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जिनोदय?JINODAYA |
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*मालव माँ का बेटा – अन्न के प्रति श्रद्धा का असली रहस्य*
कहावत यूँ ही नहीं बनती, उसके पीछे अनुभव, संस्कार और जीवन की गहरी समझ छिपी होती है। “मालव माँ का बेटा” भी ऐसी ही एक कहावत है, जिसका संबंध अन्न के सम्मान से जुड़ा है। एक प्रचलित कथा के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य एक बार हाथी पर सवार होकर अपने मंत्रियों और सेनापतियों के साथ धान मंडी से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्हें बिखरे हुए दाने दिखाई दिए तो उन्होंने कहा, “अहा! कितने हीरे बिखरे पड़े हैं।” मंत्री चकित हुए और इधर-उधर देखने लगे, पर उन्हें कोई हीरे नजर नहीं आए। जब उन्होंने पूछा कि हीरे कहाँ हैं, तब विक्रमादित्य हाथी से उतरकर धूल में पड़े धान के दानों को एक-एक कर उठाने लगे और प्रेमपूर्वक उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने लगे। उन्होंने कहा कि अन्न के ये दाने ही असली हीरे हैं, क्योंकि यही जीवन का आधार हैं। इनका अपमान करना या इन्हें पैरों से रौंदना अनुचित है। कथा आगे कहती है कि उनकी इस भावना से प्रसन्न होकर अन्नपूर्णा देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनके राज्य में कभी अन्न की कमी नहीं होगी। तभी से “मालव माँ का बेटा” कहावत प्रचलित हुई, जो उस व्यक्ति के लिए कही जाती है जो अन्न का सम्मान करना जानता हो। इस कथा का सार सरल है—जिस समाज में अन्न का आदर होता है, वहाँ समृद्धि टिकती है। आज जब भोजन की बर्बादी आम बात हो गई है, तब यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि अन्न केवल वस्तु नहीं, जीवन का आधार है। थाली में उतना ही लें जितना खा सकें, भोजन का तिरस्कार न करें और अपने बच्चों को भी यह संस्कार दें। छोटी-छोटी आदतें ही बड़े संस्कार बनाती हैं। अन्न का सम्मान करना किसी एक धर्म या क्षेत्र की बात नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। यदि हम इस भावना को अपने जीवन में उतार लें, तो “मालव माँ का बेटा” केवल कहावत नहीं, हमारी पहचान बन सकती है।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-15 07:29:45 |
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