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234944 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Any one 2026-06-16 13:05:45
234945 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Any one 2026-06-16 13:05:45
234942 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Please write me address of karntak bhawan 2026-06-16 13:05:30
234943 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Please write me address of karntak bhawan 2026-06-16 13:05:30
234941 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?✨ *तात्त्विक चिंतन* ✨? ?️ *मेरा वास्तविक परिचय* ?️ --- 1️⃣ ? *आत्मा का वास्तविक स्वरूप* ? मैं आत्मा हूँ। मैं कर्मों (द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म) से सर्वथा भिन्न हूँ। मेरा शुद्ध स्वरूप कर्मों के आवरण से परे, स्वतंत्र और निर्मल है। ? *चिंतन:* "मैं कर्म नहीं, कर्मों का ज्ञाता हूँ।" --- 2️⃣ ? *आत्मा नित्य और शुद्ध है* ✨ कर्मों का आवरण हट जाने पर आत्मा अपने स्वाभाविक, अखण्ड और शुद्ध रूप में प्रकाशित होती है। यह स्वरूप न कभी उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है। ? *चिंतन:* "शुद्धता मेरा स्वभाव है, अशुद्धि केवल आगन्तुक है।" --- 3️⃣ ?️ *आत्मा की स्वतंत्र सत्ता* आत्मा इन चारों से भिन्न है— ? परद्रव्य – दूसरे पदार्थ ? परक्षेत्र – दूसरा स्थान ? परकाल – दूसरा समय ? परभाव – दूसरे के भाव ✨ आत्मा अपनी स्वतंत्र सत्ता रखती है। ? *चिंतन:* "मैं किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं हूँ।" --- 4️⃣ ? *बन्ध और मोक्ष आत्मा का शुद्ध स्वरूप नहीं* निश्चय नय से आत्मा न बंधी हुई है और न मुक्त। बन्ध और मोक्ष उसकी अवस्थाएँ (पर्यायें) हैं, आत्मा का शाश्वत स्वभाव नहीं। ? *चिंतन:* "मेरा शुद्ध स्वरूप सदैव मुक्त है।" --- 5️⃣ ? *सिद्ध भगवान के समान शुद्ध* ? आत्मा का वास्तविक स्वरूप वही है जो सिद्ध भगवान का है। अन्तर केवल कर्मों के आवरण का है। ? *चिंतन:* "मुझमें भी सिद्धत्व की पूर्ण संभावना विद्यमान है।" --- 6️⃣ ? *आत्मा का स्वभाव* ✅ अपने द्रव्य में स्थित ✅ अपने क्षेत्र में स्थित ✅ अपने काल में स्थित ✅ अपने स्वभाव में स्थित ✨ आत्मा सदैव अखण्ड रहती है। ? *चिंतन:* "अपने स्वरूप में स्थित होना ही आत्मधर्म है।" --- 7️⃣ ?‍♂️ *आत्मा केवल शरीर नहीं* यह शरीर बदलता है, पर आत्मा नहीं बदलती। जन्म और मृत्यु शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। ? *चिंतन:* "मैं शरीर नहीं, शरीर का जानने वाला हूँ।" --- 8️⃣ ? *ज्ञान-दर्शन आत्मा के गुण हैं* ज्ञान, दर्शन और चारित्र आत्मा के गुण हैं। आत्मा इन गुणों का आधार है। ? *चिंतन:* "ज्ञान मेरा स्वभाव है, अज्ञान मेरा स्वरूप नहीं।" --- 9️⃣ ?️ *ज्ञायक-द्रष्टा स्वरूप* आत्मा का मुख्य लक्षण है— ? जानना ? देखना ✨ आत्मा ज्ञायक और द्रष्टा है। ? *चिंतन:* "मैं केवल जानने और देखने वाला शुद्ध साक्षी हूँ।" --- ? ? *केवलज्ञान की प्राप्ति* जब समस्त कर्मों का क्षय हो जाता है, तब आत्मा में— ? अनन्त ज्ञान ? अनन्त दर्शन ? अनन्त सुख ? अनन्त वीर्य पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। ? *चिंतन:* "मेरे भीतर केवलज्ञान का सूर्य विद्यमान है।" --- 1️⃣1️⃣ ♾️ *स्वयं सिद्ध सत्ता* आत्मा अनादि है, अनन्त है और स्वयं सिद्ध है। इसके अस्तित्व के लिए किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। ? *चिंतन:* "मैं शाश्वत चेतना हूँ।" --- 1️⃣2️⃣ ? *भगवान स्वरूप* आत्मा में अनन्त गुण विद्यमान हैं। जब वे पूर्ण रूप से प्रकट हो जाते हैं, तब वही आत्मा भगवान कहलाती है। ? *चिंतन:* "भगवान बनने की क्षमता मेरे भीतर ही है।" --- ?✨ *सार तत्त्व* ✨? ?️ मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ। ?️ मैं कर्मों से भिन्न हूँ। ?️ मेरा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, नित्य और अखण्ड है। ?️ मैं ज्ञायक-द्रष्टा हूँ। ?️ मुझमें अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और शक्ति की क्षमता है। ?️ कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर मैं सिद्ध भगवान के समान बन सकता हूँ। --- ? *आत्मभावना*? ? *मैं शुद्ध आत्मा हूँ।* ? *मैं ज्ञायक-द्रष्टा हूँ।* ? *मैं अनन्त शक्ति का स्रोत हूँ।* ? *मैं सिद्धत्व का अधिकारी हूँ।* ? *मेरा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।* ✨ *"नाहं देहो, न मे देहो — अहं शुद्ध आत्मा अस्मि।* ✨ ? *तात्त्विक चिंतन एवं आत्मभावना* ✍️ *राजेश जैन, मैनपुरी*?? 2026-06-16 13:04:55
234940 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?✨ *तात्त्विक चिंतन* ✨? ?️ *मेरा वास्तविक परिचय* ?️ --- 1️⃣ ? *आत्मा का वास्तविक स्वरूप* ? मैं आत्मा हूँ। मैं कर्मों (द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म) से सर्वथा भिन्न हूँ। मेरा शुद्ध स्वरूप कर्मों के आवरण से परे, स्वतंत्र और निर्मल है। ? *चिंतन:* "मैं कर्म नहीं, कर्मों का ज्ञाता हूँ।" --- 2️⃣ ? *आत्मा नित्य और शुद्ध है* ✨ कर्मों का आवरण हट जाने पर आत्मा अपने स्वाभाविक, अखण्ड और शुद्ध रूप में प्रकाशित होती है। यह स्वरूप न कभी उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है। ? *चिंतन:* "शुद्धता मेरा स्वभाव है, अशुद्धि केवल आगन्तुक है।" --- 3️⃣ ?️ *आत्मा की स्वतंत्र सत्ता* आत्मा इन चारों से भिन्न है— ? परद्रव्य – दूसरे पदार्थ ? परक्षेत्र – दूसरा स्थान ? परकाल – दूसरा समय ? परभाव – दूसरे के भाव ✨ आत्मा अपनी स्वतंत्र सत्ता रखती है। ? *चिंतन:* "मैं किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं हूँ।" --- 4️⃣ ? *बन्ध और मोक्ष आत्मा का शुद्ध स्वरूप नहीं* निश्चय नय से आत्मा न बंधी हुई है और न मुक्त। बन्ध और मोक्ष उसकी अवस्थाएँ (पर्यायें) हैं, आत्मा का शाश्वत स्वभाव नहीं। ? *चिंतन:* "मेरा शुद्ध स्वरूप सदैव मुक्त है।" --- 5️⃣ ? *सिद्ध भगवान के समान शुद्ध* ? आत्मा का वास्तविक स्वरूप वही है जो सिद्ध भगवान का है। अन्तर केवल कर्मों के आवरण का है। ? *चिंतन:* "मुझमें भी सिद्धत्व की पूर्ण संभावना विद्यमान है।" --- 6️⃣ ? *आत्मा का स्वभाव* ✅ अपने द्रव्य में स्थित ✅ अपने क्षेत्र में स्थित ✅ अपने काल में स्थित ✅ अपने स्वभाव में स्थित ✨ आत्मा सदैव अखण्ड रहती है। ? *चिंतन:* "अपने स्वरूप में स्थित होना ही आत्मधर्म है।" --- 7️⃣ ?‍♂️ *आत्मा केवल शरीर नहीं* यह शरीर बदलता है, पर आत्मा नहीं बदलती। जन्म और मृत्यु शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। ? *चिंतन:* "मैं शरीर नहीं, शरीर का जानने वाला हूँ।" --- 8️⃣ ? *ज्ञान-दर्शन आत्मा के गुण हैं* ज्ञान, दर्शन और चारित्र आत्मा के गुण हैं। आत्मा इन गुणों का आधार है। ? *चिंतन:* "ज्ञान मेरा स्वभाव है, अज्ञान मेरा स्वरूप नहीं।" --- 9️⃣ ?️ *ज्ञायक-द्रष्टा स्वरूप* आत्मा का मुख्य लक्षण है— ? जानना ? देखना ✨ आत्मा ज्ञायक और द्रष्टा है। ? *चिंतन:* "मैं केवल जानने और देखने वाला शुद्ध साक्षी हूँ।" --- ? ? *केवलज्ञान की प्राप्ति* जब समस्त कर्मों का क्षय हो जाता है, तब आत्मा में— ? अनन्त ज्ञान ? अनन्त दर्शन ? अनन्त सुख ? अनन्त वीर्य पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। ? *चिंतन:* "मेरे भीतर केवलज्ञान का सूर्य विद्यमान है।" --- 1️⃣1️⃣ ♾️ *स्वयं सिद्ध सत्ता* आत्मा अनादि है, अनन्त है और स्वयं सिद्ध है। इसके अस्तित्व के लिए किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। ? *चिंतन:* "मैं शाश्वत चेतना हूँ।" --- 1️⃣2️⃣ ? *भगवान स्वरूप* आत्मा में अनन्त गुण विद्यमान हैं। जब वे पूर्ण रूप से प्रकट हो जाते हैं, तब वही आत्मा भगवान कहलाती है। ? *चिंतन:* "भगवान बनने की क्षमता मेरे भीतर ही है।" --- ?✨ *सार तत्त्व* ✨? ?️ मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ। ?️ मैं कर्मों से भिन्न हूँ। ?️ मेरा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, नित्य और अखण्ड है। ?️ मैं ज्ञायक-द्रष्टा हूँ। ?️ मुझमें अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और शक्ति की क्षमता है। ?️ कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर मैं सिद्ध भगवान के समान बन सकता हूँ। --- ? *आत्मभावना*? ? *मैं शुद्ध आत्मा हूँ।* ? *मैं ज्ञायक-द्रष्टा हूँ।* ? *मैं अनन्त शक्ति का स्रोत हूँ।* ? *मैं सिद्धत्व का अधिकारी हूँ।* ? *मेरा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।* ✨ *"नाहं देहो, न मे देहो — अहं शुद्ध आत्मा अस्मि।* ✨ ? *तात्त्विक चिंतन एवं आत्मभावना* ✍️ *राजेश जैन, मैनपुरी*?? 2026-06-16 13:04:54
234939 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-16 13:04:16
234938 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-16 13:04:15
234936 40449688 3. विद्या शिरोमणि आचार्य श्री समयसागर जी 2026-06-16 13:02:41
234937 40449688 3. विद्या शिरोमणि आचार्य श्री समयसागर जी 2026-06-16 13:02:41