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Acharya PulakSagarji 07 |
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Muni Shri 108 Suprabhat Sagar Ji Maharaj
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2026-04-11 12:02:13 |
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Acharya PulakSagarji 07 |
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Muni Shri 108 Suprabhat Sagar Ji Maharaj
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2026-04-11 12:02:13 |
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| 77035 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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मेरे सभी नियम है जी
????
आप भी अपनी-अपनी
सुविधानुसार
1,2,34,5,6,7,8,9,10,11,
या सारे नियम ले सकते है जी
?????? |
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2026-04-11 11:59:12 |
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40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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मेरे सभी नियम है जी
????
आप भी अपनी-अपनी
सुविधानुसार
1,2,34,5,6,7,8,9,10,11,
या सारे नियम ले सकते है जी
?????? |
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2026-04-11 11:59:12 |
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40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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दीपीका दिलखुश जैन चुडिवाल बैंगलोर कर्नाटक
?????
*अथ कल्याण लोचना*
*गाथा - 1*
*पयमप्पइ वड्ढमदिं परमेट्ठठीणं करोमि णवकारं।*
*सगपर सिद्धि णिमित्तं कल्याणा लोयणा वोच्छे।।1।।*
*अर्थ -* _अनंत ज्ञान के धारक श्री अरिहंत भगवान को मैं नमस्कार करता हूं तथा आत्मा की सिद्धि के लिए एवं जीवों के कल्याण आलोचना करता हूं।_
*गाथा -2*
*रे जीवा - णंत - भवे संसारे संसरंत बहुबारं।*
*पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्त विजंभपय डीहिं।।2।।*
*अर्थ -* _रे जीव ! मिथ्यात्व कर्म की तीव्र प्रकृतियों के उदय से इस अनंत जन्म-मरण रुपी संसार में तूने अनंत बार परिभ्रमण किया परन्तु अब तक तुझे रत्नत्रय की प्राप्ति कभी नहीं हुई।_
*गाथा -3*
*संसारभमणगमणं कुणंत आराहिदो ण जिण धम्मो।*
*तेण वीणा वरं दुक्खं पत्तोसि अणंतवारा इं।।3।।*
*अर्थ -* _इस संसार परिभ्रमण करते हुए तूने जिन धर्म का आराधन कभी नहीं किया। और उसी जिनधर्म के बिना इस संसार में तुझे अनंतबार महा दुःख प्राप्त हुए हैं।_
*गाथा -4*
*संसारे णिव संता अणंत मरणाइ पाओसि तुमं।*
*केवलिणा विण तेसिं संखा पज्जति णो हवदि।।4।।*
*अर्थ -* _इस संसार में निवास करते हुए तुने अनंतबार मरण किए परन्तु केवल उस एक जैन धर्म के बिना उन मरणों की संख्या पुरी नहीं हुई अर्थात् जन्म-मरण का अंत नहीं हुआ।_
*गाथा -5*
*तिण्णि सया छत्तिसा छावट्ठि सहस्सवार मरणाइं।*
*अंतो मुहुत्तमज्झे पत्तोसि णिगोयमज्झम्मि।।5।।*
*अर्थ -* _हे जीव ! तूने निगोद में अन्तर्मुहूर्त काल में 66,336 बार मरण किया एवं जन्म-मरण के दुःखों को प्राप्त हुआ।_
*गाथा -6*
*वियलिंदिये असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणेहिं।*
*पंचेंदिय चउबीसं खुद्दभवंतो मुहुत्तस्स।।6।।*
*अर्थ -* _हे जीव ! तूने इन्द्रिय अवस्था में अन्तर्मुहूर्त काल में अस्सी क्षुद्रभव धारण किये, ते इंद्रिय अवस्था में साठ क्षुद्रभव धारण किए, चौ इंद्रिय अवस्था में चालीस क्षुद्रभव धारण किए और पंचेन्द्रिय पर्याय में चौबीस क्षुद्रभव धारण किए।_
*गाथा -7*
*अण्णोण्णं खज्जंता जीवा पावंति दारुणं दुक्खं।*
*णहु तेसिं पज्जत्ती कहयावइ धम्ममदि सुण्णो।।7।।*
*अर्थ -* _परस्पर एक-दूसरे के साथ क्रोध करते हुए ये जीव अत्यंत घोर दुःख पाते हैं। उनकी कभी पर्याप्ति ही पूरी नहीं होती। फिर भला ध्येय रुप बुद्धि से सर्वथा रहित वे जीव उस जिनधर्म को कैसे धारण कर सकते हैं।_
*गाथा -8*
*मायापिया कुडुण्बो सुजणजण कोवि णायदि सत्थे ।*
*एगागी भमदि सदा णहि वीओ अत्थि संसारे।।8।।*
*अर्थ -* _इस संसार परिभ्रमण करते हुए इस जीव के साथ माता-पिता कुटुम्बी लोग तथा अपने परिवार के मनुष्यों में कोई भी साथ नहीं जाता। यह जीव सदा अकेला परिभ्रमण किया करता हैं। इसका कोई साथी दूसरा नहीं होता।_
*गाथा -9*
*आउक्खएवि पत्ते ण समत्थो कोवि आउदाणेय।*
*देवेंदो ण णरेंदो मणिओसह मंतजालाई।।9।।*
*अर्थ -* _जब आयु का अंत आता है, आयु पूरी हो जाती है तब कोई भी उस आयु को नहीं बढ़ा सकता है। न देवों का इंद्र किसी की आयु बढ़ा सकता है न चक्रवर्ती बढ़ा सकता है। मणिमंत्र,तंत्र अथवा औषधि कोई भी किसी तरह आयु को नहीं बढ़ा सकते हैं।_
*गाथा -10*
*संपडि जिणवर धम्मो लद्धोसि तुमं विसुद्धजोएण।*
*खामसु जीवा सव्वे पत्ते समये पयत्तेण।।10।।*
*अर्थ -* _इस समय मन, वचन और काय के योग की विशुद्धि होने से तुझे इस जैन-धर्म की प्राप्ति हुई है। इसलिए बड़े प्रयत्न के साथ प्रत्येक समय में तू समस्त जीवों को क्षमा कर तथा उनके प्रति क्षमा धारण कर।_
*गाथा -11*
*तिण्णिसया तेसट्ठि मिच्छत्ता दंसणस्स पडिवक्खा।*
*अण्णाणे सदृहिया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।11।।*
*अर्थ -* _सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षी वा विरोधी मिथ्यात्व के तीन सौ तिरसेठ भेद हैं। यदि उनका मैंने अपने अज्ञान से श्रद्धान किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -12*
*महुमज्ज मंसजूआपभि दीव सणाइ सत्तभेयाइं।*
*णियमो ण कथं च तेसिं मिच्छामे दुक्कडं हुज्ज।।12।।*
*अर्थ -* _मधु, मांस,मद्य और जुआ आदि को लेकर जो व्यसनों के सात भेद हैं उनको त्याग करने का मैंने नियमन किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -13*
*अणुवयमहव्वया जे जम णिममासील साहुगुरुदिण्णा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा में दुक्कडं हुज्ज।।13।।*
*अर्थ -* _साधुओं ने या गुरुओं ने मुझे जो अणुव्रत, महाव्रत,सप्तशील यम-नियम रुप से दिए हैं और उनमें से जिन-जिन की विराधना हुई हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा 14-15*
*णिच्चिदर घादुसत्तय तरुदस वियलिंदिएसु छच्चेव।*
*सुरणरय तिरियचउरो चउदस मपुए सद सहस्सा।।14।।*
*एदे सव्वे जीवा चउरासीलक्खजोणिवसि पत्ता।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।15।।*
*अर्थ -* _नित्य निगोद की सात लाख, इत्तरनिगोद की सात लाख पृथ्वी कायिक की सात लाख, जलकायिक की सात लाख,अग्निकायिक की सात लाख,वायुकायिक की सात लाख, वनस्पति कायिक की दस लाख,दो इंद्रिय की दो लाख,ते इंद्रिय की दो लाख,चौ इन्द्रिय की दो लाख, देवों की चार लाख,नारकियों की चार लाख, पंचेन्द्रिय की तिर्यंचों की चार लाख और मनुष्यों की चौदह लाख। इस प्रकार समस्त जीवों की चौरासी लाख योनियां है। इन चौरासी लाख योनियों में प्राप्त हुए जीवों में से जिन-जिन जीवों की विराधना मुझ से हुई हो वे सब पाप मिथ्या हों।_
*गाथा - 16*
*पुढवीजलग्गिवाओ तेओवि वणप्फदिय वियलतया।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।16।।*
*अर्थ -* _पृथ्वीकायिक जीव, जलकायिक जीव,वायुकायिक जीव, वनस्पति कायिक जीव और विकलत्रय जीवों में से जो -जो मुझसे विरोध गये हो उनकी विराधना से होने सब पाप मेरे मिथ्या हो।_
*गाथा -17*
*मल सत्तरा जिणुत्ता वय विसये जा विराहणा विविहा।*
*सामइया खमइया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।17।।*
*अर्थ -* _भगवान् जिनेन्द्र देव ने सत्तर अतिचार बतलाए हैं। उनमें से जो जो अतिचार लगे हों या व्रतों में अनेक प्रकार से विराधना हुई हो या सामायिक और क्षमा भावों से विराधना हुई हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -18*
*फलफुल्लछल्लिवल्लि अणगलण्हाणं च घोवणादिहिं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।18।।*
*अर्थ -* _फल, पुष्प,छाल, लता आदि काम में लाने में जो जीवों की विराधना हुई हो, बिना छने जल से स्नान करने में जिन जीवों की विराधना हुई हो उन सबसे होने वाले मेरे सब पाप मिथ्या हो।
*गाथा -19*
*णोशीलं णेव रवमा विणओ तवो ण सजमोवासा।*
*ण कदा ण भाविकदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।19।।*
*अर्थ -* _मैंने जो शील पालन न किया हो, क्षमा धारण न की हो,विनय न किया हो,तप न किया हो, संयम पालन न किया हो, उपवास न किया हो तथा उनकी भावना न की हो,वे समस्त मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -20*
*कंदफल मूल बीया सचित्त रयणीय भोयणा हारा।*
*अण्णाणे जे वि कदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।20।।*
*अर्थ -* _यदि मैंने अपने अज्ञान से कंद, मूल, फल,बीज खाये हों। अन्य सचित्त पदार्थों का भक्षण किया हो,व रात्रि में भोजन किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -21*
*णो पूया जिणचरणे ण पत्तदाणंन चेइयाग मणं।*
*ण कदा ण भाविद मये मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।21।।*
*अर्थ -* _भगवान के चरण कमलों की पूजा न की हो,पात्र दान न दिया हो, ईर्या समिति पूर्वक गमन न किया हो,ये सब काम न किया हो,न उनकी भावना की हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -22*
*बंभारंभ परिग्गह सावज्जा बहु पमाददोसेण।*
*जीवा विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।22।।*
*अर्थ -* _मैंने अपने प्रमादजन्य दोष से ब्रह्मचर्य आरंभ और परिग्रह में बहुत से पाप किये हो तथा उनमें जीवों की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -23*
*सत्ताति सदखेत भवातीदाणागदसुवट्ठमाण जिणा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।23।।*
*अर्थ -* _एक सौ सत्तर कर्म भूमियों में होने वाले भूत, भविष्य, वर्तमान काल संबंधी तीर्थंकरों की जो विराधना की हो,उनका अनादार किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -24*
*अरु हासिद्धा इरिया उवझाय साहु पञ्च परमेष्ठि।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।24।।*
*अर्थ -* _भगवान अरिहंत परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठि, उपाध्याय परमेष्ठि और साधु परमेष्ठी की जो-जो विराधना की हो,इनकी आज्ञा भंग की हो या निरादर किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -25*
*जिणवयण धम्मचेदियजिण पडिमा किट्टियाअकिट्टिमया।*
*जे जे विराहिवा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।25।।*
*अर्थ -* _जिनवचन,जिनधर्म, जिन चैत्यालय और कृत्रिम-अकृत्रिम जिन प्रतिमाओं की जो विराधना की हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हो।_
*गाथा -26*
*दंसणणाण चरित्ते दोसा अट्ठट्ठ पञ्च भेयाइं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।26।।*
*अर्थ -* _सम्यग्दर्शन के आठ दोष है, सम्यग्ज्ञान के आठ दोष है और सम्यक् चारित्र के पांच दोष है। इनमें से जो दोष मैंने लगाये हों तो उन में होने वाले मेरे सब पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -27*
*मदिसुदओहिमण पज्जयं तहा केवलं च पंचमयं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।27।।*
*अर्थ -* _मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन: पर्यय ज्ञान, केवलज्ञान इन पांचों ज्ञान में से जिस किसी ज्ञान की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -28*
*आयारादी अंगा पुव्वपइण्णा जिणेहिं पण्णत्ता ।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।28।।*
*अर्थ -* _आचारांग आदि ग्यारह अंग और चौदह पूर्वो का स्वरूप जो भगवान जिनेन्द्र देव ने कहा है, उसमें जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -29*
*पंच महव्वदजुत्ता अट्ठा दस सहस्स सील कद सोहा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।29।।*
*अर्थ -* _जो पांच महाव्रतों से सुशोभित है और अठारह हजार शीलों से जिनकी शोभा बढ़ रही है ऐसे भगवान अरहंत प्रभु की जो कुछ विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -30*
*लोए पियर समाणा ऋद्धि पवण्णा महागणवइया।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।30।।*
*अर्थ -* _अनेक ऋद्धियों को धारण करने वाले गणधर देव इस संसार में पिता के समान है, क्योंकि वे सब ऋद्धियों के गुरु हैं। उनकी जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -31*
*णिग्गंथ* *अज्जियाओ सडढा सड्ढीय चउविहो संघो।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।31।।*
*अर्थ -* _निर्ग्रंथ मुनि, आर्यिका, श्रावक,श्राविका इन चारों संघों में से जिस किसी की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -32*
*देवा सुरा मणुस्सा णेर इयाति रिय जोणि गद जीवा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।32।।*
*अर्थ -* _वैमानिक देव भवनवासी, व्यंतरवासी और ज्योतिष्क और कल्पवासी देव, मनुष्य और तिर्यंचगति में रहने वाले जीवों की जो विराधना हुई हो और उससे जो पाप हुए हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -33*
*कोहो माणो माया लोहो एदेय राय दोसाइं।*
*अण्णाणे जे विकदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।33।।*
*अर्थ -* _मैंने अपने अज्ञान से जो क्रोध, मान, माया,लोभ आदि राग -द्वेष किये हों,वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -34*
*परवत्थं परमहिला पमाद जोगेण अज्जियं पावं।*
*अण्णावि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।34।।*
*अर्थ -* _पर वस्त्र और पर स्त्री आदि के सम्बन्ध से प्रमाद योग पूर्वक जो पाप मैंने किए हों अथवा और जो-जो न करने योग्य कार्य किए हों वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -35*
*एगो सहावसिद्धो सोहं अप्पा वियप्पपरिमुक्को।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।35।।*
*अर्थ -* _जो आत्मा एक है,शरीरिदिक नोकर्म, द्रव्यकर्म, भावकर्म से रहित है, स्वभाव से स्वयं सिद्ध है और सब तरह से विकल्पों से रहित है, ऐसे एक परमात्मा की ही मैं शरण जाता हूं। ऐसे परमात्मा के सिवाय अन्य कोई भी मुझे मेरे लिए शरण नहीं है।_
*गाथा -36*
*अरस अरुव अगधो अव्वावाहो अणंतणाणमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।36।।*
*अर्थ -* _जो परमात्मा रस रहित है, रुप रहित है, गंध रहित है,सब तरह की बाधाओं से रहित और अनंत ज्ञान स्वरूप है ऐसा एक परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा - 37*
*णेयपमाणं णाणं समए एगेण हुंति ससहावे।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।38।।*
*अर्थ -* _परमात्मा का वह अनंत ज्ञान यद्यपि अपने स्वभाव में ही स्थिर रहता है तथापि वह प्रत्येक समय में समस्त ज्ञेय पदार्थों को जानता रहता है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है, अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -38*
*एयाणेय वियप्पय साहणे सयसहावसुद्धगदी।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।38।।*
*अर्थ -* _उस परमात्मा को चाहे एक प्रकार से सिद्ध किया जाय और चाहे अनेक प्रकार से सिद्ध किया जाय, वह सदा अपने ही स्वभाव में शुद्ध-बुद्ध स्वरुप स्थिर रहता है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है उसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -39*
*देह पमाणो णिच्चो लोय पमाणो वि धम्मदो होदि।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।39।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा नित्य है,शरीर के प्रमाण के बराबर है और प्रदेशों के द्वारा लोक प्रमाण है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -40*
*केवल दंसण णाणं समए एगेण दुण्णिउव ओगा।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।40।।*
*अर्थ -* _उन परमात्मा के एक ही समय में केवल दर्शन और केवल ज्ञान दोनों ही उपयोग एक साथ होते हैं। वह परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -41*
*सगरुव सहजसिद्धो विहाव गुण मुक्क कम्म वावारो।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।41।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा अपने स्वरूप में ही लीन रहते हैं, स्वाभाविक स्वभाव से ही सिद्ध हैं और राग द्वैषायिक वैभाविक गुणों से रहित होने के कारण समस्त कर्मों के व्यापार से रहित है। ऐसे परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण_ _नहीं है।_
*गाथा -42*
*सुण्णो णेय असुण्णो णोकम्मो कम्मवज्जिओ णाणं।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।42।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा रुप,रस, गंध, स्पर्श रहित होने के कारण शून्य रूप है तथा ज्ञानमय आत्म-स्वरुप होने के कारण शून्य रूप नहीं भी है। उस परमात्मा का ज्ञान शरीरादिक नोकर्म एवं ज्ञानावरणादिक आठ कर्मों से रहित है। ऐसा वह परमात्मा मुझे शरण है। उसके सिवाय मुझे और कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -43*
*णाण उजोण भिण्णो वियप्पभिण्णो सहाव सुक्खमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।43।।*
*अर्थ -* _जो परमात्मा अपने केवलज्ञान से कभी भिन्न नहीं होता, परन्तु सब तरह के विकल्पों से वह सदा भिन्न रहता है, स्वाभाविक सुख स्वरुप है। ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। ऐसे परमात्मा के सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -44*
*अच्छिण्णो वच्छिण्णो पमेय रुक्त गुरु लहू चेव।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।44।।*
*अर्थ -* _जो कभी किसी प्रकार छिन्न-भिन्न नहीं होता, जो सदैव अखण्ड स्वरुप है तथा अविच्छिन्न है, अंतिम शरीर के प्रमाण के समान है अथवा असंख्यात प्रदेशमय है। जो ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों के समान है, अर्थात् समस्त पदार्थों का ज्ञाता हैं और अगुरु लघु गुण से सुशोभित है ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। उसके सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -45*
*सुहअसुह भाव विगओ सुद्धसहावेण तम्मयं पत्तो।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।45।।*
*अर्थ -* _जो शुभ भाव और अशुभ भाव दोनों से रहित है। जो केवल शुद्ध स्वभाव के द्वारा अपने ही आत्मा में तल्लीन हैं अथवा जो केवल अपने शुद्ध स्वभाव में लीन हैं। ऐसा ही परमात्मा मुझे शरण है। इसके सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा - 46*
*णो इत्थी ण णउंसो णो पुंसो णेव पुण्ण पावमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।46।।*
*अर्थ -* _जो न स्त्री है, नपुंसक है,न पुरुष है और न पुण्य-पाप रुप है, ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है, अन्य मुझे कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -47*
*ते कोण होदि सुजणो तं कस्स ण बंधवो ण सुजणो वा।*
*अप्पा हवेह अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो।।47।।*
*अर्थ -* _हे आत्मन् ! इस संसार में तेरा कोई सगा-संबंधी नहीं है तथा तू भी किसी का भाई,बंधु या कुटुम्बी नहीं है। यह आत्मा सदा आत्मा ही रहता है। सदा अपने आत्मस्वरुप में स्थिर है, समस्त पदार्थों का ज्ञाता हैं, जानना इसका स्वभाव है और यह सदा शुद्ध है।_
*गाथा -48*
*जिण देवो होदु सदा मई सु जिणसासणे सया होऊ।*
*सण्णासेण य मरणं भवे भवे मज्झ संपदओ।।48।।*
*अर्थ -* _मैं श्री जिनेन्द्र की ही सदा सेवा करता रहूं। श्री जिनेन्द्र देव के सिवाय अन्य किसी देव को न मानूं। मेरी बुद्धि सदा जिन-शासन में,जिन धर्म में बनी रहे। जैन-धर्म को छोड़कर अन्य किसी धर्म में मेरी बुद्धि न जाय। मेरा मरण सदा समाधि पूर्वक ही हो। समाधि-मरण के सिवाय अन्य मरण न हो। यह सम्पत्ति मुझे भव-भव में प्राप्त हो।_
*गाथा -49*
*जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणो जिणो।*
*दयाधम्मो दयाधम्मो दयाधम्मो दया सदा।।49।।*
*अर्थ -* _इस संसार में देव जिन ही है,देव जिन ही है,देव जिन ही है, भगवान् जिनेन्द्र देव अरहंत देव ही देव हैं। अन्य कोई देव,देव नहीं है। धर्म दया रुप ही है, धर्म दयामय ही है,धर्मदया ही है। धर्म सदा दयामय ही होता है, दया के सिवाय अन्य कोई धर्म हो ही नहीं सकता।_
*गाथा -50*
*महासाहू महासाहू महासाहू दिगंबरा।*
*एवं तच्च सया हुज्ज जावण्णो मुक्ति संगमो।।50।।*
*अर्थ -* _महा साधु नग्न दिगंबर महर्षि होते हैं। महा साधु दिगंबर जैन मुनीश्वर होते हैं,महा साधु दिगंबर ही होते हैं। हे प्रभो ! जब तक मुझे मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक मेरे ह्रदय में यही तत्त्व सदा बना रहे - अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति पर्यंत जिनेन्द्र देव,दया-मय धर्म एवं निर्ग्रंथ साधु के प्रति मेरी अटल श्रद्धा रहे।_
*गाथा -51*
*एवमेव गओ कालो अणंतो दुक्ख संगमे।*
*जिणोवदिट्ठ सण्णा से ण यत्ता रोहणा कया।।51।।*
*अर्थ -* _आज तक मेरा अनंतकाल दुःख भोगते हुए व्यर्थ बीत गया। मैंने अब तक भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए समाधि मरण के लिए कभी प्रयत्न नहीं किया।_
*गाथा -52*
*संपइ एव संपत्ताराहणा जिण देसिया।*
*किं किं ण जायदे मज्झ सिद्धि संदोह संपई।।53।।*
*अर्थ -* _हे प्रभो ! महान् पुण्योदय से इस समय मुझे भगवान् जिनेन्द्र देव की कही हुई आराधना से प्राप्त हुई है। इसके प्राप्त हो जाने से अब इस संसार में ऐसी कौन-सी सिद्धि अथवा सम्पत्ति है जो मुझे प्राप्त न हो अर्थात् अब इन आराधनाओं के पालन करने से मुझे समस्त सिद्धियां अवश्य प्राप्त हो जायेंगी। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।_
*गाथा -53*
*अहो धम्म महो धम्मं अहो मे लद्धि णिम्मला।*
*संजदा संपया सारा जेण सुक्ख मणू पमं।।53।।*
*अर्थ -* _हे प्रभो ! आपके द्वारा कहा हुआ दया रुपी धर्म बड़ा ही आश्चर्य कारक है। यह धर्म सबसे उत्कृष्ट है व सर्वोत्तम है, इसकी मुझे जो प्राप्ति हुई है अत्यंत आश्चर्य उत्पन्न करने वाली है। इस निर्मल काल लब्धि एवं महान् पुण्योदय के प्रसाद से ही मुझे आराधना रुपी सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त हुई है जिसके द्वारा ही मुझे मोक्ष का अनुपम सुख अवश्य प्राप्त होगा।_
*गाथा -54*
*एवं आराहंतो आलोयणवंदणा पडिक्कमणं।*
*पावइ फलं च तेसिं णिद्दिट्ठं अजियवम्मेण।।54।।*
*अर्थ -* _इस प्रकार आलोचना, वंदना और प्रतिक्रमण की आराधना करने से भगवान् जिनेन्यद्र देव का कहा हुआ मोक्ष फल अवश्य प्राप्त होता है।_
*।। इति श्री कल्याणालोचना सम्पूर्णम्।।*
(दोहा)
वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर नाय |
कहूं काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाये ||
(चौपाई)
अष्टापद आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि |
नेमिनाथ स्वामी गिरनार, वन्दौं भाव भगति उर धार ||1||
चरम तीर्थकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामि महावीर |
शिखर समेद जिनेसुर बीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||2||
वरदत्तराय रु इन्द मुनिंद, सायरदत्त आदि गुणवृन्द |
नगर तारवर मुनि उठकोडी, वन्दौं भाव सहित कर जोडी ||3||
श्रीगिरनार शिखर विख्यात, कोडी बहत्तर अरु सौ सात |
सम्बु प्रद्युम्न कुमर द्वै भाय, अनिरुध आदि नमूं तसु पाय ||4||
रामचन्द्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुणधीर |
पांच कोडी मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि वन्दौं निरधार ||5||
पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोडी मुनि मुक्ति पयान |
श्रीशत्रुंजय के सीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||6||
जे बलभद्र मुक्ति में गये, आठ कोडी मुनि औरहू भये |
श्रीगजपन्थ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ||7||
राम हणु सुग्रीव सुडील, गव गवाख्य नील महानील |
कोडी निन्याणव मुक्ति पयान, तुंगीगिरि वन्दौं धरि ध्यान ||8||
नंग अनंग कुमार सुजान, पांच कोडी अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये सोनागिरि शीस, ते वन्दौं त्रिभुवन पति ईस ||9||
रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये रेवा तट सार |
कोटि पंच और लाख पचास, ते वन्दौंधरि परम हुलास ||10||
रेवानदी सिद्धवर कूट, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वे चक्री दश कामकुमार, उठकोडी वन्दौं भव पार ||11||
बडवानी बडनयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरि चूल उतंग |
इन्द्रजीत अरु कुम्भ जो कर्ण, ते वन्दौं भव सागर तरण ||12||
सुवरणभद्र आदि मुनि चार, पावागिरि वर शिखर मंझार |
चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गये नित वन्दौं नित तास ||13||
फलहोडी बडगाम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप |
गुरुदत्तादी मुनिसुर जहाँ, मुक्ति गये वन्दौं नित तहां ||14||
बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्रीअष्टापद मुक्ति मंझार, ते वन्दौं नित सुरत सँभार ||15||
अचलापुर की दिश ईसान, तहां मेढगिरि नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोडी मुनिराय, तिनके चरण नमूं चित लाय ||16||
वंसस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुंथुगिरी सोय |
कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूं प्रणाम ||17||
जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पांच सौ लहे |
कोटिशिला मुनि कोडी प्रमान, वन्दन करूं जोरि जग पान ||18||
समवशरण श्री पार्श्व जिनन्द, रेसिन्दीगिरि नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराय, ते वन्दौं नित धरम जिहाज ||19||
मथुरा पुर पवित्र उद्यान, जंबूस्वामी जी निर्वाण ।
चरम केवली पंचम काल।
ते बंदो नित दीन दयाल।।20।।
तीन लोक ते तीरथ जहाँ, नित प्रति वन्दन कीजै तहां |
मन-वच-काय सहित सिर नाय, वन्दन करहिं भविक गुण गाय ||20||
संवत सतरह सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
भक्त वन्दन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||21 |
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2026-04-11 11:59:11 |
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?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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दीपीका दिलखुश जैन चुडिवाल बैंगलोर कर्नाटक
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*अथ कल्याण लोचना*
*गाथा - 1*
*पयमप्पइ वड्ढमदिं परमेट्ठठीणं करोमि णवकारं।*
*सगपर सिद्धि णिमित्तं कल्याणा लोयणा वोच्छे।।1।।*
*अर्थ -* _अनंत ज्ञान के धारक श्री अरिहंत भगवान को मैं नमस्कार करता हूं तथा आत्मा की सिद्धि के लिए एवं जीवों के कल्याण आलोचना करता हूं।_
*गाथा -2*
*रे जीवा - णंत - भवे संसारे संसरंत बहुबारं।*
*पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्त विजंभपय डीहिं।।2।।*
*अर्थ -* _रे जीव ! मिथ्यात्व कर्म की तीव्र प्रकृतियों के उदय से इस अनंत जन्म-मरण रुपी संसार में तूने अनंत बार परिभ्रमण किया परन्तु अब तक तुझे रत्नत्रय की प्राप्ति कभी नहीं हुई।_
*गाथा -3*
*संसारभमणगमणं कुणंत आराहिदो ण जिण धम्मो।*
*तेण वीणा वरं दुक्खं पत्तोसि अणंतवारा इं।।3।।*
*अर्थ -* _इस संसार परिभ्रमण करते हुए तूने जिन धर्म का आराधन कभी नहीं किया। और उसी जिनधर्म के बिना इस संसार में तुझे अनंतबार महा दुःख प्राप्त हुए हैं।_
*गाथा -4*
*संसारे णिव संता अणंत मरणाइ पाओसि तुमं।*
*केवलिणा विण तेसिं संखा पज्जति णो हवदि।।4।।*
*अर्थ -* _इस संसार में निवास करते हुए तुने अनंतबार मरण किए परन्तु केवल उस एक जैन धर्म के बिना उन मरणों की संख्या पुरी नहीं हुई अर्थात् जन्म-मरण का अंत नहीं हुआ।_
*गाथा -5*
*तिण्णि सया छत्तिसा छावट्ठि सहस्सवार मरणाइं।*
*अंतो मुहुत्तमज्झे पत्तोसि णिगोयमज्झम्मि।।5।।*
*अर्थ -* _हे जीव ! तूने निगोद में अन्तर्मुहूर्त काल में 66,336 बार मरण किया एवं जन्म-मरण के दुःखों को प्राप्त हुआ।_
*गाथा -6*
*वियलिंदिये असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणेहिं।*
*पंचेंदिय चउबीसं खुद्दभवंतो मुहुत्तस्स।।6।।*
*अर्थ -* _हे जीव ! तूने इन्द्रिय अवस्था में अन्तर्मुहूर्त काल में अस्सी क्षुद्रभव धारण किये, ते इंद्रिय अवस्था में साठ क्षुद्रभव धारण किए, चौ इंद्रिय अवस्था में चालीस क्षुद्रभव धारण किए और पंचेन्द्रिय पर्याय में चौबीस क्षुद्रभव धारण किए।_
*गाथा -7*
*अण्णोण्णं खज्जंता जीवा पावंति दारुणं दुक्खं।*
*णहु तेसिं पज्जत्ती कहयावइ धम्ममदि सुण्णो।।7।।*
*अर्थ -* _परस्पर एक-दूसरे के साथ क्रोध करते हुए ये जीव अत्यंत घोर दुःख पाते हैं। उनकी कभी पर्याप्ति ही पूरी नहीं होती। फिर भला ध्येय रुप बुद्धि से सर्वथा रहित वे जीव उस जिनधर्म को कैसे धारण कर सकते हैं।_
*गाथा -8*
*मायापिया कुडुण्बो सुजणजण कोवि णायदि सत्थे ।*
*एगागी भमदि सदा णहि वीओ अत्थि संसारे।।8।।*
*अर्थ -* _इस संसार परिभ्रमण करते हुए इस जीव के साथ माता-पिता कुटुम्बी लोग तथा अपने परिवार के मनुष्यों में कोई भी साथ नहीं जाता। यह जीव सदा अकेला परिभ्रमण किया करता हैं। इसका कोई साथी दूसरा नहीं होता।_
*गाथा -9*
*आउक्खएवि पत्ते ण समत्थो कोवि आउदाणेय।*
*देवेंदो ण णरेंदो मणिओसह मंतजालाई।।9।।*
*अर्थ -* _जब आयु का अंत आता है, आयु पूरी हो जाती है तब कोई भी उस आयु को नहीं बढ़ा सकता है। न देवों का इंद्र किसी की आयु बढ़ा सकता है न चक्रवर्ती बढ़ा सकता है। मणिमंत्र,तंत्र अथवा औषधि कोई भी किसी तरह आयु को नहीं बढ़ा सकते हैं।_
*गाथा -10*
*संपडि जिणवर धम्मो लद्धोसि तुमं विसुद्धजोएण।*
*खामसु जीवा सव्वे पत्ते समये पयत्तेण।।10।।*
*अर्थ -* _इस समय मन, वचन और काय के योग की विशुद्धि होने से तुझे इस जैन-धर्म की प्राप्ति हुई है। इसलिए बड़े प्रयत्न के साथ प्रत्येक समय में तू समस्त जीवों को क्षमा कर तथा उनके प्रति क्षमा धारण कर।_
*गाथा -11*
*तिण्णिसया तेसट्ठि मिच्छत्ता दंसणस्स पडिवक्खा।*
*अण्णाणे सदृहिया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।11।।*
*अर्थ -* _सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षी वा विरोधी मिथ्यात्व के तीन सौ तिरसेठ भेद हैं। यदि उनका मैंने अपने अज्ञान से श्रद्धान किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -12*
*महुमज्ज मंसजूआपभि दीव सणाइ सत्तभेयाइं।*
*णियमो ण कथं च तेसिं मिच्छामे दुक्कडं हुज्ज।।12।।*
*अर्थ -* _मधु, मांस,मद्य और जुआ आदि को लेकर जो व्यसनों के सात भेद हैं उनको त्याग करने का मैंने नियमन किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -13*
*अणुवयमहव्वया जे जम णिममासील साहुगुरुदिण्णा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा में दुक्कडं हुज्ज।।13।।*
*अर्थ -* _साधुओं ने या गुरुओं ने मुझे जो अणुव्रत, महाव्रत,सप्तशील यम-नियम रुप से दिए हैं और उनमें से जिन-जिन की विराधना हुई हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा 14-15*
*णिच्चिदर घादुसत्तय तरुदस वियलिंदिएसु छच्चेव।*
*सुरणरय तिरियचउरो चउदस मपुए सद सहस्सा।।14।।*
*एदे सव्वे जीवा चउरासीलक्खजोणिवसि पत्ता।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।15।।*
*अर्थ -* _नित्य निगोद की सात लाख, इत्तरनिगोद की सात लाख पृथ्वी कायिक की सात लाख, जलकायिक की सात लाख,अग्निकायिक की सात लाख,वायुकायिक की सात लाख, वनस्पति कायिक की दस लाख,दो इंद्रिय की दो लाख,ते इंद्रिय की दो लाख,चौ इन्द्रिय की दो लाख, देवों की चार लाख,नारकियों की चार लाख, पंचेन्द्रिय की तिर्यंचों की चार लाख और मनुष्यों की चौदह लाख। इस प्रकार समस्त जीवों की चौरासी लाख योनियां है। इन चौरासी लाख योनियों में प्राप्त हुए जीवों में से जिन-जिन जीवों की विराधना मुझ से हुई हो वे सब पाप मिथ्या हों।_
*गाथा - 16*
*पुढवीजलग्गिवाओ तेओवि वणप्फदिय वियलतया।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।16।।*
*अर्थ -* _पृथ्वीकायिक जीव, जलकायिक जीव,वायुकायिक जीव, वनस्पति कायिक जीव और विकलत्रय जीवों में से जो -जो मुझसे विरोध गये हो उनकी विराधना से होने सब पाप मेरे मिथ्या हो।_
*गाथा -17*
*मल सत्तरा जिणुत्ता वय विसये जा विराहणा विविहा।*
*सामइया खमइया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।17।।*
*अर्थ -* _भगवान् जिनेन्द्र देव ने सत्तर अतिचार बतलाए हैं। उनमें से जो जो अतिचार लगे हों या व्रतों में अनेक प्रकार से विराधना हुई हो या सामायिक और क्षमा भावों से विराधना हुई हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -18*
*फलफुल्लछल्लिवल्लि अणगलण्हाणं च घोवणादिहिं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।18।।*
*अर्थ -* _फल, पुष्प,छाल, लता आदि काम में लाने में जो जीवों की विराधना हुई हो, बिना छने जल से स्नान करने में जिन जीवों की विराधना हुई हो उन सबसे होने वाले मेरे सब पाप मिथ्या हो।
*गाथा -19*
*णोशीलं णेव रवमा विणओ तवो ण सजमोवासा।*
*ण कदा ण भाविकदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।19।।*
*अर्थ -* _मैंने जो शील पालन न किया हो, क्षमा धारण न की हो,विनय न किया हो,तप न किया हो, संयम पालन न किया हो, उपवास न किया हो तथा उनकी भावना न की हो,वे समस्त मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -20*
*कंदफल मूल बीया सचित्त रयणीय भोयणा हारा।*
*अण्णाणे जे वि कदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।20।।*
*अर्थ -* _यदि मैंने अपने अज्ञान से कंद, मूल, फल,बीज खाये हों। अन्य सचित्त पदार्थों का भक्षण किया हो,व रात्रि में भोजन किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -21*
*णो पूया जिणचरणे ण पत्तदाणंन चेइयाग मणं।*
*ण कदा ण भाविद मये मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।21।।*
*अर्थ -* _भगवान के चरण कमलों की पूजा न की हो,पात्र दान न दिया हो, ईर्या समिति पूर्वक गमन न किया हो,ये सब काम न किया हो,न उनकी भावना की हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -22*
*बंभारंभ परिग्गह सावज्जा बहु पमाददोसेण।*
*जीवा विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।22।।*
*अर्थ -* _मैंने अपने प्रमादजन्य दोष से ब्रह्मचर्य आरंभ और परिग्रह में बहुत से पाप किये हो तथा उनमें जीवों की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -23*
*सत्ताति सदखेत भवातीदाणागदसुवट्ठमाण जिणा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।23।।*
*अर्थ -* _एक सौ सत्तर कर्म भूमियों में होने वाले भूत, भविष्य, वर्तमान काल संबंधी तीर्थंकरों की जो विराधना की हो,उनका अनादार किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -24*
*अरु हासिद्धा इरिया उवझाय साहु पञ्च परमेष्ठि।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।24।।*
*अर्थ -* _भगवान अरिहंत परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठि, उपाध्याय परमेष्ठि और साधु परमेष्ठी की जो-जो विराधना की हो,इनकी आज्ञा भंग की हो या निरादर किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -25*
*जिणवयण धम्मचेदियजिण पडिमा किट्टियाअकिट्टिमया।*
*जे जे विराहिवा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।25।।*
*अर्थ -* _जिनवचन,जिनधर्म, जिन चैत्यालय और कृत्रिम-अकृत्रिम जिन प्रतिमाओं की जो विराधना की हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हो।_
*गाथा -26*
*दंसणणाण चरित्ते दोसा अट्ठट्ठ पञ्च भेयाइं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।26।।*
*अर्थ -* _सम्यग्दर्शन के आठ दोष है, सम्यग्ज्ञान के आठ दोष है और सम्यक् चारित्र के पांच दोष है। इनमें से जो दोष मैंने लगाये हों तो उन में होने वाले मेरे सब पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -27*
*मदिसुदओहिमण पज्जयं तहा केवलं च पंचमयं।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।27।।*
*अर्थ -* _मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन: पर्यय ज्ञान, केवलज्ञान इन पांचों ज्ञान में से जिस किसी ज्ञान की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -28*
*आयारादी अंगा पुव्वपइण्णा जिणेहिं पण्णत्ता ।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।28।।*
*अर्थ -* _आचारांग आदि ग्यारह अंग और चौदह पूर्वो का स्वरूप जो भगवान जिनेन्द्र देव ने कहा है, उसमें जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -29*
*पंच महव्वदजुत्ता अट्ठा दस सहस्स सील कद सोहा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।29।।*
*अर्थ -* _जो पांच महाव्रतों से सुशोभित है और अठारह हजार शीलों से जिनकी शोभा बढ़ रही है ऐसे भगवान अरहंत प्रभु की जो कुछ विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -30*
*लोए पियर समाणा ऋद्धि पवण्णा महागणवइया।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।30।।*
*अर्थ -* _अनेक ऋद्धियों को धारण करने वाले गणधर देव इस संसार में पिता के समान है, क्योंकि वे सब ऋद्धियों के गुरु हैं। उनकी जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -31*
*णिग्गंथ* *अज्जियाओ सडढा सड्ढीय चउविहो संघो।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।31।।*
*अर्थ -* _निर्ग्रंथ मुनि, आर्यिका, श्रावक,श्राविका इन चारों संघों में से जिस किसी की विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -32*
*देवा सुरा मणुस्सा णेर इयाति रिय जोणि गद जीवा।*
*जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।32।।*
*अर्थ -* _वैमानिक देव भवनवासी, व्यंतरवासी और ज्योतिष्क और कल्पवासी देव, मनुष्य और तिर्यंचगति में रहने वाले जीवों की जो विराधना हुई हो और उससे जो पाप हुए हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -33*
*कोहो माणो माया लोहो एदेय राय दोसाइं।*
*अण्णाणे जे विकदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।33।।*
*अर्थ -* _मैंने अपने अज्ञान से जो क्रोध, मान, माया,लोभ आदि राग -द्वेष किये हों,वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -34*
*परवत्थं परमहिला पमाद जोगेण अज्जियं पावं।*
*अण्णावि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।34।।*
*अर्थ -* _पर वस्त्र और पर स्त्री आदि के सम्बन्ध से प्रमाद योग पूर्वक जो पाप मैंने किए हों अथवा और जो-जो न करने योग्य कार्य किए हों वे सब मेरे पाप मिथ्या हों।_
*गाथा -35*
*एगो सहावसिद्धो सोहं अप्पा वियप्पपरिमुक्को।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।35।।*
*अर्थ -* _जो आत्मा एक है,शरीरिदिक नोकर्म, द्रव्यकर्म, भावकर्म से रहित है, स्वभाव से स्वयं सिद्ध है और सब तरह से विकल्पों से रहित है, ऐसे एक परमात्मा की ही मैं शरण जाता हूं। ऐसे परमात्मा के सिवाय अन्य कोई भी मुझे मेरे लिए शरण नहीं है।_
*गाथा -36*
*अरस अरुव अगधो अव्वावाहो अणंतणाणमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।36।।*
*अर्थ -* _जो परमात्मा रस रहित है, रुप रहित है, गंध रहित है,सब तरह की बाधाओं से रहित और अनंत ज्ञान स्वरूप है ऐसा एक परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा - 37*
*णेयपमाणं णाणं समए एगेण हुंति ससहावे।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।38।।*
*अर्थ -* _परमात्मा का वह अनंत ज्ञान यद्यपि अपने स्वभाव में ही स्थिर रहता है तथापि वह प्रत्येक समय में समस्त ज्ञेय पदार्थों को जानता रहता है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है, अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -38*
*एयाणेय वियप्पय साहणे सयसहावसुद्धगदी।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।38।।*
*अर्थ -* _उस परमात्मा को चाहे एक प्रकार से सिद्ध किया जाय और चाहे अनेक प्रकार से सिद्ध किया जाय, वह सदा अपने ही स्वभाव में शुद्ध-बुद्ध स्वरुप स्थिर रहता है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है उसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -39*
*देह पमाणो णिच्चो लोय पमाणो वि धम्मदो होदि।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।39।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा नित्य है,शरीर के प्रमाण के बराबर है और प्रदेशों के द्वारा लोक प्रमाण है। ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -40*
*केवल दंसण णाणं समए एगेण दुण्णिउव ओगा।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।40।।*
*अर्थ -* _उन परमात्मा के एक ही समय में केवल दर्शन और केवल ज्ञान दोनों ही उपयोग एक साथ होते हैं। वह परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है।_
*गाथा -41*
*सगरुव सहजसिद्धो विहाव गुण मुक्क कम्म वावारो।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।41।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा अपने स्वरूप में ही लीन रहते हैं, स्वाभाविक स्वभाव से ही सिद्ध हैं और राग द्वैषायिक वैभाविक गुणों से रहित होने के कारण समस्त कर्मों के व्यापार से रहित है। ऐसे परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई भी मुझे शरण_ _नहीं है।_
*गाथा -42*
*सुण्णो णेय असुण्णो णोकम्मो कम्मवज्जिओ णाणं।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।42।।*
*अर्थ -* _वह परमात्मा रुप,रस, गंध, स्पर्श रहित होने के कारण शून्य रूप है तथा ज्ञानमय आत्म-स्वरुप होने के कारण शून्य रूप नहीं भी है। उस परमात्मा का ज्ञान शरीरादिक नोकर्म एवं ज्ञानावरणादिक आठ कर्मों से रहित है। ऐसा वह परमात्मा मुझे शरण है। उसके सिवाय मुझे और कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -43*
*णाण उजोण भिण्णो वियप्पभिण्णो सहाव सुक्खमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।43।।*
*अर्थ -* _जो परमात्मा अपने केवलज्ञान से कभी भिन्न नहीं होता, परन्तु सब तरह के विकल्पों से वह सदा भिन्न रहता है, स्वाभाविक सुख स्वरुप है। ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। ऐसे परमात्मा के सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -44*
*अच्छिण्णो वच्छिण्णो पमेय रुक्त गुरु लहू चेव।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।44।।*
*अर्थ -* _जो कभी किसी प्रकार छिन्न-भिन्न नहीं होता, जो सदैव अखण्ड स्वरुप है तथा अविच्छिन्न है, अंतिम शरीर के प्रमाण के समान है अथवा असंख्यात प्रदेशमय है। जो ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों के समान है, अर्थात् समस्त पदार्थों का ज्ञाता हैं और अगुरु लघु गुण से सुशोभित है ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। उसके सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -45*
*सुहअसुह भाव विगओ सुद्धसहावेण तम्मयं पत्तो।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।45।।*
*अर्थ -* _जो शुभ भाव और अशुभ भाव दोनों से रहित है। जो केवल शुद्ध स्वभाव के द्वारा अपने ही आत्मा में तल्लीन हैं अथवा जो केवल अपने शुद्ध स्वभाव में लीन हैं। ऐसा ही परमात्मा मुझे शरण है। इसके सिवाय मुझे अन्य कोई शरण नहीं है।_
*गाथा - 46*
*णो इत्थी ण णउंसो णो पुंसो णेव पुण्ण पावमओ।*
*अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।46।।*
*अर्थ -* _जो न स्त्री है, नपुंसक है,न पुरुष है और न पुण्य-पाप रुप है, ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है, अन्य मुझे कोई शरण नहीं है।_
*गाथा -47*
*ते कोण होदि सुजणो तं कस्स ण बंधवो ण सुजणो वा।*
*अप्पा हवेह अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो।।47।।*
*अर्थ -* _हे आत्मन् ! इस संसार में तेरा कोई सगा-संबंधी नहीं है तथा तू भी किसी का भाई,बंधु या कुटुम्बी नहीं है। यह आत्मा सदा आत्मा ही रहता है। सदा अपने आत्मस्वरुप में स्थिर है, समस्त पदार्थों का ज्ञाता हैं, जानना इसका स्वभाव है और यह सदा शुद्ध है।_
*गाथा -48*
*जिण देवो होदु सदा मई सु जिणसासणे सया होऊ।*
*सण्णासेण य मरणं भवे भवे मज्झ संपदओ।।48।।*
*अर्थ -* _मैं श्री जिनेन्द्र की ही सदा सेवा करता रहूं। श्री जिनेन्द्र देव के सिवाय अन्य किसी देव को न मानूं। मेरी बुद्धि सदा जिन-शासन में,जिन धर्म में बनी रहे। जैन-धर्म को छोड़कर अन्य किसी धर्म में मेरी बुद्धि न जाय। मेरा मरण सदा समाधि पूर्वक ही हो। समाधि-मरण के सिवाय अन्य मरण न हो। यह सम्पत्ति मुझे भव-भव में प्राप्त हो।_
*गाथा -49*
*जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणो जिणो।*
*दयाधम्मो दयाधम्मो दयाधम्मो दया सदा।।49।।*
*अर्थ -* _इस संसार में देव जिन ही है,देव जिन ही है,देव जिन ही है, भगवान् जिनेन्द्र देव अरहंत देव ही देव हैं। अन्य कोई देव,देव नहीं है। धर्म दया रुप ही है, धर्म दयामय ही है,धर्मदया ही है। धर्म सदा दयामय ही होता है, दया के सिवाय अन्य कोई धर्म हो ही नहीं सकता।_
*गाथा -50*
*महासाहू महासाहू महासाहू दिगंबरा।*
*एवं तच्च सया हुज्ज जावण्णो मुक्ति संगमो।।50।।*
*अर्थ -* _महा साधु नग्न दिगंबर महर्षि होते हैं। महा साधु दिगंबर जैन मुनीश्वर होते हैं,महा साधु दिगंबर ही होते हैं। हे प्रभो ! जब तक मुझे मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक मेरे ह्रदय में यही तत्त्व सदा बना रहे - अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति पर्यंत जिनेन्द्र देव,दया-मय धर्म एवं निर्ग्रंथ साधु के प्रति मेरी अटल श्रद्धा रहे।_
*गाथा -51*
*एवमेव गओ कालो अणंतो दुक्ख संगमे।*
*जिणोवदिट्ठ सण्णा से ण यत्ता रोहणा कया।।51।।*
*अर्थ -* _आज तक मेरा अनंतकाल दुःख भोगते हुए व्यर्थ बीत गया। मैंने अब तक भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए समाधि मरण के लिए कभी प्रयत्न नहीं किया।_
*गाथा -52*
*संपइ एव संपत्ताराहणा जिण देसिया।*
*किं किं ण जायदे मज्झ सिद्धि संदोह संपई।।53।।*
*अर्थ -* _हे प्रभो ! महान् पुण्योदय से इस समय मुझे भगवान् जिनेन्द्र देव की कही हुई आराधना से प्राप्त हुई है। इसके प्राप्त हो जाने से अब इस संसार में ऐसी कौन-सी सिद्धि अथवा सम्पत्ति है जो मुझे प्राप्त न हो अर्थात् अब इन आराधनाओं के पालन करने से मुझे समस्त सिद्धियां अवश्य प्राप्त हो जायेंगी। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।_
*गाथा -53*
*अहो धम्म महो धम्मं अहो मे लद्धि णिम्मला।*
*संजदा संपया सारा जेण सुक्ख मणू पमं।।53।।*
*अर्थ -* _हे प्रभो ! आपके द्वारा कहा हुआ दया रुपी धर्म बड़ा ही आश्चर्य कारक है। यह धर्म सबसे उत्कृष्ट है व सर्वोत्तम है, इसकी मुझे जो प्राप्ति हुई है अत्यंत आश्चर्य उत्पन्न करने वाली है। इस निर्मल काल लब्धि एवं महान् पुण्योदय के प्रसाद से ही मुझे आराधना रुपी सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त हुई है जिसके द्वारा ही मुझे मोक्ष का अनुपम सुख अवश्य प्राप्त होगा।_
*गाथा -54*
*एवं आराहंतो आलोयणवंदणा पडिक्कमणं।*
*पावइ फलं च तेसिं णिद्दिट्ठं अजियवम्मेण।।54।।*
*अर्थ -* _इस प्रकार आलोचना, वंदना और प्रतिक्रमण की आराधना करने से भगवान् जिनेन्यद्र देव का कहा हुआ मोक्ष फल अवश्य प्राप्त होता है।_
*।। इति श्री कल्याणालोचना सम्पूर्णम्।।*
(दोहा)
वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर नाय |
कहूं काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाये ||
(चौपाई)
अष्टापद आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि |
नेमिनाथ स्वामी गिरनार, वन्दौं भाव भगति उर धार ||1||
चरम तीर्थकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामि महावीर |
शिखर समेद जिनेसुर बीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||2||
वरदत्तराय रु इन्द मुनिंद, सायरदत्त आदि गुणवृन्द |
नगर तारवर मुनि उठकोडी, वन्दौं भाव सहित कर जोडी ||3||
श्रीगिरनार शिखर विख्यात, कोडी बहत्तर अरु सौ सात |
सम्बु प्रद्युम्न कुमर द्वै भाय, अनिरुध आदि नमूं तसु पाय ||4||
रामचन्द्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुणधीर |
पांच कोडी मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि वन्दौं निरधार ||5||
पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोडी मुनि मुक्ति पयान |
श्रीशत्रुंजय के सीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||6||
जे बलभद्र मुक्ति में गये, आठ कोडी मुनि औरहू भये |
श्रीगजपन्थ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ||7||
राम हणु सुग्रीव सुडील, गव गवाख्य नील महानील |
कोडी निन्याणव मुक्ति पयान, तुंगीगिरि वन्दौं धरि ध्यान ||8||
नंग अनंग कुमार सुजान, पांच कोडी अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये सोनागिरि शीस, ते वन्दौं त्रिभुवन पति ईस ||9||
रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये रेवा तट सार |
कोटि पंच और लाख पचास, ते वन्दौंधरि परम हुलास ||10||
रेवानदी सिद्धवर कूट, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वे चक्री दश कामकुमार, उठकोडी वन्दौं भव पार ||11||
बडवानी बडनयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरि चूल उतंग |
इन्द्रजीत अरु कुम्भ जो कर्ण, ते वन्दौं भव सागर तरण ||12||
सुवरणभद्र आदि मुनि चार, पावागिरि वर शिखर मंझार |
चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गये नित वन्दौं नित तास ||13||
फलहोडी बडगाम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप |
गुरुदत्तादी मुनिसुर जहाँ, मुक्ति गये वन्दौं नित तहां ||14||
बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्रीअष्टापद मुक्ति मंझार, ते वन्दौं नित सुरत सँभार ||15||
अचलापुर की दिश ईसान, तहां मेढगिरि नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोडी मुनिराय, तिनके चरण नमूं चित लाय ||16||
वंसस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुंथुगिरी सोय |
कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूं प्रणाम ||17||
जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पांच सौ लहे |
कोटिशिला मुनि कोडी प्रमान, वन्दन करूं जोरि जग पान ||18||
समवशरण श्री पार्श्व जिनन्द, रेसिन्दीगिरि नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराय, ते वन्दौं नित धरम जिहाज ||19||
मथुरा पुर पवित्र उद्यान, जंबूस्वामी जी निर्वाण ।
चरम केवली पंचम काल।
ते बंदो नित दीन दयाल।।20।।
तीन लोक ते तीरथ जहाँ, नित प्रति वन्दन कीजै तहां |
मन-वच-काय सहित सिर नाय, वन्दन करहिं भविक गुण गाय ||20||
संवत सतरह सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
भक्त वन्दन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||21 |
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2026-04-11 11:59:10 |
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| 77032 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*दीपीका दिलखुश जैन?*
*?जय जिनेन्द्र जी सभी को*?
*?♀️जिनागम 1वाणी पाठशालाएं*
??????
*अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठि के* *चरणो में कोटि-कोटि नमन*
?????
*जैन धर्म बढे चलो*
?????
???????
? *सभी दिंगबर जैन साधुओं और माताजी ,ऐलक जी, क्षूलक जी, क्षूलिका जी , त्यागी व्रती, भट्टाकरक जी सभी के निर्विघ्न आहार हो ये भावनाएं भाती हूं जी।*????????
*?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरूवे नमो नमः* ????
*आचार्य श्री संभव सागराय नमः*
????
*आचार्य गुरूदेव विद्यासागराय नमः*
????
*?आर्यिका श्री उदित मति माताजी के चरणों में नमः।*
*?जय जिनेंद्र जी सभी को*
???????
*चौबीस भगवान के चरणों में कोटि-कोटि नमन*
??????
*?♀️ॐ ह्रीं श्रुतज्ञान प्राप्ताये गणिनी श्री प्रमुख ज्ञानमती मात्रे नमः*
*↪️ज्ञानमती माताजी के चरणों में कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम*
??????❤️❤️❤️
? *आज के नियम*
*?️?दिए गए सभी नियम आप जब ले रहे तब से 24 घंटे का है जी*
???????
1️⃣आज ? भारत से बाहर जाने का त्याग है जी ।
बीत चीत करने को छोड़कर ।
आज? 100किलोमीटर की यात्रा छोड़कर बाकी सभी दिशाओं का त्याग है जी।
*?जो जो अपने अपने स्थान से बाहर जाते है अपने हिसाब से किलोमीटर का नियम ले सकते हैं जी।*
आज ?देव दर्शन करने का नियम है जी जैसे सुविधाएं उपलब्ध हैं जी।
या
आज ? आहार देने या देखने का नियम है जी।
?आज एक नियम अपने मन से लेवे जी।
मेरा नियम मन से वाला है
? आज ? होटल में खाने का त्याग है जी।
???♂️?♀️?♂️
2️⃣??आज 20वस्त्र छोड़कर बाकी सभी के त्याग है। आज पहनने के लिए।
???♀️?♂️?♀️?♂️
3️⃣?? आज पांच मिठाई छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
???♀️?♂️?♀️?♂️
4️⃣??आज बीस हरी छोड़कर बाकी सबके त्याग है।
???♀️?♂️?♀️?
5️⃣??शांति नाथ भगवान जी तीर्थंकर की जाप
*?? ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय जगत् शांति कराय सर्वोपद्रव शांतिं कुरु कुरु ह्रीं नम: स्वाहा:*
*?नो बार जाप*
*?या एक माला*
*?ॐ ह्र णमो लोए सव्वसाहुणं*
*की एक माला करने का नियम है*
*? ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वसिद्धायदणाणं मनोवांछित सिद्धि दायकं भवतु स्वाहा:*
*?एक माला या नो बार जाप*
???????
*?एक माला या नो बार करे जी*
?????????
6️⃣??आज पांच घर जाने की छोडकर बाकी सबके त्याग है।
?आज पांच बिस्तर ,पांच पंलग छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
???♀️?♂️?♀️?♂️
7️⃣??आज दशों दिशा में जितना आवागमन होता है। उसको छोड़कर बाकी बची सभी दिशाओं का आवागमन का त्याग रहेगा ।
???♀️?♂️?♀️?♂️
8️⃣ ??आज 20 मिनट, या 10मिनट स्वाध्याय करने का नियम है।
???♀️?♂️?♀️?♂️
9️⃣??आज जमीकंद में पाच वस्तुए छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी।
*? बीस प्रकार के अनाज, धान*
*छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी*
*भूल चूक माफ ।*
???♀️?♂️?♀️?♂️
???20मिनट या 30 मिनट ,या 10, मिनट का मोन का नियम है।
???♀️?♀️?♀️?♂️
1️⃣1️⃣? आज? निर्वाण कांड भाषा पढ़ने का नियम है जी।
या
आज ? कल्याण आलोचना पाठ पढने का नियम है जी।
???♀️?♂️?♀️?♂️
??????
*यथा शक्ति नियम पालन करते*??
*आज वैशाख कृष्ण नवमी*
??????
सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ?
?छोटे से छोटे से भी नियम मुक्ति मिल सकती ह।
*?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे*
??????
*नोट:? एक नियम भी*
*पालन कर सकते ह जी*
?????
*एडमिन*
*दीपीका दिलखुश जैन*
*बैंगलोर कर्नाटक*
???????
*सानिध्य भी हम सभी का*
*पुरुसार्थ भी हम सभी का*
??????? |
|
2026-04-11 11:59:08 |
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| 77031 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*दीपीका दिलखुश जैन?*
*?जय जिनेन्द्र जी सभी को*?
*?♀️जिनागम 1वाणी पाठशालाएं*
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*अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठि के* *चरणो में कोटि-कोटि नमन*
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*जैन धर्म बढे चलो*
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? *सभी दिंगबर जैन साधुओं और माताजी ,ऐलक जी, क्षूलक जी, क्षूलिका जी , त्यागी व्रती, भट्टाकरक जी सभी के निर्विघ्न आहार हो ये भावनाएं भाती हूं जी।*????????
*?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरूवे नमो नमः* ????
*आचार्य श्री संभव सागराय नमः*
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*आचार्य गुरूदेव विद्यासागराय नमः*
????
*?आर्यिका श्री उदित मति माताजी के चरणों में नमः।*
*?जय जिनेंद्र जी सभी को*
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*चौबीस भगवान के चरणों में कोटि-कोटि नमन*
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*?♀️ॐ ह्रीं श्रुतज्ञान प्राप्ताये गणिनी श्री प्रमुख ज्ञानमती मात्रे नमः*
*↪️ज्ञानमती माताजी के चरणों में कोटी कोटी नमन बारम्बार प्रणाम*
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? *आज के नियम*
*?️?दिए गए सभी नियम आप जब ले रहे तब से 24 घंटे का है जी*
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1️⃣आज ? भारत से बाहर जाने का त्याग है जी ।
बीत चीत करने को छोड़कर ।
आज? 100किलोमीटर की यात्रा छोड़कर बाकी सभी दिशाओं का त्याग है जी।
*?जो जो अपने अपने स्थान से बाहर जाते है अपने हिसाब से किलोमीटर का नियम ले सकते हैं जी।*
आज ?देव दर्शन करने का नियम है जी जैसे सुविधाएं उपलब्ध हैं जी।
या
आज ? आहार देने या देखने का नियम है जी।
?आज एक नियम अपने मन से लेवे जी।
मेरा नियम मन से वाला है
? आज ? होटल में खाने का त्याग है जी।
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2️⃣??आज 20वस्त्र छोड़कर बाकी सभी के त्याग है। आज पहनने के लिए।
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3️⃣?? आज पांच मिठाई छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
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4️⃣??आज बीस हरी छोड़कर बाकी सबके त्याग है।
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5️⃣??शांति नाथ भगवान जी तीर्थंकर की जाप
*?? ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय जगत् शांति कराय सर्वोपद्रव शांतिं कुरु कुरु ह्रीं नम: स्वाहा:*
*?नो बार जाप*
*?या एक माला*
*?ॐ ह्र णमो लोए सव्वसाहुणं*
*की एक माला करने का नियम है*
*? ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वसिद्धायदणाणं मनोवांछित सिद्धि दायकं भवतु स्वाहा:*
*?एक माला या नो बार जाप*
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*?एक माला या नो बार करे जी*
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6️⃣??आज पांच घर जाने की छोडकर बाकी सबके त्याग है।
?आज पांच बिस्तर ,पांच पंलग छोड़कर बाकी सभी के त्याग है।
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7️⃣??आज दशों दिशा में जितना आवागमन होता है। उसको छोड़कर बाकी बची सभी दिशाओं का आवागमन का त्याग रहेगा ।
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8️⃣ ??आज 20 मिनट, या 10मिनट स्वाध्याय करने का नियम है।
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*? बीस प्रकार के अनाज, धान*
*छोड़कर बाकी सभी के त्याग है जी*
*भूल चूक माफ ।*
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???20मिनट या 30 मिनट ,या 10, मिनट का मोन का नियम है।
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1️⃣1️⃣? आज? निर्वाण कांड भाषा पढ़ने का नियम है जी।
या
आज ? कल्याण आलोचना पाठ पढने का नियम है जी।
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*यथा शक्ति नियम पालन करते*??
*आज वैशाख कृष्ण नवमी*
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सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ?
?छोटे से छोटे से भी नियम मुक्ति मिल सकती ह।
*?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे*
??????
*नोट:? एक नियम भी*
*पालन कर सकते ह जी*
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*एडमिन*
*दीपीका दिलखुश जैन*
*बैंगलोर कर्नाटक*
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*सानिध्य भी हम सभी का*
*पुरुसार्थ भी हम सभी का*
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2026-04-11 11:59:07 |
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| 77030 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*हे भगवान संसार के सभी जीव सुखी रहें* *कोई दुखी ना रहें , अनाथ न रहें ,असहाय न, रहें पीड़ित ना रहें ,रोगी ना रहें ,सभी निरोग रहें ।*
*सभी आचार्य,उपाध्याय, सर्व साधु,* *आर्यिका, ऐलक , क्षुल्लक, क्षुल्लिका जी*
*व्रती ,महाव्रती भट्टारक जी के*
*सभी के निरंतराय आहार हों ,सभी* *स्वस्थ रहें ,सभी के द्वारा जिनधर्म की*
*दिन दूनी रात चौगुनी धर्म की प्रभावना हो*
*मैं यही भावना भाती हूंँ।*
*सारे संसार में ,देश में, राष्ट्र में ,समाज में,*
*घर में, परिवार में सुख, शांति, समृद्धि हो मुझे भी ,शक्ति दो ,भक्ति दो ,शांति दो,समृद्धि दो, चारित्र दो ,स्वास्थ्य दो, संकल्प दो जिससे आत्म कल्याण के साथ साथ दूसरों का भी कल्याण कर सकूँ*
*यही भावना भाती हूँ जी।*
??????
???????
???????
अनंतानंत सिद्ध परपेष्ठी के चरणों में मेरा
कोटि-कोटि प्रणाम नमन?????????????
पंच परमेष्ठी के चरणों मे कोटी कोटी नमन?????????????
नवदेवता के चरणों में बारम्बार प्रणाम नमन?????????????????????
बारह अंग चौदह पूर्वांग को धारण करने वाली सरस्वती माता को कोटी कोटी नमन
मुझें भी ज्ञानप्रदान करें
????????????
ढाई दीप मे समस्त साधु परमेष्ठि को मेरा नमन कोटि-कोटि नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु????????????????
???????
समस्त आर्यिका श्री को वन्दामि
समस्त ऐलक क्षुल्लक क्षुल्लिका को इच्छामि कोटी नमन
????????????????
त्यागी व्रती भैयाजी और दीदी जी को वंदना ??????
सभी के निरंतराय आहार हो सभी का मंगल हो
सभी को सादर जय जिनेन्द्र जी
?????????????????????
सभी के दिन और रात मंगलमय हों???????????
सुप्रभात हों सभी के ?????????????
??
पंच परमेष्ठी भगवंतों को नमन
?????
संसार में जितने भी सम्यक्तवी आत्मा है उनको मेरा नमन है??????
चराचर जीव जगत के अनंतानंत
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जीवात्माओं से उत्तम क्षमा
?? ??? ??? ???
हे भगवान आज का दिन दिखाने के लिए धन्यवाद
धन्यवाद
धन्यवाद???????????
सभी से मेरी मैत्री हो
सभी मेरे मित्र है
????
?????
*हे भगवान!आपकी असीम कृपा से प्रातः काल की ??????*
❤️❤️❤️❤️❤️❤️???* *पावन बेला में ये भावना भाते है* *संसार में जितने भी रत्नत्रय धारी* *आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु हैं सभी के रत्नत्रय की पूर्णता हो और जो रत्नत्रय धारण करना चाहते हैं उनको रत्नत्रय की प्राप्ती हो जाए तथा शेष जितने जीव हैं*???
*उन सबके योग्यतानुसार क्रम से रत्नत्रय धारण करने के भाव हो जाए यही भगवान से प्रार्थना करती हूँ जी*
??????????
*धन्यवाद* *धन्यवाद* *धन्यवाद*
?????????
मे एक एसा जादू है जो समस्त संसार में प्यार आशीर्वाद बनाए रखता है।
*धन्यवाद*????
उन लोगों का जो मुझसे नफ़रत करते है " क्यो की उन्होंने मुझे मजबूत बनाया "
*धन्यवाद*???
उन लोगों का जो मुझसे प्यार करते है " क्यो की उन्होंने मेरा दिल बड़ा कर दिया "
*धन्यवाद* ????
उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए " और मुझे बताया दर असल वो मेरा बहुत ख्याल रखते है "
*धन्यवाद* ???
उन लोगों का जिन्होंने मुझे अपना बनाकर छोड़ दिया " और मुझे अहसास दिलाया की दुनिया में हर चीज आखरी नही "
*धन्यवाद*??
उन लोगों का जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए " और मुझे ऐसा बना दिया जैसा सोचा भी ना था "
*और सबसे ज्यादा धन्यवाद मेरे ईश्वर का* ???
जिसने मुझे हालात का सामना करने की हिम्मत दी
????
*धन्यवाद*
आप सभी का जो मुझे आपके साथ रहने का मोका मिला जी
????? |
|
2026-04-11 11:59:05 |
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| 77029 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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*हे भगवान संसार के सभी जीव सुखी रहें* *कोई दुखी ना रहें , अनाथ न रहें ,असहाय न, रहें पीड़ित ना रहें ,रोगी ना रहें ,सभी निरोग रहें ।*
*सभी आचार्य,उपाध्याय, सर्व साधु,* *आर्यिका, ऐलक , क्षुल्लक, क्षुल्लिका जी*
*व्रती ,महाव्रती भट्टारक जी के*
*सभी के निरंतराय आहार हों ,सभी* *स्वस्थ रहें ,सभी के द्वारा जिनधर्म की*
*दिन दूनी रात चौगुनी धर्म की प्रभावना हो*
*मैं यही भावना भाती हूंँ।*
*सारे संसार में ,देश में, राष्ट्र में ,समाज में,*
*घर में, परिवार में सुख, शांति, समृद्धि हो मुझे भी ,शक्ति दो ,भक्ति दो ,शांति दो,समृद्धि दो, चारित्र दो ,स्वास्थ्य दो, संकल्प दो जिससे आत्म कल्याण के साथ साथ दूसरों का भी कल्याण कर सकूँ*
*यही भावना भाती हूँ जी।*
??????
???????
???????
अनंतानंत सिद्ध परपेष्ठी के चरणों में मेरा
कोटि-कोटि प्रणाम नमन?????????????
पंच परमेष्ठी के चरणों मे कोटी कोटी नमन?????????????
नवदेवता के चरणों में बारम्बार प्रणाम नमन?????????????????????
बारह अंग चौदह पूर्वांग को धारण करने वाली सरस्वती माता को कोटी कोटी नमन
मुझें भी ज्ञानप्रदान करें
????????????
ढाई दीप मे समस्त साधु परमेष्ठि को मेरा नमन कोटि-कोटि नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु????????????????
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समस्त आर्यिका श्री को वन्दामि
समस्त ऐलक क्षुल्लक क्षुल्लिका को इच्छामि कोटी नमन
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त्यागी व्रती भैयाजी और दीदी जी को वंदना ??????
सभी के निरंतराय आहार हो सभी का मंगल हो
सभी को सादर जय जिनेन्द्र जी
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सभी के दिन और रात मंगलमय हों???????????
सुप्रभात हों सभी के ?????????????
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पंच परमेष्ठी भगवंतों को नमन
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संसार में जितने भी सम्यक्तवी आत्मा है उनको मेरा नमन है??????
चराचर जीव जगत के अनंतानंत
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जीवात्माओं से उत्तम क्षमा
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हे भगवान आज का दिन दिखाने के लिए धन्यवाद
धन्यवाद
धन्यवाद???????????
सभी से मेरी मैत्री हो
सभी मेरे मित्र है
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*हे भगवान!आपकी असीम कृपा से प्रातः काल की ??????*
❤️❤️❤️❤️❤️❤️???* *पावन बेला में ये भावना भाते है* *संसार में जितने भी रत्नत्रय धारी* *आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु हैं सभी के रत्नत्रय की पूर्णता हो और जो रत्नत्रय धारण करना चाहते हैं उनको रत्नत्रय की प्राप्ती हो जाए तथा शेष जितने जीव हैं*???
*उन सबके योग्यतानुसार क्रम से रत्नत्रय धारण करने के भाव हो जाए यही भगवान से प्रार्थना करती हूँ जी*
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*धन्यवाद* *धन्यवाद* *धन्यवाद*
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मे एक एसा जादू है जो समस्त संसार में प्यार आशीर्वाद बनाए रखता है।
*धन्यवाद*????
उन लोगों का जो मुझसे नफ़रत करते है " क्यो की उन्होंने मुझे मजबूत बनाया "
*धन्यवाद*???
उन लोगों का जो मुझसे प्यार करते है " क्यो की उन्होंने मेरा दिल बड़ा कर दिया "
*धन्यवाद* ????
उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए " और मुझे बताया दर असल वो मेरा बहुत ख्याल रखते है "
*धन्यवाद* ???
उन लोगों का जिन्होंने मुझे अपना बनाकर छोड़ दिया " और मुझे अहसास दिलाया की दुनिया में हर चीज आखरी नही "
*धन्यवाद*??
उन लोगों का जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए " और मुझे ऐसा बना दिया जैसा सोचा भी ना था "
*और सबसे ज्यादा धन्यवाद मेरे ईश्वर का* ???
जिसने मुझे हालात का सामना करने की हिम्मत दी
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*धन्यवाद*
आप सभी का जो मुझे आपके साथ रहने का मोका मिला जी
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2026-04-11 11:59:04 |
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