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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 75314 |
40449667 |
संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी |
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*? आज का सुविचार ?*
*?संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। सबका स्वभाव अलग-अलग है। "किसी का स्वभाव सरल नम्रतापूर्ण सज्जनतापूर्ण होता है। यह उत्तम स्वभाव कहलाता है।" "और कोई व्यक्ति कुटिल अभिमानी और दुष्ट प्रकृति का होता है। ऐसा स्वभाव अच्छा नहीं कहलाता। ऊपर ऊपर से देखने पर तो सभी मनुष्य दिखते हैं। परंतु स्वभाव की भिन्नता के कारण सब लोग मनुष्य नहीं कहलाते, कमीनें, दुष्ट होते है। "उत्तम स्वभाव वाले लोग ही वास्तव में मनुष्य कहलाते हैं।" ऐसा वेद आदि शास्त्रों में बताया गया है।?*
*? मंगल भावना ?*
*?सभी जीव सुख शांति एवं स्वस्थ, सुरक्षित और निरोगी रहे। कोई भी प्राणी भूखा एवं प्यासा ना रहे l सभी प्राणियों की आत्मा को मुक्ति एवं मोक्ष मिले l?*
*?आपका जीवन मंगलमय हो?*
*?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो?*
*?विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का है ।?* <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER</a> |
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2026-04-10 18:53:53 |
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| 75313 |
40449667 |
संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी |
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*? आज का सुविचार ?*
*?संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। सबका स्वभाव अलग-अलग है। "किसी का स्वभाव सरल नम्रतापूर्ण सज्जनतापूर्ण होता है। यह उत्तम स्वभाव कहलाता है।" "और कोई व्यक्ति कुटिल अभिमानी और दुष्ट प्रकृति का होता है। ऐसा स्वभाव अच्छा नहीं कहलाता। ऊपर ऊपर से देखने पर तो सभी मनुष्य दिखते हैं। परंतु स्वभाव की भिन्नता के कारण सब लोग मनुष्य नहीं कहलाते, कमीनें, दुष्ट होते है। "उत्तम स्वभाव वाले लोग ही वास्तव में मनुष्य कहलाते हैं।" ऐसा वेद आदि शास्त्रों में बताया गया है।?*
*? मंगल भावना ?*
*?सभी जीव सुख शांति एवं स्वस्थ, सुरक्षित और निरोगी रहे। कोई भी प्राणी भूखा एवं प्यासा ना रहे l सभी प्राणियों की आत्मा को मुक्ति एवं मोक्ष मिले l?*
*?आपका जीवन मंगलमय हो?*
*?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो?*
*?विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का है ।?* <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER</a> |
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2026-04-10 18:53:52 |
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| 75311 |
40449666 |
निर्यापक समय सागर जी भक्त |
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*? आज का सुविचार ?*
*?संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। सबका स्वभाव अलग-अलग है। "किसी का स्वभाव सरल नम्रतापूर्ण सज्जनतापूर्ण होता है। यह उत्तम स्वभाव कहलाता है।" "और कोई व्यक्ति कुटिल अभिमानी और दुष्ट प्रकृति का होता है। ऐसा स्वभाव अच्छा नहीं कहलाता। ऊपर ऊपर से देखने पर तो सभी मनुष्य दिखते हैं। परंतु स्वभाव की भिन्नता के कारण सब लोग मनुष्य नहीं कहलाते, कमीनें, दुष्ट होते है। "उत्तम स्वभाव वाले लोग ही वास्तव में मनुष्य कहलाते हैं।" ऐसा वेद आदि शास्त्रों में बताया गया है।?*
*? मंगल भावना ?*
*?सभी जीव सुख शांति एवं स्वस्थ, सुरक्षित और निरोगी रहे। कोई भी प्राणी भूखा एवं प्यासा ना रहे l सभी प्राणियों की आत्मा को मुक्ति एवं मोक्ष मिले l?*
*?आपका जीवन मंगलमय हो?*
*?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो?*
*?विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का है ।?* <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER</a> |
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2026-04-10 18:53:50 |
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| 75312 |
40449666 |
निर्यापक समय सागर जी भक्त |
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*? आज का सुविचार ?*
*?संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। सबका स्वभाव अलग-अलग है। "किसी का स्वभाव सरल नम्रतापूर्ण सज्जनतापूर्ण होता है। यह उत्तम स्वभाव कहलाता है।" "और कोई व्यक्ति कुटिल अभिमानी और दुष्ट प्रकृति का होता है। ऐसा स्वभाव अच्छा नहीं कहलाता। ऊपर ऊपर से देखने पर तो सभी मनुष्य दिखते हैं। परंतु स्वभाव की भिन्नता के कारण सब लोग मनुष्य नहीं कहलाते, कमीनें, दुष्ट होते है। "उत्तम स्वभाव वाले लोग ही वास्तव में मनुष्य कहलाते हैं।" ऐसा वेद आदि शास्त्रों में बताया गया है।?*
*? मंगल भावना ?*
*?सभी जीव सुख शांति एवं स्वस्थ, सुरक्षित और निरोगी रहे। कोई भी प्राणी भूखा एवं प्यासा ना रहे l सभी प्राणियों की आत्मा को मुक्ति एवं मोक्ष मिले l?*
*?आपका जीवन मंगलमय हो?*
*?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो?*
*?विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का है ।?* <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1183887248?utm_source=android_post_share_web&referral_code=N29CX&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=BROADCASTER</a> |
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2026-04-10 18:53:50 |
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| 75309 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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*तन मन को करता कौन खराब, अंडा मछली मांस शराब।*
*अंडे किसी पेड़ पर नहीं उगते हैं, इसीलिए शाकाहारी नहीं है।*सनातन जैन धर्म की जय
*जय**जिनेन्द्र जय भारत जय श्रीराम* |
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2026-04-10 18:45:32 |
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| 75310 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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*तन मन को करता कौन खराब, अंडा मछली मांस शराब।*
*अंडे किसी पेड़ पर नहीं उगते हैं, इसीलिए शाकाहारी नहीं है।*सनातन जैन धर्म की जय
*जय**जिनेन्द्र जय भारत जय श्रीराम* |
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2026-04-10 18:45:32 |
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| 75307 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-04-10 18:43:52 |
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| 75308 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-04-10 18:43:52 |
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| 75306 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*?प्रेरक वाणी?*
हो सकता है कभी समुद्र में जल समाने की सीमा समाप्त हो जाए लेकिन मनुष्य मन की चाहत का कभी अंत नहीं हो सकता। वजह साफ है मनुष्य को मिले हुए संयोग उसे औरों की तुलना में बहुत कम नजर आते हैं। लोभ ग्रस्त व्यक्ति क्षमता न होने पर भी अंत समय तक भोगों के आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाता। जैसे-जैसे लोभ का स्तर बढ़ता है उसी अनुरूप पाप का ग्राफ बढ़ता चला जाता है। "प्राप्त को पर्याप्त" समझने पर ही लोभ जैसे रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
*जय जिनेंद्र*? |
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2026-04-10 18:40:31 |
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| 75305 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*?प्रेरक वाणी?*
हो सकता है कभी समुद्र में जल समाने की सीमा समाप्त हो जाए लेकिन मनुष्य मन की चाहत का कभी अंत नहीं हो सकता। वजह साफ है मनुष्य को मिले हुए संयोग उसे औरों की तुलना में बहुत कम नजर आते हैं। लोभ ग्रस्त व्यक्ति क्षमता न होने पर भी अंत समय तक भोगों के आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाता। जैसे-जैसे लोभ का स्तर बढ़ता है उसी अनुरूप पाप का ग्राफ बढ़ता चला जाता है। "प्राप्त को पर्याप्त" समझने पर ही लोभ जैसे रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
*जय जिनेंद्र*? |
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2026-04-10 18:40:30 |
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