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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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? *तात्विक चिंतन* ?
✨ *आत्मचिंतन — स्वरूप की ओर लौटने का आह्वान* ✨
बाहर जो कुछ भी दिखाई देता है — ? *वस्तुएँ, ? संबंध, ? शरीर, ? परिस्थितियाँ* — वास्तव में वे सब हमसे अलग (छुटे हुए) ही हैं।
हम उन्हें वास्तव में ग्रहण कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे *हमारे स्वभाव का हिस्सा नहीं हैं*।
फिर भी, जब मन भाव से उनमें एकत्व कर लेता है —
*“यह मेरा है”, “यह मुझसे दूर न हो”* —
यही भावना ग्रहण (स्वामित्व) कहलाती है।
? *वस्तु को पकड़ना ग्रहण नहीं है,*
? *भाव से अपना मान लेना ही ग्रहण है*। ?
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✨ *वैराग्य का वास्तविक अर्थ* ✨
यदि अभी इतनी वितरागता नहीं आई कि हम *बाहरी संयोगों को व्यवहार में छोड़ सकें*,
तो भी कम से कम श्रद्धा तो यही होनी चाहिए —
कि *यह सब नश्वर है, अलग है, और छोड़ने योग्य ही* है। ⏳
स्थिर रहने योग्य यदि कुछ है, तो केवल —
?️ *चैतन्य स्वरूप आत्मतत्व*
बाकी सब तो *संयोग है*, और संयोग का धर्म ही है —
? *आना और जाना।*
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? *परपदार्थ से छूटने का उपाय* ?
परपदार्थों में रहते हुए भी यदि मन में उपेक्षा भाव आ जाए —
न आकर्षण ❌ न घृणा ❌ *केवल साक्षी भाव* ?️ —
तो वही उनसे छूटने का वास्तविक उपाय है।
जब तक —
❤️ *शरीर से प्रीति रहेगी*
? *पुण्य (सुखद परिस्थितियों) से प्रीति रहेगी*
⏰ *एक क्षणिक अवस्था से भी अपनत्व रहेगा*
तब तक त्याग की भावना उत्पन्न ही नहीं हो सकती।
क्योंकि त्याग वहीं संभव है, जहाँ *अपनापन समाप्त* हो।
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? *ज्ञानी का संदेश* ?
ज्ञानी हमें वस्तुओं को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं करते,
वे कहते हैं — *प्रीति छोड़ो।*
और प्रीति छोड़ने का उपाय क्या है?
? *अपने आत्मस्वरूप में प्रीति करना*। ?
जब आत्मा में रस आ जाता है,
तो संसार अपने आप फीका पड़ जाता है।
यह नियम है —
? *जहाँ सच्चा प्रेम जागता है*,
वहाँ झूठा प्रेम स्वतः छूट जाता है।
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✨ *अंतिम सत्य* ✨
परपदार्थ को छोड़ने से हमारा कुछ नहीं जाता,
बल्कि उल्टा —
*हम अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं*। ?
जो बाहर छोड़ता है, वह खाली नहीं होता —
वह भीतर भर जाता है।
? *स्वरूप की प्राप्ति ही जीवन का वास्तविक लाभ है।* ?
— ✍️ *राजेश जैन मैनपुरी* |
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2026-02-16 05:11:26 |
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