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5536 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) ????????????? ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಶುಭ ದಿನದ ಶುಭೋದಯ ?? 2026-02-16 06:56:17
5535 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) <a href="https://youtu.be/S7BLDdnG7xk?si=Z-v4XdNf0p_jxam9" target="_blank">https://youtu.be/S7BLDdnG7xk?si=Z-v4XdNf0p_jxam9</a> 2026-02-16 06:56:10
5534 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *।। कषायजय भावना।।* *मूल लेखक - श्रमणरत्न श्री कनककीर्ति जी महाराज* *रचयिता - परम पूज्य शब्द शिल्पी आचार्य श्री सुविधि सागर जी महाराज* ___&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;___&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;__ *लोभ कषाय* _परद्रव्य को पाने की अभिलाषा को लोभ कहते है। इन्हीं आकांक्षाओं की विभीषिका में यह रात-दिन जल रहा है। वह कुछ और पाने की आशा करता हुआ दुःखी रहने का आदि हो गया है। जीवन लोभ, आरोग्य लोभ, इन्द्रिय लोभ और उपभोग लोभ इन चार विभागों में विभाजित हुआ यह परम शत्रु जीवों को तीव्रतर कष्ट देने के लिए प्रतिपल तैयार बैठा है। यह लोभ सम्पूर्ण गुणों का नाशक है।_ *श्री वेदव्यास ने लिखा है -* *भूमिष्ठोऽपि रथस्थांस्तान्,पार्थ: सर्वधनुर्धरान्।* *एकोऽपि पातयामास,लोभ: सर्वगुणानिव।।* *अर्थात् -* _भूमि पर खड़े हुए अकेले अर्जुन ने रथ में बैठे हुए सभी धनुर्धारियों को उसी प्रकार मार गिराया, जैसे लोभ सभी गुणों को नष्ट कर देता है।_ _लोभ शब्द को प्राकृत भाषा में लोह कहते है। लोह के संसर्ग से अग्नि और लोभ के संसर्ग से आत्मा कैसे दुःखी होती है ? इस बात को सुस्पष्ट करते हुए आचार्य श्री योगीन्दु देव जी महाराज लिखते हैं -_ *तलि अहिरणि वरि घणवडणु संडस्सय लुंचोडु।* *लोहहॅं लग्गिवि हुयवहहॅं पिक्खु पडंतउ तोडु।।* *(परमात्म प्रकाश - २/११४)* *अर्थात् -* _जैसे लोहे का सम्बन्ध पाकर अग्नि नीचे रखें हुए निहाई के ऊपर घन की चोट,संडासी से खेंचना,चोट लगने से टूटना इत्यादि दुःखों को सहन करती है - ऐसा देखो।_ *इसे स्पष्ट करते समय आचार्य श्री ब्रह्मदेव जी महाराज ने लिखा है -* *यथा लोहपिण्डसंसर्गादग्निरज्ञानिलोकपूज्या प्रसिद्धा पिट्टनक्रियां लभते तथा लोभादिकषायपरिणतिकारणभूतेन पन्चेन्द्रियशरीरसम्बन्धेन निर्लोभपरमात्मतत्त्व - भावनारहितो जीवो घनघातस्थानीयानि नारकादि दुःखानि बहुकालं सहत इति।* *अर्थात् -* _लोहे की संगति से लोक प्रसिद्ध देवता अग्नि दुःख भोगती है। यदि वह लोहे का संग न करे तो इतने दुःख क्यों भोगे ? उसी प्रकार लोह अर्थात् लोभ के कारण से परमात्मतत्त्व की भावना से रहित हुआ मिथ्या दृष्टि जीव घनघात के समान नरकादि दुःखों को बहुत काल तक भोगता है।_ _पानी की प्यास तो पानी पीने पर कम हो जाती है, परन्तु आकांक्षाओं की प्यास कभी नहीं बुझती। ज्यों-ज्यों लाभ बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों लोभ भी बढ़ता जाता है। पर पदार्थों को सुख का कारण मानने से, आध्यात्मिक विचारों के चिन्तन का अभाव होने से अथवा मोहनीय कर्म के तीव्र उदय से लोभ कषाय जागृत होती है।_ *लोभ कषाय पर विजय प्राप्त करने के लिए -* _१- बारह भावनाओं का चिन्तन करना चाहिए।_ _२- अपने से कम वैभव वाले लोगों को देखना चाहिए।_ _३- सतत ऐसा विचार करना चाहिए कि मैं जब जन्मा था,तब मैं कुछ लेकर नहीं आया था और मैं मर जाऊंगा,तब भी मैं कुछ नहीं ले जा पाऊंगा। फिर मैं लोभ क्यों करूं ? जब मेरा अल्प-आरम्भ और परिग्रह से काम चल सकता है तो मैं अधिक की चाहना से संक्लेशित क्यों होऊं ?_ *कषायविषयैरोगैश्चात्मा च पीडित: सदा।* *चिकित्स्यतां प्रयत्नेन,जिनवाक्सारभैषजै:।।* *(सारसमुच्चय - २९)* *अर्थात् -* _कषाय और विषय रुपी रोगों से यह आत्मा सदैव पीड़ित हो रहा है। इसलिए जिन वचन रुपी उत्तम औषधि से प्रयोग पूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए।_ *कषायों से भयभीत आत्मा को कषायों का स्वरूप और फल जान कर उनका त्याग करना चाहिए।* ??????? 2026-02-16 06:54:18
5533 40449749 जिनोदय?JINODAYA ? आप सभी को सादर जय जिनेंद्र? ? आज का दिन शुभ एवं मंगलमय हो? ☎️?"व्हाट्सएप नंबर"-9977608466? सकल जैन तीर्थंकर धर्म प्रभावना का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/827398/post/1179503762?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=EIZ7X&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/827398/post/1179503762?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=EIZ7X&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-16 06:54:10
5532 40449701 ??संत शिरोमणि अपडेट?? 2026-02-16 06:53:25
5531 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ <a href="https://youtu.be/p-7rsQr_MpI?si=JuqF9IxVljQfA9Rn" target="_blank">https://youtu.be/p-7rsQr_MpI?si=JuqF9IxVljQfA9Rn</a> 2026-02-16 06:53:20
5530 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ आशीर्वाद 2026-02-16 06:53:07
5529 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ *।। कषायजय भावना।।* *मूल लेखक - श्रमणरत्न श्री कनककीर्ति जी महाराज* *रचयिता - परम पूज्य शब्द शिल्पी आचार्य श्री सुविधि सागर जी महाराज* ___&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;___&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;&amp;__ *लोभ कषाय* _परद्रव्य को पाने की अभिलाषा को लोभ कहते है। इन्हीं आकांक्षाओं की विभीषिका में यह रात-दिन जल रहा है। वह कुछ और पाने की आशा करता हुआ दुःखी रहने का आदि हो गया है। जीवन लोभ, आरोग्य लोभ, इन्द्रिय लोभ और उपभोग लोभ इन चार विभागों में विभाजित हुआ यह परम शत्रु जीवों को तीव्रतर कष्ट देने के लिए प्रतिपल तैयार बैठा है। यह लोभ सम्पूर्ण गुणों का नाशक है।_ *श्री वेदव्यास ने लिखा है -* *भूमिष्ठोऽपि रथस्थांस्तान्,पार्थ: सर्वधनुर्धरान्।* *एकोऽपि पातयामास,लोभ: सर्वगुणानिव।।* *अर्थात् -* _भूमि पर खड़े हुए अकेले अर्जुन ने रथ में बैठे हुए सभी धनुर्धारियों को उसी प्रकार मार गिराया, जैसे लोभ सभी गुणों को नष्ट कर देता है।_ _लोभ शब्द को प्राकृत भाषा में लोह कहते है। लोह के संसर्ग से अग्नि और लोभ के संसर्ग से आत्मा कैसे दुःखी होती है ? इस बात को सुस्पष्ट करते हुए आचार्य श्री योगीन्दु देव जी महाराज लिखते हैं -_ *तलि अहिरणि वरि घणवडणु संडस्सय लुंचोडु।* *लोहहॅं लग्गिवि हुयवहहॅं पिक्खु पडंतउ तोडु।।* *(परमात्म प्रकाश - २/११४)* *अर्थात् -* _जैसे लोहे का सम्बन्ध पाकर अग्नि नीचे रखें हुए निहाई के ऊपर घन की चोट,संडासी से खेंचना,चोट लगने से टूटना इत्यादि दुःखों को सहन करती है - ऐसा देखो।_ *इसे स्पष्ट करते समय आचार्य श्री ब्रह्मदेव जी महाराज ने लिखा है -* *यथा लोहपिण्डसंसर्गादग्निरज्ञानिलोकपूज्या प्रसिद्धा पिट्टनक्रियां लभते तथा लोभादिकषायपरिणतिकारणभूतेन पन्चेन्द्रियशरीरसम्बन्धेन निर्लोभपरमात्मतत्त्व - भावनारहितो जीवो घनघातस्थानीयानि नारकादि दुःखानि बहुकालं सहत इति।* *अर्थात् -* _लोहे की संगति से लोक प्रसिद्ध देवता अग्नि दुःख भोगती है। यदि वह लोहे का संग न करे तो इतने दुःख क्यों भोगे ? उसी प्रकार लोह अर्थात् लोभ के कारण से परमात्मतत्त्व की भावना से रहित हुआ मिथ्या दृष्टि जीव घनघात के समान नरकादि दुःखों को बहुत काल तक भोगता है।_ _पानी की प्यास तो पानी पीने पर कम हो जाती है, परन्तु आकांक्षाओं की प्यास कभी नहीं बुझती। ज्यों-ज्यों लाभ बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों लोभ भी बढ़ता जाता है। पर पदार्थों को सुख का कारण मानने से, आध्यात्मिक विचारों के चिन्तन का अभाव होने से अथवा मोहनीय कर्म के तीव्र उदय से लोभ कषाय जागृत होती है।_ *लोभ कषाय पर विजय प्राप्त करने के लिए -* _१- बारह भावनाओं का चिन्तन करना चाहिए।_ _२- अपने से कम वैभव वाले लोगों को देखना चाहिए।_ _३- सतत ऐसा विचार करना चाहिए कि मैं जब जन्मा था,तब मैं कुछ लेकर नहीं आया था और मैं मर जाऊंगा,तब भी मैं कुछ नहीं ले जा पाऊंगा। फिर मैं लोभ क्यों करूं ? जब मेरा अल्प-आरम्भ और परिग्रह से काम चल सकता है तो मैं अधिक की चाहना से संक्लेशित क्यों होऊं ?_ *कषायविषयैरोगैश्चात्मा च पीडित: सदा।* *चिकित्स्यतां प्रयत्नेन,जिनवाक्सारभैषजै:।।* *(सारसमुच्चय - २९)* *अर्थात् -* _कषाय और विषय रुपी रोगों से यह आत्मा सदैव पीड़ित हो रहा है। इसलिए जिन वचन रुपी उत्तम औषधि से प्रयोग पूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए।_ *कषायों से भयभीत आत्मा को कषायों का स्वरूप और फल जान कर उनका त्याग करना चाहिए।* ??????? 2026-02-16 06:52:47
5528 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) ಕರ್ನಾಟಕ ದಿಗಂಬರ ಜೈನ ಸಮಾಜ ಇವರ ಆ್ಯಪ್ ಬಂದಿದೆ. ಎಲ್ಲಾ ಸದಸ್ಯರು ತಕ್ಷಣವೇ ಕೆಳಗೆ ನೀಡಿರುವ ಲಿಂಕ್ ಅನ್ನು ಕ್ಲಿಕ್ ಮಾಡುವ ಮೂಲಕ‌ ಗುಂಪನ್ನು‌ ಸೇರಿ, ಮತ್ತು ನಿಮ್ಮ ಸದಸ್ಯತ್ವ ಗುರುತಿನ ಚೀಟಿಯನ್ನು ಪಡೆಯಿರಿ - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/875244/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=ZHQAP&amp;utm_referrer_state=SUPERSTAR" target="_blank">https://primetrace.com/group/875244/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=ZHQAP&amp;utm_referrer_state=SUPERSTAR</a> 2026-02-16 06:49:57
5527 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-16 06:49:56