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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Message
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*वक्त*
का खेल है सारा
जिसका आ गया
*वो छा गया*!
*गुरु मां मेरी पहचान* |
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2026-04-12 04:13:29 |
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| 78580 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*वक्त*
का खेल है सारा
जिसका आ गया
*वो छा गया*!
*गुरु मां मेरी पहचान* |
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2026-04-12 04:13:29 |
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| 78578 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु भगवन ??? |
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2026-04-12 04:09:48 |
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| 78577 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु भगवन ??? |
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2026-04-12 04:09:47 |
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| 78576 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*✨ आज की ✨*
*?? कहानी ??*
*दान कैसा हो*
*प्राचीन काल की बात है कि अमर नाम का एक कवि था। जो कि बड़ा अपरिग्रही था, एक दिन वह सेठ के घर पर कुछ मांगने गया। वहां पर चला तो पर उसने मांगा कुछ नहीं। खाली हाथ जब वह अपने घर आया तो उसके बच्चे रो रहे थे। उसकी पत्नी ने अमर से कहा कि क्या आपकी बिद्धता की इतनी कदर नहीं कि कोई आपकों कुछ दे दे? अमर ने कहा, देते तो सब है पर ले कौन? कोई अहंकार से देता है, कोई सैकड़ों को रुला कर देता है और कोई गाली देकर देता है. ऐसा दान किस काम का है? ऐसे दान को मैं क्यों लूँ? बन्धुओं! आजकल का दान भी इसी प्रकार का है। हाथी को छीनकर बकरी का दान देना क्या ऐसा नहीं है? इस प्रकार अमर ने कहा कि ऐसा दान लेने के बजाय तो मर जाना ही अच्छा है। क्योंकि ऐसा दान लेने से हमारी वृत्ति भी खराब हो जायेगी। अमर की पत्नी ने गहरी श्वास छोड़ते हुए कहा कि क्या दुनिया में कोई सच्चा दातार नहीं है? जाओ देखो कुछ लाकर इन बच्चों को सन्तुष्ट करो। अमर राज्य दरबार में जाता है, जहाँ युवराज का राज्याभिषेक हो रहा था। सब उसको आशीर्वाद दे रहे थे। अमर भी आशीर्वाद देते हुए कहता है कि हे राजन! तू सिंहासन पर बैठकर नहीं बल्कि प्रजा के हृदय पर बैठकर राज्य करना। राजकुमार ने उसका आशय समझ कर कहा कि अमर कुछ मांग। अमर ने सोचा कि मैं क्या मांगू, यहाँ भी प्रजा के पीसने से ही सारा खजाना भरा पड़ा है। उसने कहा राजन् अपना वचन रहने दीजिये। मैं फिर कभी मांग लूंगा। राजा ने कहा नहीं अभी कुछ मांग लो। अमर ने कहा महाराज! आप अपनी मेहनत का एक रुपया मुझे दे दीजिये। यह सुनकर सब लोग चकित हो गये, पर युवराज ने कहा कि राजकवि तुमने जो बादशाही दान माँगा है उसे मेरे बादशाही दिल ने समझ लिया है। आज का तो यह राज्याभिषेक बन्द रहेगा मैं पहले तुम्हें दान दूंगा। युवराज अपने राज्य सिंहासन से उतर कर एक रुपया पैदा करने का प्रयत्न करने लगा। उसने बहुत सोचा विचारा और देखा.किन्तु उसे कहीं भी मजदूरी नहीं मिली। अन्त में एक लुहार के पास आया। लुहार के पास काम था उसने कहा कि इस लोहे को घन से पीटो और फिर बाद में पैसे लो। राजकुमार ने घन उठाया और पीटना प्रारम्भ किया। जैसे-जैसे वह घन चलाता था वैसे-वैसे उसके हृदय में विचारों का उथल-पुथल मचता था। वह मन ही मन में कहता था कि क्या पैसा इसी प्रकार पैदा किया जाता है? लुहार ने कहा भाई। पैसा हराम का नहीं है, इसलिए यदि ऐसा विचार करना हो तो घर जाओ यहां तो काम करो और पूरे पैसे लो। राजकुमार सांयकाल तक परिश्रम करता है और उसकी मजदूरी के बदले में रुपया पाता है उसे लेकर वह प्रसन्नता पूर्वक अमर के घर की ओर चलता है। मार्ग में जाते-जाते उसके मन में विचार उठता है कि ऐसी खरी मजदूरी के पैसे का हम लोग कितना मूल्य आंकते हैं? जो लोग महीनों की मजदूरी को केवल एक घन्टे के मौज शौक में उड़ा देते हैं वे मानव है या दानव? राजकुमार उसी दिन से राजा न होकर मानव बन जाता है। वह तभी अमर के घर पहुँचकर अपनी मेहनत का एक रुपया दान में देता है। अमर उसे हर्षपूर्वक लेकर पूर्ण रूप से आशीर्वाद देता है कि हे युवराजा तुम सिंहासन पर नहीं, किन्तु प्रजा के हृदय पर विराजमान होकर राज्य करो।*
*ऊपर के दृष्टान्त से हमें मालूम होना चाहिए कि त्याग और दान क्या चीज है। हम अपने मन के अनुसार जो दान देते हैं क्या वही सच्चा दान है? नहीं! सच्या दान यही है जो कि अपने परिश्रम के पैसे में से दिया जाए। ऐसा दानी ही त्याग धर्म के अंश का पालन करने वाला है और इसी से शान्ति मिलती है।*
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2026-04-12 04:05:07 |
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| 78575 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*✨ आज की ✨*
*?? कहानी ??*
*दान कैसा हो*
*प्राचीन काल की बात है कि अमर नाम का एक कवि था। जो कि बड़ा अपरिग्रही था, एक दिन वह सेठ के घर पर कुछ मांगने गया। वहां पर चला तो पर उसने मांगा कुछ नहीं। खाली हाथ जब वह अपने घर आया तो उसके बच्चे रो रहे थे। उसकी पत्नी ने अमर से कहा कि क्या आपकी बिद्धता की इतनी कदर नहीं कि कोई आपकों कुछ दे दे? अमर ने कहा, देते तो सब है पर ले कौन? कोई अहंकार से देता है, कोई सैकड़ों को रुला कर देता है और कोई गाली देकर देता है. ऐसा दान किस काम का है? ऐसे दान को मैं क्यों लूँ? बन्धुओं! आजकल का दान भी इसी प्रकार का है। हाथी को छीनकर बकरी का दान देना क्या ऐसा नहीं है? इस प्रकार अमर ने कहा कि ऐसा दान लेने के बजाय तो मर जाना ही अच्छा है। क्योंकि ऐसा दान लेने से हमारी वृत्ति भी खराब हो जायेगी। अमर की पत्नी ने गहरी श्वास छोड़ते हुए कहा कि क्या दुनिया में कोई सच्चा दातार नहीं है? जाओ देखो कुछ लाकर इन बच्चों को सन्तुष्ट करो। अमर राज्य दरबार में जाता है, जहाँ युवराज का राज्याभिषेक हो रहा था। सब उसको आशीर्वाद दे रहे थे। अमर भी आशीर्वाद देते हुए कहता है कि हे राजन! तू सिंहासन पर बैठकर नहीं बल्कि प्रजा के हृदय पर बैठकर राज्य करना। राजकुमार ने उसका आशय समझ कर कहा कि अमर कुछ मांग। अमर ने सोचा कि मैं क्या मांगू, यहाँ भी प्रजा के पीसने से ही सारा खजाना भरा पड़ा है। उसने कहा राजन् अपना वचन रहने दीजिये। मैं फिर कभी मांग लूंगा। राजा ने कहा नहीं अभी कुछ मांग लो। अमर ने कहा महाराज! आप अपनी मेहनत का एक रुपया मुझे दे दीजिये। यह सुनकर सब लोग चकित हो गये, पर युवराज ने कहा कि राजकवि तुमने जो बादशाही दान माँगा है उसे मेरे बादशाही दिल ने समझ लिया है। आज का तो यह राज्याभिषेक बन्द रहेगा मैं पहले तुम्हें दान दूंगा। युवराज अपने राज्य सिंहासन से उतर कर एक रुपया पैदा करने का प्रयत्न करने लगा। उसने बहुत सोचा विचारा और देखा.किन्तु उसे कहीं भी मजदूरी नहीं मिली। अन्त में एक लुहार के पास आया। लुहार के पास काम था उसने कहा कि इस लोहे को घन से पीटो और फिर बाद में पैसे लो। राजकुमार ने घन उठाया और पीटना प्रारम्भ किया। जैसे-जैसे वह घन चलाता था वैसे-वैसे उसके हृदय में विचारों का उथल-पुथल मचता था। वह मन ही मन में कहता था कि क्या पैसा इसी प्रकार पैदा किया जाता है? लुहार ने कहा भाई। पैसा हराम का नहीं है, इसलिए यदि ऐसा विचार करना हो तो घर जाओ यहां तो काम करो और पूरे पैसे लो। राजकुमार सांयकाल तक परिश्रम करता है और उसकी मजदूरी के बदले में रुपया पाता है उसे लेकर वह प्रसन्नता पूर्वक अमर के घर की ओर चलता है। मार्ग में जाते-जाते उसके मन में विचार उठता है कि ऐसी खरी मजदूरी के पैसे का हम लोग कितना मूल्य आंकते हैं? जो लोग महीनों की मजदूरी को केवल एक घन्टे के मौज शौक में उड़ा देते हैं वे मानव है या दानव? राजकुमार उसी दिन से राजा न होकर मानव बन जाता है। वह तभी अमर के घर पहुँचकर अपनी मेहनत का एक रुपया दान में देता है। अमर उसे हर्षपूर्वक लेकर पूर्ण रूप से आशीर्वाद देता है कि हे युवराजा तुम सिंहासन पर नहीं, किन्तु प्रजा के हृदय पर विराजमान होकर राज्य करो।*
*ऊपर के दृष्टान्त से हमें मालूम होना चाहिए कि त्याग और दान क्या चीज है। हम अपने मन के अनुसार जो दान देते हैं क्या वही सच्चा दान है? नहीं! सच्या दान यही है जो कि अपने परिश्रम के पैसे में से दिया जाए। ऐसा दानी ही त्याग धर्म के अंश का पालन करने वाला है और इसी से शान्ति मिलती है।*
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2026-04-12 04:05:06 |
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| 78574 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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वर्तमानकालीन चोविस तीर्थंकरांच्या मालिकेतील प्रथम तीर्थंकर, राजे नाभिराज आणि राणी मरुदेवी यांचे पुत्र *भगवान वृषभनाथ तथा आदिनाथ* यांचा हा जन्म आणि दीक्षा कल्याणिकाचा मंगलमय दिन !
आदिनाथ यांचे जन्मकल्याणिक कौशल देशातील अयोध्या नगरी येथे इक्ष्वाकु वंशात झाले. त्यांनी आपल्या ब्राह्मी या पुत्रीस गणित शास्त्र व सुंदरी या दुसऱ्या पुत्रीस व्याकरण, छंद, अलंकार इत्यादी शास्त्र शिकविले. भरत या पुत्रास अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र; बाहुबली या पुत्रास आयुर्वेद, धनुर्वेदाचे ज्ञान दिले. समस्त श्रावक - श्राविकांना असि, मसि, कृषी आदी सहा कला दिल्या..
*एके दिवशी वृषभदेव राज्यसभेमध्ये सुवर्णमय सिंहासनावर विराजमान झाले असताना इंद्रांनी अल्पायु असलेल्या नीलांजना या अप्सरेस राज्यसभेत नृत्य करण्यास सांगितले. ती नृत्य करता करता आयुकर्म संपल्याने मृत्यू पावली. परंतु इंद्राने तिच्यासारखीच दुसरी अप्सरा तत्क्षणीच निर्माण करून नृत्य अखण्डित सुरुच ठेवले. परंतु ही गोष्ट वृषभदेवांच्या अवधिज्ञानी चाणाक्ष्ण नजरेतून सुटली नाही. नीलांजनेचा मृत्यू पाहून त्यांचे मन संसारातून विरक्त झाले. सर्वस्वाचा त्याग करून त्यांनी दिगंबर दीक्षा घेतली.*
युवराज श्रेयांसकुमार यांनी त्यांना हस्तिनापुरात सर्वप्रथम इक्षुरसाचा आहार दिला, तो मंगल दिन म्हणजे अक्षयतृतीया होय.
1000 वर्षे ध्यानधारणा केल्यानंतर, महाराज वृषभदेव यांना केवलज्ञानची प्राप्ती झाली. त्यांचे लांछन बैल हे आहे. 14 दिवस पूर्व योग निरोध लावून, त्यांनी शुक्ल ध्यानाद्वारे *शाश्वत मोक्ष मार्गक्रमण* केले. चतुर्थकालीन 24 तीर्थकरांच्या मालिकेतील भ.वृषभदेव हे प्रथम तीर्थंकर असल्यामुळे त्यांना *भगवान आदिनाथ* असे म्हणतात.
*॥ श्री आदिनाथ भगवान की जय |
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2026-04-12 04:05:05 |
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| 78573 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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वर्तमानकालीन चोविस तीर्थंकरांच्या मालिकेतील प्रथम तीर्थंकर, राजे नाभिराज आणि राणी मरुदेवी यांचे पुत्र *भगवान वृषभनाथ तथा आदिनाथ* यांचा हा जन्म आणि दीक्षा कल्याणिकाचा मंगलमय दिन !
आदिनाथ यांचे जन्मकल्याणिक कौशल देशातील अयोध्या नगरी येथे इक्ष्वाकु वंशात झाले. त्यांनी आपल्या ब्राह्मी या पुत्रीस गणित शास्त्र व सुंदरी या दुसऱ्या पुत्रीस व्याकरण, छंद, अलंकार इत्यादी शास्त्र शिकविले. भरत या पुत्रास अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र; बाहुबली या पुत्रास आयुर्वेद, धनुर्वेदाचे ज्ञान दिले. समस्त श्रावक - श्राविकांना असि, मसि, कृषी आदी सहा कला दिल्या..
*एके दिवशी वृषभदेव राज्यसभेमध्ये सुवर्णमय सिंहासनावर विराजमान झाले असताना इंद्रांनी अल्पायु असलेल्या नीलांजना या अप्सरेस राज्यसभेत नृत्य करण्यास सांगितले. ती नृत्य करता करता आयुकर्म संपल्याने मृत्यू पावली. परंतु इंद्राने तिच्यासारखीच दुसरी अप्सरा तत्क्षणीच निर्माण करून नृत्य अखण्डित सुरुच ठेवले. परंतु ही गोष्ट वृषभदेवांच्या अवधिज्ञानी चाणाक्ष्ण नजरेतून सुटली नाही. नीलांजनेचा मृत्यू पाहून त्यांचे मन संसारातून विरक्त झाले. सर्वस्वाचा त्याग करून त्यांनी दिगंबर दीक्षा घेतली.*
युवराज श्रेयांसकुमार यांनी त्यांना हस्तिनापुरात सर्वप्रथम इक्षुरसाचा आहार दिला, तो मंगल दिन म्हणजे अक्षयतृतीया होय.
1000 वर्षे ध्यानधारणा केल्यानंतर, महाराज वृषभदेव यांना केवलज्ञानची प्राप्ती झाली. त्यांचे लांछन बैल हे आहे. 14 दिवस पूर्व योग निरोध लावून, त्यांनी शुक्ल ध्यानाद्वारे *शाश्वत मोक्ष मार्गक्रमण* केले. चतुर्थकालीन 24 तीर्थकरांच्या मालिकेतील भ.वृषभदेव हे प्रथम तीर्थंकर असल्यामुळे त्यांना *भगवान आदिनाथ* असे म्हणतात.
*॥ श्री आदिनाथ भगवान की जय |
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2026-04-12 04:05:04 |
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| 78572 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-04-12 04:03:15 |
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| 78571 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-04-12 04:03:14 |
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