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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Message
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Status
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Date |
View |
| 11398 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-20 09:07:04 |
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| 11397 |
40449697 |
हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 |
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*नीलेश भैया अजमेर वालो ने 10 मीटर पानी छानने का कपड़ा पूज्य गुरूदेव के समाधि दिवस के पावन अवसर पर ऑर्डर करके अपने कदम अहिंसक मार्ग पर आगे बढ़ा दिए है, यदि आप भी परिमार्जन कपड़ा व पानी छानने का कपड़ा ऑर्डर करना चाहते है तो शीघ्र सम्पर्क करे,9893112665*??? |
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2026-02-20 09:06:10 |
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| 11396 |
40449679 |
ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 |
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2026-02-20 09:04:48 |
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| 11395 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_गतियों और जन्मों का सम्बन्ध; लब्ध्यपर्याप्तक जीवों की सम्भावना और असम्भावना_
*उववादा सुरणिरया गब्भजसम्मुच्छिमा हु णरतिरिया ।*
*सम्मुच्छिमा मणुस्साऽपज्जत्ता एयवियलक्खा ।।९०।।*
*पंचक्खतिरिक्खाओ गब्भजसम्मुच्छिमा तिरिक्खाणं ।*
*भोगभुमा गब्भभवा, णरपुण्णा गब्भजा चेव ॥९१॥*
*उववादगब्भजेसु य, लद्धिअपज्जत्तगा ण णियमेण ।*
*णरसम्मुच्छिमजीवा, लद्धिअपज्जत्तगा चेव ॥९२।।*
*गाथार्थ* - देव और नारकियों का उपपादजन्म होता है। मनुष्य और तियंचों के गर्भ व सम्मूर्च्छन जन्म होता है। एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और अपर्याप्त मनुष्यों का सम्मूर्च्छन जन्म ही होता है ।।९०।।
पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का जन्म गर्भज भी होता है और सम्मूर्च्छन भी होता है। भोगभूमिया तिर्यंचों का जन्म गर्भज ही होता है। पर्याप्त मनुष्यों का जन्म गर्भज ही है ।।९१।।
उपपाद जन्म में और गर्भजन्म में नियम से लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते। सम्मूर्च्छन मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक ही होते हैं ।।९२।।
*विशेषार्थ* - देव और नारको औपपादिक ही होते हैं। नरक बिलों में रहने वाले जीव नारकी ही होते हैं। कहा भी है- "देवनारकारणामुपपादः" अर्थात् देव और नारकियों का उपपाद जन्म ही होता है, अन्य जन्म नहीं होता। मनुष्य व तिर्यच गर्भज भी होते हैं और सम्मूर्च्छन भी होते हैं। अपर्याप्त- [लब्ध्यपर्याप्त] मनुष्य सम्मूर्च्छन ही होते हैं। एकेन्द्रिय जीव व विकलेन्द्रिय (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय) नियम से सम्मूर्च्छन होते हैं। पंचेन्द्रियतिर्यंच गर्भज भी होते हैं, सम्मूर्च्छन भी होते हैं, किन्तु तिर्यंचों में भोगभूमिया गर्भज ही होते हैं। "णरपुष्णा" अर्थात् पर्याप्त मनुष्य भी गर्भज ही होते हैं। उपपाद जन्म वालों में अर्थात देव-नारकियों में तथा गर्भज मनुष्य-तियंचों में, विशिष्ट तिर्यचमनुष्यों में नियम से लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते। सम्मूर्च्छन मनुष्य नियम से लब्ध्यपर्याप्तक ही होते हैं।
??????? ? |
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2026-02-20 09:02:57 |
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| 11394 |
48283884 |
?Jwalamala News ? |
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ಮಹಾರಾಷ್ಟ್ರದಲ್ಲಿನ ಣಮೋಕಾರ್ ತೀರ್ಥ ಬೃಹತ್ ಪಂಚಕಲ್ಯಾಣ ನೇರ ಪ್ರಸಾರ
Day 15
Bhavya Maha
Mastakabhisheka
महाराष्ट्र के णमोकार तीर्थ पर विशाल पंचकल्याणक का सीधा प्रसारण
மகாராஷ்டிராவில் உள்ள நமோகர் தீர்த்தத்தில் பிரம்மாண்டமான பஞ்சகல்யாணத்தின் நேரடி ஒளிபரப்பு
మహారాష్ట్రలోని నమోకర్ తీర్థంలో గ్రాండ్ పంచకల్యాణక్ మహోత్సవం ప్రత్యక్ష ప్రసారం
മഹാരാഷ്ട്രയിലെ നമോകർ തീർത്ഥ ഗ്രാൻഡ് പഞ്ചകല്യാണത്തിൻ്റെ തത്സമയ സംപ്രേക്ഷണം
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2026-02-20 09:02:38 |
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| 11393 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_गतियों और जन्मों का सम्बन्ध; लब्ध्यपर्याप्तक जीवों की सम्भावना और असम्भावना_
*उववादा सुरणिरया गब्भजसम्मुच्छिमा हु णरतिरिया ।*
*सम्मुच्छिमा मणुस्साऽपज्जत्ता एयवियलक्खा ।।९०।।*
*पंचक्खतिरिक्खाओ गब्भजसम्मुच्छिमा तिरिक्खाणं ।*
*भोगभुमा गब्भभवा, णरपुण्णा गब्भजा चेव ॥९१॥*
*उववादगब्भजेसु य, लद्धिअपज्जत्तगा ण णियमेण ।*
*णरसम्मुच्छिमजीवा, लद्धिअपज्जत्तगा चेव ॥९२।।*
*गाथार्थ* - देव और नारकियों का उपपादजन्म होता है। मनुष्य और तियंचों के गर्भ व सम्मूर्च्छन जन्म होता है। एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और अपर्याप्त मनुष्यों का सम्मूर्च्छन जन्म ही होता है ।।९०।।
पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का जन्म गर्भज भी होता है और सम्मूर्च्छन भी होता है। भोगभूमिया तिर्यंचों का जन्म गर्भज ही होता है। पर्याप्त मनुष्यों का जन्म गर्भज ही है ।।९१।।
उपपाद जन्म में और गर्भजन्म में नियम से लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते। सम्मूर्च्छन मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक ही होते हैं ।।९२।।
*विशेषार्थ* - देव और नारको औपपादिक ही होते हैं। नरक बिलों में रहने वाले जीव नारकी ही होते हैं। कहा भी है- "देवनारकारणामुपपादः" अर्थात् देव और नारकियों का उपपाद जन्म ही होता है, अन्य जन्म नहीं होता। मनुष्य व तिर्यच गर्भज भी होते हैं और सम्मूर्च्छन भी होते हैं। अपर्याप्त- [लब्ध्यपर्याप्त] मनुष्य सम्मूर्च्छन ही होते हैं। एकेन्द्रिय जीव व विकलेन्द्रिय (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय) नियम से सम्मूर्च्छन होते हैं। पंचेन्द्रियतिर्यंच गर्भज भी होते हैं, सम्मूर्च्छन भी होते हैं, किन्तु तिर्यंचों में भोगभूमिया गर्भज ही होते हैं। "णरपुष्णा" अर्थात् पर्याप्त मनुष्य भी गर्भज ही होते हैं। उपपाद जन्म वालों में अर्थात देव-नारकियों में तथा गर्भज मनुष्य-तियंचों में, विशिष्ट तिर्यचमनुष्यों में नियम से लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते। सम्मूर्च्छन मनुष्य नियम से लब्ध्यपर्याप्तक ही होते हैं।
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2026-02-20 09:01:25 |
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| 11392 |
40449689 |
? विद्या शरणम ०१ ? |
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2026-02-20 09:00:22 |
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| 11391 |
40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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2026-02-20 09:00:16 |
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| 11390 |
40449674 |
JAIN MAHILAMANDAL |
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2026-02-20 09:00:15 |
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| 11389 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-20 08:57:58 |
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