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71861 40449701 ??संत शिरोमणि अपडेट?? *?शिरगुप्पी, कर्नाटक ?* *आहार अपडेट* ता. 09/04/2026 *संत शिरोमणी आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महामुनिराज के परम शिष्य* *विद्या शिरोमणिआचार्य श्री समय सागर जी महाराजजी* परम शिष्य *मुनि श्री उत्कृष्ट सागर जी महाराज जी* *पडगाहन-दृष्य.* ------‐---------‐----------------------- साभार- विद्याधर पाटील --------------------------------------- संकलन- *?शांति विद्या धर्म प्रभावना संघ?* 2026-04-09 11:58:45
71862 40449701 ??संत शिरोमणि अपडेट?? *?शिरगुप्पी, कर्नाटक ?* *आहार अपडेट* ता. 09/04/2026 *संत शिरोमणी आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महामुनिराज के परम शिष्य* *विद्या शिरोमणिआचार्य श्री समय सागर जी महाराजजी* परम शिष्य *मुनि श्री उत्कृष्ट सागर जी महाराज जी* *पडगाहन-दृष्य.* ------‐---------‐----------------------- साभार- विद्याधर पाटील --------------------------------------- संकलन- *?शांति विद्या धर्म प्रभावना संघ?* 2026-04-09 11:58:45
71859 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ? Wandami mataji ? 2026-04-09 11:57:34
71860 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ? Wandami mataji ? 2026-04-09 11:57:34
71858 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 11:52:58
71857 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 11:52:57
71856 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर मेरे सभी नियम है जी ???? आप भी अपनी-अपनी सुविधानुसार 1,2,34,5,6,7,8,9,10,11, या सारे नियम ले सकते है जी ?????? 2026-04-09 11:51:20
71855 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर मेरे सभी नियम है जी ???? आप भी अपनी-अपनी सुविधानुसार 1,2,34,5,6,7,8,9,10,11, या सारे नियम ले सकते है जी ?????? 2026-04-09 11:51:19
71853 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर जय जिनेन्द्र जी सभी को आज णमोकार महामंत्र का चालिसा पढने का नियम है जी *?9/4/2026* *एक छोटा सा नियम ही मोक्षमार्ग का कारण बनेगा हम सभी के लिए ??* *??णमोकार चालीसा??* सब सिद्धो को नमन कर,सरस्वती को ध्याय, चालीसा नवकार का, लिखूं त्रियोग लगाय || महामंत्र नवकार हमारा, जन जन को प्राणों से प्यारा १ मंगलमय यह प्रथम कहा हैं, मंत्र अनधि निधन महा हैं २ षटखंडागम में गुरुवर ने, मंगलाचरण लिखा प्राकृत में ३ यही से ही लिपिबद्ध हुआ हैं, भविजन ने डर धार लिया हैं ४ पांचो पद के पैतीस अक्षर, अट्ठावन मात्राए हैं सुखकर ५ मंत्र चौरासी लाख कहाए, इससे ही निर्मित बतलाए ६ अरिहंतो को नमन किया हैं, मिथ्यातम का वमन किया हैं ७ सब सिद्धो को वन्दन करके, झुक जाते भावों में भरकर ८ आचार्यों की पद भक्ति से, जीव उबरते निज शक्ति से ९ उपाध्याय गुरुओं का वन्दन, मोह तिमिर का करता खंडन १० सर्व साधुओ को मन में लाना, अतिशयकारी पुण्य बढ़ाना ११ मोक्षमहल की नीव बनाता, अतः मूल मंत्र कहलाता १२ स्वर्णाक्षर में जो लिखवाता, सम्पति से टूटे नहीं नाता १३ णमोकार की अद्भुत महिमा, भक्त बने भगवन ये गरिमा १४ जिसने इसको मन से ध्याया, मनचाहा फल उसने पाया १५ अहंकार जब मन का मिटता, भव्य जीव तब इसको जपता १६ मन से राग द्वेष मिट जाता, समता बाव ह्रदय में आता १७ अंजन चोर ने इसको ध्याया, बने निरंजन निज पद पाया १८ पार्श्वनाथ ने इसको सुनाया, नाग-नागिनी सुर पद पाया १९ चारुदत्त ने अज की दीना, बकरा भी सुर बना नवीना २० सूली पर लटके कैदी को, दिया सेठ ने आत्मशुद्धि को २१ हुई शांति पीड़ा हरने से, देव बना इसको पढ़ने से २२ पदमरुची ने बैल को दीना, उसने भी उत्तम पद लीना २३ श्वान ने जीवन्धर से पाया, मरकर वह भी देव कहाया २४ प्रातः प्रतिदिन जो पढ़ते हैं, अपने दुःख संकट हराते हैं २५ जो नवकार की भक्ति करते, देव भी उनकी सेवा करते २६ जिस जिसने भी इसे जपा हैं, वही स्वर्ण सम खूब तपा हैं२७ तप-तप कर कुंदन बन जाता, अंत में मोक्ष परम पद पाता २८ जो भी कंठहार कर लेता, उसको भव-भव में सुख देता २९ जिसने इसको शीश पर धारा, उसने ही रिपु कर्म निवारा ३० विश्वशान्ति का मूल मंत्र हैं, भेदज्ञान का महामंत्र हैं ३१ जिसने इसका पाठ कराया, वचन सिद्धि को उसने पाया ३२ खाते-पीते-सोते जपना, चलते-फिरते संकट हरना ३३ क्रोध अग्नि का बल घट जावे, मंत्र नीर शीतलता लावे ३४ चालीसा जो पढ़े पढावे, उसका बेडा पार हो जावे ३५ क्षुल्लकमणि शीतलसागर ने, प्रेरित किया लिखा ‘अरुण’ ने ३६ तीन योग से शीश नवाऊ, तीन रतन उत्तम पा जाऊं ३७ पर पदार्थ से प्रीत हटाऊं, शुद्धातम के ही गुण गाऊ ३८ हे प्रभु! बस यही वर चाहूँ, अंत समय नवकार ही ध्याऊ ३९ एक-एक सीढ़ी चढ़ जाऊं, अनुक्रम से निजपद पा जाऊं ४० पंच परम परमेष्ठी हैं, जग में विख्यात | नमन करे जो भाव से,शिव सुख पा हर्षात || 2026-04-09 11:51:17
71854 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर जय जिनेन्द्र जी सभी को आज णमोकार महामंत्र का चालिसा पढने का नियम है जी *?9/4/2026* *एक छोटा सा नियम ही मोक्षमार्ग का कारण बनेगा हम सभी के लिए ??* *??णमोकार चालीसा??* सब सिद्धो को नमन कर,सरस्वती को ध्याय, चालीसा नवकार का, लिखूं त्रियोग लगाय || महामंत्र नवकार हमारा, जन जन को प्राणों से प्यारा १ मंगलमय यह प्रथम कहा हैं, मंत्र अनधि निधन महा हैं २ षटखंडागम में गुरुवर ने, मंगलाचरण लिखा प्राकृत में ३ यही से ही लिपिबद्ध हुआ हैं, भविजन ने डर धार लिया हैं ४ पांचो पद के पैतीस अक्षर, अट्ठावन मात्राए हैं सुखकर ५ मंत्र चौरासी लाख कहाए, इससे ही निर्मित बतलाए ६ अरिहंतो को नमन किया हैं, मिथ्यातम का वमन किया हैं ७ सब सिद्धो को वन्दन करके, झुक जाते भावों में भरकर ८ आचार्यों की पद भक्ति से, जीव उबरते निज शक्ति से ९ उपाध्याय गुरुओं का वन्दन, मोह तिमिर का करता खंडन १० सर्व साधुओ को मन में लाना, अतिशयकारी पुण्य बढ़ाना ११ मोक्षमहल की नीव बनाता, अतः मूल मंत्र कहलाता १२ स्वर्णाक्षर में जो लिखवाता, सम्पति से टूटे नहीं नाता १३ णमोकार की अद्भुत महिमा, भक्त बने भगवन ये गरिमा १४ जिसने इसको मन से ध्याया, मनचाहा फल उसने पाया १५ अहंकार जब मन का मिटता, भव्य जीव तब इसको जपता १६ मन से राग द्वेष मिट जाता, समता बाव ह्रदय में आता १७ अंजन चोर ने इसको ध्याया, बने निरंजन निज पद पाया १८ पार्श्वनाथ ने इसको सुनाया, नाग-नागिनी सुर पद पाया १९ चारुदत्त ने अज की दीना, बकरा भी सुर बना नवीना २० सूली पर लटके कैदी को, दिया सेठ ने आत्मशुद्धि को २१ हुई शांति पीड़ा हरने से, देव बना इसको पढ़ने से २२ पदमरुची ने बैल को दीना, उसने भी उत्तम पद लीना २३ श्वान ने जीवन्धर से पाया, मरकर वह भी देव कहाया २४ प्रातः प्रतिदिन जो पढ़ते हैं, अपने दुःख संकट हराते हैं २५ जो नवकार की भक्ति करते, देव भी उनकी सेवा करते २६ जिस जिसने भी इसे जपा हैं, वही स्वर्ण सम खूब तपा हैं२७ तप-तप कर कुंदन बन जाता, अंत में मोक्ष परम पद पाता २८ जो भी कंठहार कर लेता, उसको भव-भव में सुख देता २९ जिसने इसको शीश पर धारा, उसने ही रिपु कर्म निवारा ३० विश्वशान्ति का मूल मंत्र हैं, भेदज्ञान का महामंत्र हैं ३१ जिसने इसका पाठ कराया, वचन सिद्धि को उसने पाया ३२ खाते-पीते-सोते जपना, चलते-फिरते संकट हरना ३३ क्रोध अग्नि का बल घट जावे, मंत्र नीर शीतलता लावे ३४ चालीसा जो पढ़े पढावे, उसका बेडा पार हो जावे ३५ क्षुल्लकमणि शीतलसागर ने, प्रेरित किया लिखा ‘अरुण’ ने ३६ तीन योग से शीश नवाऊ, तीन रतन उत्तम पा जाऊं ३७ पर पदार्थ से प्रीत हटाऊं, शुद्धातम के ही गुण गाऊ ३८ हे प्रभु! बस यही वर चाहूँ, अंत समय नवकार ही ध्याऊ ३९ एक-एक सीढ़ी चढ़ जाऊं, अनुक्रम से निजपद पा जाऊं ४० पंच परम परमेष्ठी हैं, जग में विख्यात | नमन करे जो भाव से,शिव सुख पा हर्षात || 2026-04-09 11:51:17