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40449689 |
? विद्या शरणम ०१ ? |
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*? श्रुत स्वरांजलि : सादर आमंत्रण ?*
श्रुतपंचमी महापर्व 2026 के पावन अवसर पर आयोजित श्रुत स्वरांजली सीजन-2, श्रुतरत्न सम्मान, तत्त्वार्थसूत्र आम्नाय प्रतियोगिता, सम्यक्त्व कौमुदी परीक्षा एवं अन्य विविध धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आप सभी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन है।
हम, समस्त पारस परिवार एवं सभी प्रायोजकगण, समाज के प्रत्येक सदस्य, धर्मप्रेमी बंधुओं, अतिथियों एवं प्रतिभागियों को सपरिवार इस भव्य आयोजन में पधारकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने हेतु विनम्र आमंत्रण प्रदान करते हैं।
आपकी उपस्थिति ही इस आयोजन की वास्तविक सफलता एवं हमारा सौभाग्य है।
आइए, जिनवाणी, श्रुत एवं धर्मप्रभावना को समर्पित इस ऐतिहासिक आयोजन के सहभागी बनें।
? स्थान : वर्धमान कॉम्प्लेक्स, आरोन (म.प्र.)
? 17, 18 एवं 19 जून 2026
आपकी प्रतीक्षा में…
*? प्रायोजक -* श्री सुरेश चंद जी,नरेश चंद जी,शशि जैन, आशीष कुमार, अमित कुमार, अभिषेक जैन, ऋचा जैन, नेहा जैन, प्राची जैन, ऋषि जैन, परी जैन, पारस जैन,अर्शिका जैन,पर्व जैन, आस्था जैन, समस्त पारस परिवार।
1. पारस ट्रेडर्स आरोन
2. भवानी मार्बल्स-टाइल्स एवं सैनेटरी
3. मैग्मा टीएमटी प्राइवेट लिमिटेड (इंडिया)
*? आयोजक -* सकल दिगम्बर जैन समाज आरोन जिला -गुना (म.प्र.) एवं श्री विद्याशरणम् परिवार (भारत)
*☀️ संयोजक -* निर्ग्रन्थ क्रियेशन (इंदौर)
? स्थान : वर्धमान कॉम्प्लेक्स, आरोन (म.प्र.)
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*॥ वर्धतां जिनशासनं ॥* |
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2026-06-15 20:42:08 |
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40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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*बारूद के ढेर पर बैठा जैन समाज : दिखावे की चकाचौंध, टूटी संवेदनाएँ और बिखरती पहचान का नग्न सच*
जैन समाज आज बाहर से जितना शांत और सुसंस्कृत दिखाई देता है, भीतर उतना ही तनावग्रस्त, बिखरा हुआ और दिशाहीन हो चुका है। यह स्थिति किसी एक घटना या एक पीढ़ी की देन नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती संवेदनहीनता, दिखावा, आडंबर, मौन और आंतरिक विघटन का परिणाम है। बाहर भव्यता है, भीतर खोखलापन। मंच जगमगा रहे हैं, लेकिन आत्मा अंधेरे में डूबी है। सच यही है—पूरा जैन समाज बारूद के ढेर पर बैठ चुका है, और हमें इसका एहसास तक नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या है *कमजोर सधार्मिक की ओर से समाज का पूरी तरह मुंह फेर लेना।* हमारे शास्त्र बार-बार “परस्परोपग्रहो जीवाना” की घोषणा करते हैं, लेकिन व्यवहार में आज समाज में सबसे अधिक अनदेखा वही है जो संघर्ष कर रहा है। किसी के घर में बीमारी हो, बेटा-बेटी की शादी अटकी हो, रोजगार छूट गया हो, कोई मानसिक रूप से दबा हो—इन समस्याओं के लिए समाज के पास न समय है न तंत्र। परंतु स्थानको में करोड़ों के आयोजन, फूलों से सजी शोभायात्राएँ, बड़े-बड़े मंचों की चकाचौंध—ये सब ‘धर्म’ कहलाते हुए भी वास्तविक धर्म की जड़ को खोखला कर रहे हैं। संवेदनहीनता अगर किसी समाज की पहचान बन जाए तो समझ लेना चाहिए कि विस्फोट बस समय की बात है
अब बात समाज की उन समस्याओं की, जो अंदर ही अंदर हमें खोखला कर चुकी हैं—
(१) देर से विवाह और ‘सही लड़का/लड़की’ की अंधी खोज:
जैन समाज में लेट मैरिज आज एक सामाजिक महामारी बन चुकी है। माता-पिता की अवास्तविक अपेक्षाएँ, तुलना, अहंकार और दिखावे के कारण योग्य युवक-युवतियाँ 30–35 की उम्र पार कर रहे हैं। परिणाम—तनाव, अवसाद, एकाकीपन और टूटता सामाजिक ढांचा।
(२) जनसंख्या का खतरनाक रूप से गिरना:
एक बच्चा नीति, करियर का दबाव, और सामाजिक दिखावे की वजह से हमारी जनसंख्या तेजी से कम हो रही है। आने वाले दशकों में हमारी स्थिति अत्यंत कमजोर होने वाली है और हम अभी भी निश्चिंत बैठे हैं।
(३) आर्थिक असमानता और आपसी जलन:
व्यापार हमारा मुख्य क्षेत्र है, लेकिन सबसे अधिक जलन और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी यहीं पाई जाती है। सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा, मिलकर उठने की जगह एक-दूसरे को गिराने की मानसिकता बढ़ी है। यह आपसी विघटन समाज की ताकत को खत्म कर रहा है।
(४) धार्मिक स्थानों का निजीकरण:
स्थानक अब धर्म के केंद्र कम और सत्ता संघर्ष का मैदान ज्यादा बन गए हैं। समितियाँ बंट रही हैं, नियंत्रण के झगड़े बढ़ रहे हैं, पारदर्शिता खत्म हो रही है। श्रावक/श्राविकाओ में विश्वास कम हो रहा है और धर्म का सम्मान चोटिल हो रहा है।
(५) युवाओं का धर्म से दूर होना:
युवा पीढ़ी स्थानक से जुड़ना चाहती है, पर उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिलता, उन्हे बेवजह दबाया जाता है। धर्म की गहराई की बजाय उन्हें इवेंट दिखाए जाते हैं। परिणाम—युवा धर्म से दूरी बना रहे हैं, और यह दूरी समाज के भविष्य को अंधकार की ओर ले जा रही है।
(६) वृद्धजनों की अनदेखी:
बुज़ुर्ग परिवारों में ही नहीं, समाज में भी अकेले पड़ते जा रहे हैं। सम्मान घट रहा है, संवाद कम हो रहा है, और देखभाल दिखावे तक सीमित है। यह समाज की जड़ों को कमजोर करने वाला बड़ा कारण है।
(७) संगठनात्मक बिखराव और राजनीतिक शून्यता:
हर शहर में समाज है, हर समाज में कमेटियाँ हैं, और हर कमेटी में गुटबाजी। न कोई सामूहिक लक्ष्य, न कोई सामूहिक नीति। यह स्थिति किसी भी समाज को कमजोर और असुरक्षित बना देती है।
इन सबके बीच सबसे दुखद यह है कि हमें अपनी ही समस्याएँ स्वीकार करने का साहस नहीं। हम बाहरी चमक में इतने उलझ गए हैं कि भीतर की सड़ती जड़ों को देखने की फुर्सत ही नहीं बची। पर सच तो यही है— *भव्यता किसी समाज को महान नहीं बनाती; महानता आती है संवेदना,एकता, त्याग और सामूहिक चेतना से।*
*जैन समाज में इन सब समस्याओं के समाधान की अपार संभावनाएँ हैं। अगर हम दिखावे से हटकर सत्य को देखने की हिम्मत जुटाएँ, कमजोरों की चिंता को धर्म के केंद्र में लाएँ, साधुओं से साधना की अपेक्षा करें न कि प्रचार की, युवाओं को शास्त्रीय मार्ग दिखाएँ और एकता के आधार पर राजनीतिक आवाज खड़ी करें—तो यह बारूद शक्ति बन सकता है, विनाश नहीं।*
वरना इतिहास गवाह है— *जो समाज अपने भीतर की आग नहीं बुझाता, वह बाहर की आँधियों से नहीं बच पाता।*
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2026-06-15 20:40:09 |
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1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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*बारूद के ढेर पर बैठा जैन समाज : दिखावे की चकाचौंध, टूटी संवेदनाएँ और बिखरती पहचान का नग्न सच*
जैन समाज आज बाहर से जितना शांत और सुसंस्कृत दिखाई देता है, भीतर उतना ही तनावग्रस्त, बिखरा हुआ और दिशाहीन हो चुका है। यह स्थिति किसी एक घटना या एक पीढ़ी की देन नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती संवेदनहीनता, दिखावा, आडंबर, मौन और आंतरिक विघटन का परिणाम है। बाहर भव्यता है, भीतर खोखलापन। मंच जगमगा रहे हैं, लेकिन आत्मा अंधेरे में डूबी है। सच यही है—पूरा जैन समाज बारूद के ढेर पर बैठ चुका है, और हमें इसका एहसास तक नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या है *कमजोर सधार्मिक की ओर से समाज का पूरी तरह मुंह फेर लेना।* हमारे शास्त्र बार-बार “परस्परोपग्रहो जीवाना” की घोषणा करते हैं, लेकिन व्यवहार में आज समाज में सबसे अधिक अनदेखा वही है जो संघर्ष कर रहा है। किसी के घर में बीमारी हो, बेटा-बेटी की शादी अटकी हो, रोजगार छूट गया हो, कोई मानसिक रूप से दबा हो—इन समस्याओं के लिए समाज के पास न समय है न तंत्र। परंतु स्थानको में करोड़ों के आयोजन, फूलों से सजी शोभायात्राएँ, बड़े-बड़े मंचों की चकाचौंध—ये सब ‘धर्म’ कहलाते हुए भी वास्तविक धर्म की जड़ को खोखला कर रहे हैं। संवेदनहीनता अगर किसी समाज की पहचान बन जाए तो समझ लेना चाहिए कि विस्फोट बस समय की बात है
अब बात समाज की उन समस्याओं की, जो अंदर ही अंदर हमें खोखला कर चुकी हैं—
(१) देर से विवाह और ‘सही लड़का/लड़की’ की अंधी खोज:
जैन समाज में लेट मैरिज आज एक सामाजिक महामारी बन चुकी है। माता-पिता की अवास्तविक अपेक्षाएँ, तुलना, अहंकार और दिखावे के कारण योग्य युवक-युवतियाँ 30–35 की उम्र पार कर रहे हैं। परिणाम—तनाव, अवसाद, एकाकीपन और टूटता सामाजिक ढांचा।
(२) जनसंख्या का खतरनाक रूप से गिरना:
एक बच्चा नीति, करियर का दबाव, और सामाजिक दिखावे की वजह से हमारी जनसंख्या तेजी से कम हो रही है। आने वाले दशकों में हमारी स्थिति अत्यंत कमजोर होने वाली है और हम अभी भी निश्चिंत बैठे हैं।
(३) आर्थिक असमानता और आपसी जलन:
व्यापार हमारा मुख्य क्षेत्र है, लेकिन सबसे अधिक जलन और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी यहीं पाई जाती है। सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा, मिलकर उठने की जगह एक-दूसरे को गिराने की मानसिकता बढ़ी है। यह आपसी विघटन समाज की ताकत को खत्म कर रहा है।
(४) धार्मिक स्थानों का निजीकरण:
स्थानक अब धर्म के केंद्र कम और सत्ता संघर्ष का मैदान ज्यादा बन गए हैं। समितियाँ बंट रही हैं, नियंत्रण के झगड़े बढ़ रहे हैं, पारदर्शिता खत्म हो रही है। श्रावक/श्राविकाओ में विश्वास कम हो रहा है और धर्म का सम्मान चोटिल हो रहा है।
(५) युवाओं का धर्म से दूर होना:
युवा पीढ़ी स्थानक से जुड़ना चाहती है, पर उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिलता, उन्हे बेवजह दबाया जाता है। धर्म की गहराई की बजाय उन्हें इवेंट दिखाए जाते हैं। परिणाम—युवा धर्म से दूरी बना रहे हैं, और यह दूरी समाज के भविष्य को अंधकार की ओर ले जा रही है।
(६) वृद्धजनों की अनदेखी:
बुज़ुर्ग परिवारों में ही नहीं, समाज में भी अकेले पड़ते जा रहे हैं। सम्मान घट रहा है, संवाद कम हो रहा है, और देखभाल दिखावे तक सीमित है। यह समाज की जड़ों को कमजोर करने वाला बड़ा कारण है।
(७) संगठनात्मक बिखराव और राजनीतिक शून्यता:
हर शहर में समाज है, हर समाज में कमेटियाँ हैं, और हर कमेटी में गुटबाजी। न कोई सामूहिक लक्ष्य, न कोई सामूहिक नीति। यह स्थिति किसी भी समाज को कमजोर और असुरक्षित बना देती है।
इन सबके बीच सबसे दुखद यह है कि हमें अपनी ही समस्याएँ स्वीकार करने का साहस नहीं। हम बाहरी चमक में इतने उलझ गए हैं कि भीतर की सड़ती जड़ों को देखने की फुर्सत ही नहीं बची। पर सच तो यही है— *भव्यता किसी समाज को महान नहीं बनाती; महानता आती है संवेदना,एकता, त्याग और सामूहिक चेतना से।*
*जैन समाज में इन सब समस्याओं के समाधान की अपार संभावनाएँ हैं। अगर हम दिखावे से हटकर सत्य को देखने की हिम्मत जुटाएँ, कमजोरों की चिंता को धर्म के केंद्र में लाएँ, साधुओं से साधना की अपेक्षा करें न कि प्रचार की, युवाओं को शास्त्रीय मार्ग दिखाएँ और एकता के आधार पर राजनीतिक आवाज खड़ी करें—तो यह बारूद शक्ति बन सकता है, विनाश नहीं।*
वरना इतिहास गवाह है— *जो समाज अपने भीतर की आग नहीं बुझाता, वह बाहर की आँधियों से नहीं बच पाता।*
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2026-06-15 20:40:08 |
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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु गुरुदेव |
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2026-06-15 20:39:13 |
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| 233005 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु गुरुदेव |
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2026-06-15 20:39:12 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु गुरुदेव |
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2026-06-15 20:38:31 |
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| 233004 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु गुरुदेव |
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2026-06-15 20:38:31 |
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| 233001 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु भगवन् |
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2026-06-15 20:38:14 |
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| 233002 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु भगवन् |
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2026-06-15 20:38:14 |
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| 232999 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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नमोस्तु गुरुदेव |
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2026-06-15 20:38:02 |
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