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Chat Name
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Message
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40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-02-20 05:05:09 |
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| 10915 |
40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-02-20 05:05:05 |
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| 10914 |
40449663 |
? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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2026-02-20 05:04:57 |
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| 10913 |
40449663 |
? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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18
अरहनाथ चालीसा – Bhagwan Aranath Chalisa
अरहनाथ चालीसा का प्रभाव अतुलनीय है। यह चालीसा वस्तुतः सभी कर्म-बंधनों को काटने वाली है। श्रद्धा और भक्ति से भरकर जो भी भगवान अरहनाथ चालीसा की पाठ करता है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता है। ऐसे व्यक्ति के सारे पाप-ताप कट जाते हैं और हृदय में संतोष की भावना स्वतः उदित हो जाती है। पढ़ें अरहनाथ चालीसा–
यह भी पढ़ें – भगवान अरहनाथ की आरती
भगवान अरहनाथ का चिह्न – मछली
श्री अरहनाथ जिनेन्द्र गुणाकर,
नान-दरस-सुरत-बल रत्नाकर॥
कल्पवृक्ष सम सुख के सागर,
पार हुए निज आतम ध्याकर॥
अरहनाथ वसु अरि के नाशक,
हुए हस्तिनापुर के शासक॥
माँ मित्रसेना-पिता सुर्दशन,
चक्रवर्ती बन किया दिग्दर्शन॥
सहस चौरासी आयु प्रभु की,
अवगाहना थी तीस धनुष की॥
वर्ण सुवर्ण समान था पीत,
रोग शोक थे तुमसे भीत॥
ब्याह हुआ जब प्रिय कुमार का,
स्वप्न हुआ साकार पिता का॥
राज्याभिषेक हुआ अरहजिन का,
हुआ अभ्युदय चक्र रतन का॥
एक दिन देवा शरद ऋतु में,
मेघ विलीन हुए क्षण भर में॥
उदित हुआ वैराग्य हृदय में,
लौकान्तिक सुर आए पल में॥
‘अरविन्द’ पुत्र को देकर राज,
गए सहेतुक वन जिनराज॥
मंगसिर की दशमी उजियारी,
परम दिगम्बर दीक्षाधारी॥
पंचमुष्टि उखाड़े केश,
तन से ममत्व रहा नहीं दलेश॥
नगर चक्रपुर गए पारण हित,
पड़गाहें भूपति अपराजित॥
प्रासुक शुद्धाहार कराये,
पंचाश्चर्य देव कराये॥
कठिन तपस्या करते वन में,
लीन रहें आतम चिन्तन में॥
कार्तिक मास द्वादशी उज्जवल,
प्रभु विराजे आम्र वृक्ष- तल॥
अन्तर ज्ञान ज्योति प्रगटाई,
हुए केवली श्री जिनराई॥
देव करें उत्सव अति भव्य,
समोशरण की रचना दिव्य॥
सोलह वर्ष का मौनभंग कर,
सप्तभंग जिनवाणी सुखकर॥
चौदह गुणस्थान बताये,
मोह – काय – योग दर्शाये॥
पत्तावन आश्रव बतलाये,
इतने ही संवर गिनवाये॥
संवर हेतु समता लाओ,
अनुप्रेक्षा द्वादश मन भाओ॥
हुए प्रबुद्ध सभी नर-नारी,
दीक्षा व्रत धारें बहु भारी॥
कम्भार्प आदि गणधर तीस,
अर्द्ध लक्ष थे सकल मुनीश॥
सत्यधर्म का हुआ प्रचार,
दूर-दूर तक हुआ विहार॥
एक माह पहले निर्वेद,
सहस मुनिसंग गए सम्मेद॥
चैत्र कृष्ण एकादशी के दिन,
मोक्ष गए श्री अरहनाथ जिन॥
नाटक कट को पूजें देव,
कामदेव- चक्री-जिनदेव॥
जिनवर का लक्षण था ‘मीन’,
धारो जैन धर्म समीचीन॥
प्राणी मात्र का जैन धर्म है,
जैन धर्म ही परम धर्म है॥
चेन्द्रियों को जीतें जो नर,
जितेन्द्रिय वे बनते जिनवर॥
याग धर्म की महिमा गाई,
त्याग से ही सब सुख हों भाई॥
त्याग कर सकें केवल मानव,
हैं अक्षम सब देव और दानव॥
हो स्वाधीन तजो तुम भाई,
बन्धन में पीड़ा मन लाई॥
हस्तिनापुर में दूसरी नशिया,
कर्म जहाँ पर नसे घातिया॥
जिनके चरणों में धरें,
शीश सभी नरनाथ।
हम सब पूजे उन्हें,
कृपा करें अरहनाथ॥
जाप – ॐ ह्रीं अर्हं श्री अरहनाथाय नमः॥ |
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2026-02-20 05:04:55 |
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| 10912 |
48340398 |
???गुरु भगवान??? |
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2026-02-20 05:04:20 |
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| 10911 |
48340398 |
???गुरु भगवान??? |
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18
अरहनाथ चालीसा – Bhagwan Aranath Chalisa
अरहनाथ चालीसा का प्रभाव अतुलनीय है। यह चालीसा वस्तुतः सभी कर्म-बंधनों को काटने वाली है। श्रद्धा और भक्ति से भरकर जो भी भगवान अरहनाथ चालीसा की पाठ करता है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता है। ऐसे व्यक्ति के सारे पाप-ताप कट जाते हैं और हृदय में संतोष की भावना स्वतः उदित हो जाती है। पढ़ें अरहनाथ चालीसा–
यह भी पढ़ें – भगवान अरहनाथ की आरती
भगवान अरहनाथ का चिह्न – मछली
श्री अरहनाथ जिनेन्द्र गुणाकर,
नान-दरस-सुरत-बल रत्नाकर॥
कल्पवृक्ष सम सुख के सागर,
पार हुए निज आतम ध्याकर॥
अरहनाथ वसु अरि के नाशक,
हुए हस्तिनापुर के शासक॥
माँ मित्रसेना-पिता सुर्दशन,
चक्रवर्ती बन किया दिग्दर्शन॥
सहस चौरासी आयु प्रभु की,
अवगाहना थी तीस धनुष की॥
वर्ण सुवर्ण समान था पीत,
रोग शोक थे तुमसे भीत॥
ब्याह हुआ जब प्रिय कुमार का,
स्वप्न हुआ साकार पिता का॥
राज्याभिषेक हुआ अरहजिन का,
हुआ अभ्युदय चक्र रतन का॥
एक दिन देवा शरद ऋतु में,
मेघ विलीन हुए क्षण भर में॥
उदित हुआ वैराग्य हृदय में,
लौकान्तिक सुर आए पल में॥
‘अरविन्द’ पुत्र को देकर राज,
गए सहेतुक वन जिनराज॥
मंगसिर की दशमी उजियारी,
परम दिगम्बर दीक्षाधारी॥
पंचमुष्टि उखाड़े केश,
तन से ममत्व रहा नहीं दलेश॥
नगर चक्रपुर गए पारण हित,
पड़गाहें भूपति अपराजित॥
प्रासुक शुद्धाहार कराये,
पंचाश्चर्य देव कराये॥
कठिन तपस्या करते वन में,
लीन रहें आतम चिन्तन में॥
कार्तिक मास द्वादशी उज्जवल,
प्रभु विराजे आम्र वृक्ष- तल॥
अन्तर ज्ञान ज्योति प्रगटाई,
हुए केवली श्री जिनराई॥
देव करें उत्सव अति भव्य,
समोशरण की रचना दिव्य॥
सोलह वर्ष का मौनभंग कर,
सप्तभंग जिनवाणी सुखकर॥
चौदह गुणस्थान बताये,
मोह – काय – योग दर्शाये॥
पत्तावन आश्रव बतलाये,
इतने ही संवर गिनवाये॥
संवर हेतु समता लाओ,
अनुप्रेक्षा द्वादश मन भाओ॥
हुए प्रबुद्ध सभी नर-नारी,
दीक्षा व्रत धारें बहु भारी॥
कम्भार्प आदि गणधर तीस,
अर्द्ध लक्ष थे सकल मुनीश॥
सत्यधर्म का हुआ प्रचार,
दूर-दूर तक हुआ विहार॥
एक माह पहले निर्वेद,
सहस मुनिसंग गए सम्मेद॥
चैत्र कृष्ण एकादशी के दिन,
मोक्ष गए श्री अरहनाथ जिन॥
नाटक कट को पूजें देव,
कामदेव- चक्री-जिनदेव॥
जिनवर का लक्षण था ‘मीन’,
धारो जैन धर्म समीचीन॥
प्राणी मात्र का जैन धर्म है,
जैन धर्म ही परम धर्म है॥
चेन्द्रियों को जीतें जो नर,
जितेन्द्रिय वे बनते जिनवर॥
याग धर्म की महिमा गाई,
त्याग से ही सब सुख हों भाई॥
त्याग कर सकें केवल मानव,
हैं अक्षम सब देव और दानव॥
हो स्वाधीन तजो तुम भाई,
बन्धन में पीड़ा मन लाई॥
हस्तिनापुर में दूसरी नशिया,
कर्म जहाँ पर नसे घातिया॥
जिनके चरणों में धरें,
शीश सभी नरनाथ।
हम सब पूजे उन्हें,
कृपा करें अरहनाथ॥
जाप – ॐ ह्रीं अर्हं श्री अरहनाथाय नमः॥ |
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2026-02-20 05:04:18 |
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| 10910 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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??गुरु समान दाता नहीं कोई ✨ |
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2026-02-20 05:04:06 |
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| 10909 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-20 05:04:04 |
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| 10908 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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2026-02-20 05:04:00 |
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| 10907 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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??गुरु समान दाता नहीं कोई ✨ |
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2026-02-20 05:03:59 |
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