी कठोर हैं, तुम दोनों अपने पथ पर अडिग थे, जितेन्द्रिय हो चुके थे किन्तु मेरा मन कांप रहा था मगर कुंडलपुर के बड़े बाबा एवं छोटे बाबा की कृपा से तुम्हारा स्वास्थ्य सुधार हुआ तुम व्याधि से समाधि तक की स्थिति का सामना करते हुए पुनः आत्मउपलब्धि की उपाधि की यात्रा पर पुनः आरून हुए!_ _अब मुझे यकीन हुआ जिसको धरती पर लाने का प्रयोजन स्वयं नियति नें रचा हो, जिसके शरण प्रदाता स्वयं विद्यासिंधु जैसे ईश्वर हों, उन्हें कोई व्याधि या उपसर्ग पराजित कैसे कर सकता है, नियति के नियत को बदलने की सामर्थ किसी में नहीं!_ _ऐंसे अपराजेय साधक विद्या-समय सिंधु को ये लेखनी नमन करती है._ _____________________ आशीष सिंघई "श्री जी" 13-6-2026 शनिवार (आप भी पढ़कर सभी को प्रेषित करें ) 2026-06-13 14:50:39