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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 77183 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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2026-04-11 12:53:03 |
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| 77184 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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2026-04-11 12:53:03 |
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| 77182 |
40449695 |
www yug marble stone work.Com |
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*श्रीमती मंजु जी जैन के जन्मदिन के पावन अवसर पर समिति की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। प्राचीन जिनालयों एवं जिन प्रतिमाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में आपके अमूल्य योगदान से प्राप्त पुण्य के लिए समिति सहस्त्रगुणित अनुमोदना करती है एवं प्रभु से प्रार्थना करती है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और आध्यात्मिक समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता रहे।* |
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2026-04-11 12:52:55 |
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| 77181 |
40449695 |
www yug marble stone work.Com |
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*श्रीमती मंजु जी जैन के जन्मदिन के पावन अवसर पर समिति की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। प्राचीन जिनालयों एवं जिन प्रतिमाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में आपके अमूल्य योगदान से प्राप्त पुण्य के लिए समिति सहस्त्रगुणित अनुमोदना करती है एवं प्रभु से प्रार्थना करती है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और आध्यात्मिक समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता रहे।* |
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2026-04-11 12:52:54 |
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| 77180 |
48925761 |
आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:52:24 |
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| 77179 |
48925761 |
आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:52:23 |
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| 77177 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:52:12 |
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| 77178 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:52:12 |
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| 77176 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:51:36 |
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| 77175 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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_*आहारचर्या* (पड़गाहन), 10/4/26, नागपुर, वर्तमान दिगंबर जैन *आचार्य श्री समयसागर जी महाराज*_
???
_*हमारे साथ श्री रघुनाथ*_
_*तो किस बात की चिंता*_
????
पराग-प्यासा भ्रमर-दल वह
कोंपल-फूल-फलों-दलों का
सौरभ सरस पीता है
पर उन्हें
पीड़ा कभी न पहुँचाता,
प्रत्युत,
*अपनी स्फुरणशील कर-छुवन से*
*उन्हें नचाता है*
*गुन-गुन-गुंजन-गान सुनाता।*
बस, इसी भाँति
पात्रों को दान दे कर
*दाता भी फूला न समाता,*
*होता आनन्द-विभोर वह।*
*अन्धकार घोर मिटता है,*
*जीवन में आती नयी भोर वह*
*और यही...तो*
*'भ्रामरी-वृत्ति' कही जाती सन्तों की !*
- _मूकमाटी :: ३३३, ३३४_
- _आचार्य श्री विद्यासागर जी_ |
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2026-04-11 12:51:35 |
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