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40449679 |
ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 |
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2026-02-12 07:13:52 |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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???? Wandami Matajii ???? Jai Jinendra Didi ?? |
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2026-02-12 07:13:04 |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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??वंदामी माताजी??
???????????? |
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2026-02-12 07:12:16 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*।। द्रव्यानुयोग।।*
_!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!_
_श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत_
*॥श्री इष्टोपदेश॥*
_मूल संस्कृत गाथा_
( *पंडित आशाधरजी* )
_मंगलाचरण_
*परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।*
*इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥*
*मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण*
*_यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः_*
*_तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥_*
_आत्मा को स्वयं ही स्वरूप की उपलब्धि कैसे? -_
*योग्योपादानयोगेन, दृषदः स्वर्णता मता* *द्रव्यादिस्वादिसंपत्तावात्मनोऽप्यात्मता मता ॥2॥*
_स्वर्ण पाषाण सुहेतु से, स्वयं कनक हो जाय_
_सुद्रव्यादि चारों मिलें, आप शुद्धता थाय ॥२॥_
*अन्वयार्थ* : योग्य उपादान कारण के संयोग से जैसे पाषाण-विशेष स्वर्ण बन जाता है, वैसे ही सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि रूप सामग्री के मिलने पर जीव भी चैतन्य-स्वरूप आत्मा हो जाता है।
*आशाधरजी* : योग्य (कार्योत्पादनसमर्थी उपादान कारण के मिलने से पाषाण-विशेष, जिसमें सुवर्णरूप परिणमन (होने) की योग्यता पाई जाती है, वह जैसे स्वर्ण बन जाता है, वैसे ही अच्छे (प्रकृत कार्य के लिए उपयोगी) द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावों की सम्पूर्णता होने पर जीव (संसारी आत्मा) निश्चल चैतन्य-स्वरूप हो जाता है। दूसरे शब्दों में, संसारी प्राणी जीवात्मा से परमात्म बन जाता है ॥२॥ |
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2026-02-12 07:11:40 |
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40449718 |
विनय गुरु ? |
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2026-02-12 07:11:30 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-12 07:10:48 |
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40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*आर्यिका मां विज्ञानमति माताजी द्वारा रचित सम्यक्त्व मञ्जूषा एवं सच्चे देव का स्वरूप*
*देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के चार कारण कहे गए है -*
_१- जिनमहिमा दर्शन २- धर्म श्रवण ३- जाति स्मरण और ४- देव ऋद्धि दर्शन_
*सम्यग्दर्शन की प्राप्ति कैसे होती है*
_जब देशना लब्धि और काल लब्धि आदि बहिरंग कारण तथा करण लब्धि रूप अन्तरंग कारण सामग्री प्राप्त होती है, तभी यह भव्य प्राणी विशुद्ध सम्यग्दर्शन का धारक हो सकता है।_ *(मल्लिपुराण ९/११६)*
_क्षयोपशम लब्धि, विशुद्ध लब्धि, देशना लब्धि तथा प्रायोग्य लब्धि ये चार लब्धियां तो अभव्य जीवों के भी हो सकती है लेकिन करण लब्धि को प्राप्त कर लेने पर नियम से सम्यग्दर्शन होता है।_ *(धवला जी ६/२०३-५)*
_तीनों कारणों के अंतिम समय में सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती है। इस सूत्र के द्वारा क्षयोपशम लब्धि,विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि और प्रायोग्य लब्धि इन चारों लब्धियों की प्ररुपणा की गई है।_ *(धवला जी ६/२०४)*
_दर्शन मोह का उपशम करने वाला (करण लब्धि में प्रवेश करने के लिए) जीव उपद्रव व उपसर्ग आने पर भी उसका उपशम किए बिना नहीं रहता है।_ *(धवला ६)* _अर्थात् वह निश्चित रूप से सम्यक्त्व प्राप्त कर लेता है।_
*?️ अनादि मिथ्या दृष्टि भव्य के कर्मों के उदय से प्राप्त कलुषता के रहते हुए उपशम सम्यक्त्व कैसे होता हैं ⁉️*
_?️ अनादिकाल से मिथ्यात्व में पड़ा हुआ जीव भी काल लब्धि आदि कारणों के मिलने पर सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेता है। उसमें एक लब्धि यह है कि कर्मों से घिरे हुए भव्य जीव के संसार भ्रमण का काल अधिक से अधिक अर्धपुद्गल परावर्तन प्रमाण बाकी रहने पर वह प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करने का पात्र होता है। यदि उसके परिभ्रमण का काल अर्द्धपुद्गल परावर्तन से अधिक शेष होता है तो प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य नहीं होता है।_ *(कार्तिकेय अनुप्रेक्षा टीका ३०८)* जिस प्रकार स्वर्ण पाषाण शोधने की सामग्री के संयोग से शुद्ध स्वर्ण बन जाता है,उसी प्रकार काल आदि लब्धि की प्राप्ति से आत्मा परमात्मा बन जाता है। *(मोक्षपाहुड २४)*
_मिथ्यात्व से पुष्ट तथा कर्ममल सहित आत्मा कभी कालादि लब्धि के प्राप्त होने पर क्रम से सम्यग्दर्शन, व्रत दक्षता,कषायों का विनाश और योगनिरोध के द्वारा मुक्ति प्राप्त कर लेता है।_ *(आत्मानुशासन २४१)*
_अनादिकाल से चला आया कोई जीव काल आदि लब्धियों का निमित्त पाकर तीनों कारण रूप परिणामों के द्वारा मिथ्यात्वादि सात प्रकृतियों का उपशम करता है तथा संसार की परिपाटी का विच्छेद कर उपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है।_ *(मल्लिपुराण ६२/३१४-१५)* _आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी ने तत्त्वार्थसूत्र महाग्रंथ की सर्वप्रथम टीका श्री सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ में काल लब्धि का वर्णन करते हुए लिखा है - अनादि मिथ्या दृष्टि के काल लब्धि आदि के निमित्त से इनका उपशम होता है अर्थात् प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त होता है। यहां कार लब्धि को बताते हैं - कर्म युक्त कोई भी भव्य आत्मा अर्द्धपुद्गल परिवर्तन नाम के काल के शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य होता है, इससे अधिक काल के शेष रहने पर नहीं होता है, यह एक काल लब्धि है। दूसरी काल लब्धि का संबंध कर्म स्थिति से हैं। उत्कृष्ट स्थिति वाले कर्मों के शेष रहने पर या जघन्य स्थिति वाले कर्मों के शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्व का लाभ नहीं होता है। जब बंधने वाले कर्मों की स्थिति अन्त:कोड़ाकोड़ी सागर पड़ती है और विशुद्ध परिणामों के वश से सत्ता में स्थित कर्मों की स्थिति संख्यात हजार सागर कम अन्त:कोड़ाकोड़ी सागर प्राप्त होती है,तब यह जीव प्रथम सम्यक्त्व के योग्य होता है। एक अर्थात् तीसरी काल लब्धि भव की अपेक्षा होती है - जो भव्य है,संज्ञी है,पर्याप्तक है और सर्व विशुद्ध है, वह प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करता है।_ *(सर्वार्थसिद्धि २/३)*
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2026-02-12 07:10:16 |
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40449756 |
अंतरिक्ष पार्श्वनाथचंडीगढ़ पंजाब हरियाणा 19 |
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2026-02-12 07:10:12 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-02-12 07:10:05 |
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40449729 |
माँ विशुद्ध भक्त परिवार?7 |
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मन की मेरी बात में तुमसे कहूं |
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2026-02-12 07:09:17 |
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