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73411 40449732 ? पंच परमेष्ठी जैनसमूह ? ? *जय जिनेन्द्र* ? ? एक लक्ष्य... एक ध्येय... एक उद्देश्य... ✨ *“जैन का विवाह जैन से ही हो”*✨ ? 11 वर्षों का विश्वास ? 2,20,000+ जैन बायोडाटा ? 22,000+ सफल विवाह ? *MEGA Maha-Online Parichay Sammelan 2026* ? 01 MAY 2026 – 15 JUNE 2026 ? *विशेष अवसर – केवल पहले 1000 सदस्य!* ? आज ही जुड़ें और पाएं अपने मनपसंद जैन जीवनसाथी *? Verified Profiles | Secure Process | Trusted by Jain Samaj* ? नाममात्र शुल्क: ₹2100/- ? Join Official WhatsApp Group: <a href="https://chat.whatsapp.com/G8R4iF9gdQa4IxQjCwTgBh?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/G8R4iF9gdQa4IxQjCwTgBh?mode=gi_t</a> *? Contact / WhatsApp:* 6260249730 *? Powered by: Mahavir Biodata Bank* ? Support: 100+ Jain Organisations *? नोट:* यह अवसर सीमित है, देर न करें — अभी जुड़ें! *? जैन एकता का संदेश फैलाएं:* ? इस संदेश को कम से कम 10 जैन ग्रुप में अवश्य भेजें *? “मैंने भेज दिया है... क्या आपने भेजा?”* 2026-04-10 05:00:30
73412 40449732 ? पंच परमेष्ठी जैनसमूह ? ? *जय जिनेन्द्र* ? ? एक लक्ष्य... एक ध्येय... एक उद्देश्य... ✨ *“जैन का विवाह जैन से ही हो”*✨ ? 11 वर्षों का विश्वास ? 2,20,000+ जैन बायोडाटा ? 22,000+ सफल विवाह ? *MEGA Maha-Online Parichay Sammelan 2026* ? 01 MAY 2026 – 15 JUNE 2026 ? *विशेष अवसर – केवल पहले 1000 सदस्य!* ? आज ही जुड़ें और पाएं अपने मनपसंद जैन जीवनसाथी *? Verified Profiles | Secure Process | Trusted by Jain Samaj* ? नाममात्र शुल्क: ₹2100/- ? Join Official WhatsApp Group: <a href="https://chat.whatsapp.com/G8R4iF9gdQa4IxQjCwTgBh?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/G8R4iF9gdQa4IxQjCwTgBh?mode=gi_t</a> *? Contact / WhatsApp:* 6260249730 *? Powered by: Mahavir Biodata Bank* ? Support: 100+ Jain Organisations *? नोट:* यह अवसर सीमित है, देर न करें — अभी जुड़ें! *? जैन एकता का संदेश फैलाएं:* ? इस संदेश को कम से कम 10 जैन ग्रुप में अवश्य भेजें *? “मैंने भेज दिया है... क्या आपने भेजा?”* 2026-04-10 05:00:30
73409 50889696 श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी 2026-04-10 04:57:30
73410 50889696 श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी 2026-04-10 04:57:30
73408 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-10 04:49:39
73407 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-10 04:49:38
73405 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *"जगत की रीत"* एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी। वहीं थोड़ी दूरी पर एक सन्त ने अपना बसेरा किया हुआ था। जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी सन्त के पास पहुँचे। जब सन्त ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है। मन भी नहीं होता पानी पीने को।” सन्त ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ? लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ? सन्त ने कहा - 'एक काम करो, उसमें गंगाजल डलवाओ। कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया। फिर भी समस्या जस की तस रही। लोग फिर से सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।” लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस। लोग फिर सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात। लोग फिर सन्त के पास, अब सन्त खुद चलकर आये। लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया। गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं। अब सन्त आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला। तो सन्त ने पूछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ? लोग बोले - उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं। सन्त बोले - "जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।" ऐसी ही कथा हमारे जीवन की भी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं। इन्हीं की सारी बदबू है। हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है। तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा। **************************************** (2) *कहानी* *?दो सत्य कथाऐं ; पढ़ने के बाद आप सब भी अपनी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ बदल देंगे?* *पहली*कथा* ?दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मांडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। खाना आने के बाद सभी खाने लगे, *वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।* खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर रेस्तरां से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। *वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।* मांडेला ने कहा *मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।* *दूसरी कथा* ?मुंबई से बैंगलुरू जा रही ट्रेन में सफ़र के दौरान टीसी ने सीट के नीचे छिपी लगभग तेरह/चौदह साल की ऐक लड़की से कहा टीसी "टिकट कहाँ है?" काँपती हुई लडकी "नहीं है साहब।" टी सी "तो गाड़ी से उतरो।" *इसका टिकट मैं दे रही हूँ।............पीछे से ऐक सह यात्री ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।* ऊषा जी - "तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की - "पता नहीं मैम!" ऊषा जी - "तब मेरे साथ चलो, बैंगलोर तक!" ऊषा जी - "तुम्हारा नाम क्या है?" लड़की - "चित्रा" बैंगलुरू पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी जान पहचान की ऐक स्वंयसेवी संस्था को सौंप दिया और ऐक अच्छे स्कूल में भी एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली हो गया जिसके कारण चित्रा से संपर्क टूट गया, कभी-कभार केवल फोन पर बात हो जाया करती थी। करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गईं तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल चुका दिया था। ऊषाजी "तुमने मेरा बिल क्यों भरा?" *मैम, यह मुम्बई से बैंगलुरू तक के रेल टिकट के सामने कुछ भी नहीं है ।* ऊषाजी "अरे चित्रा!" ... चित्रा और कोई नहीं बल्कि *इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थीं जो इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं।* यह लघु कथा उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से ली गई है। *कभी कभी आपके द्वारा की गई किसी की सहायता, किसी का जीवन बदल सकती है।* 2026-04-10 04:41:26
73406 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *"जगत की रीत"* एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी। वहीं थोड़ी दूरी पर एक सन्त ने अपना बसेरा किया हुआ था। जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी सन्त के पास पहुँचे। जब सन्त ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है। मन भी नहीं होता पानी पीने को।” सन्त ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ? लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ? सन्त ने कहा - 'एक काम करो, उसमें गंगाजल डलवाओ। कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया। फिर भी समस्या जस की तस रही। लोग फिर से सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।” लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस। लोग फिर सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात। लोग फिर सन्त के पास, अब सन्त खुद चलकर आये। लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया। गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं। अब सन्त आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला। तो सन्त ने पूछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ? लोग बोले - उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं। सन्त बोले - "जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।" ऐसी ही कथा हमारे जीवन की भी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं। इन्हीं की सारी बदबू है। हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है। तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा। **************************************** (2) *कहानी* *?दो सत्य कथाऐं ; पढ़ने के बाद आप सब भी अपनी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ बदल देंगे?* *पहली*कथा* ?दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मांडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। खाना आने के बाद सभी खाने लगे, *वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।* खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर रेस्तरां से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। *वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।* मांडेला ने कहा *मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।* *दूसरी कथा* ?मुंबई से बैंगलुरू जा रही ट्रेन में सफ़र के दौरान टीसी ने सीट के नीचे छिपी लगभग तेरह/चौदह साल की ऐक लड़की से कहा टीसी "टिकट कहाँ है?" काँपती हुई लडकी "नहीं है साहब।" टी सी "तो गाड़ी से उतरो।" *इसका टिकट मैं दे रही हूँ।............पीछे से ऐक सह यात्री ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।* ऊषा जी - "तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की - "पता नहीं मैम!" ऊषा जी - "तब मेरे साथ चलो, बैंगलोर तक!" ऊषा जी - "तुम्हारा नाम क्या है?" लड़की - "चित्रा" बैंगलुरू पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी जान पहचान की ऐक स्वंयसेवी संस्था को सौंप दिया और ऐक अच्छे स्कूल में भी एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली हो गया जिसके कारण चित्रा से संपर्क टूट गया, कभी-कभार केवल फोन पर बात हो जाया करती थी। करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गईं तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल चुका दिया था। ऊषाजी "तुमने मेरा बिल क्यों भरा?" *मैम, यह मुम्बई से बैंगलुरू तक के रेल टिकट के सामने कुछ भी नहीं है ।* ऊषाजी "अरे चित्रा!" ... चित्रा और कोई नहीं बल्कि *इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थीं जो इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं।* यह लघु कथा उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से ली गई है। *कभी कभी आपके द्वारा की गई किसी की सहायता, किसी का जीवन बदल सकती है।* 2026-04-10 04:41:26
73404 50889696 श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी 2026-04-10 04:39:36
73403 50889696 श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी 2026-04-10 04:39:35