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76005 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ? *प्रेरक वचन*? खुद की कमियों को पहचान लेना सबसे बड़ी काबिलियत है और वक्त रहते उन्हें सुधार लेना सबसे बड़ा हुनर। *?जय जिनेंद्र*? 2026-04-11 06:02:44
76006 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ? *प्रेरक वचन*? खुद की कमियों को पहचान लेना सबसे बड़ी काबिलियत है और वक्त रहते उन्हें सुधार लेना सबसे बड़ा हुनर। *?जय जिनेंद्र*? 2026-04-11 06:02:44
76004 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? जयजिनेन्द्र?? सुप्रभात ? नमस्ते ?? *दोस्ती एवं..?* *सम्बन्ध..?* *कभी अन्त नहीं होता..?* *बातों से छूटा तो..⚖️* *नयनों में रह जाता है..?* और..?? *नयनों से छूटा तो..?* *ह्रदय में स्मरण रहता हैं..?* ✒️✒️✒️✒️✒️ *कौन कहता है कि..?* *हम झूठ नहीं बोलते..?️* *एक बार हमारी तबियत....❤️* *तो पूछ कर देखो..?️* *मनुष्य आयु से नहीं..?‍♂️?‍♀️* किन्तु..‼️‼️ *जीवन में प्राप्त कष्टों से..?* *शीघ्र वृद्ध हो जाता है..?‍?* ॥ सर्वे भवन्तु सुखिन: ॥ *अहिंसा परमो धर्म* *जीओ ओर जीने दो* *नमोस्तु शासन जयवन्त हो* आप??‍♂सपरिवार *स्वस्थ रहे मस्त रहे व्यस्त रहे* ??????????? ?↔️???❤️??❤️ 2026-04-11 06:01:44
76003 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? जयजिनेन्द्र?? सुप्रभात ? नमस्ते ?? *दोस्ती एवं..?* *सम्बन्ध..?* *कभी अन्त नहीं होता..?* *बातों से छूटा तो..⚖️* *नयनों में रह जाता है..?* और..?? *नयनों से छूटा तो..?* *ह्रदय में स्मरण रहता हैं..?* ✒️✒️✒️✒️✒️ *कौन कहता है कि..?* *हम झूठ नहीं बोलते..?️* *एक बार हमारी तबियत....❤️* *तो पूछ कर देखो..?️* *मनुष्य आयु से नहीं..?‍♂️?‍♀️* किन्तु..‼️‼️ *जीवन में प्राप्त कष्टों से..?* *शीघ्र वृद्ध हो जाता है..?‍?* ॥ सर्वे भवन्तु सुखिन: ॥ *अहिंसा परमो धर्म* *जीओ ओर जीने दो* *नमोस्तु शासन जयवन्त हो* आप??‍♂सपरिवार *स्वस्थ रहे मस्त रहे व्यस्त रहे* ??????????? ?↔️???❤️??❤️ 2026-04-11 06:01:43
76001 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *?आचार्य अमरदेव शणीडल्यजी महाराज ने ?अंतर्मना गुरुदेव आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के 557 दिन की साधना की अनुमोदना कर उनकी साधना को किया नमन, वंदन..??* ✨ *ऊॅ हूं कल्पतरू प्रसन्न सागराय नमः*✨ ? *ANTARMANA VAANI* ? <a href="https://linktr.ee/Antarmanavaani" target="_blank">https://linktr.ee/Antarmanavaani</a> `•हर मास १ उपवास•` 2026-04-11 05:59:30
76002 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *?आचार्य अमरदेव शणीडल्यजी महाराज ने ?अंतर्मना गुरुदेव आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के 557 दिन की साधना की अनुमोदना कर उनकी साधना को किया नमन, वंदन..??* ✨ *ऊॅ हूं कल्पतरू प्रसन्न सागराय नमः*✨ ? *ANTARMANA VAANI* ? <a href="https://linktr.ee/Antarmanavaani" target="_blank">https://linktr.ee/Antarmanavaani</a> `•हर मास १ उपवास•` 2026-04-11 05:59:30
76000 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर <a href="https://youtu.be/5zuhnwrzoUg?si=cp8w1zKqVsI7h2a1" target="_blank">https://youtu.be/5zuhnwrzoUg?si=cp8w1zKqVsI7h2a1</a> 2026-04-11 05:59:04
75999 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर <a href="https://youtu.be/5zuhnwrzoUg?si=cp8w1zKqVsI7h2a1" target="_blank">https://youtu.be/5zuhnwrzoUg?si=cp8w1zKqVsI7h2a1</a> 2026-04-11 05:59:03
75997 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *!! मन की आवाज़ !!* एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘ वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उल्टी बात तुझे किसने समझाई है?’ बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’ **************************************** (2) *कहानी* *घर बना खण्डहर* *एक सेठ जी थे, जो दिन-रात अपना काम-धँधा बढ़ाने में लगे रहते थे। उन्हें तो बस, शहर का सबसे अमीर आदमी बनना था। धीरे-धीरे पर आखिर वे नगर के सबसे धनी सेठ बन ही गए।* *इस सफलता की ख़ुशी में उन्होने एक शानदार घर बनवाया। गृह प्रवेश के दिन, उन्होने एक बहुत शानदार पार्टी का आयोजन किया। जब सारे मेहमान चले गए तो वे भी अपने कमरे में सोने के लिए चले आए। थकान से चूर, जैसे ही बिस्तर पर लेटे, एक आवाज़ उन्हें सुनायी पड़ी...* *"मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, और अब मैं तुम्हारा शरीर छोड़ कर जा रही हूँ !!"* सेठ घबरा कर बोले, *"अरे! तुम ऐसा नहीं कर सकती!!, तुम्हारे बिना तो मैं मर ही जाऊँगा। देखो!, मैंने वर्षों के तनतोड़-परिश्रम के बाद यह सफलता अर्जित की है। अब जाकर इस सफलता को आमोद प्रमोद से भोगने का अवसर आया है। सौ वर्ष तक टिके, ऐसा मजबूत मकान मैने बनाया है। यह करोड़ों रूपये का, सुख सुविधा से भरपूर घर, मैंने तुम्हारे लिए ही तो बनाया है!, तुम यहाँ से मत जाओ।"*     आत्मा बोली, *"यह मेरा घर नहीं है, मेरा घर तो तुम्हारा शरीर था, स्वास्थ्य ही उसकी मजबूती थी, किन्तु करोड़ों कमाने के चक्कर में, तुमने इसके रख-रखाव की अवहेलना की है। मौज-शौक के कबाड़ तो भरता रहा, पर मजबूत बनाने पर किंचित भी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी गैर जिम्मेदारी ने इस अमूल्य तन का नाश ही कर डाला है।"* आत्मा नें स्पष्ट करते हुए कहा, *"अब इसे ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरॉइड, मोटापा, कमर दर्द जैसी बीमारियों ने घेर लिया है। तुम ठीक से चल नहीं पाते, रात को तुम्हे नींद नहीं आती, तुम्हारा दिल भी कमजोर हो चुका है। तनाव के कारण, ना जाने और कितनी बीमारियों का घर बन चुका है, ये तुम्हारा शरीर!!"* *"अब तुम ही बताओ, क्या तुम किसी ऐसे जर्जरित घर में रहना चाहोगे, जिसके चारो ओर कमजोर व असुरक्षित दीवारें हो, जिसका ढाँचा चरमरा गया हो, फर्नीचर को दीमक खा रही हो, प्लास्टर और रंग-रोगन उड़ चुका हो, ढंग से सफाई तक न होती हो, यहाँ वहाँ गंदगी पड़ी रहती हो। जिसकी छत टपक रही हो, जिसके खिड़की दरवाजे टूटे हों!! क्या रहना चाहोगे ऐसे घर में? नहीं रहना चाहोगे ना!! ...इसलिए मैं भी ऐसे आवास में नहीं रह सकती।"* *सेठ पश्चाताप मिश्रित भय से काँप उठे!! अब तो आत्मा को रोकने का, न तो सामर्थ्य और न ही साहस सेठ में बचा था। एक गहरी निश्वास छोड़ते हुए आत्मा, सेठ जी के शरीर से निकल पड़ी... सेठ का पार्थिव बंगला पडा रहा।* *मित्रों, ये कहानी आज अधिकांश लोगों की हकीकत है। सफलता अवश्य हासिल कीजिए, किन्तु स्वास्थ्य की बलि देकर नहीं। अन्यथा सेठ की तरह मंजिल पा लेने के बाद भी, अपनी सफलता का लुत्फ उठाने से वंचित रह जाएँगे!!*   **************************************** (3) *कहानी* *कवि का स्वाभिमान* _*एक दिन राजा मान सिंह प्रसिद्ध कवि कुंभनदास के दर्शन के लिए वेश बदलकर उनके घर पहुंचे। उस समय कुंभनदास अपनी बेटी को आवाज लगाते हुए कह रहे थे, 'बेटी, जरा दर्पण तो लाना, मुझे तिलक लगाना है।' बेटी जब दर्पण लाने लगी तो वह नीचे गिरकर टूट गया। यह देखकर कुंभनदास बोले, 'कोई बात नहीं, किसी बर्तन में जल भर लाओ।' राजा कुंभनदास के पास बैठकर बातें करने लगे और बेटी एक टूटे हुए घड़े में पानी भरकर ले आई। जल की छाया में अपना चेहरा देखकर कुंभनदास ने तिलक लगा लिया।*_ _*यह देखकर राजा दंग रह गए। वह कुंभनदास से अत्यंत प्रभावित हुए। राजा यह सोचकर प्रसन्न थे कि कवि कुंभनदास उन्हें पहचान नहीं पाए हैं। राजा वहां से चले गए। अगले दिन वह एक स्वर्ण जड़ित दर्पण लेकर कवि के पास पहुंचे और बोले, 'कविराज, आपकी सेवा में यह तुच्छ भेंट अर्पित है। कृपया इसे स्वीकार कीजिए।' कुंभनदास विनम्रतापूर्वक बोले, 'महाराज आप! अच्छा तो कल वेश बदलकर आप ही हम से मिलने आए थे। कोई बात नहीं। हमें आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। पर एक विनती है।'*_ _*राजा ने पूछा, 'क्या कविराज?' कुंभनदास बोले, 'आप मेरे घर अवश्य आइए लेकिन खाली हाथ। यदि आप अपने साथ ऐसी ही वस्तुएं लेकर आते रहे तो बेकार की वस्तुओं से मेरा घर भर जाएगा। मुझे व्यर्थ की वस्तुओं से कोई मोह नहीं। मुझे बस मां सरस्वती की कृपा की आवश्कता है।' कवि के इस स्वाभिमानी रूप को देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। वह समझ गए कि कवि कुंभनदास की निर्धनता उनकी विवशता नहीं है, बल्कि इसी तरह का जीवन उन्हें संतुष्टि देता है। वह लोभ, मोह, माया आदि से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। उस दिन से कुंभनदास राजा के प्रिय हो गए। राजा के लिए यह गर्व का विषय था कि उनके राज्य में कुंभनदास जैसे लोग रहते हैं।*_ **************************************** (4) *कहानी* *एक पुरानी कथा जो आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है* एक राजा को राज करते काफी समय हो गया था।बाल भी सफ़ेद होने लगे थे।एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया व अपने गुरुदेव को भी बुलाया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दी, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे भी उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है, वरना राजा का क्या भरोसा दंड दे दे। तो उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक *दोहा* पढ़ा - ... *"घणी गई थोड़ी रही, या में पल पल जाय।* *एक पलक के कारणे, युं ना कलंक लगाय।"* ... अब इस *दोहे* का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। ... जब यह दोहा *गुरु जी* ने सुना तो गुरुजी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को अर्पण कर दी। ... दोहा सुनते ही *राजकुमारी* ने भी अपना *नौलखा हार* नर्तकी को भेंट कर दिया। ... *दोहा* सुनते ही राजा के *युवराज* ने भी अपना *मुकुट* उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया । *राजा बहुत ही अचम्भित हो गया।* सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है पर यह क्या! अचानक *एक दोहे* से सब अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुश हो कर नर्तकी को समर्पित कर रहें हैं ? *राजा* सिंहासन से उठा और नर्तकी को बोला *एक दोहे* द्वारा एक सामान्य नर्तकी होकर तुमने सबको लूट लिया। ... जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरुजी कहने लगे - "राजा ! इसको *नीच नर्तकी मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है क्योंकि इसके दोहे ने मेरी आँखें खोल दी हैं*। दोहे से यह कह रही है कि *मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ,* भाई ! मैं तो चला ।" यह कहकर गुरुजी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े। ... *राजा की लड़की* ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरा विवाह नहीं कर रहे थे। आज रात मैं आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद करने वाली थी। लेकिन इस *नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दी, कि जल्दबाज़ी न कर, हो सकता है तेरा विवाह कल हो जाए, क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?"* ... *युवराज ने कहा -* महाराज ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैं आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपको मारने वाला था। लेकिन इस *दोहे ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है! थोड़ा धैर्य रख।"* ... जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैंसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया । ... *यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा -* "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना नृत्य बन्द करती हूँ "हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।" ************************************* 2026-04-11 05:58:40
75998 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *!! मन की आवाज़ !!* एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘ वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उल्टी बात तुझे किसने समझाई है?’ बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’ **************************************** (2) *कहानी* *घर बना खण्डहर* *एक सेठ जी थे, जो दिन-रात अपना काम-धँधा बढ़ाने में लगे रहते थे। उन्हें तो बस, शहर का सबसे अमीर आदमी बनना था। धीरे-धीरे पर आखिर वे नगर के सबसे धनी सेठ बन ही गए।* *इस सफलता की ख़ुशी में उन्होने एक शानदार घर बनवाया। गृह प्रवेश के दिन, उन्होने एक बहुत शानदार पार्टी का आयोजन किया। जब सारे मेहमान चले गए तो वे भी अपने कमरे में सोने के लिए चले आए। थकान से चूर, जैसे ही बिस्तर पर लेटे, एक आवाज़ उन्हें सुनायी पड़ी...* *"मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, और अब मैं तुम्हारा शरीर छोड़ कर जा रही हूँ !!"* सेठ घबरा कर बोले, *"अरे! तुम ऐसा नहीं कर सकती!!, तुम्हारे बिना तो मैं मर ही जाऊँगा। देखो!, मैंने वर्षों के तनतोड़-परिश्रम के बाद यह सफलता अर्जित की है। अब जाकर इस सफलता को आमोद प्रमोद से भोगने का अवसर आया है। सौ वर्ष तक टिके, ऐसा मजबूत मकान मैने बनाया है। यह करोड़ों रूपये का, सुख सुविधा से भरपूर घर, मैंने तुम्हारे लिए ही तो बनाया है!, तुम यहाँ से मत जाओ।"*     आत्मा बोली, *"यह मेरा घर नहीं है, मेरा घर तो तुम्हारा शरीर था, स्वास्थ्य ही उसकी मजबूती थी, किन्तु करोड़ों कमाने के चक्कर में, तुमने इसके रख-रखाव की अवहेलना की है। मौज-शौक के कबाड़ तो भरता रहा, पर मजबूत बनाने पर किंचित भी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी गैर जिम्मेदारी ने इस अमूल्य तन का नाश ही कर डाला है।"* आत्मा नें स्पष्ट करते हुए कहा, *"अब इसे ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरॉइड, मोटापा, कमर दर्द जैसी बीमारियों ने घेर लिया है। तुम ठीक से चल नहीं पाते, रात को तुम्हे नींद नहीं आती, तुम्हारा दिल भी कमजोर हो चुका है। तनाव के कारण, ना जाने और कितनी बीमारियों का घर बन चुका है, ये तुम्हारा शरीर!!"* *"अब तुम ही बताओ, क्या तुम किसी ऐसे जर्जरित घर में रहना चाहोगे, जिसके चारो ओर कमजोर व असुरक्षित दीवारें हो, जिसका ढाँचा चरमरा गया हो, फर्नीचर को दीमक खा रही हो, प्लास्टर और रंग-रोगन उड़ चुका हो, ढंग से सफाई तक न होती हो, यहाँ वहाँ गंदगी पड़ी रहती हो। जिसकी छत टपक रही हो, जिसके खिड़की दरवाजे टूटे हों!! क्या रहना चाहोगे ऐसे घर में? नहीं रहना चाहोगे ना!! ...इसलिए मैं भी ऐसे आवास में नहीं रह सकती।"* *सेठ पश्चाताप मिश्रित भय से काँप उठे!! अब तो आत्मा को रोकने का, न तो सामर्थ्य और न ही साहस सेठ में बचा था। एक गहरी निश्वास छोड़ते हुए आत्मा, सेठ जी के शरीर से निकल पड़ी... सेठ का पार्थिव बंगला पडा रहा।* *मित्रों, ये कहानी आज अधिकांश लोगों की हकीकत है। सफलता अवश्य हासिल कीजिए, किन्तु स्वास्थ्य की बलि देकर नहीं। अन्यथा सेठ की तरह मंजिल पा लेने के बाद भी, अपनी सफलता का लुत्फ उठाने से वंचित रह जाएँगे!!*   **************************************** (3) *कहानी* *कवि का स्वाभिमान* _*एक दिन राजा मान सिंह प्रसिद्ध कवि कुंभनदास के दर्शन के लिए वेश बदलकर उनके घर पहुंचे। उस समय कुंभनदास अपनी बेटी को आवाज लगाते हुए कह रहे थे, 'बेटी, जरा दर्पण तो लाना, मुझे तिलक लगाना है।' बेटी जब दर्पण लाने लगी तो वह नीचे गिरकर टूट गया। यह देखकर कुंभनदास बोले, 'कोई बात नहीं, किसी बर्तन में जल भर लाओ।' राजा कुंभनदास के पास बैठकर बातें करने लगे और बेटी एक टूटे हुए घड़े में पानी भरकर ले आई। जल की छाया में अपना चेहरा देखकर कुंभनदास ने तिलक लगा लिया।*_ _*यह देखकर राजा दंग रह गए। वह कुंभनदास से अत्यंत प्रभावित हुए। राजा यह सोचकर प्रसन्न थे कि कवि कुंभनदास उन्हें पहचान नहीं पाए हैं। राजा वहां से चले गए। अगले दिन वह एक स्वर्ण जड़ित दर्पण लेकर कवि के पास पहुंचे और बोले, 'कविराज, आपकी सेवा में यह तुच्छ भेंट अर्पित है। कृपया इसे स्वीकार कीजिए।' कुंभनदास विनम्रतापूर्वक बोले, 'महाराज आप! अच्छा तो कल वेश बदलकर आप ही हम से मिलने आए थे। कोई बात नहीं। हमें आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। पर एक विनती है।'*_ _*राजा ने पूछा, 'क्या कविराज?' कुंभनदास बोले, 'आप मेरे घर अवश्य आइए लेकिन खाली हाथ। यदि आप अपने साथ ऐसी ही वस्तुएं लेकर आते रहे तो बेकार की वस्तुओं से मेरा घर भर जाएगा। मुझे व्यर्थ की वस्तुओं से कोई मोह नहीं। मुझे बस मां सरस्वती की कृपा की आवश्कता है।' कवि के इस स्वाभिमानी रूप को देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। वह समझ गए कि कवि कुंभनदास की निर्धनता उनकी विवशता नहीं है, बल्कि इसी तरह का जीवन उन्हें संतुष्टि देता है। वह लोभ, मोह, माया आदि से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। उस दिन से कुंभनदास राजा के प्रिय हो गए। राजा के लिए यह गर्व का विषय था कि उनके राज्य में कुंभनदास जैसे लोग रहते हैं।*_ **************************************** (4) *कहानी* *एक पुरानी कथा जो आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है* एक राजा को राज करते काफी समय हो गया था।बाल भी सफ़ेद होने लगे थे।एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया व अपने गुरुदेव को भी बुलाया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दी, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे भी उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है, वरना राजा का क्या भरोसा दंड दे दे। तो उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक *दोहा* पढ़ा - ... *"घणी गई थोड़ी रही, या में पल पल जाय।* *एक पलक के कारणे, युं ना कलंक लगाय।"* ... अब इस *दोहे* का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। ... जब यह दोहा *गुरु जी* ने सुना तो गुरुजी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को अर्पण कर दी। ... दोहा सुनते ही *राजकुमारी* ने भी अपना *नौलखा हार* नर्तकी को भेंट कर दिया। ... *दोहा* सुनते ही राजा के *युवराज* ने भी अपना *मुकुट* उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया । *राजा बहुत ही अचम्भित हो गया।* सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है पर यह क्या! अचानक *एक दोहे* से सब अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुश हो कर नर्तकी को समर्पित कर रहें हैं ? *राजा* सिंहासन से उठा और नर्तकी को बोला *एक दोहे* द्वारा एक सामान्य नर्तकी होकर तुमने सबको लूट लिया। ... जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरुजी कहने लगे - "राजा ! इसको *नीच नर्तकी मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है क्योंकि इसके दोहे ने मेरी आँखें खोल दी हैं*। दोहे से यह कह रही है कि *मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ,* भाई ! मैं तो चला ।" यह कहकर गुरुजी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े। ... *राजा की लड़की* ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरा विवाह नहीं कर रहे थे। आज रात मैं आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद करने वाली थी। लेकिन इस *नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दी, कि जल्दबाज़ी न कर, हो सकता है तेरा विवाह कल हो जाए, क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?"* ... *युवराज ने कहा -* महाराज ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैं आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपको मारने वाला था। लेकिन इस *दोहे ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है! थोड़ा धैर्य रख।"* ... जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैंसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया । ... *यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा -* "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना नृत्य बन्द करती हूँ "हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।" ************************************* 2026-04-11 05:58:40