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74670 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DW3pzd1AVUW/?igsh=b2NueHByNDAxNjZh" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DW3pzd1AVUW/?igsh=b2NueHByNDAxNjZh</a> 2026-04-10 13:27:13
74669 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DW3pzd1AVUW/?igsh=b2NueHByNDAxNjZh" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DW3pzd1AVUW/?igsh=b2NueHByNDAxNjZh</a> 2026-04-10 13:27:12
74668 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE सभी को प्रणाम, एक छोटी सी मदद चाहिए। क्या आप प्लीज़ इस मैसेज को जाने-पहचाने ग्रुप्स में पोस्ट करेंगे ताकि यह सर्कुलेट हो जाए.... अगर आपको कोई ऐसे होशियार विद्यार्थी मिले है जो कि आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्होंने इस साल अपनी 10वीं की पढ़ाई पूरी की है और 80% से ज़्यादा नंबर लाए हैं, तो प्लीज़ उनसे NGO - प्रेरणा (इंफोसिस फाउंडेशन द्वारा सपोर्टेड) से कॉन्टैक्ट करने के लिए कहें। NGO एक रिटन टेस्ट ले रहा है और जो लोग टेस्ट पास कर लेंगे, वे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता के लिए पात्र होंगे। प्लीज़ स्टूडेंट्स से फॉर्म लेने के लिए नीचे दिए गए लोगों से कॉन्टैक्ट करने के लिए कहें: कॉन्टैक्ट नंबर: 1. सुश्री सरस्वती - 9900906338 2. श्री शिवकुमार - 9986630301 3. सुश्री बिंदु - 99645 34667 अगर आप किसी को नहीं जानते हैं, तो भी प्लीज़ यह जानकारी आगे बढ़ाएं, किसी को इसकी ज़रूरत हो सकती है। www.infosys.com/infosys-foundation धन्यवाद इसे दूसरे ग्रुप्स में भी फॉरवर्ड करें। अगर इससे किसी एक व्यक्ति को भी मदद मिलती है, तो यह किसी बच्चे के लिए अच्छी जानकारी है। मनोज जैन 2026-04-10 13:26:47
74667 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE सभी को प्रणाम, एक छोटी सी मदद चाहिए। क्या आप प्लीज़ इस मैसेज को जाने-पहचाने ग्रुप्स में पोस्ट करेंगे ताकि यह सर्कुलेट हो जाए.... अगर आपको कोई ऐसे होशियार विद्यार्थी मिले है जो कि आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्होंने इस साल अपनी 10वीं की पढ़ाई पूरी की है और 80% से ज़्यादा नंबर लाए हैं, तो प्लीज़ उनसे NGO - प्रेरणा (इंफोसिस फाउंडेशन द्वारा सपोर्टेड) से कॉन्टैक्ट करने के लिए कहें। NGO एक रिटन टेस्ट ले रहा है और जो लोग टेस्ट पास कर लेंगे, वे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता के लिए पात्र होंगे। प्लीज़ स्टूडेंट्स से फॉर्म लेने के लिए नीचे दिए गए लोगों से कॉन्टैक्ट करने के लिए कहें: कॉन्टैक्ट नंबर: 1. सुश्री सरस्वती - 9900906338 2. श्री शिवकुमार - 9986630301 3. सुश्री बिंदु - 99645 34667 अगर आप किसी को नहीं जानते हैं, तो भी प्लीज़ यह जानकारी आगे बढ़ाएं, किसी को इसकी ज़रूरत हो सकती है। www.infosys.com/infosys-foundation धन्यवाद इसे दूसरे ग्रुप्स में भी फॉरवर्ड करें। अगर इससे किसी एक व्यक्ति को भी मदद मिलती है, तो यह किसी बच्चे के लिए अच्छी जानकारी है। मनोज जैन 2026-04-10 13:26:46
74666 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-04-10 13:24:41
74665 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-04-10 13:24:40
74663 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *परमानंद स्तोत्र (अर्थ सहित)* _रचयिता - आचार्य श्री अकलंक स्वामी जी।_ *परमानन्द-संयुक्तं, निर्विकारं निरामयम्।* *ध्यानहीना न पश्यन्ति, निजदेहे व्यवस्थितम् ॥ १॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य अपने शरीर में रहने वाले, निराकुल आनन्द वाले,विकार रहित तथा नीरोग आत्मा को नहीं देखते।।१।।_ *अनन्त-सुख-सम्पन्नं, ज्ञानामृत-पयोधरम्।* *अनन्त-वीर्य-सम्पन्नं, दर्शनं परमात्मन: ॥२॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य अनन्त सुखों से सहित, ज्ञान रुपी अमृत के समुद्र रूप, अनन्तवीर्य से सहित, उत्कृष्ट अनन्त दर्शन स्वरूप (अनन्त चतुष्टयमयी) आत्मा को नहीं देखते।।२।।_ *निर्विकारं निराबाधं, सर्व-सङ्ग-विवर्जितम्।* *परमानन्द-सम्पन्नं, शुद्ध-चैतन्य-लक्षणम्॥ ३॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य विकार रहित,बाधा रहित,सब परिग्रह से रहित, निराकुल आनन्द सहित,शुद्धोपयोगी आत्मा को नहीं देखते।।३।।_ *उत्तमा स्वात्म चिन्ता स्यात् देहचिन्ता च मध्यमा।* *अधमा कामचिन्ता स्यात्,परचिन्ताऽधमाधमा॥ ४॥* *अर्थ -* _अपने आत्मा की चिंता उत्तम है, शरीर की चिंता मध्यम है, विषयों की चिंता अधम है और दूसरों की चिंता अधम से अधम है।।४।।_ *निर्विकल्प-समुत्पन्नं, ज्ञानमेव सुधारसम्।* *विवेक-मञ्जलिं कृत्वा, तं पिबंति तपस्विन:॥ ५॥* *अर्थ -* _एकाग्रता से उत्पन्न ज्ञान ही अमृत है। तपस्वी लोग विवेक की अंजुली बनाकर उसी को पीते हैं।।५।।_ *सदानन्द मयं जीवं, यो जानाति स पण्डित:।* *स सेवते निजात्मानं, परमानन्द-कारणम्॥ ६॥* *अर्थ -* _जो हमेशा आनन्द रूप आत्मा को जानता है वह पंडित है। वह ही निराकुल आनन्द में कारणभूत अपनी आत्मा का सेवन करता है।।६।।_ *नलिन्याच्च यथा नीरं, भिन्नं तिष्ठति सर्वदा।* *सोऽयमात्मा स्वभावेन, देहे तिष्ठति निर्मल:॥ ७॥* *अर्थ -* _जैसे कमल से पानी हमेशा अलग रहता है, वैसे ही यह आत्मा स्वभाव से शरीर में निर्मल रहता है।।७।।_ *द्रव्यकर्म-विनिर्मुक्तुं भाव-कर्म-विवर्जितम्।* *नो कर्म रहितं सिद्धं, निश्चयेन चिदात्मकम्॥ ८॥* *अर्थ -* _निश्चय से चैतन्यमयी आत्मा द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से रहित सिद्ध परमात्मा है।।८।।_ *आनन्दं ब्रह्मणो रूपं, निज देहे व्यवस्थितम्।* *ध्यानहीना न पश्यन्ति,जात्यन्धा इव भास्करम्॥ ९॥* *अर्थ -* _जिस प्रकार जन्म से अंधे सूर्य को नहीं देख पाते उसी प्रकार ध्यानहीन प्राणी अपने शरीर में रहने वाले सुख स्वभावी आत्मा को नहीं देख सकते हैं।।९।।_ *सद्ध्यानं क्रियते भव्यं मनो येन विलीयते।* *तत्क्षणं दृश्यते शुद्धं, चिच्चमत्कार-लक्षणम्॥ १०॥* *अर्थ -* _जिससे मन स्थिर होता है ऐसा सुन्दर ध्यान जब किया जाता है उस समय चमत्कारी शुद्ध आत्मा देखा जाता है।।१०।।_ *(उपजाति)* *ये ध्यानशीला मुनय: प्रधाना: दु:खहीना नियमाद्भवन्ति।* *सम्प्राप्य शीघ्रं परमात्म-तत्त्वं, व्रजन्ति मोक्ष क्षणमेकमेव॥ ११॥* *अर्थ -* _जो उत्कृष्ट मुनि ध्यान लीन होते है वे नियम से दुःख रहित होते है और असली आत्मस्वरुप को शीघ्र ही प्राप्त कर एक क्षण में ही मोक्ष चले जाते है।।११।।_ *आनन्द रूपं परमात्मतत्त्वं, समस्त-संकल्प-विकल्प-मुक्तम्।* *स्वभावलीना निवसन्ति नित्यं, जानाति योगी स्वयमेव तत्त्वम्॥१२॥* *अर्थ -* _जो योगी अपने ही को आनन्दरूप परमात्म स्वरूप,सब संकल्प-विकल्पों से रहित मानते हैं वे हमेशा निज भाव में लीन रहते है।।१२।।_ *चिदानन्दमयं शुद्धं, निराकारं निरामयम्।* *अनन्त-सुख-सम्पन्नं सर्वसङ्ग-विवर्जितम्॥ १३॥* *लोक मात्र-प्रमाणोऽयं, निश्चये न हि संशय:।* *व्यवहारे तनु मात्र: कथित: परमेश्वरै:॥ १४॥* *अर्थ -* _निश्चयनय से आचार्य आत्मा को अपने आनन्द स्वरूप, शुद्ध, निराकार,निरोग, अनन्त सुख से रहित, सम्पूर्ण परिग्रहों से रहित लोक के बराबर कहते है। व्यवहार नय से आचार्यों ने शरीर प्रमाण आत्मा कहा है, इसमें सन्देह नहीं है।।१३-१४।।_ *यत्क्षणं दृश्यते शुद्धं, तत्क्षणं गत विभ्रम:।* *स्वस्थचित्त: स्थिरी भूत्वा, निर्विकल्प-समाधित:॥१५॥* *अर्थ -* _स्थिर होकर जो क्षणमात्र में देखा गया है वह ही शुद्ध, सन्देह रहित, निर्विकल्प समाधि सहित, स्वस्थ चित्त वाला आत्मा है।।१५।।_ *स एव परमं ब्रह्म, स एव जिनपुङ्गव:।* *स एव परमं तत्त्वं, स एव परमो गुरु : ॥ १६॥* *स एव परमं ज्योति:, स एव परमं तप:।* *स एव परमं ध्यानं, स एव परमात्मक:॥ १७॥* *स एव सर्वकल्याणं, स एव सुखभाजनम्।* *स एव शुद्धचिद्रूपं, स एव परम: शिव:॥ १८॥* *स एव परमानन्द:, स एव सुखदायक:।* *स एव परमज्ञानं, स एव गुणसागर: ॥ १९॥* *अर्थ -* _आत्मा ही श्रेष्ठ ब्रह्मा है,वही जिनेन्द्रों में श्रेष्ठ है,वही उत्तम तत्त्व है,वही परम गुरु हैं। वही उत्कृष्ट ज्योति है,वही उत्तम तप है,वही श्रेष्ठ ध्यान है,वही परमात्मा है। वही कल्याण रूप है, वही सुख का पात्र है,वही शुद्ध चैतन्य है,वही अतिशय कल्याण रूप है। वही उत्कृष्ट आनन्द है,वही सुख देने वाला है,वही उत्तम ज्ञान है,वही गुणों का समुद्र है।।१६-१७-१८-१९।।_ *परमाल्हाद-सम्पन्नं, रागद्वेष-विवर्जितम्।* *सोऽहं तं देह-मध्येषु, यो जानाति स पण्डित:॥ २०॥* *अर्थ -* _शरीर में उत्कृष्ट आनन्द से सहित,राग -द्वेष से रहित, आत्मा को,वही (सिद्ध) मैं हूं ऐसा जो जानता है वह पण्डित है।।२०।।_ *आकार-रहितं शुद्धं, स्वस्वरूपे व्यवस्थितम्।* *सिद्धमष्ट-गुणोपेतं, निर्विकारं निरञ्जनम्॥ २१॥* *तत्सद्दर्शनं निजात्मानं, प्रकाशाय महीयसे।* *सहजानन्द-चैतन्यं, यो जानाति स पण्डित:॥ २२॥* *अर्थ -* _उत्तम स्वाभाविक चिदानंद को प्रकाश करने के लिए जो आकार रहित, शुद्ध, अपने स्वरुप में लीन,आठ गुणों से सहित,विकार रहित, निष्कलंक जो सिद्ध, उनके समान अपनी आत्मा को जानता है वह पंडित है।।२१-२२।।_ *पाषाणेषु यथा हेम, दुग्धमध्ये यथा घृतम्।* *तिल मध्ये यथा तैलं, देहमध्ये तथा शिव:॥ २३॥* *अर्थ -* _सुवर्ण पत्थर में जैसे सोना रहता है,दूध में जैसे घी रहता है, तिलों में जैसे तेल रहता है उसी प्रकार शरीर में यह आत्मा रहता है।।२३।।_ *काष्ठमध्ये यथा वह्नि:, शक्तिरूपेण तिष्ठति।* *अयमात्मा शरीरेषु, यो जानाति स पण्डित:॥२४॥* *अर्थ -* _लकड़ी के बीच में जैसे शक्ति रुप से अग्नि रहती है उसी प्रकार शरीर में यह आत्मा रहता है। इस प्रकार जो जानता है वह पंडित है।।२४।।_ *।। सम्पूर्ण।।* 2026-04-10 13:21:21
74664 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *परमानंद स्तोत्र (अर्थ सहित)* _रचयिता - आचार्य श्री अकलंक स्वामी जी।_ *परमानन्द-संयुक्तं, निर्विकारं निरामयम्।* *ध्यानहीना न पश्यन्ति, निजदेहे व्यवस्थितम् ॥ १॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य अपने शरीर में रहने वाले, निराकुल आनन्द वाले,विकार रहित तथा नीरोग आत्मा को नहीं देखते।।१।।_ *अनन्त-सुख-सम्पन्नं, ज्ञानामृत-पयोधरम्।* *अनन्त-वीर्य-सम्पन्नं, दर्शनं परमात्मन: ॥२॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य अनन्त सुखों से सहित, ज्ञान रुपी अमृत के समुद्र रूप, अनन्तवीर्य से सहित, उत्कृष्ट अनन्त दर्शन स्वरूप (अनन्त चतुष्टयमयी) आत्मा को नहीं देखते।।२।।_ *निर्विकारं निराबाधं, सर्व-सङ्ग-विवर्जितम्।* *परमानन्द-सम्पन्नं, शुद्ध-चैतन्य-लक्षणम्॥ ३॥* *अर्थ -* _ध्यानहीन मनुष्य विकार रहित,बाधा रहित,सब परिग्रह से रहित, निराकुल आनन्द सहित,शुद्धोपयोगी आत्मा को नहीं देखते।।३।।_ *उत्तमा स्वात्म चिन्ता स्यात् देहचिन्ता च मध्यमा।* *अधमा कामचिन्ता स्यात्,परचिन्ताऽधमाधमा॥ ४॥* *अर्थ -* _अपने आत्मा की चिंता उत्तम है, शरीर की चिंता मध्यम है, विषयों की चिंता अधम है और दूसरों की चिंता अधम से अधम है।।४।।_ *निर्विकल्प-समुत्पन्नं, ज्ञानमेव सुधारसम्।* *विवेक-मञ्जलिं कृत्वा, तं पिबंति तपस्विन:॥ ५॥* *अर्थ -* _एकाग्रता से उत्पन्न ज्ञान ही अमृत है। तपस्वी लोग विवेक की अंजुली बनाकर उसी को पीते हैं।।५।।_ *सदानन्द मयं जीवं, यो जानाति स पण्डित:।* *स सेवते निजात्मानं, परमानन्द-कारणम्॥ ६॥* *अर्थ -* _जो हमेशा आनन्द रूप आत्मा को जानता है वह पंडित है। वह ही निराकुल आनन्द में कारणभूत अपनी आत्मा का सेवन करता है।।६।।_ *नलिन्याच्च यथा नीरं, भिन्नं तिष्ठति सर्वदा।* *सोऽयमात्मा स्वभावेन, देहे तिष्ठति निर्मल:॥ ७॥* *अर्थ -* _जैसे कमल से पानी हमेशा अलग रहता है, वैसे ही यह आत्मा स्वभाव से शरीर में निर्मल रहता है।।७।।_ *द्रव्यकर्म-विनिर्मुक्तुं भाव-कर्म-विवर्जितम्।* *नो कर्म रहितं सिद्धं, निश्चयेन चिदात्मकम्॥ ८॥* *अर्थ -* _निश्चय से चैतन्यमयी आत्मा द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से रहित सिद्ध परमात्मा है।।८।।_ *आनन्दं ब्रह्मणो रूपं, निज देहे व्यवस्थितम्।* *ध्यानहीना न पश्यन्ति,जात्यन्धा इव भास्करम्॥ ९॥* *अर्थ -* _जिस प्रकार जन्म से अंधे सूर्य को नहीं देख पाते उसी प्रकार ध्यानहीन प्राणी अपने शरीर में रहने वाले सुख स्वभावी आत्मा को नहीं देख सकते हैं।।९।।_ *सद्ध्यानं क्रियते भव्यं मनो येन विलीयते।* *तत्क्षणं दृश्यते शुद्धं, चिच्चमत्कार-लक्षणम्॥ १०॥* *अर्थ -* _जिससे मन स्थिर होता है ऐसा सुन्दर ध्यान जब किया जाता है उस समय चमत्कारी शुद्ध आत्मा देखा जाता है।।१०।।_ *(उपजाति)* *ये ध्यानशीला मुनय: प्रधाना: दु:खहीना नियमाद्भवन्ति।* *सम्प्राप्य शीघ्रं परमात्म-तत्त्वं, व्रजन्ति मोक्ष क्षणमेकमेव॥ ११॥* *अर्थ -* _जो उत्कृष्ट मुनि ध्यान लीन होते है वे नियम से दुःख रहित होते है और असली आत्मस्वरुप को शीघ्र ही प्राप्त कर एक क्षण में ही मोक्ष चले जाते है।।११।।_ *आनन्द रूपं परमात्मतत्त्वं, समस्त-संकल्प-विकल्प-मुक्तम्।* *स्वभावलीना निवसन्ति नित्यं, जानाति योगी स्वयमेव तत्त्वम्॥१२॥* *अर्थ -* _जो योगी अपने ही को आनन्दरूप परमात्म स्वरूप,सब संकल्प-विकल्पों से रहित मानते हैं वे हमेशा निज भाव में लीन रहते है।।१२।।_ *चिदानन्दमयं शुद्धं, निराकारं निरामयम्।* *अनन्त-सुख-सम्पन्नं सर्वसङ्ग-विवर्जितम्॥ १३॥* *लोक मात्र-प्रमाणोऽयं, निश्चये न हि संशय:।* *व्यवहारे तनु मात्र: कथित: परमेश्वरै:॥ १४॥* *अर्थ -* _निश्चयनय से आचार्य आत्मा को अपने आनन्द स्वरूप, शुद्ध, निराकार,निरोग, अनन्त सुख से रहित, सम्पूर्ण परिग्रहों से रहित लोक के बराबर कहते है। व्यवहार नय से आचार्यों ने शरीर प्रमाण आत्मा कहा है, इसमें सन्देह नहीं है।।१३-१४।।_ *यत्क्षणं दृश्यते शुद्धं, तत्क्षणं गत विभ्रम:।* *स्वस्थचित्त: स्थिरी भूत्वा, निर्विकल्प-समाधित:॥१५॥* *अर्थ -* _स्थिर होकर जो क्षणमात्र में देखा गया है वह ही शुद्ध, सन्देह रहित, निर्विकल्प समाधि सहित, स्वस्थ चित्त वाला आत्मा है।।१५।।_ *स एव परमं ब्रह्म, स एव जिनपुङ्गव:।* *स एव परमं तत्त्वं, स एव परमो गुरु : ॥ १६॥* *स एव परमं ज्योति:, स एव परमं तप:।* *स एव परमं ध्यानं, स एव परमात्मक:॥ १७॥* *स एव सर्वकल्याणं, स एव सुखभाजनम्।* *स एव शुद्धचिद्रूपं, स एव परम: शिव:॥ १८॥* *स एव परमानन्द:, स एव सुखदायक:।* *स एव परमज्ञानं, स एव गुणसागर: ॥ १९॥* *अर्थ -* _आत्मा ही श्रेष्ठ ब्रह्मा है,वही जिनेन्द्रों में श्रेष्ठ है,वही उत्तम तत्त्व है,वही परम गुरु हैं। वही उत्कृष्ट ज्योति है,वही उत्तम तप है,वही श्रेष्ठ ध्यान है,वही परमात्मा है। वही कल्याण रूप है, वही सुख का पात्र है,वही शुद्ध चैतन्य है,वही अतिशय कल्याण रूप है। वही उत्कृष्ट आनन्द है,वही सुख देने वाला है,वही उत्तम ज्ञान है,वही गुणों का समुद्र है।।१६-१७-१८-१९।।_ *परमाल्हाद-सम्पन्नं, रागद्वेष-विवर्जितम्।* *सोऽहं तं देह-मध्येषु, यो जानाति स पण्डित:॥ २०॥* *अर्थ -* _शरीर में उत्कृष्ट आनन्द से सहित,राग -द्वेष से रहित, आत्मा को,वही (सिद्ध) मैं हूं ऐसा जो जानता है वह पण्डित है।।२०।।_ *आकार-रहितं शुद्धं, स्वस्वरूपे व्यवस्थितम्।* *सिद्धमष्ट-गुणोपेतं, निर्विकारं निरञ्जनम्॥ २१॥* *तत्सद्दर्शनं निजात्मानं, प्रकाशाय महीयसे।* *सहजानन्द-चैतन्यं, यो जानाति स पण्डित:॥ २२॥* *अर्थ -* _उत्तम स्वाभाविक चिदानंद को प्रकाश करने के लिए जो आकार रहित, शुद्ध, अपने स्वरुप में लीन,आठ गुणों से सहित,विकार रहित, निष्कलंक जो सिद्ध, उनके समान अपनी आत्मा को जानता है वह पंडित है।।२१-२२।।_ *पाषाणेषु यथा हेम, दुग्धमध्ये यथा घृतम्।* *तिल मध्ये यथा तैलं, देहमध्ये तथा शिव:॥ २३॥* *अर्थ -* _सुवर्ण पत्थर में जैसे सोना रहता है,दूध में जैसे घी रहता है, तिलों में जैसे तेल रहता है उसी प्रकार शरीर में यह आत्मा रहता है।।२३।।_ *काष्ठमध्ये यथा वह्नि:, शक्तिरूपेण तिष्ठति।* *अयमात्मा शरीरेषु, यो जानाति स पण्डित:॥२४॥* *अर्थ -* _लकड़ी के बीच में जैसे शक्ति रुप से अग्नि रहती है उसी प्रकार शरीर में यह आत्मा रहता है। इस प्रकार जो जानता है वह पंडित है।।२४।।_ *।। सम्पूर्ण।।* 2026-04-10 13:21:21
74661 48925761 आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 _जो कवियों ने ऋषियों ने लिखा है, *सभी मुद्राओं को देखकर के ऐसा लगता है* कि, *मैं अकेले ही प्रसन्न नहीं हूं, सारा जगत ही प्रसन्न है*_ ???? _महाकवि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के समाधि दिवस पर उनकी अनुपम कृति जयोदय महाकाव्य पर राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी, पपौरा जी (जिला-टीकमगढ़, म.प्र.) १४-१५ मई २०१८, में राष्ट्रहित चिंतक *आचार्य विद्यासागर जी महाराज* का प्रवचनांश-_ <a href="https://youtu.be/gPcVOCgL_fc?si=m5PyWlfQ1XgZKjo8" target="_blank">https://youtu.be/gPcVOCgL_fc?si=m5PyWlfQ1XgZKjo8</a> _(देखें 3.50 से 6.44 तक)_ *_15 मि. का प्रवचनांश पूरा अवश्य सुनें_* ???????? हम ही सब कुछ हैं यूँ कहता है 'ही' सदा, तुम तो तुच्छ, कुछ नहीं हो ! और, 'भी' का कहना है कि *हम भी हैं* *तुम भी हो* *सब कुछ !* *'ही' देखता है हीन दृष्टि से पर को* *'भी' देखता है समीचीन दृष्टि से सब को* - _मूकमाटी :: पृ १७२,१७३_ - _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज_ 2026-04-10 13:20:12
74662 48925761 आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 _जो कवियों ने ऋषियों ने लिखा है, *सभी मुद्राओं को देखकर के ऐसा लगता है* कि, *मैं अकेले ही प्रसन्न नहीं हूं, सारा जगत ही प्रसन्न है*_ ???? _महाकवि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के समाधि दिवस पर उनकी अनुपम कृति जयोदय महाकाव्य पर राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी, पपौरा जी (जिला-टीकमगढ़, म.प्र.) १४-१५ मई २०१८, में राष्ट्रहित चिंतक *आचार्य विद्यासागर जी महाराज* का प्रवचनांश-_ <a href="https://youtu.be/gPcVOCgL_fc?si=m5PyWlfQ1XgZKjo8" target="_blank">https://youtu.be/gPcVOCgL_fc?si=m5PyWlfQ1XgZKjo8</a> _(देखें 3.50 से 6.44 तक)_ *_15 मि. का प्रवचनांश पूरा अवश्य सुनें_* ???????? हम ही सब कुछ हैं यूँ कहता है 'ही' सदा, तुम तो तुच्छ, कुछ नहीं हो ! और, 'भी' का कहना है कि *हम भी हैं* *तुम भी हो* *सब कुछ !* *'ही' देखता है हीन दृष्टि से पर को* *'भी' देखता है समीचीन दृष्टि से सब को* - _मूकमाटी :: पृ १७२,१७३_ - _आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज_ 2026-04-10 13:20:12