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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 71735 |
40449717 |
JES PUNE Chapter ( JESP) |
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Jai Jinendra.
Sure many of you have attended विश्व नवकार महामंत्र दिवस at some location in Pune.
( Some could not due to Jobs need , personal imp emergency etc.)
Request please put thumb ( ?) to this msg, if U have attended physically anywhere in Pune.
This will help us to communicate, publish to HO, Indore. |
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2026-04-09 10:49:58 |
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| 71736 |
40449717 |
JES PUNE Chapter ( JESP) |
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Jai Jinendra.
Sure many of you have attended विश्व नवकार महामंत्र दिवस at some location in Pune.
( Some could not due to Jobs need , personal imp emergency etc.)
Request please put thumb ( ?) to this msg, if U have attended physically anywhere in Pune.
This will help us to communicate, publish to HO, Indore. |
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2026-04-09 10:49:58 |
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| 71733 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-04-09 10:49:08 |
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| 71734 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-04-09 10:49:08 |
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| 71732 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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अपनी अपनी भाषा में अपने क्षेत्र के ग्रुपों में भेजिए: हिंदी अंग्रेजी मराठी गुजराती कन्नड़ तमिल
CENSUS 2027 — PHASE ONE
एक भी जैन ना छूटे, जनगणना का संकल्प ना टूटे
Not even one Jain should be left out, let the census resolve not be broken.
एकही जैन सुटू नये, जनगणनेचा संकल्प तुटू नये
એક પણ જૈન ન છૂટે, વસ્તી ગણતરીનો સંકલ્પ ન તૂટે.
ಒಬ್ಬನೇ ಒಬ್ಬ ಜೈನನೂ ಬಿಟ್ಟುಹೋಗಬಾರದು, ಜನಗಣತಿಯ ಸಂಕಲ್ಪ ಮುರಿಯಬಾರದು.
ஒரு ஜெயின் கூட விடுபடக்கூடாது, கணக்கெடுப்பு உறுதிமொழி தளரக்கூடாது. |
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2026-04-09 10:49:00 |
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| 71731 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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अपनी अपनी भाषा में अपने क्षेत्र के ग्रुपों में भेजिए: हिंदी अंग्रेजी मराठी गुजराती कन्नड़ तमिल
CENSUS 2027 — PHASE ONE
एक भी जैन ना छूटे, जनगणना का संकल्प ना टूटे
Not even one Jain should be left out, let the census resolve not be broken.
एकही जैन सुटू नये, जनगणनेचा संकल्प तुटू नये
એક પણ જૈન ન છૂટે, વસ્તી ગણતરીનો સંકલ્પ ન તૂટે.
ಒಬ್ಬನೇ ಒಬ್ಬ ಜೈನನೂ ಬಿಟ್ಟುಹೋಗಬಾರದು, ಜನಗಣತಿಯ ಸಂಕಲ್ಪ ಮುರಿಯಬಾರದು.
ஒரு ஜெயின் கூட விடுபடக்கூடாது, கணக்கெடுப்பு உறுதிமொழி தளரக்கூடாது. |
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2026-04-09 10:48:59 |
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| 71729 |
40449785 |
Jain Heritage Kamthan |
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?????????? |
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2026-04-09 10:47:42 |
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| 71730 |
40449785 |
Jain Heritage Kamthan |
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?????????? |
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2026-04-09 10:47:42 |
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| 71727 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्यअवगाहना से सूक्ष्म वायुकायिक की जघन्यअवगाहना की गुणकार आवली के असंख्यातवें भाग की उत्पत्ति का क्रम तथा दोनों के मध्य की अवगाहनाओं के भेदों का कथन --_
*अवरुवरि इगिपदेसे जुदे असंखेज्जभागवड्ढीए ।*
*आदी णिरंतरमदो एगेगपदेसपरिवड्ढी ।।१०२॥*
*अवरोग्गाहणमाणे जहष्णपरिमिदश्रसंखरा सिहिदे ।*
*अवरस्सुवरिं उढ्ढे जेट्ठमसंखेज्जभागस्स ।।१०३।।*
*गाथार्थ* - जघन्य अवगाहना के प्रमाण में एक प्रदेश मिलाने से असंख्यातभागवृद्धि का आदि-स्थान होता है। इसके ऊपर निरन्तर एक-एक प्रदेश की वृद्धि होती जाती है। जघन्य अवगाहना के प्रदेशों में जघन्य परीतासंख्यात का भाग देने से जो लब्ध आवे उतने प्रदेशों की वृद्धि हो जाने पर असंख्यातभागवृद्धि का उत्कृष्ट स्थान होता है ।।१०२-१०३।।
*विशेषार्थ* - इन दोनों गाथाओं में जो विषय प्रतिपादित है वह ध. पु. ११ सू. २१ की टीका में है अतः यहाँ विशेषार्थ में उसी को आधार बनाया है। पल्योपम के असंख्यातवें भाग का विरलन करके घनांगुल को समखण्ड करके देने पर एक-एक रूप के प्रति सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव को जघन्य अवगाहना प्राप्त होती है। पश्चात् इसके आगे एक प्रदेश अधिक अवगाहना से निगोद पर्याय में ही स्थित जीव की अजघन्य अवगाहना होती है। यह द्वितीय अवगाहनाविकल्प असंख्यात-भागवृद्धि के द्वारा वृद्धिगत हुआ है। वह इस प्रकार है- जघन्य अवगाहना का नीचे विरलन करके उपरिम एक अंक के प्रति आप्त राशि को (जघन्य अवगाहना को) समखण्ड करके देने पर एक-प्रदेश प्राप्त होता है। जघन्य अवगाहना के ऊपर दो प्रदेशों को बढ़ाकर स्थित जीव की द्वितीय अजघन्य अवगाहना होती है। यहाँ भी असंख्यातभागवृद्धि ही है। तीन प्रदेश अधिक जघन्य- अवगाहना में रहने वाले जीव की तृतीय अजघन्य अवगाहना है। इस प्रकार एक-एक आकाश-प्रदेश को बढ़ाकर जघन्य परीतासंख्यात प्रमाण आकाशप्रदेशों की वृद्धि होने तक ले जाना चाहिए। जघन्य अवगाहना को जघन्य परीतासंख्यात से खण्डित करके उनमें से एकखण्ड प्रमाण वृद्धि हो जाने पर असंख्यातभागवृद्धि ही रहती है।'
??????? ? |
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2026-04-09 10:45:41 |
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| 71728 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्यअवगाहना से सूक्ष्म वायुकायिक की जघन्यअवगाहना की गुणकार आवली के असंख्यातवें भाग की उत्पत्ति का क्रम तथा दोनों के मध्य की अवगाहनाओं के भेदों का कथन --_
*अवरुवरि इगिपदेसे जुदे असंखेज्जभागवड्ढीए ।*
*आदी णिरंतरमदो एगेगपदेसपरिवड्ढी ।।१०२॥*
*अवरोग्गाहणमाणे जहष्णपरिमिदश्रसंखरा सिहिदे ।*
*अवरस्सुवरिं उढ्ढे जेट्ठमसंखेज्जभागस्स ।।१०३।।*
*गाथार्थ* - जघन्य अवगाहना के प्रमाण में एक प्रदेश मिलाने से असंख्यातभागवृद्धि का आदि-स्थान होता है। इसके ऊपर निरन्तर एक-एक प्रदेश की वृद्धि होती जाती है। जघन्य अवगाहना के प्रदेशों में जघन्य परीतासंख्यात का भाग देने से जो लब्ध आवे उतने प्रदेशों की वृद्धि हो जाने पर असंख्यातभागवृद्धि का उत्कृष्ट स्थान होता है ।।१०२-१०३।।
*विशेषार्थ* - इन दोनों गाथाओं में जो विषय प्रतिपादित है वह ध. पु. ११ सू. २१ की टीका में है अतः यहाँ विशेषार्थ में उसी को आधार बनाया है। पल्योपम के असंख्यातवें भाग का विरलन करके घनांगुल को समखण्ड करके देने पर एक-एक रूप के प्रति सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव को जघन्य अवगाहना प्राप्त होती है। पश्चात् इसके आगे एक प्रदेश अधिक अवगाहना से निगोद पर्याय में ही स्थित जीव की अजघन्य अवगाहना होती है। यह द्वितीय अवगाहनाविकल्प असंख्यात-भागवृद्धि के द्वारा वृद्धिगत हुआ है। वह इस प्रकार है- जघन्य अवगाहना का नीचे विरलन करके उपरिम एक अंक के प्रति आप्त राशि को (जघन्य अवगाहना को) समखण्ड करके देने पर एक-प्रदेश प्राप्त होता है। जघन्य अवगाहना के ऊपर दो प्रदेशों को बढ़ाकर स्थित जीव की द्वितीय अजघन्य अवगाहना होती है। यहाँ भी असंख्यातभागवृद्धि ही है। तीन प्रदेश अधिक जघन्य- अवगाहना में रहने वाले जीव की तृतीय अजघन्य अवगाहना है। इस प्रकार एक-एक आकाश-प्रदेश को बढ़ाकर जघन्य परीतासंख्यात प्रमाण आकाशप्रदेशों की वृद्धि होने तक ले जाना चाहिए। जघन्य अवगाहना को जघन्य परीतासंख्यात से खण्डित करके उनमें से एकखण्ड प्रमाण वृद्धि हो जाने पर असंख्यातभागवृद्धि ही रहती है।'
??????? ? |
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2026-04-09 10:45:41 |
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