WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 11810

Records Matching Filters: 11810

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
1020 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? आचार्यश्री समय सागर जी देंगे दीक्षाएं ? | Samay Sagar Ji | Jain Focus | Click Here : <a href="https://youtube.com/shorts/sgAYLEKVlCc?si=9VWtLlZTPLD61cMT" target="_blank">https://youtube.com/shorts/sgAYLEKVlCc?si=9VWtLlZTPLD61cMT</a> 2026-02-12 19:12:59
1019 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-02-12 19:12:56
1018 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ धर्म की प्रभावना 2026-02-12 19:10:12
1017 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर Sonal Doshi 1 mala ? 2026-02-12 19:09:41
1016 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन <a href="https://www.facebook.com/share/r/17u1Wx5N48/" target="_blank">https://www.facebook.com/share/r/17u1Wx5N48/</a> 2026-02-12 19:08:21
1015 48283815 Jain pramukh pathshala 1 2026-02-12 19:08:10
1014 48283815 Jain pramukh pathshala 1 प्रश्न का सही जवाब है: *वेदनीय* ????? 2026-02-12 19:07:39
1013 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी क्षुल्लिका सहर्ष श्री माताजी का अवतरण दिवस गुरु मां के चरणों मे 2026-02-12 19:04:46
1012 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-02-12 19:03:07
1011 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा <a href="https://youtube.com/live/QWzfhZmtXPg?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/QWzfhZmtXPg?feature=share</a> _*?95#ध्रुव स्वभाव में नित्यार्थ क्रिया मान्यता&amp;३ प्रकारके सामान्य (१)गुणपर्ययवद् द्रव्यम्।(२)पर्ययवद् द्रव्यम्।&amp;(३) गुणवद् द्रव्यम् ⬅️इन ३ सामान्य के अज्ञानी(होनेंसे वे हेय-उपादेय के सही२निर्णय केअभाव में)उभयाभासी विपरित एकान्तवादि मिथ्यादृष्टि कहलाते हैं। कैसे?आगमाधार?-पं.अनिलजी, पुणे।*_ *#गाथा सूत्र172 ? इसलिए मोक्षाभिलाषी जीव सर्वत्र किंचित भी राग न करो [अर्थात ध्रुवस्वरुप में परमाणु मात्र भी नित्यार्थक्रियादि अनित्य पर्याय तथा परद्रव्य न मिलावो-ऐसा भी आचार्यश्री का हार्द है क्योंकी बिना शुद्धध्येय के ३ काल में भी किंचित भी बुद्धीपूर्वक उपयोग रुप मोह राग द्वेष रुकता ही नहीं, और मोक्षमार्ग की प्रारंभता भी होती नहीं। अत्यन्त अल्प शब्दों में आचार्य सम्यग्दृष्टि ४-५-६ गु वर्ती जीवों को भी बता रहे है की, निरंतर निर्विकल्प का प्रयत्न करो जिससे बुद्धिपूर्वक उपयोगरुप राग किंचित भी नहीं होगा।अत्यल्प शब्दों में सम्यग्दृष्टि एवं मिथ्यादृष्टि दोनों जीवोंको संबोधन किया है, समझना!]; ऐसा करनेसे वह भव्य जीव वीतराग होकर भवसागरको तरता है।* *#जो जीव ध्रुवस्वभाव को परिणमनशील मानते हैं, उसमें नित्यार्थक्रिया मानते है, वे एक ही अपेक्षासे नित्य में अनित्य दोनों युगपत माननें से, वे सभी जीव विरोधी हेत्वाभास के पात्र होनेसे, जिनवाणी माता ऐसे जीवोंको उभयाभासी विपरित एकांतवादि मिथ्यादृष्टि पशु करके संबोधित करती है। आगमाधार- अष्टसहस्त्री परिशिष्ट के दसो अध्याय की प्रत्येकी १ कारीका। पंचास्तिकाय -समयव्याख्या गा सू ८ इत्यादि संपूर्ण जिणवानी*? *ऐसे जीवोंको श्लोकवार्तिकादि जिनवाणी में प्रतिपादित ३ प्रकारके सामान्य (१)गुणपर्ययवद् द्रव्यम्। (२) पर्ययवद् द्रव्यम्। &amp; (३) गुणवद् द्रव्यम्।*⬅️ *इन ३ सामान्य (गुणी/धर्मि) का समिचिन ज्ञान ना होनेंसे वे हेय-उपादेय का सही२ निर्णय नहीं कर पाते। इसमें (१) &amp; (२) प्रकारके सामान्य को अध्यात्मन्यायदीपिका ग्रंथ में प.पू.१०८ श्री वीरसागरजी महाराज 'अभेदोपचार' कहते हैं क्योंकी ए दोनों सामान्य अनित्य धर्मो से निर्मित होने से नियम से उत्पाद-व्यय (नित्यार्थक्रिया) संयुक्त होते ही है। करके (१) &amp;(२) सामान्य,ध्यान(दृष्टि) के ध्येय* ❌ *नहीं२।* 〰️*(३)गुणवद् द्रव्यम। सामान्य जिसको अभेदवृत्ति/ऊर्ध्वता सामान्य कहते हैं, क्योंकी यह नित्य गुणमय विशेषोंसे निर्मित होनेसे कुटस्थ ध्रुव कहलाता है,और इसमें नियमसे उत्पाद-व्यय (नित्यार्थ क्रिया) का अतत् अभाव अनादि-अनंत वर्तता होंनेसे इसीको शुद्ध ध्येय जिनवाणी कहती है और यही त्रिकाल में एकमेव ध्यान (दृष्टि) का ध्येय होता हैं। ?अज्ञानी जीवों को इन नित्य सामान्य एवं अनित्य सामान्य का अज्ञान वर्तता होनेंसे वे पंच परावर्तन रुप संसार में दारुण दु:ख को प्राप्त होते रहते हैं।* *?वीतरागपनेका व्यवहार-निश्चयके अविरोध द्वारा ही अनुसरण किया जाए तो इष्टसिद्धि होती है,अन्यथा नहीं।?सविकल्प दशा में निर्विकल्प दशा के ध्येय से क्रियाकाण्डपरिणति को माहात्म्य नहीं देते हुए क्रियाकाण्ड करते हैं, एवं बुद्धीपूर्वक उपयोगरुप उग्र पुरुषार्थसे पुन:२ निष्प्रमादि अप्रमत्त ज्ञानानुभूतिसे उत्पन्न हुए तात्त्विक आनन्दसे अत्यन्त भरपूर सुखके भोक्ता होते है। इसी हेतूसे इस अनन्तरपूर्व क्षणिक अवस्था गत सविकल्प दशारुप शुभोपयोग को कारण एवं तत्समय की योग्यतारुप अप्रमत्त रुप वीतराग निर्विकल्प दशा को कार्य कहा जाता हैं। शुभोपयोग रुप प्रमत्तता(व्यवहार)➡️ शुद्धोपयोगरुप अप्रमत्तता(निश्चय)➡️शुभोपयोग रुप प्रमत्तता(व्यवहार)? इस चक्र को ही भेदाभेद रत्नत्रय से जिनवाणी माता संबोधति हैं।* *#समयव्याख्या गाथा सूत्र१७२ ,पृष्ठ क्रं २६० से २६१।* 2026-02-12 19:00:54