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Message
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श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर |
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<a href="https://www.facebook.com/share/p/1AxzhrTe6R/" target="_blank">https://www.facebook.com/share/p/1AxzhrTe6R/</a> |
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2026-04-13 11:24:54 |
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| 82343 |
50892187 |
श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर |
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2026-04-13 11:24:53 |
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| 82341 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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मेरे सभी नियम है जी
????
आप भी अपनी-अपनी
सुविधानुसार
1,2,34,5,6,7,8,9,10,11,
या सारे नियम ले सकते है जी
?????? |
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2026-04-13 11:24:05 |
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| 82342 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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मेरे सभी नियम है जी
????
आप भी अपनी-अपनी
सुविधानुसार
1,2,34,5,6,7,8,9,10,11,
या सारे नियम ले सकते है जी
?????? |
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2026-04-13 11:24:05 |
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| 82339 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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[19/03, 12:03] dipikadilkushjain❤️??: जिनागम 1वाणी पाठशाला
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
जय जिनेन्द्र जी सभी को
????????
चौबीस तीर्थंकर के नाम और चिंह
सभी पढे जी
????
ऋषभ नाथ भगवान जी का बैल
अजीतनाथ भगवान जी का हाथी
संभवनाथ भगवान जी का घोडा
अभिनंदन नाथ जी का बंदर
सुमति नाथ भगवान जी का चकवा
पद्मप्रभु जी का लाल कमल
सुपार्श्वनाथ जी का स्वस्तिक
चंद्रप्रभु जी का चंद्रमा
पुष्प दंत नाथ भगवान जी का मगर
शीतल नाथ जी का कल्पवृक्ष
श्रैंयासनाथ भगवान जी गैंडा
वासुपूज्य भगवान जी का भैंसा
बिमलनाथ भगवान जी का सुकर
अनंत नाथ भगवान जी का सेही
धर्म नाथ का व्रजदंड
शांति नाथ भगवान जी का हिरण
कूंथूनाथ भगवान जी का बकरा
अरहनाथ भगवान जी का मछली
मलिनाथ जी का कलश
मुनिसुब्रतनाथ जी का कछुआ
नमिनाथ जी का नील कमल
नेमिनाथ जी का शंख
पारसनाथ भगवान जी का सर्प
महावीर स्वामी जी का सिंह
ये चौबीस तीर्थंकर भगवान को कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम
??????
*संकल्लन ,?♀️ एडमिन श्री मति दीपीका दिलखुश जैन चुडिवाल बैंगलोर*
????✍️✍️✍️
सबका साथ गुरूप्स का विकास
[19/03, 12:10] dipikadilkushjain❤️??: (दोहा)
वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर नाय |
कहूं काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाये ||
(चौपाई)
अष्टापद आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि |
नेमिनाथ स्वामी गिरनार, वन्दौं भाव भगति उर धार ||1||
चरम तीर्थकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामि महावीर |
शिखर समेद जिनेसुर बीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||2||
वरदत्तराय रु इन्द मुनिंद, सायरदत्त आदि गुणवृन्द |
नगर तारवर मुनि उठकोडी, वन्दौं भाव सहित कर जोडी ||3||
श्रीगिरनार शिखर विख्यात, कोडी बहत्तर अरु सौ सात |
सम्बु प्रद्युम्न कुमर द्वै भाय, अनिरुध आदि नमूं तसु पाय ||4||
रामचन्द्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुणधीर |
पांच कोडी मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि वन्दौं निरधार ||5||
पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोडी मुनि मुक्ति पयान |
श्रीशत्रुंजय के सीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||6||
जे बलभद्र मुक्ति में गये, आठ कोडी मुनि औरहू भये |
श्रीगजपन्थ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ||7||
राम हणु सुग्रीव सुडील, गव गवाख्य नील महानील |
कोडी निन्याणव मुक्ति पयान, तुंगीगिरि वन्दौं धरि ध्यान ||8||
नंग अनंग कुमार सुजान, पांच कोडी अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये सोनागिरि शीस, ते वन्दौं त्रिभुवन पति ईस ||9||
रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये रेवा तट सार |
कोटि पंच और लाख पचास, ते वन्दौंधरि परम हुलास ||10||
रेवानदी सिद्धवर कूट, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वे चक्री दश कामकुमार, उठकोडी वन्दौं भव पार ||11||
बडवानी बडनयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरि चूल उतंग |
इन्द्रजीत अरु कुम्भ जो कर्ण, ते वन्दौं भव सागर तरण ||12||
सुवरणभद्र आदि मुनि चार, पावागिरि वर शिखर मंझार |
चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गये नित वन्दौं नित तास ||13||
फलहोडी बडगाम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप |
गुरुदत्तादी मुनिसुर जहाँ, मुक्ति गये वन्दौं नित तहां ||14||
बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्रीअष्टापद मुक्ति मंझार, ते वन्दौं नित सुरत सँभार ||15||
अचलापुर की दिश ईसान, तहां मेढगिरि नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोडी मुनिराय, तिनके चरण नमूं चित लाय ||16||
वंसस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुंथुगिरी सोय |
कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूं प्रणाम ||17||
जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पांच सौ लहे |
कोटिशिला मुनि कोडी प्रमान, वन्दन करूं जोरि जग पान ||18||
समवशरण श्री पार्श्व जिनन्द, रेसिन्दीगिरि नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराय, ते वन्दौं नित धरम जिहाज ||19||
मथुरा पुर पवित्र उद्यान, जंबूस्वामी जी निर्वाण ।
चरम केवली पंचम काल।
ते बंदो नित दीन दयाल।।20।।
तीन लोक ते तीरथ जहाँ, नित प्रति वन्दन कीजै तहां |
मन-वच-काय सहित सिर नाय, वन्दन करहिं भविक गुण गाय ||20||
संवत सतरह सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
भक्त वन्दन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||21
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*मेरी भावना*
जिसने रागद्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया।
सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ 1॥
विषयों की आशा नहिं, जिनके साम्य भाव धन रखते हैं।
निज पर के हित साधन में जो, निशदिन तत्पर रहते हैं।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं॥ 2॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन ही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे॥
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ ।
परधन वनिता पर न लुभाऊँ , संतोषामृत पिया करूँ॥ 3॥
अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ ।
देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईष्र्या-भाव धरूँ॥
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।
बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥ 4॥
मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।
दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे॥
दुर्जन क्रूर - कुमार्गरतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।
साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ 5॥
गुणीजनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।
बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे॥
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ 6॥
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।
लाखों वर्षों तक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आ जावे॥
अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे।
तो भी न्याय-मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे॥ 7॥
होकर सुख में मग्न न फूलै दुख में कभी न घबरावे।
पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से नहिं भय खावे॥
रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे।
इष्टवियोग अनिष्टयोग में, सहनशीलता दिखलावे॥ 8॥
सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
बैर-पाप अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥
घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत-दुष्कर हो जावे।
ज्ञानचरित उन्नत कर अपना, मनुजजन्म फल सब पावे॥ 9॥
ईति-भीति व्यापे नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे,
धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।
रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।
परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे॥10॥
फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करे॥
बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करे।
वस्तु स्वरूप विचार खुशी से,सब दुख संकट सहा करे॥11॥
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*आलोचना पाठ*
वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज।
करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥ १॥
सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी।
तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥ २॥
इक वे ते चउ इन्द्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा।
तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदय ह्वै घात विचारी॥ ३॥
समरंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ।
कृत कारित मोदन करिकै , क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ॥ ४॥
शत आठ जु इमि भेदन तैं, अघ कीने परिछेदन तैं।
तिनकी कहुँ कोलों कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥ ५॥
विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनय के।
वश होय घोर अघ कीने, वचतैं नहिं जाय कहीने॥ ६॥
कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदयाकरि भीनी।
या विधि मिथ्यात भ्ऱमायो, चहुंगति मधि दोष उपायो॥ ७॥
हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, परवनिता सों दृगजोरी।
आरंभ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो॥ ८॥
सपरस रसना घ्राननको, चखु कान विषय-सेवनको।
बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने॥ ९॥
फल पंच उदम्बर खाये, मधु मांस मद्य चित चाहे।
नहिं अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुविसन दुखकारे॥ १०॥
दुइबीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये।
कछु भेदाभेद न पायो, ज्यों-त्यों करि उदर भरायो॥ ११॥
अनंतानु जु बंधी जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो।
संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये॥ १२॥
परिहास अरति रति शोग, भय ग्लानि त्रिवेद संयोग।
पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम॥ १३॥
निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई।
फिर जागि विषय-वन धायो, नानाविध विष-फल खायो॥१४||
आहार विहार निहारा, इनमें नहिं जतन विचारा।
बिन देखी धरी उठाई, बिन शोधी वस्तु जु खाई॥ १५॥
तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकलप उपजायो।
कछु सुधि बुधि नाहिं रही है, मिथ्यामति छाय गयी है॥ १६॥
मरजादा तुम ढिंग लीनी, ताहू में दोस जु कीनी।
भिनभिन अब कैसे कहिये, तुम ज्ञानविषैं सब पइये॥ १७॥
हा हा! मैं दुठ अपराधी, त्रसजीवन राशि विराधी।
थावर की जतन न कीनी, उर में करुना नहिं लीनी॥ १८॥
पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागां चिनाई।
पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो,पंखातैं पवन बिलोल्यो॥ १९॥
हा हा! मैं अदयाचारी, बहु हरितकाय जु विदारी।
तामधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनंदा॥ २०॥
हा हा! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई।
तामधि जीव जु आये, ते हू परलोक सिधाये॥ २१॥
बींध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन-सोधि जलायो।
झाडू ले जागां बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी॥ २२॥
जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि-डारि जु दीनी।
नहिं जल-थानक पहुँचाई, किरिया बिन पाप उपाई॥ २३॥
जलमल मोरिन गिरवायो, कृमिकुल बहुघात करायो।
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये॥ २४॥
अन्नादिक शोध कराई, तामें जु जीव निसराई।
तिनका नहिं जतन कराया, गलियारैं धूप डराया॥ २५॥
पुनि द्रव्य कमावन काजे, बहु आरंभ हिंसा साजे।
किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी॥ २६॥
इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता।
संतति चिरकाल उपाई, वानी तैं कहिय न जाई॥ २७॥
ताको जु उदय अब आयो, नानाविध मोहि सतायो।
फल भुँजत जिय दुख पावै, वचतैं कैसें करि गावै॥ २८॥
तुम जानत केवलज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी।
हम तो तुम शरण लही है जिन तारन विरद सही है॥ २९॥
इक गांवपती जो होवे, सो भी दुखिया दुख खोवै।
तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३०॥
द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीता प्रति कमल रचायो।
अंजन से किये अकामी, दुख मेटो अन्तरजामी॥ ३१॥
मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनो विरद सम्हारो।
सब दोषरहित करि स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३२॥
इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ ।
रागादिक दोष हरीजे, परमातम निजपद दीजे॥ ३३॥
दोहा
दोष रहित जिनदेवजी, निजपद दीज्यो मोय।
सब जीवन के सुख बढ़ै, आनंद-मंगल होय॥ ३४॥
अनुभव माणिक पारखी, ‘जौहरी’ आप जिनन्द।
ये ही वर मोहि दीजिये, चरन-शरन आनन्द॥ ३५॥ |
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2026-04-13 11:24:03 |
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40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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[19/03, 12:03] dipikadilkushjain❤️??: जिनागम 1वाणी पाठशाला
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जय जिनेन्द्र जी सभी को
????????
चौबीस तीर्थंकर के नाम और चिंह
सभी पढे जी
????
ऋषभ नाथ भगवान जी का बैल
अजीतनाथ भगवान जी का हाथी
संभवनाथ भगवान जी का घोडा
अभिनंदन नाथ जी का बंदर
सुमति नाथ भगवान जी का चकवा
पद्मप्रभु जी का लाल कमल
सुपार्श्वनाथ जी का स्वस्तिक
चंद्रप्रभु जी का चंद्रमा
पुष्प दंत नाथ भगवान जी का मगर
शीतल नाथ जी का कल्पवृक्ष
श्रैंयासनाथ भगवान जी गैंडा
वासुपूज्य भगवान जी का भैंसा
बिमलनाथ भगवान जी का सुकर
अनंत नाथ भगवान जी का सेही
धर्म नाथ का व्रजदंड
शांति नाथ भगवान जी का हिरण
कूंथूनाथ भगवान जी का बकरा
अरहनाथ भगवान जी का मछली
मलिनाथ जी का कलश
मुनिसुब्रतनाथ जी का कछुआ
नमिनाथ जी का नील कमल
नेमिनाथ जी का शंख
पारसनाथ भगवान जी का सर्प
महावीर स्वामी जी का सिंह
ये चौबीस तीर्थंकर भगवान को कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम
??????
*संकल्लन ,?♀️ एडमिन श्री मति दीपीका दिलखुश जैन चुडिवाल बैंगलोर*
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सबका साथ गुरूप्स का विकास
[19/03, 12:10] dipikadilkushjain❤️??: (दोहा)
वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर नाय |
कहूं काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाये ||
(चौपाई)
अष्टापद आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि |
नेमिनाथ स्वामी गिरनार, वन्दौं भाव भगति उर धार ||1||
चरम तीर्थकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामि महावीर |
शिखर समेद जिनेसुर बीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||2||
वरदत्तराय रु इन्द मुनिंद, सायरदत्त आदि गुणवृन्द |
नगर तारवर मुनि उठकोडी, वन्दौं भाव सहित कर जोडी ||3||
श्रीगिरनार शिखर विख्यात, कोडी बहत्तर अरु सौ सात |
सम्बु प्रद्युम्न कुमर द्वै भाय, अनिरुध आदि नमूं तसु पाय ||4||
रामचन्द्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुणधीर |
पांच कोडी मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि वन्दौं निरधार ||5||
पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोडी मुनि मुक्ति पयान |
श्रीशत्रुंजय के सीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||6||
जे बलभद्र मुक्ति में गये, आठ कोडी मुनि औरहू भये |
श्रीगजपन्थ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ||7||
राम हणु सुग्रीव सुडील, गव गवाख्य नील महानील |
कोडी निन्याणव मुक्ति पयान, तुंगीगिरि वन्दौं धरि ध्यान ||8||
नंग अनंग कुमार सुजान, पांच कोडी अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये सोनागिरि शीस, ते वन्दौं त्रिभुवन पति ईस ||9||
रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये रेवा तट सार |
कोटि पंच और लाख पचास, ते वन्दौंधरि परम हुलास ||10||
रेवानदी सिद्धवर कूट, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वे चक्री दश कामकुमार, उठकोडी वन्दौं भव पार ||11||
बडवानी बडनयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरि चूल उतंग |
इन्द्रजीत अरु कुम्भ जो कर्ण, ते वन्दौं भव सागर तरण ||12||
सुवरणभद्र आदि मुनि चार, पावागिरि वर शिखर मंझार |
चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गये नित वन्दौं नित तास ||13||
फलहोडी बडगाम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप |
गुरुदत्तादी मुनिसुर जहाँ, मुक्ति गये वन्दौं नित तहां ||14||
बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्रीअष्टापद मुक्ति मंझार, ते वन्दौं नित सुरत सँभार ||15||
अचलापुर की दिश ईसान, तहां मेढगिरि नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोडी मुनिराय, तिनके चरण नमूं चित लाय ||16||
वंसस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुंथुगिरी सोय |
कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूं प्रणाम ||17||
जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पांच सौ लहे |
कोटिशिला मुनि कोडी प्रमान, वन्दन करूं जोरि जग पान ||18||
समवशरण श्री पार्श्व जिनन्द, रेसिन्दीगिरि नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराय, ते वन्दौं नित धरम जिहाज ||19||
मथुरा पुर पवित्र उद्यान, जंबूस्वामी जी निर्वाण ।
चरम केवली पंचम काल।
ते बंदो नित दीन दयाल।।20।।
तीन लोक ते तीरथ जहाँ, नित प्रति वन्दन कीजै तहां |
मन-वच-काय सहित सिर नाय, वन्दन करहिं भविक गुण गाय ||20||
संवत सतरह सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
भक्त वन्दन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||21
?????????
*मेरी भावना*
जिसने रागद्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया।
सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ 1॥
विषयों की आशा नहिं, जिनके साम्य भाव धन रखते हैं।
निज पर के हित साधन में जो, निशदिन तत्पर रहते हैं।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं॥ 2॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन ही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे॥
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ ।
परधन वनिता पर न लुभाऊँ , संतोषामृत पिया करूँ॥ 3॥
अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ ।
देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईष्र्या-भाव धरूँ॥
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।
बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥ 4॥
मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।
दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे॥
दुर्जन क्रूर - कुमार्गरतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।
साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ 5॥
गुणीजनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।
बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे॥
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ 6॥
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।
लाखों वर्षों तक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आ जावे॥
अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे।
तो भी न्याय-मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे॥ 7॥
होकर सुख में मग्न न फूलै दुख में कभी न घबरावे।
पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से नहिं भय खावे॥
रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे।
इष्टवियोग अनिष्टयोग में, सहनशीलता दिखलावे॥ 8॥
सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
बैर-पाप अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥
घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत-दुष्कर हो जावे।
ज्ञानचरित उन्नत कर अपना, मनुजजन्म फल सब पावे॥ 9॥
ईति-भीति व्यापे नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे,
धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।
रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।
परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे॥10॥
फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करे॥
बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करे।
वस्तु स्वरूप विचार खुशी से,सब दुख संकट सहा करे॥11॥
?????????
*आलोचना पाठ*
वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज।
करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥ १॥
सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी।
तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥ २॥
इक वे ते चउ इन्द्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा।
तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदय ह्वै घात विचारी॥ ३॥
समरंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ।
कृत कारित मोदन करिकै , क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ॥ ४॥
शत आठ जु इमि भेदन तैं, अघ कीने परिछेदन तैं।
तिनकी कहुँ कोलों कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥ ५॥
विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनय के।
वश होय घोर अघ कीने, वचतैं नहिं जाय कहीने॥ ६॥
कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदयाकरि भीनी।
या विधि मिथ्यात भ्ऱमायो, चहुंगति मधि दोष उपायो॥ ७॥
हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, परवनिता सों दृगजोरी।
आरंभ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो॥ ८॥
सपरस रसना घ्राननको, चखु कान विषय-सेवनको।
बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने॥ ९॥
फल पंच उदम्बर खाये, मधु मांस मद्य चित चाहे।
नहिं अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुविसन दुखकारे॥ १०॥
दुइबीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये।
कछु भेदाभेद न पायो, ज्यों-त्यों करि उदर भरायो॥ ११॥
अनंतानु जु बंधी जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो।
संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये॥ १२॥
परिहास अरति रति शोग, भय ग्लानि त्रिवेद संयोग।
पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम॥ १३॥
निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई।
फिर जागि विषय-वन धायो, नानाविध विष-फल खायो॥१४||
आहार विहार निहारा, इनमें नहिं जतन विचारा।
बिन देखी धरी उठाई, बिन शोधी वस्तु जु खाई॥ १५॥
तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकलप उपजायो।
कछु सुधि बुधि नाहिं रही है, मिथ्यामति छाय गयी है॥ १६॥
मरजादा तुम ढिंग लीनी, ताहू में दोस जु कीनी।
भिनभिन अब कैसे कहिये, तुम ज्ञानविषैं सब पइये॥ १७॥
हा हा! मैं दुठ अपराधी, त्रसजीवन राशि विराधी।
थावर की जतन न कीनी, उर में करुना नहिं लीनी॥ १८॥
पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागां चिनाई।
पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो,पंखातैं पवन बिलोल्यो॥ १९॥
हा हा! मैं अदयाचारी, बहु हरितकाय जु विदारी।
तामधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनंदा॥ २०॥
हा हा! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई।
तामधि जीव जु आये, ते हू परलोक सिधाये॥ २१॥
बींध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन-सोधि जलायो।
झाडू ले जागां बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी॥ २२॥
जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि-डारि जु दीनी।
नहिं जल-थानक पहुँचाई, किरिया बिन पाप उपाई॥ २३॥
जलमल मोरिन गिरवायो, कृमिकुल बहुघात करायो।
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये॥ २४॥
अन्नादिक शोध कराई, तामें जु जीव निसराई।
तिनका नहिं जतन कराया, गलियारैं धूप डराया॥ २५॥
पुनि द्रव्य कमावन काजे, बहु आरंभ हिंसा साजे।
किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी॥ २६॥
इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता।
संतति चिरकाल उपाई, वानी तैं कहिय न जाई॥ २७॥
ताको जु उदय अब आयो, नानाविध मोहि सतायो।
फल भुँजत जिय दुख पावै, वचतैं कैसें करि गावै॥ २८॥
तुम जानत केवलज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी।
हम तो तुम शरण लही है जिन तारन विरद सही है॥ २९॥
इक गांवपती जो होवे, सो भी दुखिया दुख खोवै।
तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३०॥
द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीता प्रति कमल रचायो।
अंजन से किये अकामी, दुख मेटो अन्तरजामी॥ ३१॥
मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनो विरद सम्हारो।
सब दोषरहित करि स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३२॥
इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ ।
रागादिक दोष हरीजे, परमातम निजपद दीजे॥ ३३॥
दोहा
दोष रहित जिनदेवजी, निजपद दीज्यो मोय।
सब जीवन के सुख बढ़ै, आनंद-मंगल होय॥ ३४॥
अनुभव माणिक पारखी, ‘जौहरी’ आप जिनन्द।
ये ही वर मोहि दीजिये, चरन-शरन आनन्द॥ ३५॥ |
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2026-04-13 11:24:03 |
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40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*दीपीका दिलखुश जैन?*
*?जय जिनेन्द्र जी सभी को*?
*?♀️जिनागम 1वाणी पाठशालाएं*
??????
*अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठि के* *चरणो में कोटि-कोटि नमन*
?????
*जैन धर्म बढे चलो*
?????
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? *सभी दिंगबर जैन साधुओं और माताजी ,ऐलक जी, क्षूलक जी, क्षूलिका जी , त्यागी व्रती, भट्टाकरक जी सभी के निर्विघ्न आहार हो ये भावनाएं भाती हूं जी।*????????
*?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरूवे नमो नमः* ????
*आचार्य श्री संभव सागराय नमः*
????
*आचार्य गुरूदेव विद्यासागराय नमः*
????
*?आर्यिका श्री उदित मति माताजी के चरणों में नमः।*
*?जय जिनेंद्र जी सभी को*
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*चौबीस भगवान के चरणों में कोटि-कोटि नमन*
??????
*?♀️ॐ ह्रीं श्रुतज्ञान प्राप्ताये गणिनी श्री प्रमुख ज्ञानमती मात्रे नमः*
*↪️ज्ञानमती माताजी के चरणों में कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम*
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? *आज के नियम*
*?️?दिए गए सभी नियम आप जब ले रहे तब से 24 घंटे का है जी*
???????
1️⃣आज ? भारत से बाहर जाने का त्याग है जी ।
बीत चीत करने को छोड़कर ।
आज? 100किलोमीटर की यात्रा छोड़कर बाकी सभी दिशाओं का त्याग है जी।
*?जो जो अपने अपने स्थान से बाहर जाते है अपने हिसाब से किलोमीटर का नियम ले सकते हैं जी।*
आज ?देव दर्शन करने का नियम है जी जैसे सुविधाएं उपलब्ध हैं जी।
या
आज ? आहार देने या देखने का नियम है जी।
?आज एक नियम अपने मन से लेवे जी।
मेरा नियम मन से वाला है
? आज ? चाउमिन ,मेघी, पिजा, बर्गर खाने का त्याग है जी।
???♂️?♀️?♂️
2️⃣??आज 20वस्त्र छोड़कर बाकी सभी के त्याग है। आज पहनने के लिए।
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3️⃣?? आज पांच मिठाई छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
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4️⃣??आज बीस हरी छोड़कर बाकी सबके त्याग है।
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5️⃣??शांति नाथ भगवान जी तीर्थंकर की जाप
*?? ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय जगत् शांति कराय सर्वोपद्रव शांतिं कुरु कुरु ह्रीं नम: स्वाहा:*
*?नो बार जाप*
*?या एक माला*
*?ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं*
*की एक माला करने का नियम है*
*? ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वसिद्धायदणाणं मनोवांछित सिद्धि दायकं भवतु स्वाहा:*
*?एक माला या नो बार जाप*
???????
*?एक माला या नो बार करे जी*
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6️⃣??आज पांच घर जाने की छोडकर बाकी सबके त्याग है।
?आज पांच बिस्तर ,पांच पंलग छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
???♀️?♂️?♀️?♂️
7️⃣??आज दशों दिशा में जितना आवागमन होता है। उसको छोड़कर बाकी बची सभी दिशाओं का आवागमन का त्याग रहेगा ।
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8️⃣ ??आज 20 मिनट, या 10मिनट स्वाध्याय करने का नियम है।
???♀️?♂️?♀️?♂️
9️⃣??आज जमीकंद में पाच वस्तुए छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी।
*? बीस प्रकार के अनाज, धान*
*छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी*
*भूल चूक माफ ।*
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???20मिनट या 30 मिनट ,या 10, मिनट का मोन का नियम है।
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1️⃣1️⃣? आज? निर्वाण कांड भाषा पढ़ने का नियम है जी।
या
आज ?नित्या प्रकंपाद रूपा वाला पाठ पढने का नियम है जी।
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*यथा शक्ति नियम पालन करते*??
*आज वैशाख कृष्ण एकादशी*
??????
सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ?
?छोटे से छोटे से भी नियम मुक्ति मिल सकती ह।
*?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे*
??????
*नोट:? एक नियम भी*
*पालन कर सकते ह जी*
?????
*एडमिन*
*दीपीका दिलखुश जैन*
*बैंगलोर कर्नाटक*
???????
*सानिध्य भी हम सभी का*
*पुरुसार्थ भी हम सभी का*
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2026-04-13 11:24:01 |
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40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*दीपीका दिलखुश जैन?*
*?जय जिनेन्द्र जी सभी को*?
*?♀️जिनागम 1वाणी पाठशालाएं*
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*अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठि के* *चरणो में कोटि-कोटि नमन*
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*जैन धर्म बढे चलो*
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? *सभी दिंगबर जैन साधुओं और माताजी ,ऐलक जी, क्षूलक जी, क्षूलिका जी , त्यागी व्रती, भट्टाकरक जी सभी के निर्विघ्न आहार हो ये भावनाएं भाती हूं जी।*????????
*?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरूवे नमो नमः* ????
*आचार्य श्री संभव सागराय नमः*
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*आचार्य गुरूदेव विद्यासागराय नमः*
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*?आर्यिका श्री उदित मति माताजी के चरणों में नमः।*
*?जय जिनेंद्र जी सभी को*
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*चौबीस भगवान के चरणों में कोटि-कोटि नमन*
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*?♀️ॐ ह्रीं श्रुतज्ञान प्राप्ताये गणिनी श्री प्रमुख ज्ञानमती मात्रे नमः*
*↪️ज्ञानमती माताजी के चरणों में कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम*
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? *आज के नियम*
*?️?दिए गए सभी नियम आप जब ले रहे तब से 24 घंटे का है जी*
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1️⃣आज ? भारत से बाहर जाने का त्याग है जी ।
बीत चीत करने को छोड़कर ।
आज? 100किलोमीटर की यात्रा छोड़कर बाकी सभी दिशाओं का त्याग है जी।
*?जो जो अपने अपने स्थान से बाहर जाते है अपने हिसाब से किलोमीटर का नियम ले सकते हैं जी।*
आज ?देव दर्शन करने का नियम है जी जैसे सुविधाएं उपलब्ध हैं जी।
या
आज ? आहार देने या देखने का नियम है जी।
?आज एक नियम अपने मन से लेवे जी।
मेरा नियम मन से वाला है
? आज ? चाउमिन ,मेघी, पिजा, बर्गर खाने का त्याग है जी।
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2️⃣??आज 20वस्त्र छोड़कर बाकी सभी के त्याग है। आज पहनने के लिए।
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3️⃣?? आज पांच मिठाई छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
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4️⃣??आज बीस हरी छोड़कर बाकी सबके त्याग है।
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5️⃣??शांति नाथ भगवान जी तीर्थंकर की जाप
*?? ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय जगत् शांति कराय सर्वोपद्रव शांतिं कुरु कुरु ह्रीं नम: स्वाहा:*
*?नो बार जाप*
*?या एक माला*
*?ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं*
*की एक माला करने का नियम है*
*? ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वसिद्धायदणाणं मनोवांछित सिद्धि दायकं भवतु स्वाहा:*
*?एक माला या नो बार जाप*
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*?एक माला या नो बार करे जी*
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6️⃣??आज पांच घर जाने की छोडकर बाकी सबके त्याग है।
?आज पांच बिस्तर ,पांच पंलग छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
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7️⃣??आज दशों दिशा में जितना आवागमन होता है। उसको छोड़कर बाकी बची सभी दिशाओं का आवागमन का त्याग रहेगा ।
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8️⃣ ??आज 20 मिनट, या 10मिनट स्वाध्याय करने का नियम है।
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9️⃣??आज जमीकंद में पाच वस्तुए छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी।
*? बीस प्रकार के अनाज, धान*
*छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी*
*भूल चूक माफ ।*
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???20मिनट या 30 मिनट ,या 10, मिनट का मोन का नियम है।
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1️⃣1️⃣? आज? निर्वाण कांड भाषा पढ़ने का नियम है जी।
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आज ?नित्या प्रकंपाद रूपा वाला पाठ पढने का नियम है जी।
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*यथा शक्ति नियम पालन करते*??
*आज वैशाख कृष्ण एकादशी*
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सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ?
?छोटे से छोटे से भी नियम मुक्ति मिल सकती ह।
*?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे*
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*नोट:? एक नियम भी*
*पालन कर सकते ह जी*
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*एडमिन*
*दीपीका दिलखुश जैन*
*बैंगलोर कर्नाटक*
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*सानिध्य भी हम सभी का*
*पुरुसार्थ भी हम सभी का*
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2026-04-13 11:24:00 |
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| 82336 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*हे भगवान संसार के सभी जीव सुखी रहें* *कोई दुखी ना रहें , अनाथ न रहें ,असहाय न, रहें पीड़ित ना रहें ,रोगी ना रहें ,सभी निरोग रहें ।*
*सभी आचार्य,उपाध्याय, सर्व साधु,* *आर्यिका, ऐलक , क्षुल्लक, क्षुल्लिका जी*
*व्रती ,महाव्रती भट्टारक जी के*
*सभी के निरंतराय आहार हों ,सभी* *स्वस्थ रहें ,सभी के द्वारा जिनधर्म की*
*दिन दूनी रात चौगुनी धर्म की प्रभावना हो*
*मैं यही भावना भाती हूंँ।*
*सारे संसार में ,देश में, राष्ट्र में ,समाज में,*
*घर में, परिवार में सुख, शांति, समृद्धि हो मुझे भी ,शक्ति दो ,भक्ति दो ,शांति दो,समृद्धि दो, चारित्र दो ,स्वास्थ्य दो, संकल्प दो जिससे आत्म कल्याण के साथ साथ दूसरों का भी कल्याण कर सकूँ*
*यही भावना भाती हूँ जी।*
??????
???????
???????
अनंतानंत सिद्ध परपेष्ठी के चरणों में मेरा
कोटि-कोटि प्रणाम नमन?????????????
पंच परमेष्ठी के चरणों मे कोटी कोटी नमन?????????????
नवदेवता के चरणों में बारम्बार प्रणाम नमन?????????????????????
बारह अंग चौदह पूर्वांग को धारण करने वाली सरस्वती माता को कोटी कोटी नमन
मुझें भी ज्ञानप्रदान करें
????????????
ढाई दीप मे समस्त साधु परमेष्ठि को मेरा नमन कोटि-कोटि नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु????????????????
???????
समस्त आर्यिका श्री को वन्दामि
समस्त ऐलक क्षुल्लक क्षुल्लिका को इच्छामि कोटी नमन
????????????????
त्यागी व्रती भैयाजी और दीदी जी को वंदना ??????
सभी के निरंतराय आहार हो सभी का मंगल हो
सभी को सादर जय जिनेन्द्र जी
?????????????????????
सभी के दिन और रात मंगलमय हों???????????
सुप्रभात हों सभी के ?????????????
??
पंच परमेष्ठी भगवंतों को नमन
?????
संसार में जितने भी सम्यक्तवी आत्मा है उनको मेरा नमन है??????
चराचर जीव जगत के अनंतानंत
?????
जीवात्माओं से उत्तम क्षमा
?? ??? ??? ???
हे भगवान आज का दिन दिखाने के लिए धन्यवाद
धन्यवाद
धन्यवाद???????????
सभी से मेरी मैत्री हो
सभी मेरे मित्र है
????
?????
*हे भगवान!आपकी असीम कृपा से प्रातः काल की ??????*
❤️❤️❤️❤️❤️❤️???* *पावन बेला में ये भावना भाते है* *संसार में जितने भी रत्नत्रय धारी* *आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु हैं सभी के रत्नत्रय की पूर्णता हो और जो रत्नत्रय धारण करना चाहते हैं उनको रत्नत्रय की प्राप्ती हो जाए तथा शेष जितने जीव हैं*???
*उन सबके योग्यतानुसार क्रम से रत्नत्रय धारण करने के भाव हो जाए यही भगवान से प्रार्थना करती हूँ जी*
??????????
*धन्यवाद* *धन्यवाद* *धन्यवाद*
?????????
मे एक एसा जादू है जो समस्त संसार में प्यार आशीर्वाद बनाए रखता है।
*धन्यवाद*????
उन लोगों का जो मुझसे नफ़रत करते है " क्यो की उन्होंने मुझे मजबूत बनाया "
*धन्यवाद*???
उन लोगों का जो मुझसे प्यार करते है " क्यो की उन्होंने मेरा दिल बड़ा कर दिया "
*धन्यवाद* ????
उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए " और मुझे बताया दर असल वो मेरा बहुत ख्याल रखते है "
*धन्यवाद* ???
उन लोगों का जिन्होंने मुझे अपना बनाकर छोड़ दिया " और मुझे अहसास दिलाया की दुनिया में हर चीज आखरी नही "
*धन्यवाद*??
उन लोगों का जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए " और मुझे ऐसा बना दिया जैसा सोचा भी ना था "
*और सबसे ज्यादा धन्यवाद मेरे ईश्वर का* ???
जिसने मुझे हालात का सामना करने की हिम्मत दी
????
*धन्यवाद*
आप सभी का जो मुझे आपके साथ रहने का मोका मिला जी
????? |
|
2026-04-13 11:23:59 |
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| 82335 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*हे भगवान संसार के सभी जीव सुखी रहें* *कोई दुखी ना रहें , अनाथ न रहें ,असहाय न, रहें पीड़ित ना रहें ,रोगी ना रहें ,सभी निरोग रहें ।*
*सभी आचार्य,उपाध्याय, सर्व साधु,* *आर्यिका, ऐलक , क्षुल्लक, क्षुल्लिका जी*
*व्रती ,महाव्रती भट्टारक जी के*
*सभी के निरंतराय आहार हों ,सभी* *स्वस्थ रहें ,सभी के द्वारा जिनधर्म की*
*दिन दूनी रात चौगुनी धर्म की प्रभावना हो*
*मैं यही भावना भाती हूंँ।*
*सारे संसार में ,देश में, राष्ट्र में ,समाज में,*
*घर में, परिवार में सुख, शांति, समृद्धि हो मुझे भी ,शक्ति दो ,भक्ति दो ,शांति दो,समृद्धि दो, चारित्र दो ,स्वास्थ्य दो, संकल्प दो जिससे आत्म कल्याण के साथ साथ दूसरों का भी कल्याण कर सकूँ*
*यही भावना भाती हूँ जी।*
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???????
अनंतानंत सिद्ध परपेष्ठी के चरणों में मेरा
कोटि-कोटि प्रणाम नमन?????????????
पंच परमेष्ठी के चरणों मे कोटी कोटी नमन?????????????
नवदेवता के चरणों में बारम्बार प्रणाम नमन?????????????????????
बारह अंग चौदह पूर्वांग को धारण करने वाली सरस्वती माता को कोटी कोटी नमन
मुझें भी ज्ञानप्रदान करें
????????????
ढाई दीप मे समस्त साधु परमेष्ठि को मेरा नमन कोटि-कोटि नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु????????????????
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समस्त आर्यिका श्री को वन्दामि
समस्त ऐलक क्षुल्लक क्षुल्लिका को इच्छामि कोटी नमन
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त्यागी व्रती भैयाजी और दीदी जी को वंदना ??????
सभी के निरंतराय आहार हो सभी का मंगल हो
सभी को सादर जय जिनेन्द्र जी
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सभी के दिन और रात मंगलमय हों???????????
सुप्रभात हों सभी के ?????????????
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पंच परमेष्ठी भगवंतों को नमन
?????
संसार में जितने भी सम्यक्तवी आत्मा है उनको मेरा नमन है??????
चराचर जीव जगत के अनंतानंत
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जीवात्माओं से उत्तम क्षमा
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हे भगवान आज का दिन दिखाने के लिए धन्यवाद
धन्यवाद
धन्यवाद???????????
सभी से मेरी मैत्री हो
सभी मेरे मित्र है
????
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*हे भगवान!आपकी असीम कृपा से प्रातः काल की ??????*
❤️❤️❤️❤️❤️❤️???* *पावन बेला में ये भावना भाते है* *संसार में जितने भी रत्नत्रय धारी* *आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु हैं सभी के रत्नत्रय की पूर्णता हो और जो रत्नत्रय धारण करना चाहते हैं उनको रत्नत्रय की प्राप्ती हो जाए तथा शेष जितने जीव हैं*???
*उन सबके योग्यतानुसार क्रम से रत्नत्रय धारण करने के भाव हो जाए यही भगवान से प्रार्थना करती हूँ जी*
??????????
*धन्यवाद* *धन्यवाद* *धन्यवाद*
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मे एक एसा जादू है जो समस्त संसार में प्यार आशीर्वाद बनाए रखता है।
*धन्यवाद*????
उन लोगों का जो मुझसे नफ़रत करते है " क्यो की उन्होंने मुझे मजबूत बनाया "
*धन्यवाद*???
उन लोगों का जो मुझसे प्यार करते है " क्यो की उन्होंने मेरा दिल बड़ा कर दिया "
*धन्यवाद* ????
उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए " और मुझे बताया दर असल वो मेरा बहुत ख्याल रखते है "
*धन्यवाद* ???
उन लोगों का जिन्होंने मुझे अपना बनाकर छोड़ दिया " और मुझे अहसास दिलाया की दुनिया में हर चीज आखरी नही "
*धन्यवाद*??
उन लोगों का जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए " और मुझे ऐसा बना दिया जैसा सोचा भी ना था "
*और सबसे ज्यादा धन्यवाद मेरे ईश्वर का* ???
जिसने मुझे हालात का सामना करने की हिम्मत दी
????
*धन्यवाद*
आप सभी का जो मुझे आपके साथ रहने का मोका मिला जी
????? |
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2026-04-13 11:23:58 |
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