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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Message
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Date |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-16 07:56:04 |
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| 5656 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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2026-02-16 07:56:03 |
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| 5655 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-16 07:52:04 |
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| 5654 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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धर्मानुरागी महानुभाव,
सादर जय जिनेन्द्र… ?
अनादि काल से संसार-सागर में भटकती हुई आत्मा को परमात्म पद की ओर अग्रसर करने वाला जो दिव्य अवसर है, वही श्री जिनेन्द्र भगवान का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव है। यह कोई राग-रंग का उत्सव नहीं, अपितु आत्मजागरण, श्रद्धा, संयम और वैराग्य का अनुपम आध्यात्मिक पर्व है। इसमें गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान और निर्वाण—इन पंच परम कल्याणकों की पावन स्मृति के माध्यम से आत्मा को उसके शुद्ध, बुद्ध और सिद्ध स्वरूप का बोध कराया जाता है।
महान पुण्योदय से धर्मनगरी सरधना (मेरठ) की पावन धरा पर,
दिगंबर जैन परंपरा के गौरव स्तंभ
आचार्य श्री शान्तिसागर जी (हस्तिनापुर वाले) की परंपरा प्रवर्तक,
समाधि सम्राट
आचार्य श्री धर्मभूषण जी महामुनिराज के परम शिष्य,
वात्सल्य मूर्ति, सरल स्वभावी, पाठशाला प्रेरक
आचार्य श्री भारत भूषण जी मुनिराज (ससंघ)
के पावन सान्निध्य में यह भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव आयोजित हो रहा है।
यह महोत्सव हमें सिखाता है कि
देह नहीं, आत्मा ही हमारा वास्तविक स्वरूप है;
मोह नहीं, सम्यग्दर्शन ही जीवन का प्रकाश है;
और विषय नहीं, संयम ही परम सुख का मार्ग है।
अतः आप सभी श्रद्धाल |
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2026-02-16 07:51:24 |
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| 5653 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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धर्मानुरागी महानुभाव,
सादर जय जिनेन्द्र… ?
अनादि काल से संसार-सागर में भटकती हुई आत्मा को परमात्म पद की ओर अग्रसर करने वाला जो दिव्य अवसर है, वही श्री जिनेन्द्र भगवान का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव है। यह कोई राग-रंग का उत्सव नहीं, अपितु आत्मजागरण, श्रद्धा, संयम और वैराग्य का अनुपम आध्यात्मिक पर्व है। इसमें गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान और निर्वाण—इन पंच परम कल्याणकों की पावन स्मृति के माध्यम से आत्मा को उसके शुद्ध, बुद्ध और सिद्ध स्वरूप का बोध कराया जाता है।
महान पुण्योदय से धर्मनगरी सरधना (मेरठ) की पावन धरा पर,
दिगंबर जैन परंपरा के गौरव स्तंभ
आचार्य श्री शान्तिसागर जी (हस्तिनापुर वाले) की परंपरा प्रवर्तक,
समाधि सम्राट
आचार्य श्री धर्मभूषण जी महामुनिराज के परम शिष्य,
वात्सल्य मूर्ति, सरल स्वभावी, पाठशाला प्रेरक
आचार्य श्री भारत भूषण जी मुनिराज (ससंघ)
के पावन सान्निध्य में यह भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव आयोजित हो रहा है।
यह महोत्सव हमें सिखाता है कि
देह नहीं, आत्मा ही हमारा वास्तविक स्वरूप है;
मोह नहीं, सम्यग्दर्शन ही जीवन का प्रकाश है;
और विषय नहीं, संयम ही परम सुख का मार्ग है।
अतः आप सभी श्रद्धाल |
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2026-02-16 07:51:15 |
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| 5652 |
40449672 |
वीरसागर जी के भक्त 34 |
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*WBC Counting ऐसे बढ़ाओ | 16 फरवरी 2026 | निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 वीरसागर जी महाराज*
?
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2026-02-16 07:51:07 |
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| 5651 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-02-16 07:51:04 |
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| 5650 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-02-16 07:51:03 |
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| 5649 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-02-16 07:51:01 |
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| 5648 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_योनियों की संख्या_
*सामण्णेण य एवं णव जोणीओ हवंति वित्थारे ।*
*लक्खाण चदुरसीदी जोणीओ होंति णियमेण ॥८८॥*
*गाथार्थ* - सामान्य से योनियाँ नौ प्रकार की हैं। विस्तार से योनियों के नियम से चौरासी लाख भेद हैं ।। ८८ ।।
*विशेषार्थ* - सचित्त, शीत, संवृत, अचित्त, उष्ण, विवृत, सचित्ताचित्तमिश्र, शीतोष्णमिश्र, संवृतविवृतमिश्र, योनियों के ये नो प्रकार हैं।' प्रत्यक्षज्ञानियों ने दिव्यचक्षु के द्वारा इन नव प्रकार की योनियों को देखा है और शेष छद्यस्थों ने आगम के कथन से जाना है। सामान्य से अर्थात् संक्षेप कथन की अपेक्षा योनियाँ नौ प्रकार की होती हैं, किन्तु विशेष अर्थात् विस्तार की अपेक्षा योनियों के ८४ लाख भेद हैं। -
??????? ? |
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2026-02-16 07:50:43 |
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