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73458 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/fYsHq1DKlx8?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/fYsHq1DKlx8?feature=share</a> _*?53#शुद्धनिश्चयनयसे अर्हन्त, सिद्धभगवान अपने२ शुद्धपर्याय के कर्ता और परमशुद्धनिश्चयनयसे अर्हन्त-सिद्धप्रभु सहित सभी जीव अकर्ता-इस स्यात् कर्ता-अकर्ता रुप अनेकान्त से नित्यार्थक्रियाका अभाव निजध्रुवशुद्धप्रभु में कैसे सिद्ध होता हैं? इस अनेकान्त के सम्यक् परिज्ञान से ही मुक्तीसुंदरी की प्राप्ति सहज सुलभ कैसे?-पं.अनिलजी, पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#अनादि-अनंत अविनश्वर निजध्रुवशुद्ध प्रभु में नित्यार्थक्रिया की कल्पना वाले जीव नियमसे परम आनंदमय सुखामृतके रसास्वादसे पराङ्गमुख बहिरात्मा ही होते हैं। ?वे आस्त्रव,बंध, पाप और पापानुबंधी पुण्यादि के अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे कर्ता हैं।* *#अन्तरात्मा-उक्त बहिरात्मा से विलक्षण लक्षणवाले सम्यग्दृष्टि जीव को द्रव्यरुप, संवर, निर्जरा और मोक्ष पदार्थका कर्तृत्व अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे हैं, और जीवभाव पर्यायरुप संवर-निर्जरा-मोक्ष पदार्थोंका कर्तृत्व विवक्षित एकदेश शुद्धनिश्चयनयसे है।* *#परमशुद्धनिश्चयनयसे ? सभी जीव नित्यानित्यार्थक्रियारहित होनेसे ना उत्पन्न होते हैं नाही मरते हैं, तथा नाही बंध-मोक्ष करते हैं। इस वचनसे जन्म, मरण, बंधमोक्ष से रहित हैं।* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७ पृष्ठ क्रं ९५ से ९६।* 2026-04-10 05:31:27
73457 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/fYsHq1DKlx8?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/fYsHq1DKlx8?feature=share</a> _*?53#शुद्धनिश्चयनयसे अर्हन्त, सिद्धभगवान अपने२ शुद्धपर्याय के कर्ता और परमशुद्धनिश्चयनयसे अर्हन्त-सिद्धप्रभु सहित सभी जीव अकर्ता-इस स्यात् कर्ता-अकर्ता रुप अनेकान्त से नित्यार्थक्रियाका अभाव निजध्रुवशुद्धप्रभु में कैसे सिद्ध होता हैं? इस अनेकान्त के सम्यक् परिज्ञान से ही मुक्तीसुंदरी की प्राप्ति सहज सुलभ कैसे?-पं.अनिलजी, पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#अनादि-अनंत अविनश्वर निजध्रुवशुद्ध प्रभु में नित्यार्थक्रिया की कल्पना वाले जीव नियमसे परम आनंदमय सुखामृतके रसास्वादसे पराङ्गमुख बहिरात्मा ही होते हैं। ?वे आस्त्रव,बंध, पाप और पापानुबंधी पुण्यादि के अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे कर्ता हैं।* *#अन्तरात्मा-उक्त बहिरात्मा से विलक्षण लक्षणवाले सम्यग्दृष्टि जीव को द्रव्यरुप, संवर, निर्जरा और मोक्ष पदार्थका कर्तृत्व अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे हैं, और जीवभाव पर्यायरुप संवर-निर्जरा-मोक्ष पदार्थोंका कर्तृत्व विवक्षित एकदेश शुद्धनिश्चयनयसे है।* *#परमशुद्धनिश्चयनयसे ? सभी जीव नित्यानित्यार्थक्रियारहित होनेसे ना उत्पन्न होते हैं नाही मरते हैं, तथा नाही बंध-मोक्ष करते हैं। इस वचनसे जन्म, मरण, बंधमोक्ष से रहित हैं।* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७ पृष्ठ क्रं ९५ से ९६।* 2026-04-10 05:31:26
73455 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता हैं ऐसा आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-10 05:31:24
73456 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता हैं ऐसा आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-10 05:31:24
73453 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? 2026-04-10 05:29:23
73454 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? 2026-04-10 05:29:23
73452 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? 2026-04-10 05:29:22
73451 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? 2026-04-10 05:29:21
73450 40449749 जिनोदय?JINODAYA *“हृदय का किसान: हर साँस में भक्ति का बीज”* मनुष्य का जीवन केवल सांसों का आवागमन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी साधना यात्रा है जिसमें हर क्षण कुछ न कुछ बोया जाता है—कभी विचार, कभी भाव, और कभी कर्म। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसकी हर साँस एक अवसर है, वह साधारण जीवन जीते हुए भी असाधारण बन जाता है। “मैं हर साँस के साथ भक्ति के बीज बोता हूँ—मैं हृदय का किसान हूँ”, यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का एक गहरा दर्शन है। जिस प्रकार एक किसान अपने खेत में बीज बोते समय धैर्य रखता है, समय की प्रतीक्षा करता है, और प्रकृति के नियमों का सम्मान करता है, ठीक उसी प्रकार भक्ति का मार्ग भी धैर्य, विश्वास और निरंतरता की माँग करता है। किसान बीज बोकर तुरंत फल की अपेक्षा नहीं करता, वह जानता है कि बीज को अंकुरित होने, पौधा बनने और फल देने में समय लगेगा। इसी प्रकार, जो व्यक्ति अपने हृदय में भक्ति के बीज बोता है, उसे भी यह समझना चाहिए कि उसका फल तुरंत नहीं मिलेगा, परंतु जब मिलेगा तो जीवन को पूर्णता प्रदान करेगा। आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे इतना भाग रहा है कि उसने अपने भीतर की खेती को लगभग छोड़ ही दिया है। बाहर की दुनिया में सफलता पाने की दौड़ में हम अपने हृदय की भूमि को बंजर बना रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यदि हृदय की भूमि उपजाऊ होगी, तो बाहरी जीवन भी स्वतः ही सुंदर और संतुलित बन जाएगा। भक्ति उस जल के समान है जो इस भूमि को सींचती है, और सद्भाव, करुणा, और संयम उसके अंकुर हैं। भक्ति का अर्थ केवल मंदिर जाना, पूजा करना या मंत्र जपना ही नहीं है। सच्ची भक्ति वह है जो हमारे व्यवहार में झलके, हमारे शब्दों में मधुरता लाए, और हमारे कर्मों में पवित्रता उत्पन्न करे। जब कोई व्यक्ति हर सांस के साथ यह संकल्प लेता है कि वह अपने भीतर अच्छे विचारों को जन्म देगा, दूसरों के प्रति दया और सहानुभूति रखेगा, और अपने अहंकार को त्यागेगा, तभी वह वास्तव में “हृदय का किसान” बनता है। लेकिन इस खेती में सबसे बड़ा बाधक हमारा अहंकार और अधैर्य है। हम चाहते हैं कि थोड़ी सी पूजा या थोड़े से प्रयास से ही हमें बड़ा फल मिल जाए। यह प्रवृत्ति हमें भक्ति के वास्तविक मार्ग से भटका देती है। किसान यदि अधीर हो जाए और बीच में ही खेत छोड़ दे, तो उसे कभी फसल नहीं मिलेगी। उसी प्रकार, जो व्यक्ति भक्ति के मार्ग में स्थिर नहीं रहता, उसे भी आत्मिक शांति और संतोष प्राप्त नहीं होता। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और स्वयं से पूछें कि क्या हम केवल बाहरी दिखावे की भक्ति कर रहे हैं या वास्तव में अपने हृदय में भक्ति के बीज बो रहे हैं। यदि हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा नहीं बन रहा, यदि हमारे व्यवहार से किसी को शांति नहीं मिल रही, तो हमें अपनी साधना पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है। जब हम सच में “हृदय के किसान” बन जाते हैं, तो हमारा जीवन बदलने लगता है। हमारे भीतर का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगता है, लोभ कम होने लगता है, और संतोष का भाव बढ़ने लगता है। हम छोटी-छोटी बातों में भी प्रसन्नता खोजने लगते हैं, और दूसरों की सफलता में भी आनंद अनुभव करते हैं। यही सच्ची भक्ति का फल है। अंततः, यह जीवन एक खेत की तरह है और हर सांस एक बीज की तरह। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इसमें क्या बोते हैं—अहंकार और स्वार्थ के बीज या भक्ति और प्रेम के बीज। जो व्यक्ति हर सांस के साथ भक्ति का बीज बोता है, वही जीवन के अंत में एक समृद्ध और शांत फसल प्राप्त करता है। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-10 05:29:02
73449 40449749 जिनोदय?JINODAYA *“हृदय का किसान: हर साँस में भक्ति का बीज”* मनुष्य का जीवन केवल सांसों का आवागमन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी साधना यात्रा है जिसमें हर क्षण कुछ न कुछ बोया जाता है—कभी विचार, कभी भाव, और कभी कर्म। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसकी हर साँस एक अवसर है, वह साधारण जीवन जीते हुए भी असाधारण बन जाता है। “मैं हर साँस के साथ भक्ति के बीज बोता हूँ—मैं हृदय का किसान हूँ”, यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का एक गहरा दर्शन है। जिस प्रकार एक किसान अपने खेत में बीज बोते समय धैर्य रखता है, समय की प्रतीक्षा करता है, और प्रकृति के नियमों का सम्मान करता है, ठीक उसी प्रकार भक्ति का मार्ग भी धैर्य, विश्वास और निरंतरता की माँग करता है। किसान बीज बोकर तुरंत फल की अपेक्षा नहीं करता, वह जानता है कि बीज को अंकुरित होने, पौधा बनने और फल देने में समय लगेगा। इसी प्रकार, जो व्यक्ति अपने हृदय में भक्ति के बीज बोता है, उसे भी यह समझना चाहिए कि उसका फल तुरंत नहीं मिलेगा, परंतु जब मिलेगा तो जीवन को पूर्णता प्रदान करेगा। आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे इतना भाग रहा है कि उसने अपने भीतर की खेती को लगभग छोड़ ही दिया है। बाहर की दुनिया में सफलता पाने की दौड़ में हम अपने हृदय की भूमि को बंजर बना रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यदि हृदय की भूमि उपजाऊ होगी, तो बाहरी जीवन भी स्वतः ही सुंदर और संतुलित बन जाएगा। भक्ति उस जल के समान है जो इस भूमि को सींचती है, और सद्भाव, करुणा, और संयम उसके अंकुर हैं। भक्ति का अर्थ केवल मंदिर जाना, पूजा करना या मंत्र जपना ही नहीं है। सच्ची भक्ति वह है जो हमारे व्यवहार में झलके, हमारे शब्दों में मधुरता लाए, और हमारे कर्मों में पवित्रता उत्पन्न करे। जब कोई व्यक्ति हर सांस के साथ यह संकल्प लेता है कि वह अपने भीतर अच्छे विचारों को जन्म देगा, दूसरों के प्रति दया और सहानुभूति रखेगा, और अपने अहंकार को त्यागेगा, तभी वह वास्तव में “हृदय का किसान” बनता है। लेकिन इस खेती में सबसे बड़ा बाधक हमारा अहंकार और अधैर्य है। हम चाहते हैं कि थोड़ी सी पूजा या थोड़े से प्रयास से ही हमें बड़ा फल मिल जाए। यह प्रवृत्ति हमें भक्ति के वास्तविक मार्ग से भटका देती है। किसान यदि अधीर हो जाए और बीच में ही खेत छोड़ दे, तो उसे कभी फसल नहीं मिलेगी। उसी प्रकार, जो व्यक्ति भक्ति के मार्ग में स्थिर नहीं रहता, उसे भी आत्मिक शांति और संतोष प्राप्त नहीं होता। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और स्वयं से पूछें कि क्या हम केवल बाहरी दिखावे की भक्ति कर रहे हैं या वास्तव में अपने हृदय में भक्ति के बीज बो रहे हैं। यदि हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा नहीं बन रहा, यदि हमारे व्यवहार से किसी को शांति नहीं मिल रही, तो हमें अपनी साधना पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है। जब हम सच में “हृदय के किसान” बन जाते हैं, तो हमारा जीवन बदलने लगता है। हमारे भीतर का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगता है, लोभ कम होने लगता है, और संतोष का भाव बढ़ने लगता है। हम छोटी-छोटी बातों में भी प्रसन्नता खोजने लगते हैं, और दूसरों की सफलता में भी आनंद अनुभव करते हैं। यही सच्ची भक्ति का फल है। अंततः, यह जीवन एक खेत की तरह है और हर सांस एक बीज की तरह। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इसमें क्या बोते हैं—अहंकार और स्वार्थ के बीज या भक्ति और प्रेम के बीज। जो व्यक्ति हर सांस के साथ भक्ति का बीज बोता है, वही जीवन के अंत में एक समृद्ध और शांत फसल प्राप्त करता है। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-10 05:29:01