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5430 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?Wandami Mataji ? 2026-02-16 05:23:33
5429 40649233 Mumukshu mandal 2026-02-16 05:22:53
5428 40649233 Mumukshu mandal 2026-02-16 05:18:50
5427 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म इच्छामि महाराज 2026-02-16 05:17:58
5426 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-02-16 05:15:49
5425 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ??Aahu Chaitanya Anand mein ✨ 2026-02-16 05:15:48
5423 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-16 05:15:47
5424 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा ??Aahu Chaitanya Anand mein ✨ 2026-02-16 05:15:47
5422 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ? *तात्विक चिंतन* ? ✨ *आत्मचिंतन — स्वरूप की ओर लौटने का आह्वान* ✨ बाहर जो कुछ भी दिखाई देता है — ? *वस्तुएँ, ? संबंध, ? शरीर, ? परिस्थितियाँ* — वास्तव में वे सब हमसे अलग (छुटे हुए) ही हैं। हम उन्हें वास्तव में ग्रहण कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे *हमारे स्वभाव का हिस्सा नहीं हैं*। फिर भी, जब मन भाव से उनमें एकत्व कर लेता है — *“यह मेरा है”, “यह मुझसे दूर न हो”* — यही भावना ग्रहण (स्वामित्व) कहलाती है। ? *वस्तु को पकड़ना ग्रहण नहीं है,* ? *भाव से अपना मान लेना ही ग्रहण है*। ? --- ✨ *वैराग्य का वास्तविक अर्थ* ✨ यदि अभी इतनी वितरागता नहीं आई कि हम *बाहरी संयोगों को व्यवहार में छोड़ सकें*, तो भी कम से कम श्रद्धा तो यही होनी चाहिए — कि *यह सब नश्वर है, अलग है, और छोड़ने योग्य ही* है। ⏳ स्थिर रहने योग्य यदि कुछ है, तो केवल — ?️ *चैतन्य स्वरूप आत्मतत्व* बाकी सब तो *संयोग है*, और संयोग का धर्म ही है — ? *आना और जाना।* --- ? *परपदार्थ से छूटने का उपाय* ? परपदार्थों में रहते हुए भी यदि मन में उपेक्षा भाव आ जाए — न आकर्षण ❌ न घृणा ❌ *केवल साक्षी भाव* ?️ — तो वही उनसे छूटने का वास्तविक उपाय है। जब तक — ❤️ *शरीर से प्रीति रहेगी* ? *पुण्य (सुखद परिस्थितियों) से प्रीति रहेगी* ⏰ *एक क्षणिक अवस्था से भी अपनत्व रहेगा* तब तक त्याग की भावना उत्पन्न ही नहीं हो सकती। क्योंकि त्याग वहीं संभव है, जहाँ *अपनापन समाप्त* हो। --- ? *ज्ञानी का संदेश* ? ज्ञानी हमें वस्तुओं को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं करते, वे कहते हैं — *प्रीति छोड़ो।* और प्रीति छोड़ने का उपाय क्या है? ? *अपने आत्मस्वरूप में प्रीति करना*। ? जब आत्मा में रस आ जाता है, तो संसार अपने आप फीका पड़ जाता है। यह नियम है — ? *जहाँ सच्चा प्रेम जागता है*, वहाँ झूठा प्रेम स्वतः छूट जाता है। --- ✨ *अंतिम सत्य* ✨ परपदार्थ को छोड़ने से हमारा कुछ नहीं जाता, बल्कि उल्टा — *हम अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं*। ? जो बाहर छोड़ता है, वह खाली नहीं होता — वह भीतर भर जाता है। ? *स्वरूप की प्राप्ति ही जीवन का वास्तविक लाभ है।* ? — ✍️ *राजेश जैन मैनपुरी* 2026-02-16 05:11:26
5421 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर 2026-02-16 05:03:56