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226558 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 08:53:03
226553 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 08:53:01
226554 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 08:53:01
226551 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 08:52:59
226552 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 08:52:59
226550 41139993 +120363368584592632 2026-06-13 08:52:51
226549 41139993 +120363368584592632 2026-06-13 08:52:50
226548 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *"जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं - श्री स्वामी जी"* *"स्वकी अस्ति में परकी नास्ति स्वमेव हो जाती है - पारसमणी"* *1. प्रश्न: अनंत काल बीत गया, अब कैसे समझ आएगा?* *पू. गुरुदेवश्री का वज्र जवाब*: _अनंत काल में नहीं समझा = इसका मतलब ये नहीं कि अब नहीं समझेगा_। *उदाहरण दिया*: _पानी 100 साल तक अग्नि के निमित्त से उष्ण रहे_ → _क्या उसका शीतल स्वभाव नष्ट हो गया?_ _चूल्हे से उतरते ही, अग्नि हटते ही, तत्क्षण शीतल_। _स्वभाव कभी मरता नहीं, ढका था बस_। *वैसे ही आत्मा*: _अनंत काल से विपरीत रुचि = पर-सन्मुख दृष्टि के कारण नहीं जाना_। _पर अब रुचि पलट जाए = "मैं ज्ञायक हूँ" की लगन लग जाए_ → _क्षणमात्र में आत्मा समझ में आ जाए_। _कल्याण हो जाए_। _कल पढ़ा न? निश्चय प्रतिक्रमण = स्वभाव में स्थिर होना_। _यही रुचि पलटना है_। *2. विभाव हटेगा कैसे? - हटाओ मत, स्वभाव में लगो* *श्री स्वामी जी का सूत्र*: _जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं_। *हम क्या करते हैं?* _क्रोध आया → क्रोध हटाओ, क्रोध मिटाओ_ → _यही तो और राग_। *ज्ञानी क्या करता है?* _क्रोध को देखता ही नहीं_ → _"मैं ज्ञायक हूँ" में लग जाता है_। *नियम*: _अंधकार को भगाना नहीं पड़ता, दीपक जलाओ अंधकार खुद भाग जाएगा_। *वैसे ही*: _विभाव = परद्रव्य में उपयोग_। _स्वभाव = ज्ञायक में उपयोग_। _स्वभाव में उपयोग लगा = विभाव की जगह ही नहीं बची_। _कल पढ़ा: वस्तु में भूल नहीं, भूल दृष्टि में है_। _दृष्टि स्व में गई = विभाव गया_। *3. पारसमणी का सिद्धांत - "स्वकी अस्ति में परकी नास्ति"* *पारसमणी लोहे को छुए तो लोहा सोना बन जाए* → _लोहे को मिटाना नहीं पड़ता_। *वैसे ही*: _स्व की अस्ति = "मैं हूँ, ज्ञायक हूँ" इस अस्तित्व में जमो_ → _पर की नास्ति = "ये मेरा नहीं, मैं इसका कर्ता नहीं" अपने आप हो जाएगा_। *मतलब*: _राग-द्वेष को लड़कर मिटाना नहीं है_। _स्वभाव को जानकर भासने से वो खुद मिट जाएंगे_। _जैसे सूरज निकलते ही ओस के कण खुद सूख जाते हैं_। *आज का 3 सेकंड का प्रयोग - "स्व में लगो"* *जब भी मन भटके, 3 शब्द बोलो और भासो*: *1. स्वकी अस्ति* → _"मैं हूँ"_ *2. ज्ञायक स्वभाव* → _"मैं ज्ञायक हूँ"_ *3. परकी नास्ति* → _"बाकी सब पर है, मेरा नहीं"_ _बस उपयोग स्व में लगा_ → _विभाव अपने आप हट गया_ → _यही क्षणमात्र का कल्याण है_। *सार: 9 दिन की पूरी कड़ी का राज* *_मिथ्यात्व छोड़ो_ → _निमित्ताधीन दृष्टि हटाओ_ → _क्रमबद्ध मानो_ → _"अहमेक्को शुद्धों"_* → _वत्थु सहावो धम्मो_ → _निज वैभव_ → _यथार्थ निर्णय_ → _दृष्टि बदलो_ → _निश्चय प्रतिक्रमण हुआ _ → _आज: उपयोग स्वभाव में लगाओ, विभाव खुद हट जाएगा_ _पर-सन्मुख रुचि हटाओ, "मैं ज्ञायक हूँ" रुचि लगाओ, आत्मा खुद प्रकट_। _आत्मा को कभी मत बेचना - न विभाव मिटाने की मेहनत के लिए_। _क्योंकि स्वभाव में लगते ही विभाव की दुकान बंद_। _पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_। *_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?* *स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज का संकल्प: लड़ना नहीं है, बस स्व में लगना है* ?✨ *सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते* *शुद्ध आगम वाणी* 2026-06-13 08:50:42
226547 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *"जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं - श्री स्वामी जी"* *"स्वकी अस्ति में परकी नास्ति स्वमेव हो जाती है - पारसमणी"* *1. प्रश्न: अनंत काल बीत गया, अब कैसे समझ आएगा?* *पू. गुरुदेवश्री का वज्र जवाब*: _अनंत काल में नहीं समझा = इसका मतलब ये नहीं कि अब नहीं समझेगा_। *उदाहरण दिया*: _पानी 100 साल तक अग्नि के निमित्त से उष्ण रहे_ → _क्या उसका शीतल स्वभाव नष्ट हो गया?_ _चूल्हे से उतरते ही, अग्नि हटते ही, तत्क्षण शीतल_। _स्वभाव कभी मरता नहीं, ढका था बस_। *वैसे ही आत्मा*: _अनंत काल से विपरीत रुचि = पर-सन्मुख दृष्टि के कारण नहीं जाना_। _पर अब रुचि पलट जाए = "मैं ज्ञायक हूँ" की लगन लग जाए_ → _क्षणमात्र में आत्मा समझ में आ जाए_। _कल्याण हो जाए_। _कल पढ़ा न? निश्चय प्रतिक्रमण = स्वभाव में स्थिर होना_। _यही रुचि पलटना है_। *2. विभाव हटेगा कैसे? - हटाओ मत, स्वभाव में लगो* *श्री स्वामी जी का सूत्र*: _जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं_। *हम क्या करते हैं?* _क्रोध आया → क्रोध हटाओ, क्रोध मिटाओ_ → _यही तो और राग_। *ज्ञानी क्या करता है?* _क्रोध को देखता ही नहीं_ → _"मैं ज्ञायक हूँ" में लग जाता है_। *नियम*: _अंधकार को भगाना नहीं पड़ता, दीपक जलाओ अंधकार खुद भाग जाएगा_। *वैसे ही*: _विभाव = परद्रव्य में उपयोग_। _स्वभाव = ज्ञायक में उपयोग_। _स्वभाव में उपयोग लगा = विभाव की जगह ही नहीं बची_। _कल पढ़ा: वस्तु में भूल नहीं, भूल दृष्टि में है_। _दृष्टि स्व में गई = विभाव गया_। *3. पारसमणी का सिद्धांत - "स्वकी अस्ति में परकी नास्ति"* *पारसमणी लोहे को छुए तो लोहा सोना बन जाए* → _लोहे को मिटाना नहीं पड़ता_। *वैसे ही*: _स्व की अस्ति = "मैं हूँ, ज्ञायक हूँ" इस अस्तित्व में जमो_ → _पर की नास्ति = "ये मेरा नहीं, मैं इसका कर्ता नहीं" अपने आप हो जाएगा_। *मतलब*: _राग-द्वेष को लड़कर मिटाना नहीं है_। _स्वभाव को जानकर भासने से वो खुद मिट जाएंगे_। _जैसे सूरज निकलते ही ओस के कण खुद सूख जाते हैं_। *आज का 3 सेकंड का प्रयोग - "स्व में लगो"* *जब भी मन भटके, 3 शब्द बोलो और भासो*: *1. स्वकी अस्ति* → _"मैं हूँ"_ *2. ज्ञायक स्वभाव* → _"मैं ज्ञायक हूँ"_ *3. परकी नास्ति* → _"बाकी सब पर है, मेरा नहीं"_ _बस उपयोग स्व में लगा_ → _विभाव अपने आप हट गया_ → _यही क्षणमात्र का कल्याण है_। *सार: 9 दिन की पूरी कड़ी का राज* *_मिथ्यात्व छोड़ो_ → _निमित्ताधीन दृष्टि हटाओ_ → _क्रमबद्ध मानो_ → _"अहमेक्को शुद्धों"_* → _वत्थु सहावो धम्मो_ → _निज वैभव_ → _यथार्थ निर्णय_ → _दृष्टि बदलो_ → _निश्चय प्रतिक्रमण हुआ _ → _आज: उपयोग स्वभाव में लगाओ, विभाव खुद हट जाएगा_ _पर-सन्मुख रुचि हटाओ, "मैं ज्ञायक हूँ" रुचि लगाओ, आत्मा खुद प्रकट_। _आत्मा को कभी मत बेचना - न विभाव मिटाने की मेहनत के लिए_। _क्योंकि स्वभाव में लगते ही विभाव की दुकान बंद_। _पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_। *_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?* *स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज का संकल्प: लड़ना नहीं है, बस स्व में लगना है* ?✨ *सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते* *शुद्ध आगम वाणी* 2026-06-13 08:50:41
226546 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *जय जिनेन्द्र,,जैन धर्म और हिंदू धर्म में किसी तरह की कोई समानता नही है दोनो भारत के सविधान में पूर्ण रूप से अलग अलग धर्म है अब जरा सा हिंदू धर्म के बारे में विस्तृत जानकारी पूरे भारत में जान लेते हैं जैन धर्म के श्रावक श्राविकाओं को मुस्लिम इस्लामिक धर्म बोहोत हिसक लगता है अब हिन्दू धर्म भी कुछ ज्यादा अलग नही है कुछ बाते अच्छे से सभी जान ले हिंदू धर्म में मास अंडा चिकन मटन मछली खाने वालो की संख्या करीब 80 से 85 प्रतिशत है जो जैन धर्म में छूआ भी नही जाता और बाकी बचे 15 प्रतिशत में अधिकांश जमीकंद प्याज लहसुन आलू का सेवन करते हैं जो जैन धर्म में किसी श्रावक श्राविकाओं को सेवन पूर्ण वर्जित है अब खाने पीने की आदत पूर्ण रूप से जैन धर्म जिन शासन और हिंदू धर्म में कही से कही भी समानता नही है अब दूसरे कुछ प्रथा पर आते हैं हिंदू धर्म वैदिक कर्म काण्ड को ही मानता है जबकि जैन धर्म अरिहंत तीर्थंकर प्रभुजी के द्वारा प्रतिपादित श्रमण परंपराओं को भी मानता है और वैदिक कर्म काण्ड जो हिंदू धर्म के पंडोओ द्वारा करी जाती है कोई भी जैन श्रावक श्राविकाओं का उसमे कोई भी लेना देना नहीं है सिर्फ और सिर्फ श्रमण परंपराओं को ही जैन श्रावक श्राविकाओं द्वारा अंगीकार किया जाता है अब कुछ और बाते हिंदू धर्म में इस्लामिक मुस्लिम धर्म की तरह बली देने की परम्परा है जबकि जैन धर्म में अहिंसा परमो धर्म किसी भी परिस्थिति में कोई भी जीव की हिंसा को भयंकर पाप कर्म का बंधन माना गया है हिंदू धर्म में अधिकांश लोगों द्वारा दीपावली पर पटाखे फोड़े जाते हैं और असंख्य छोटे छोटे जीवो की हिंसा करी जाती है जबकि जैन धर्म में किसी भी परिस्थिति में किसी भी प्रकार की हिंसा वर्जित है और पटाखे जलाना तो दूर देखते भी नहीं है क्युकी अनुमोदन की हिंसा लगती हैं हिंदू धर्म में मास अंडा मछली चिकन मटन अधिकांश हिंदू लोगो द्वारा सेवन किया जाता है और जो 10 से 15 प्रतिशत नही भीं करते इस में से अधिकांश अभस्य वस्तु का सेवन करते हैं जैसे जमीकंद आलू प्याज लहसुन आदि और जैन धर्म में रात्रि भोजन का त्याग रहता है वही हिंदू धर्म में किसी भी प्रकार के रात्रि भोजन के त्याग की कोई भी परंपरा नहीं है और वैदिक कर्म काण्ड को भी माना जाता है और अधिकांश हिंदू बलि चराते है जैसे बकरा ईद पर मुस्लिम इस्लामिक धर्म द्वारा मासूम निर्दोष जीवो की घाट करी जाती है और हिंदू धर्म के अधिकांश लोगों द्वारा दीपावली में भी हर तरह की हिंसा छोटे छोटे सूक्ष्म जीवों की करी जाती हैं जैन धर्म और हिंदू धर्म में कुछ भी समानता नही है और पुरी तरह से अलग अलग धर्म भारत के संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित है जैन हिंदू नही होते और हिंदू जैन किसी भी प्रकार से नही होते राष्ट्रीय धार्मिक आधार पर जनगणना कुछ ही महीनों में पूरे भारत में होने जा रही है सभी से निवेदन और अनुरोध है धर्म हमारा जैन जाति हमारी जैन उपनाम में भी सिर्फ और सिर्फ जैन लिखे हमारा पूरा अस्तित्व ही जैन जैन जैन जिन शासन का परचम पूरे भारत में लहरा दे क्युकी यह जन गणना जैन धर्म का भविष्य निर्धारण करेगी पूरे भारत में जैन 5 करोड़ से भी अधिक है लेकिन सरकारी रिकार्ड में बोहोत कम दर्ज हे जैन धर्म जिन शासन के साथ आज पूरे भारत में अन्याय अत्याचार के समाचार आप रोज देख सुन रहे हैं जैन धर्म संस्कृति हमारे तीर्थ स्थल की रक्षा सुरक्षा जैन धर्म जिन शासन की आत्मा सभी सभी संत और महा सती जी साध्वी जी की रक्षा सुरक्षा और सभी श्रावक श्राविकाओं की रक्षा सुरक्षा हमारे बच्चो का भविष्य भीं जन गणना से सुनिश्चित होगी क्युकी कमजोर की आवाज कोई भी नहीं सुनता लेकिन जब पूरे भारत में सभी को अच्छी तरह से मालूम होगा जैन धर्म के परिवारों श्रावक श्राविकाओं की संख्या पूरे भारत में 5 करोड़ से भी अधिक है पूरे भारत का जैन धर्म जिन शासन को देखने का नजरिया बदल जाएगा और जैन धर्म जिन शासन को कोई भी हल्के में लेने की जीवन में भूल नहीं करेंगे भारत के संविधान की अधिकृत प्रति भी साथ में भेज रहे हैं जिसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है जैन धर्म पूर्ण रूप से अलग और भारत के संविधान में स्वतंत्र धर्म के रूप में भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त है और किसी भी भारत के दूसरे धर्म से कोई लेना देना नहीं है ...खास कर गोदी जैन अंध भक्त इस बात का ध्यान रखे ...जय जिनेन्द्र जय जिन शासन जी* 2026-06-13 08:50:40