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*भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी*
*पूर्व भव -* _अंगदेश के चम्पापुर नगर में हरिवर्मा नामक एक राजा राज्य करते थे। एक दिन नगर के बाह्य उद्यान में अनन्तवीर्य नामक निर्ग्रन्थ मुनिराज पधारे। उनका आगमन सुनकर अपने परिजनों-पुरजनों के साथ पूजा की सामग्री लेकर दर्शनों के गये। वहां जाकर राजा ने मुनिराज की तीन प्रदक्षिणा दी, तीन बार वंदना की और उनकी पूजा की। फिर हाथ जोड़कर विनय पूर्वक मुनिराज से धर्म के स्वरूप की जिज्ञासा की। मुनिराज ने विस्तार पूर्वक धर्म का स्वरूप समझाते हुए कल्याण का मार्ग बताया। उपदेश सुनकर महाराज हरिवर्मा को आत्म-कल्याण की अन्त:प्रेरणा हुई। उन्होंने बड़े पुत्र को राज्य सौंपकर बाह्य और अभ्यंतर दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग करके जैनेन्द्री दीक्षा ले ली। उन्होंने गुरु के चरणों में रहकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और दर्शन विशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन कर तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर लिया। इस प्रकार चिरकाल तक नाना प्रकार के तप करके आत्म-विशुद्धि करते हुए अन्त में समाधि मरण करके प्राणत स्वर्ग के इन्द्र का पद प्राप्त किया।_
_जब उस इन्द्र की आयु छः माह शेष रह गयी,तब राजगृह नगरी के स्वामी हरिवंश शिरोमणि काश्यपगोत्री महाराज सुमित्र के घर में छः माह तक रत्नवर्षा हुई। जब इन्द्र की आयु पूर्ण होने वाली थी,तब महाराज सुमित्र की महारानी सोमा को श्रावण कृष्ण द्वितीया को श्रवण नक्षत्र में रात्रि के अन्तिम प्रहर में तीर्थंकर प्रभु के गर्भावतरण के सूचक सोलह स्वप्न दिखाई दिए। स्वप्नों के अनन्तर उन्हें एक तेजस्वी गजराज मुख में प्रवेश करता हुआ दिखाई दिया। उस इन्द्र का जीव तभी महारानी सोमा के गर्भ में अवतरित हुआ।_
*गर्भ कल्याणक*
_प्रातः काल होने पर स्नानादि से निवृत्त होकर महारानी हर्षित होती हुई महाराज के पास पहुंची और उन्हें रात्रि में देखे हुए स्वप्न कह सुनाये तथा उनसे इन स्वप्नों का फल पूछा। महाराज ने अवधिज्ञान से फल जानकर महारानी को बताया - देवी ! तुम्हारे गर्भ से तीन जगत के स्वामी तीर्थंकर प्रभु जन्म लेंगे। सुनकर महारानी को अपार हर्ष हुआ। तभी देवों ने आकर माता का अभिषेक किया और भगवान का गर्भ कल्याणक मनाया। सौधर्म इन्द्र देवियों को माता की सेवा में नियुक्त करके देवों के साथ वापस चला गया_
*जन्म कल्याणक*
_यथासमय तीर्थंकर प्रभु का जन्म हुआ। चारों जाति के इन्द्र और देव,इन्द्राणी और देवियां आई और भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर देवों ने उनका अभिषेक किया। सौधर्मेन्द्र ने उस समय बालक का नाम मुनिसुव्रत नाथ रखा। उनका जन्म चिह्न कछुआ था।_
_भगवान की आयु तीस हजार वर्ष थी। शरीर की ऊंचाई बीस धनुष की थी। उनके शरीर का वर्ण मयूर के कण्ठ के समान नील था। भगवान एक हजार आठ लक्षणों और तीन ज्ञानों से युक्त थे।_
_जब कुमार काल के साढ़े सात हजार वर्ष व्यतीत हो गये,तब पिता ने उनका विवाह कर दिया तथा राज्याभिषेक करके राज्यभार सौंप दिया। उन्होंने सुख पूर्वक साढ़े सात हजार वर्ष तक राज्य किया। एक दिन आकाश में घनघोर घटा छाई हुई थी। तभी उनकी गजशाला के अधिपति ने यह समाचार दिया कि प्रसिद्ध यागहस्ती ने आहार छोड़ दिया है। समाचार सुनकर भगवान चिंतन में लीन हो गए। किन्तु उपस्थित सभासदों को इस समाचार से बड़ा कुतूहल हुआ। उन्होंने भगवान से इसका कारण जानना चाहा। भगवान बोले - पूर्वभव में यह हाथी तालपुर नगर का स्वामी नरपति नाम का राजा था। यह बड़ा अभिमानी था। यह पात्र-अपात्र का भेद नहीं जानता था। इसने किमिच्छक दान दिया। इस कुदान के प्रभाव से इसे तिर्यंच योनि प्राप्त हुई और यह हाथी बना।_
_जब भगवान सभासदों को हाथी का पूर्वभव सुना रहे थे,उस समय हाथी वहां खड़ा हुआ यह सुन रहा था। सुनकर उसे जाति स्मरण ज्ञान हो गया। उसने उसी समय संयमासंयम धारण कर लिया अर्थात् श्रावक के व्रत धारण कर लिए। भगवान के मन में भी संसार से वैराग्य हो गया। उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर भगवान की वन्दना की और भगवान के विचारों की सराहना की। उन्होंने अपने पुत्र युवराज विजय को राज्य सौंप दिया। तभी देवों ने आकर भगवान का दीक्षाभिषेक किया। फिर वे मनुष्यों और देवताओं से उठाई हुई अपराजिता नामक पालकी में बैठकर विपुल नामक उद्यान में पहुंचे। वहां दो दिन के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिन श्रवण नक्षत्र में सांयकाल के समय एक हजार राजाओं के साथ समस्त सावद्य से विरत होकर और सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग करके जिन दीक्षा ग्रहण कर ली। भगवान ने जो केशलोंच किया था,उन बालों को रत्नमंजुषा में रखकर सौधर्म इंद्र ने क्षीरसागर में प्रवाहित कर दिया। दीक्षा लेते ही संयम और भाव विशुद्धि के प्रभाव से भगवान को मन:पर्यय ज्ञान उत्पन्न हो गया। दीक्षा लेकर वे ध्यानमग्न हो गये। उपवास समाप्त होने पर वे पारणा के लिए राजगृह नगर में पधारे और वहां वृषभदत्त राजा ने परमान्न भोजन से पारणा कराया। यद्यपि भगवान समभाव से तृप्त थे, उन्हें आहार की कोई आवश्यकता नहीं थी। किन्तु जिनशासन में आचार की वृत्ति किस तरह है, यह बतलाने के लिए उन्होंने आहार ग्रहण किया था। आहार दान के प्रभाव से राजा वृषभदत्त देवकृत पंचातिशयों को प्राप्त हुआ।_
_इस प्रकार तपश्चरण करते हुए छद्मस्थ अवस्था के जब ग्यारह माह व्यतीत हो गये,तब वे दीक्षा-वन में पहुंचे और एक चम्पक वृक्ष के नीचे स्थित होकर दो दिन के उपवास का नियम लिया। शुक्ल ध्यान में विराजमान भगवान को दीक्षा लेने के मास, पक्ष, नक्षत्र और तिथि में अर्थात् वैशाख कृष्ण नवमी के दिन श्रवण नक्षत्र में संध्या के समय घातिया कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। भगवान सर्वज्ञ सर्वदर्शी हो गये। तभी इन्द्रों और देवों ने आकर भगवान के केवलज्ञान कल्याणक का उत्सव किया और समवशरण की रचना की। समवशरण में विराजमान होकर भगवान ने गणधरों, देवों, मनुष्यों और तिर्यंचों को सागार और अनगार धर्म का उपदेश दिया,जिसे सुनकर अनेकों ने संयम धारण किया, बहुतों ने श्रावक के व्रत ग्रहण किए और बहुत से भव्य प्राणियों ने सम्यग्दर्शन धारण किया, अनेकों ने सम्यग्दर्शन में निर्मलता प्राप्त की।_
_भगवान के संघ में मल्लि आदि अठारह गणधर थे जो अपने-अपने गणों की धर्म रक्षा करते थे। 500 द्वादशांग के वेत्ता, 2100 शिक्षक मुनि, 1800 अवधिज्ञानी मुनि, 1800 केवलज्ञानी मुनि, 2200 विक्रिया ऋद्धिधारी मुनिराज, 1500 मन: पर्यय ज्ञानी मुनि और 1200 वादी मुनि थे। इस प्रकार सब मिलाकर 30,000 मुनिराज उनके साथ थे। पुष्पदत्ता आदि 50,000 आर्यिकाऐं थी। एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएं थी। उनके भक्त संख्यात तिर्यंच और असंख्यात देव थे।_
_धर्म देशना देते हुए भगवान मुनि संघ के साथ विभिन्न देशों में विहार करते रहे। जब उनकी आयु एक मास शेष रह गयी तब वे सम्मेद शिखर पर पहुंचे और एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण कर योग निरोध कर लिया और फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन रात्रि के अन्तिम प्रहर में समस्त घातिया कर्मों का क्षय करके निर्वाण प्राप्त किया,वे सिद्ध मुक्त हो गये। उसी समय देवों और इन्द्रों ने आकर भगवान के निर्वाण कल्याणक की पूजा की।_
_भगवान के सेवक वरुण यक्ष और बहुरुपिणी यक्षिणी थे।_
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2026-02-14 16:46:14 |
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