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70626 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म *जय बोलो १००८ श्री आदिनाथ भगवान जी की जय* ????? *वैशाख कृष्णपक्ष तिथि ०७ सप्तमी तारीख ०९ मार्च वार गुरुवार २०२६* ????? *चैत्र वदी नवमी को जन्मे, तुमने जग को ज्ञान सिखाया|* *कर्म भूमि का बीज उपाया, कल्प-वृक्ष जब लगे विघटने||* *जनता आयी दुखड़ा कहने,सब का संशय तभी मिटाया | सुर्य-चन्द्र का भान कराया, खेती करना भी सिखलाया ||* *विक्रम संवत २०८३* *वीर निवाऀण सम्वत्-२५५२-५३* *?गुरु ग्रह का जाप?* *ॐ ह्रीॅं श्री ‌आदिनाथाय गुरुवे नमः* *ॐ ह्रीॅं श्री णमो आयरियाणं* ????????? *ॐ ह्रीॅं श्री वृषभनाथ तिंरथॅंकंर जिनेन्द्रायॗ नमः* *ॐ ह्रीं श्री महावीरस्वामी प्रभु जिनेन्द्रायॗ नमः* ???????? *शीश नवा अरिहंत को सिद्धन करूॅ प्रणाम |* *उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी ना‍म ||* *सर्व साधु और सरस्वती जिनमंदिरसुखकार |* *आदिनाथ भगवान् को मन-मदिर में धार ||* *?? ? इस संसार में सबका स्वास्थ्य अच्छा हो सबका भला हो जय जिनेंद्र आप सब को अंग्रेजी नववर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं बधाई हो??*????????????? 2026-04-09 06:18:31
70625 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म *जय बोलो १००८ श्री आदिनाथ भगवान जी की जय* ????? *वैशाख कृष्णपक्ष तिथि ०७ सप्तमी तारीख ०९ मार्च वार गुरुवार २०२६* ????? *चैत्र वदी नवमी को जन्मे, तुमने जग को ज्ञान सिखाया|* *कर्म भूमि का बीज उपाया, कल्प-वृक्ष जब लगे विघटने||* *जनता आयी दुखड़ा कहने,सब का संशय तभी मिटाया | सुर्य-चन्द्र का भान कराया, खेती करना भी सिखलाया ||* *विक्रम संवत २०८३* *वीर निवाऀण सम्वत्-२५५२-५३* *?गुरु ग्रह का जाप?* *ॐ ह्रीॅं श्री ‌आदिनाथाय गुरुवे नमः* *ॐ ह्रीॅं श्री णमो आयरियाणं* ????????? *ॐ ह्रीॅं श्री वृषभनाथ तिंरथॅंकंर जिनेन्द्रायॗ नमः* *ॐ ह्रीं श्री महावीरस्वामी प्रभु जिनेन्द्रायॗ नमः* ???????? *शीश नवा अरिहंत को सिद्धन करूॅ प्रणाम |* *उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी ना‍म ||* *सर्व साधु और सरस्वती जिनमंदिरसुखकार |* *आदिनाथ भगवान् को मन-मदिर में धार ||* *?? ? इस संसार में सबका स्वास्थ्य अच्छा हो सबका भला हो जय जिनेंद्र आप सब को अंग्रेजी नववर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं बधाई हो??*????????????? 2026-04-09 06:18:30
70624 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 1 *कुछ नहीं सबकुछ देखो पर अपनी आत्मा में।* 2 *धैर्य सदा सुख देता है।* 3 *किसी को दबाना अर्थात वस्तु स्वरूप को भुलाना।* 4 *सरल और नरम व्यक्ति ही मोक्षमार्ग में कदम बढ़ा सकता है।* 5 *अच्छा घर तो एक ही है निजघर,जिसका नाम है शुद्धात्मा।* 6 *सतसंगति ही सद्गति की ओर ले जाती है।* 7 *स्वभाव में झुकने वालों को कहीं और नहीं झुकना पड़ता है।* 8 *मोक्षमार्ग की सफलता निराकुलता बढ़ने से है।* 9 *उल्टी सलाह अनंत पाप बांधती है।* 10 *दूसरों को उल्लू बनाने वाले भविष्य में सही में उल्लू बनते हैं।*       (श्रेणिक जैन जबलपुर 9-4-26) 2026-04-09 06:18:16
70623 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 1 *कुछ नहीं सबकुछ देखो पर अपनी आत्मा में।* 2 *धैर्य सदा सुख देता है।* 3 *किसी को दबाना अर्थात वस्तु स्वरूप को भुलाना।* 4 *सरल और नरम व्यक्ति ही मोक्षमार्ग में कदम बढ़ा सकता है।* 5 *अच्छा घर तो एक ही है निजघर,जिसका नाम है शुद्धात्मा।* 6 *सतसंगति ही सद्गति की ओर ले जाती है।* 7 *स्वभाव में झुकने वालों को कहीं और नहीं झुकना पड़ता है।* 8 *मोक्षमार्ग की सफलता निराकुलता बढ़ने से है।* 9 *उल्टी सलाह अनंत पाप बांधती है।* 10 *दूसरों को उल्लू बनाने वाले भविष्य में सही में उल्लू बनते हैं।*       (श्रेणिक जैन जबलपुर 9-4-26) 2026-04-09 06:18:15
70621 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ?????????? ? आज तिथि सप्तमी (7) है✨ ?आज के दर्शन ?? ?श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान? ? जैन सोसाइटी ऑफ़ मेट्रोपोलीटन Washington, ?? Maryland- Washington (US) ?प्रातः कालीन वंदना ॐ ह्रींम अर्हम् श्री असिआऊसा नमः ? ?अरिहंते, सिद्धे, साहु, शरणं पवजामी केवली पन्नतम धम्मम शरणं पवजामी? ?लोक में विराजित समस्त अरिहंत परमेष्ठीयों को वंदन ? ?लोक के अग्र भाग में सिध्द शिला पर विराजित समस्त सिध्द परमेष्ठीयों को वंदन ? ?ढाई द्वीप में विराजित समस्त आचार्य उपाध्याय साधु परमेष्ठीयों को नमन ? Facebook: fb.com/RajBagrechaa fb.com/JainRajeshBagrecha fb.com/RajeshBagrechaGharMandir Instagram: instagram.com/RajeshBagrecha.Jain.GharMandir Twitter: twitter.com/JainGoldnMandir ✊ "समूह रात्रिभोजन मुक्त जैन शासन" ? सामूहिक रात्रि भोजन त्याग हर जैनी को करना चाहिये ? ?सभी संयमी जीवो का रत्नत्रय सदाकाल उत्तम रहे सभी का दिन मंगलमय हो ? ?????????? 2026-04-09 06:17:55
70622 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ?????????? ? आज तिथि सप्तमी (7) है✨ ?आज के दर्शन ?? ?श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान? ? जैन सोसाइटी ऑफ़ मेट्रोपोलीटन Washington, ?? Maryland- Washington (US) ?प्रातः कालीन वंदना ॐ ह्रींम अर्हम् श्री असिआऊसा नमः ? ?अरिहंते, सिद्धे, साहु, शरणं पवजामी केवली पन्नतम धम्मम शरणं पवजामी? ?लोक में विराजित समस्त अरिहंत परमेष्ठीयों को वंदन ? ?लोक के अग्र भाग में सिध्द शिला पर विराजित समस्त सिध्द परमेष्ठीयों को वंदन ? ?ढाई द्वीप में विराजित समस्त आचार्य उपाध्याय साधु परमेष्ठीयों को नमन ? Facebook: fb.com/RajBagrechaa fb.com/JainRajeshBagrecha fb.com/RajeshBagrechaGharMandir Instagram: instagram.com/RajeshBagrecha.Jain.GharMandir Twitter: twitter.com/JainGoldnMandir ✊ "समूह रात्रिभोजन मुक्त जैन शासन" ? सामूहिक रात्रि भोजन त्याग हर जैनी को करना चाहिये ? ?सभी संयमी जीवो का रत्नत्रय सदाकाल उत्तम रहे सभी का दिन मंगलमय हो ? ?????????? 2026-04-09 06:17:55
70619 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=9JF34&amp;utm_referrer_state=STAR" target="_blank">https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=9JF34&amp;utm_referrer_state=STAR</a> 2026-04-09 06:15:21
70620 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=9JF34&amp;utm_referrer_state=STAR" target="_blank">https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=9JF34&amp;utm_referrer_state=STAR</a> 2026-04-09 06:15:21
70618 40449749 जिनोदय?JINODAYA *जैन धर्म में शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना के दुष्परिणाम — एक गहन चिंतन* जैन धर्म केवल एक पूजा-पद्धति या परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक मार्ग है। इस मार्ग में तीर्थंकर भगवान सर्वोच्च स्थान पर विराजमान होते हैं, जो हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का पथ दिखाते हैं। किन्तु इस दिव्य धर्म व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और उसकी रक्षा करने हेतु शासन रक्षक देवी-देवताओं की भी विशेष भूमिका मानी गई है। प्राचीन आगमों, परंपराओं और आचार्यों के वचनों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि प्रत्येक तीर्थंकर के साथ एक यक्ष-यक्षिणी अथवा शासन देव-देवी जुड़े होते हैं, जो धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और सच्चे श्रद्धालुओं के लिए अदृश्य रूप से सहायक बनते हैं। जैसे माँ पद्मावती, चक्रेश्वरी माता, क्षेत्रपाल बाबा आदि—ये केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा की जीवंत शक्तियाँ मानी जाती हैं। परंतु वर्तमान समय में एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है—कुछ लोग तथाकथित “आधुनिकता” और “तर्क” के नाम पर इन शासन रक्षक देवताओं की उपेक्षा या उपहास करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत भूल नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक संकेत है। १. श्रद्धा के क्षरण से आध्यात्मिक पतन श्रद्धा जैन धर्म की नींव है। जब व्यक्ति शासन देवताओं की अवहेलना करता है, तो उसकी श्रद्धा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह कमजोरी आगे चलकर तीर्थंकरों और गुरु के प्रति भी अनादर में परिवर्तित हो सकती है, जिससे आत्मा का पतन निश्चित हो जाता है। २. साधना मार्ग में अदृश्य अवरोध धर्म साधना केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति शासन देव-देवियों का अनादर करता है, तो उसकी साधना में अनगिनत बाधाएँ उत्पन्न होती हैं—ध्यान में अस्थिरता, मन में संदेह, और बार-बार नकारात्मक विचारों का आना। यह सब आत्मिक उन्नति को रोक देता है। ३. अहंकार का विकराल रूप “हमें किसी देवी-देवता की आवश्यकता नहीं”—यह सोच धीरे-धीरे अहंकार को जन्म देती है। जैन दर्शन में अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। शासन देवताओं की अवहेलना इसी अहंकार का परिणाम होती है, जो अंततः व्यक्ति को मिथ्यात्व (गलत आस्था) की ओर धकेल देता है। ४. धर्म की मर्यादाओं का ह्रास जब समाज में शासन रक्षक शक्तियों के प्रति सम्मान कम होता है, तो धार्मिक अनुशासन भी कमजोर हो जाता है। मंदिरों की पवित्रता घटती है, नियमों का पालन ढीला पड़ता है, और धर्म केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह स्थिति धर्म के वास्तविक स्वरूप को विकृत कर देती है। ५. कर्म बंधन और पाप की वृद्धि जैन शास्त्रों में अविनय (असम्मान) को गंभीर पाप माना गया है। शासन रक्षक देवी-देवताओं का अनादर करना भी इसी श्रेणी में आता है। इससे अशुभ कर्मों का बंधन बढ़ता है, जो भविष्य में दुःख, अशांति और कष्ट का कारण बनता है। ६. मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक विपत्तियाँ अनेक अनुभवी साधकों और श्रावकों के जीवन में यह देखा गया है कि जब धर्म-रक्षक शक्तियों का अनादर होता है, तो जीवन में अचानक समस्याएँ बढ़ने लगती हैं—बिना कारण तनाव, पारिवारिक कलह, आर्थिक हानि, और मानसिक अस्थिरता। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर धर्म के नियमों का परिणाम होता है। ७. सच्चे श्रद्धालुओं का आंतरिक द्वंद्व आज हर जगह “आस्था की बोली” लग रही है और उसका भोंडा प्रदर्शन हो रहा है। इस दिखावे और अवहेलना के बीच एक सच्चा सधर्मी स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। एक ओर उसे धर्म की गहराई समझ आती है, दूसरी ओर समाज में हो रही अवहेलना उसे भीतर से विचलित करती है। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है। ८. आस्था और अंधविश्वास के बीच संतुलन की आवश्यकता यह भी सत्य है कि जैन धर्म अंधविश्वास को स्वीकार नहीं करता। देवी-देवताओं की पूजा अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल सहायक माध्यम है। परंतु “अंधविश्वास से बचने” के नाम पर “असम्मान” करना भी उतना ही गलत है। हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा—जहाँ श्रद्धा भी हो और विवेक भी। समाधान और मार्गदर्शन हमें यह समझना होगा कि शासन रक्षक देवी-देवता कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि धर्म व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं। • उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान रखें • दिखावे से दूर रहकर सरल और सच्ची भक्ति करें • तीर्थंकर भगवान को सर्वोच्च मानते हुए, शासन देवताओं को सहायक शक्ति के रूप में स्वीकार करें • धर्म के नाम पर हो रहे व्यापार और पाखंड से सावधान रहें निष्कर्ष — एक जागरूकता का संदेश शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना केवल एक धार्मिक गलती नहीं, बल्कि यह आत्मा के पतन की शुरुआत है। यह आवश्यक है कि हम अपनी आस्था को पुनः जागृत करें, उसे सही दिशा दें, और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें। श्रद्धा और विवेक का संतुलन ही हमें सच्चे अर्थों में जैन धर्म का अनुयायी बना सकता है। अंततः, यह लेख किसी भय या अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए है—ताकि हम अपने धर्म, अपनी आस्था और अपनी आत्मा के प्रति सजग रह सकें। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-09 06:10:16
70617 40449749 जिनोदय?JINODAYA *जैन धर्म में शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना के दुष्परिणाम — एक गहन चिंतन* जैन धर्म केवल एक पूजा-पद्धति या परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक मार्ग है। इस मार्ग में तीर्थंकर भगवान सर्वोच्च स्थान पर विराजमान होते हैं, जो हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का पथ दिखाते हैं। किन्तु इस दिव्य धर्म व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और उसकी रक्षा करने हेतु शासन रक्षक देवी-देवताओं की भी विशेष भूमिका मानी गई है। प्राचीन आगमों, परंपराओं और आचार्यों के वचनों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि प्रत्येक तीर्थंकर के साथ एक यक्ष-यक्षिणी अथवा शासन देव-देवी जुड़े होते हैं, जो धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और सच्चे श्रद्धालुओं के लिए अदृश्य रूप से सहायक बनते हैं। जैसे माँ पद्मावती, चक्रेश्वरी माता, क्षेत्रपाल बाबा आदि—ये केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा की जीवंत शक्तियाँ मानी जाती हैं। परंतु वर्तमान समय में एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है—कुछ लोग तथाकथित “आधुनिकता” और “तर्क” के नाम पर इन शासन रक्षक देवताओं की उपेक्षा या उपहास करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत भूल नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक संकेत है। १. श्रद्धा के क्षरण से आध्यात्मिक पतन श्रद्धा जैन धर्म की नींव है। जब व्यक्ति शासन देवताओं की अवहेलना करता है, तो उसकी श्रद्धा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह कमजोरी आगे चलकर तीर्थंकरों और गुरु के प्रति भी अनादर में परिवर्तित हो सकती है, जिससे आत्मा का पतन निश्चित हो जाता है। २. साधना मार्ग में अदृश्य अवरोध धर्म साधना केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति शासन देव-देवियों का अनादर करता है, तो उसकी साधना में अनगिनत बाधाएँ उत्पन्न होती हैं—ध्यान में अस्थिरता, मन में संदेह, और बार-बार नकारात्मक विचारों का आना। यह सब आत्मिक उन्नति को रोक देता है। ३. अहंकार का विकराल रूप “हमें किसी देवी-देवता की आवश्यकता नहीं”—यह सोच धीरे-धीरे अहंकार को जन्म देती है। जैन दर्शन में अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। शासन देवताओं की अवहेलना इसी अहंकार का परिणाम होती है, जो अंततः व्यक्ति को मिथ्यात्व (गलत आस्था) की ओर धकेल देता है। ४. धर्म की मर्यादाओं का ह्रास जब समाज में शासन रक्षक शक्तियों के प्रति सम्मान कम होता है, तो धार्मिक अनुशासन भी कमजोर हो जाता है। मंदिरों की पवित्रता घटती है, नियमों का पालन ढीला पड़ता है, और धर्म केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह स्थिति धर्म के वास्तविक स्वरूप को विकृत कर देती है। ५. कर्म बंधन और पाप की वृद्धि जैन शास्त्रों में अविनय (असम्मान) को गंभीर पाप माना गया है। शासन रक्षक देवी-देवताओं का अनादर करना भी इसी श्रेणी में आता है। इससे अशुभ कर्मों का बंधन बढ़ता है, जो भविष्य में दुःख, अशांति और कष्ट का कारण बनता है। ६. मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक विपत्तियाँ अनेक अनुभवी साधकों और श्रावकों के जीवन में यह देखा गया है कि जब धर्म-रक्षक शक्तियों का अनादर होता है, तो जीवन में अचानक समस्याएँ बढ़ने लगती हैं—बिना कारण तनाव, पारिवारिक कलह, आर्थिक हानि, और मानसिक अस्थिरता। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर धर्म के नियमों का परिणाम होता है। ७. सच्चे श्रद्धालुओं का आंतरिक द्वंद्व आज हर जगह “आस्था की बोली” लग रही है और उसका भोंडा प्रदर्शन हो रहा है। इस दिखावे और अवहेलना के बीच एक सच्चा सधर्मी स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। एक ओर उसे धर्म की गहराई समझ आती है, दूसरी ओर समाज में हो रही अवहेलना उसे भीतर से विचलित करती है। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है। ८. आस्था और अंधविश्वास के बीच संतुलन की आवश्यकता यह भी सत्य है कि जैन धर्म अंधविश्वास को स्वीकार नहीं करता। देवी-देवताओं की पूजा अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल सहायक माध्यम है। परंतु “अंधविश्वास से बचने” के नाम पर “असम्मान” करना भी उतना ही गलत है। हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा—जहाँ श्रद्धा भी हो और विवेक भी। समाधान और मार्गदर्शन हमें यह समझना होगा कि शासन रक्षक देवी-देवता कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि धर्म व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं। • उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान रखें • दिखावे से दूर रहकर सरल और सच्ची भक्ति करें • तीर्थंकर भगवान को सर्वोच्च मानते हुए, शासन देवताओं को सहायक शक्ति के रूप में स्वीकार करें • धर्म के नाम पर हो रहे व्यापार और पाखंड से सावधान रहें निष्कर्ष — एक जागरूकता का संदेश शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना केवल एक धार्मिक गलती नहीं, बल्कि यह आत्मा के पतन की शुरुआत है। यह आवश्यक है कि हम अपनी आस्था को पुनः जागृत करें, उसे सही दिशा दें, और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें। श्रद्धा और विवेक का संतुलन ही हमें सच्चे अर्थों में जैन धर्म का अनुयायी बना सकता है। अंततः, यह लेख किसी भय या अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए है—ताकि हम अपने धर्म, अपनी आस्था और अपनी आत्मा के प्रति सजग रह सकें। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-09 06:10:15