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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
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40449694 |
तन्मय आराधना ग्रुप |
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2026-04-13 14:06:19 |
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| 82680 |
40449694 |
तन्मय आराधना ग्रुप |
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2026-04-13 14:06:19 |
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40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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<a href="https://youtu.be/ILS92r0vDn4?si=RW1uA3GjdBxMupy2" target="_blank">https://youtu.be/ILS92r0vDn4?si=RW1uA3GjdBxMupy2</a>
_*?5a.2#ध्यान पिडस्थ- अ.धा [हिन्दी+मराठी]-प.पू. १०८अपूर्व चैतन्य ऋध्दिधारी, परम दिगंबर मुनिराज, अभिष्ण ज्ञानोपयोगी, अध्यात्मयोगी श्री वीरसागरजी महाराज।*_ |
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2026-04-13 14:06:11 |
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1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
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<a href="https://youtu.be/ILS92r0vDn4?si=RW1uA3GjdBxMupy2" target="_blank">https://youtu.be/ILS92r0vDn4?si=RW1uA3GjdBxMupy2</a>
_*?5a.2#ध्यान पिडस्थ- अ.धा [हिन्दी+मराठी]-प.पू. १०८अपूर्व चैतन्य ऋध्दिधारी, परम दिगंबर मुनिराज, अभिष्ण ज्ञानोपयोगी, अध्यात्मयोगी श्री वीरसागरजी महाराज।*_ |
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2026-04-13 14:06:10 |
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40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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<a href="https://www.shreephaljainnews.com/resentment_within_the_jain_community_over_attempts_to_remove_jain_heritage/" target="_blank">https://www.shreephaljainnews.com/resentment_within_the_jain_community_over_attempts_to_remove_jain_heritage/</a> |
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2026-04-13 14:06:00 |
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तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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<a href="https://www.shreephaljainnews.com/resentment_within_the_jain_community_over_attempts_to_remove_jain_heritage/" target="_blank">https://www.shreephaljainnews.com/resentment_within_the_jain_community_over_attempts_to_remove_jain_heritage/</a> |
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2026-04-13 14:06:00 |
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40449685 |
?2️⃣Pragya Shraman network? |
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*अक्षय तृतीय पर्व की विशेषता..*
??????????
जैन पुराणों के अनुसार अक्षय तृतीया के महात्म्य को दान तीर्थ के प्रवर्तक राजा श्रेयांस एवं प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ स्वामी की कथा से दर्शाया है।
*दान तीर्थ का प्रारंभ और राजा श्रेयांस का पुण्य?*
*1)- अज्ञानता का काल:-* दीक्षा के बाद छह माह के उपवास और फिर सात माह नौ दिन की आहार चर्या के दौरान, प्रजा को मुनि चर्या का ज्ञान नहीं था। लोग उन्हें चक्रवर्ती सम्राट मानकर रत्न, हाथी, घोड़े और कन्याएं भेंट कर रहे थे, जबकि उन्हें केवल शुद्ध आहार की आवश्यकता थी।
*1)-जातिस्मरण और नवधा भक्ति:-* राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म (वज्रजंघ की पर्याय) का स्मरण हुआ, जिससे उन्हें मुनि को आहार देने की विधि (पड़गाहन, पाद प्रक्षालन, पूजन और मन-वचन-काय की शुद्धि) ज्ञात हुई।
*3)-इक्षु रस का आहार:-* भगवान ऋषभदेव ने हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस के हाथों *इक्षु रस (गन्ने के रस)* का आहार ग्रहण किया। यह जैन परंपरा में 'दान तीर्थ' की स्थापना का क्षण माना जाता है।
*अक्षय तृतीया (आखा तीज) का महत्व?*
*1)- अक्षय निधि:-* वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन दिए गए दान का फल कभी समाप्त नहीं होता, इसीलिए इसे 'अक्षय' कहा जाता है।
*2)- पञ्चाश्चर्य:-* भगवान के आहार के समय देवों द्वारा रत्न वृष्टि, पुष्प वृष्टि और दुन्दुभि जैसे चमत्कार हुए, जो इस कार्य की महानता को दर्शाते हैं।
*3)- स्वयं सिद्ध मुहूर्त:-* लोक मान्यता में इस दिन को इतना शुभ माना जाता है कि किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती।
??????????
*एक विशेष तथ्य*
भगवान ऋषभदेव (जो उस समय मुनि अवस्था में थे) आहार के उपरांत वन में चले गए और देवतागणो राजा श्रेयांस का *अभिषेक सहित पूजा अर्चना* किया
जो यह दर्शाता है कि *निस्वार्थ भाव से किया गया 'सुपात्र दान' और संयम की आराधना आत्मा को कितनी शीघ्रता से कर्मों से मुक्त कर सकती है। निश्चित रूप से, अक्षय तृतीया केवल भौतिक समृद्धि का पर्व नहीं, बल्कि *त्याग, संयम और दान* की उस महान परंपरा का स्मरण है जिसे राजा श्रेयांस ने प्रारंभ किया था। |
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2026-04-13 14:03:16 |
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?2️⃣Pragya Shraman network? |
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*अक्षय तृतीय पर्व की विशेषता..*
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जैन पुराणों के अनुसार अक्षय तृतीया के महात्म्य को दान तीर्थ के प्रवर्तक राजा श्रेयांस एवं प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ स्वामी की कथा से दर्शाया है।
*दान तीर्थ का प्रारंभ और राजा श्रेयांस का पुण्य?*
*1)- अज्ञानता का काल:-* दीक्षा के बाद छह माह के उपवास और फिर सात माह नौ दिन की आहार चर्या के दौरान, प्रजा को मुनि चर्या का ज्ञान नहीं था। लोग उन्हें चक्रवर्ती सम्राट मानकर रत्न, हाथी, घोड़े और कन्याएं भेंट कर रहे थे, जबकि उन्हें केवल शुद्ध आहार की आवश्यकता थी।
*1)-जातिस्मरण और नवधा भक्ति:-* राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म (वज्रजंघ की पर्याय) का स्मरण हुआ, जिससे उन्हें मुनि को आहार देने की विधि (पड़गाहन, पाद प्रक्षालन, पूजन और मन-वचन-काय की शुद्धि) ज्ञात हुई।
*3)-इक्षु रस का आहार:-* भगवान ऋषभदेव ने हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस के हाथों *इक्षु रस (गन्ने के रस)* का आहार ग्रहण किया। यह जैन परंपरा में 'दान तीर्थ' की स्थापना का क्षण माना जाता है।
*अक्षय तृतीया (आखा तीज) का महत्व?*
*1)- अक्षय निधि:-* वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन दिए गए दान का फल कभी समाप्त नहीं होता, इसीलिए इसे 'अक्षय' कहा जाता है।
*2)- पञ्चाश्चर्य:-* भगवान के आहार के समय देवों द्वारा रत्न वृष्टि, पुष्प वृष्टि और दुन्दुभि जैसे चमत्कार हुए, जो इस कार्य की महानता को दर्शाते हैं।
*3)- स्वयं सिद्ध मुहूर्त:-* लोक मान्यता में इस दिन को इतना शुभ माना जाता है कि किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती।
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*एक विशेष तथ्य*
भगवान ऋषभदेव (जो उस समय मुनि अवस्था में थे) आहार के उपरांत वन में चले गए और देवतागणो राजा श्रेयांस का *अभिषेक सहित पूजा अर्चना* किया
जो यह दर्शाता है कि *निस्वार्थ भाव से किया गया 'सुपात्र दान' और संयम की आराधना आत्मा को कितनी शीघ्रता से कर्मों से मुक्त कर सकती है। निश्चित रूप से, अक्षय तृतीया केवल भौतिक समृद्धि का पर्व नहीं, बल्कि *त्याग, संयम और दान* की उस महान परंपरा का स्मरण है जिसे राजा श्रेयांस ने प्रारंभ किया था। |
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2026-04-13 14:03:15 |
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40449685 |
?2️⃣Pragya Shraman network? |
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*हरिवंशपुराण से प्रमाणित* |
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2026-04-13 14:03:11 |
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40449685 |
?2️⃣Pragya Shraman network? |
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*हरिवंशपुराण से प्रमाणित* |
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2026-04-13 14:03:10 |
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