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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
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40449682 |
तन्मय सागर प्रभावना ग्रुप |
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2026-06-16 09:30:41 |
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| 234231 |
40449682 |
तन्मय सागर प्रभावना ग्रुप |
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2026-06-16 09:30:41 |
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| 234228 |
43516760 |
Divya_tapasvi-2 |
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<a href="https://www.youtube.com/live/pQRfe5J5C7c?si=SJfRzbdk0x2x5ITr" target="_blank">https://www.youtube.com/live/pQRfe5J5C7c?si=SJfRzbdk0x2x5ITr</a> |
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2026-06-16 09:30:36 |
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| 234229 |
43516760 |
Divya_tapasvi-2 |
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<a href="https://www.youtube.com/live/pQRfe5J5C7c?si=SJfRzbdk0x2x5ITr" target="_blank">https://www.youtube.com/live/pQRfe5J5C7c?si=SJfRzbdk0x2x5ITr</a> |
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2026-06-16 09:30:36 |
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| 234226 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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2026-06-16 09:29:56 |
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| 234227 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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2026-06-16 09:29:56 |
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| 234224 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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अखिल भारतीय पुलक मंच परिवार जोन छह के महामंत्री, श्री दिगंबर जैन महासमिति के पूर्व प्रदेश महामंत्री, गुरुभक्त *श्री दिलीप जी एवं सौ. सुवर्णा भाभी सावलकर* आपको वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं। आपका दाम्पत्य जीवन खुशियों से भरा रहे। स्वस्थ रहो -आनंदित रहो ।????? |
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2026-06-16 09:29:54 |
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| 234225 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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अखिल भारतीय पुलक मंच परिवार जोन छह के महामंत्री, श्री दिगंबर जैन महासमिति के पूर्व प्रदेश महामंत्री, गुरुभक्त *श्री दिलीप जी एवं सौ. सुवर्णा भाभी सावलकर* आपको वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं। आपका दाम्पत्य जीवन खुशियों से भरा रहे। स्वस्थ रहो -आनंदित रहो ।????? |
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2026-06-16 09:29:54 |
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| 234222 |
42131354 |
जिनधर्म प्रभावक प्रकोष्ठ (JAIN INFLUENCER), विश्व जैन संगठन |
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।।आचार्यश्री सुशील मुनि जी के 100 वें जन्मदिवस (15 जून) पर सादर स्मरण।।
?????????
विश्व में जैन धर्म की पताका फहराने वाले जैन संत—आचार्यश्री सुशील मुनि जी के जन्मदिवस (15 जून) पर सादर स्मरण।
आज हम सब जानते हैं कि अमेरिका में अब दर्जनों विशाल जैन मंदिर हैं। JAINA जैसी प्रभावशाली संस्था प्रवासी जैनों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज संयुक्त राष्ट्र तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जैन दर्शन, अहिंसा और अनेकांतवाद पर गंभीर चर्चा होती है। विश्व
के अनेक देशों में जैन समुदाय संगठित रूप से अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। किंतु आज से छह दशक पूर्व यह सब कल्पना के समान प्रतीत होता था।
वैश्विक स्तर पर जैन धर्म की पताका फहराने का जो स्वप्न कुछ दूरदर्शी संतों ने देखा था, उनमें प्रमुख नाम गुरुदेव मुनिश्री सुशील कुमार जी महाराज का है। उनके साथ गुरुदेव श्री चित्रभानु जी का भी उल्लेख आवश्यक है, जिन्होंने विदेशों में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की सुदृढ़ नींव रखी।
आचार्य श्री सुशील मुनि (15 जून 1926 – 22 अप्रैल 1994) बीसवीं शताब्दी के जैन समाज की ऐसी विलक्षण विभूति थे, जिनका विश्वभर में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में योगदान अद्वितीय रहा है। यह अलग बात है कि विभिन्न संप्रदायों की सीमाओं और पूर्वाग्रहों में बंधे अनेक जैन चिंतकों द्वारा उनके कार्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं हो सका। किंतु सत्य यही है कि विश्व मंच पर भगवान महावीर के अहिंसा, अनेकांतवाद और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। भारत के भीतर धर्म-प्रचार और विदेशों में धर्म-प्रचार—दोनों की परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ बिल्कुल भिन्न थीं, और उन्होंने दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
उन्होंने परंपरागत जैन मान्यताओं की सीमाओं से आगे बढ़कर विदेश यात्राएँ कीं तथा अमेरिका में भगवान महावीर के सिद्धांतों का प्रचार किया। वहीं न्यू जर्सी में प्रथम जैन भव्य आराधना-स्थल *सिद्धाचल* की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने सैकड़ों विदेशियों को अहिंसा, शाकाहार और आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा प्रदान की।
वे अहिंसा के प्रचार-प्रसार, समन्वयवादी दृष्टिकोण तथा सर्वधर्म समभाव के प्रबल समर्थक थे। उनके व्यापक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय स्वीकार्यता के कारण तत्कालीन शासन-प्रशासन में जैन धर्म की आवाज़ प्रभावी रूप से सुनी जाती थी। आध्यात्मिक, धार्मिक और विश्व-शांति से जुड़े अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उनका मार्गदर्शन महत्वपूर्ण माना जाता था। उस समय न तो सोशल मीडिया था और न ही डिजिटल संचार के आधुनिक साधन; फिर भी प्रिंट मीडिया में उनके विचार, गतिविधियाँ और संदेश प्रमुखता से प्रकाशित होते थे।
उनकी सर्वस्वीकार्यता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब पंजाब उग्रवाद की भीषण समस्या से जूझ रहा था और पूरा देश चिंतित था, तब शांति स्थापना के प्रयासों में उन्होंने संवाद और समन्वय की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं, किंतु वे उन विरले संतों में थे जिनकी बात सभी पक्ष सम्मानपूर्वक सुनते थे।
देश के प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय इंदिरा गांधी, स्वर्गीय मोरारजी देसाई तथा स्वर्गीय राजीव गांधी—सभी के मन में उनके प्रति विशेष सम्मान था। उनकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा किसी एक संप्रदाय या समुदाय तक सीमित नहीं थी।
जैन एकता के लिए वे आजीवन सक्रिय रहे। यह भी एक रोचक तथ्य है कि जन्म से वे ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे, किंतु उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जैन धर्म और उसके सार्वभौमिक मूल्यों के प्रसार को समर्पित कर दिया।
सन् 1975 में भगवान महावीर स्वामी के 2500वें निर्वाण महोत्सव का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भव्य आयोजन हुआ, उसके प्रमुख सूत्रधारों में उनका नाम अग्रिम पंक्ति
में लिया जाता है।
जैन सिद्धांतों के सर्वमान्य सार-ग्रंथ समणसुत्तं—जिसे कि आचार्य विनोबा भावे ने "जैन गीता" की उपाधि दी—की व्यापक स्वीकार्यता का वातावरण निर्मित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। सर्वोदय आंदोलन के अग्रणी नेता और भूदान-यज्ञ के प्रणेता विनोबा भावे भी श्री सुशीलमुनि जी के प्रशंसकों में से एक थे।
आचार्य श्री सुशील मुनि जी गौवंश संरक्षण और गोहत्या-निषेध के प्रश्न पर भी अत्यंत सक्रिय रहे। उन्होंने इस विषय पर देशभर के संत-समाज को एकजुट करने और जन-जागरण चलाने का प्रयास किया।
नई दिल्ली के शंकर रोड स्थित सुशील मुनि आश्रम में स्थापित जैन मंदिर अपने आप में अद्वितीय है। यह देश का संभवतः पहला ऐसा जैन मंदिर है जहाँ एक ही वेदी पर श्वेतांबर जिनबिंब, दिगंबर जिनप्रतिमा और जिनवाणी विराजमान हैं। मैं इस मंदिर में जैन एकता का सजीव और व्यावहारिक स्वरूप देखता हूँ—आचार्यश्री की व्यापक, समन्वयकारी और दूरदर्शी सोच का मूर्त रूप।
आज अमेरिका, इंग्लैंड तथा अन्य दूरवर्ती देशों में जैन समाज यदि अनेक परंपराओं के होते हुए भी एक सूत्र में बंधा हुआ दिखाई देता है, तो उसके पीछे इसी प्रकार की समन्वयकारी सोच कार्य करती रही है। हमारे आराध्य महावीर एक हैं; हम अपनी-अपनी परंपराओं और भावनाओं के अनुसार उनकी आराधना करें, किंतु परस्पर सद्भाव, सम्मान और आत्मीयता बनाए रखें—यही इस सोच का मूल संदेश है।
शंकर रोड दिल्ली में स्थित सुशील मुनि आश्रम द्वारा प्रतिदिन अत्यंत न्यून मूल्य पर प्रासादी वितरण किया जाता है, जिससे सामान्य व्यक्ति भी सहज रूप से "शाकाहारी" भोजन प्राप्त कर सके। यह भी उनकी दूरदर्शी सामाजिक सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है।आश्रम का पुस्तकालय विशेष रूप से उल्लेखनीय है; सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए ऐसी समृद्ध लाइब्रेरी दुर्लभ है। वर्तमान में अवश्य उनके शिष्य आपसी मनमुटावों के कारण संस्था के कार्यों को
बढ़ा क्या नहीं पा रहे है, बल्कि चला ही नहीं पा रहे हैं।
आचार्य श्री सुशील मुनि जी के संदर्भ में एक तथ्य कभी-कभी मन को विचलित भी करता है। "घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध"—इस कहावत की तरह, उन्हें जितना सम्मान और स्वीकार्यता जैनेतर समाज में प्राप्त हुई, उतनी शायद जैन समाज के भीतर नहीं मिल सकी। किंतु इतिहास अंततः व्यक्तियों का मूल्यांकन उनके संप्रदायगत आग्रहों से नहीं, बल्कि उनके कार्यों की व्यापकता और प्रभाव से करता है।
आज, उनके 100वें जन्मदिवस पर, उस युगद्रष्टा संत को मेरा विनम्र नमन, जिनकी दृष्टि ने जैन धर्म को विश्वव्यापी संवाद का विषय बनाया और जैन एकता को एक व्यावहारिक दिशा देने का साहसिक प्रयास किया।
आचार्य श्री सुशील कुमार जी को पुनः शत-शत विनम्र नमन।
??
*नीलमकांत**"जीवमित्र"*
9910378087
?? |
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2026-06-16 09:27:50 |
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42131354 |
जिनधर्म प्रभावक प्रकोष्ठ (JAIN INFLUENCER), विश्व जैन संगठन |
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।।आचार्यश्री सुशील मुनि जी के 100 वें जन्मदिवस (15 जून) पर सादर स्मरण।।
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विश्व में जैन धर्म की पताका फहराने वाले जैन संत—आचार्यश्री सुशील मुनि जी के जन्मदिवस (15 जून) पर सादर स्मरण।
आज हम सब जानते हैं कि अमेरिका में अब दर्जनों विशाल जैन मंदिर हैं। JAINA जैसी प्रभावशाली संस्था प्रवासी जैनों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज संयुक्त राष्ट्र तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जैन दर्शन, अहिंसा और अनेकांतवाद पर गंभीर चर्चा होती है। विश्व
के अनेक देशों में जैन समुदाय संगठित रूप से अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। किंतु आज से छह दशक पूर्व यह सब कल्पना के समान प्रतीत होता था।
वैश्विक स्तर पर जैन धर्म की पताका फहराने का जो स्वप्न कुछ दूरदर्शी संतों ने देखा था, उनमें प्रमुख नाम गुरुदेव मुनिश्री सुशील कुमार जी महाराज का है। उनके साथ गुरुदेव श्री चित्रभानु जी का भी उल्लेख आवश्यक है, जिन्होंने विदेशों में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की सुदृढ़ नींव रखी।
आचार्य श्री सुशील मुनि (15 जून 1926 – 22 अप्रैल 1994) बीसवीं शताब्दी के जैन समाज की ऐसी विलक्षण विभूति थे, जिनका विश्वभर में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में योगदान अद्वितीय रहा है। यह अलग बात है कि विभिन्न संप्रदायों की सीमाओं और पूर्वाग्रहों में बंधे अनेक जैन चिंतकों द्वारा उनके कार्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं हो सका। किंतु सत्य यही है कि विश्व मंच पर भगवान महावीर के अहिंसा, अनेकांतवाद और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। भारत के भीतर धर्म-प्रचार और विदेशों में धर्म-प्रचार—दोनों की परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ बिल्कुल भिन्न थीं, और उन्होंने दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
उन्होंने परंपरागत जैन मान्यताओं की सीमाओं से आगे बढ़कर विदेश यात्राएँ कीं तथा अमेरिका में भगवान महावीर के सिद्धांतों का प्रचार किया। वहीं न्यू जर्सी में प्रथम जैन भव्य आराधना-स्थल *सिद्धाचल* की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने सैकड़ों विदेशियों को अहिंसा, शाकाहार और आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा प्रदान की।
वे अहिंसा के प्रचार-प्रसार, समन्वयवादी दृष्टिकोण तथा सर्वधर्म समभाव के प्रबल समर्थक थे। उनके व्यापक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय स्वीकार्यता के कारण तत्कालीन शासन-प्रशासन में जैन धर्म की आवाज़ प्रभावी रूप से सुनी जाती थी। आध्यात्मिक, धार्मिक और विश्व-शांति से जुड़े अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उनका मार्गदर्शन महत्वपूर्ण माना जाता था। उस समय न तो सोशल मीडिया था और न ही डिजिटल संचार के आधुनिक साधन; फिर भी प्रिंट मीडिया में उनके विचार, गतिविधियाँ और संदेश प्रमुखता से प्रकाशित होते थे।
उनकी सर्वस्वीकार्यता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब पंजाब उग्रवाद की भीषण समस्या से जूझ रहा था और पूरा देश चिंतित था, तब शांति स्थापना के प्रयासों में उन्होंने संवाद और समन्वय की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं, किंतु वे उन विरले संतों में थे जिनकी बात सभी पक्ष सम्मानपूर्वक सुनते थे।
देश के प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय इंदिरा गांधी, स्वर्गीय मोरारजी देसाई तथा स्वर्गीय राजीव गांधी—सभी के मन में उनके प्रति विशेष सम्मान था। उनकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा किसी एक संप्रदाय या समुदाय तक सीमित नहीं थी।
जैन एकता के लिए वे आजीवन सक्रिय रहे। यह भी एक रोचक तथ्य है कि जन्म से वे ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे, किंतु उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जैन धर्म और उसके सार्वभौमिक मूल्यों के प्रसार को समर्पित कर दिया।
सन् 1975 में भगवान महावीर स्वामी के 2500वें निर्वाण महोत्सव का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भव्य आयोजन हुआ, उसके प्रमुख सूत्रधारों में उनका नाम अग्रिम पंक्ति
में लिया जाता है।
जैन सिद्धांतों के सर्वमान्य सार-ग्रंथ समणसुत्तं—जिसे कि आचार्य विनोबा भावे ने "जैन गीता" की उपाधि दी—की व्यापक स्वीकार्यता का वातावरण निर्मित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। सर्वोदय आंदोलन के अग्रणी नेता और भूदान-यज्ञ के प्रणेता विनोबा भावे भी श्री सुशीलमुनि जी के प्रशंसकों में से एक थे।
आचार्य श्री सुशील मुनि जी गौवंश संरक्षण और गोहत्या-निषेध के प्रश्न पर भी अत्यंत सक्रिय रहे। उन्होंने इस विषय पर देशभर के संत-समाज को एकजुट करने और जन-जागरण चलाने का प्रयास किया।
नई दिल्ली के शंकर रोड स्थित सुशील मुनि आश्रम में स्थापित जैन मंदिर अपने आप में अद्वितीय है। यह देश का संभवतः पहला ऐसा जैन मंदिर है जहाँ एक ही वेदी पर श्वेतांबर जिनबिंब, दिगंबर जिनप्रतिमा और जिनवाणी विराजमान हैं। मैं इस मंदिर में जैन एकता का सजीव और व्यावहारिक स्वरूप देखता हूँ—आचार्यश्री की व्यापक, समन्वयकारी और दूरदर्शी सोच का मूर्त रूप।
आज अमेरिका, इंग्लैंड तथा अन्य दूरवर्ती देशों में जैन समाज यदि अनेक परंपराओं के होते हुए भी एक सूत्र में बंधा हुआ दिखाई देता है, तो उसके पीछे इसी प्रकार की समन्वयकारी सोच कार्य करती रही है। हमारे आराध्य महावीर एक हैं; हम अपनी-अपनी परंपराओं और भावनाओं के अनुसार उनकी आराधना करें, किंतु परस्पर सद्भाव, सम्मान और आत्मीयता बनाए रखें—यही इस सोच का मूल संदेश है।
शंकर रोड दिल्ली में स्थित सुशील मुनि आश्रम द्वारा प्रतिदिन अत्यंत न्यून मूल्य पर प्रासादी वितरण किया जाता है, जिससे सामान्य व्यक्ति भी सहज रूप से "शाकाहारी" भोजन प्राप्त कर सके। यह भी उनकी दूरदर्शी सामाजिक सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है।आश्रम का पुस्तकालय विशेष रूप से उल्लेखनीय है; सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए ऐसी समृद्ध लाइब्रेरी दुर्लभ है। वर्तमान में अवश्य उनके शिष्य आपसी मनमुटावों के कारण संस्था के कार्यों को
बढ़ा क्या नहीं पा रहे है, बल्कि चला ही नहीं पा रहे हैं।
आचार्य श्री सुशील मुनि जी के संदर्भ में एक तथ्य कभी-कभी मन को विचलित भी करता है। "घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध"—इस कहावत की तरह, उन्हें जितना सम्मान और स्वीकार्यता जैनेतर समाज में प्राप्त हुई, उतनी शायद जैन समाज के भीतर नहीं मिल सकी। किंतु इतिहास अंततः व्यक्तियों का मूल्यांकन उनके संप्रदायगत आग्रहों से नहीं, बल्कि उनके कार्यों की व्यापकता और प्रभाव से करता है।
आज, उनके 100वें जन्मदिवस पर, उस युगद्रष्टा संत को मेरा विनम्र नमन, जिनकी दृष्टि ने जैन धर्म को विश्वव्यापी संवाद का विषय बनाया और जैन एकता को एक व्यावहारिक दिशा देने का साहसिक प्रयास किया।
आचार्य श्री सुशील कुमार जी को पुनः शत-शत विनम्र नमन।
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*नीलमकांत**"जीवमित्र"*
9910378087
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2026-06-16 09:27:50 |
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