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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
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| 223732 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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### *"प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना क्या है ?"*
### *"जो आत्मा है, वही प्रतिक्रमण है। जो आत्मा है, वही प्रत्याख्यान है। जो आत्मा है, वही आलोचना है"*
" स्वभावसे विभावमें जाना ही अतिक्रमण है "
#### *1. व्यवहार vs निश्चय - दोनों का भेद समझो*
*तस्वीर बिल्कुल साफ बोल रही है*:
*व्यवहार रुप* = _बाह्य क्रिया_
*1. प्रतिक्रमण* = _भूतकाल के दोषों से निवृत्ति_ → _"पिछले पापों के लिए खेद"_
*2. प्रत्याख्यान* = _भविष्य के दोषों का त्याग_ → _"आगे पाप नहीं करूंगा का संकल्प"_
*3. आलोचना* = _वर्तमान के दोषों का त्याग_ → _"अभी जो गलती हो रही है उसे छोड़ना"_
_ये सब शुभ भाव हैं, पाप से बचाते हैं, पुण्य बंध कराते हैं_। _पर अंतिम लक्ष्य नहीं_।
*निश्चय रुप* = _अंतर स्वभाव में लीन होना_
*सार एक लाइन में*: _स्वभाव से उपयोग का बाहर आना ही अतिक्रमण है_।
_और उसी का प्रतिक्रमण = "मैं त्रिकाल ज्ञायक चैतन्य आत्मतत्व हूँ" - उसी में स्थिर हो जाना_।
_मतलब: रटना नहीं, अनुभव करना है_। _तोते की तरह "मिच्छामि दुक्कडं" बोला और मन में राग = खाली पिंजरे का तोता_।
#### *2. अभेद साधना क्या है? - कर्म-चेतना छोड़ो, ज्ञान-चेतना में आओ*
*तस्वीर का सार*:
*जो आत्मा है = वही प्रतिक्रमण है* = _भूतकाल के पापों को देखो ही मत, अपने ज्ञायक स्वभाव को देखो_।
*जो आत्मा है = वही प्रत्याख्यान है* = _भविष्य का संकल्प नहीं, वर्तमान में ज्ञायक में रम जाओ_।
*जो आत्मा है = वही आलोचना है* = _वर्तमान की गलती पकड़ो मत, "मैं ज्ञायक हूँ" भासो_।
_क्यों? क्योंकि कर्म-चेतना = "मैंने पाप किया, मैं पुण्य करूंगा" = पर-सन्मुख_।
_ज्ञान-चेतना = "मैं ज्ञायक हूँ, मैं शुद्ध हूँ" = स्व-सन्मुख_।
_कल पढ़ा न? वस्तु में भूल नहीं, भूल मात्र दृष्टि में है_। _दृष्टि स्व में टिक गई = सच्चा प्रतिक्रमण हो गया_।
#### *3. तोते वाला दृष्टांत - हम कहाँ गलती कर रहे हैं?*
_"बहुत प्रतिक्रमण किए, धर्म क्यों नहीं हुआ?"_
*उत्तर*: _"बिना समझे रटना कार्यकारी नहीं"_।
*शब्दों का अर्थ और अर्थ का भाव भासन हो तब सच्चा प्रतिक्रमण , प्रत्याख्यान और आलोचना होती है _ पारसमणी*
*हम क्या करते हैं?*
_मुंह से बोलते हैं "मैं क्षमा चाहता हूँ"_ → _मन में वही व्यक्ति, वही क्रोध याद_।
_ऊपर से प्रतिक्रमण, अंदर राग के संस्कार_ → _ये मोक्ष मार्ग नहीं, पुण्य मार्ग है_।
*सच्चा प्रतिक्रमण कब?*
_जब "मैंने गाली दी" की जगह "मैं ज्ञायक हूँ" भासे_।
_गलती पर्याय में हुई, मैं तो त्रिकाल शुद्ध हूँ_ → _यही निश्चय आलोचना है_।
### *आज का 1 मिनट का निश्चय प्रयोग*
*रात को सोने से पहले, 3 काल के लिए*:
*1. भूतकाल प्रतिक्रमण*: _आंख बंद → "मैं त्रिकाल ज्ञायक हूँ" → पाप याद मत करो, स्वभाव याद करो_।
*2. वर्तमान आलोचना*: _"अभी उपयोग बाहर गया था" → वापस "मैं दृष्टा हूँ" में ले आओ_।
*3. भविष्य प्रत्याख्यान*: _संकल्प नहीं → निश्चय: "आगे भी मैं ज्ञायक ही रहूंगा, परद्रव्य कर्ता नहीं"_।
_बोला नहीं, भासा_ → _यही शुद्धि के तीन आवश्यक अंग हैं_।
### *सार: 8 दिन की पूरी माला पूरी हुई*
_1. मिथ्यात्व छोड़ो_ → _2. निमित्ताधीन दृष्टि हटाओ_ → _3. क्रमबद्ध_ → _4. अहमेक्को शुद्धों_
_5. वत्थु सहावो धम्मो_ → _6. निज वैभव_ → _7. यथार्थ निर्णय_ → _8. दृष्टि बदलो_ → _9. आज: निश्चय प्रतिक्रमण_
_व्यवहार से शुरू करो, निश्चय पर रुको_। _रटना से शुरू करो, अनुभव पर जमो_।
_आत्मा को कभी मत बेचना - न प्रतिक्रमण के अहंकार के लिए_।
_क्योंकि आत्मा खुद शुद्ध है - उसमें स्थिर हो जाना ही सच्चा प्रायश्चित है_।
_पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_।
*_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?*
*स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज से प्रतिक्रमण का मतलब बदल दो: "मिच्छामि दुक्कडं" + "अहमेक्को शुद्धों"* ?✨
*सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते*
*शुद्ध आगम वाणी* |
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2026-06-12 07:37:12 |
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| 223729 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*स्वास्थ्य संवाद - ( क्र. 1601 )*
***************************
*10) तंबाखू सेवन - व्याधीला निमंत्रण*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(भाग - 29)
"""""""""'''''"""""""
*दि.31 मे - तंबाखू सेवन विरोधी दिन...*
*खरंच तंबाखू इतकी वाईट आहे का ?*
*=> तंबाखू सेवनाच्या विविध पद्धती -*
तंबाखूचा वापर अनेक पद्धतीने केला जातो. संपूर्ण जगभर या तंबाखू सेवनाच्या अंगभूत सवय असलेल्या लोकांची संख्या हजारो..लाखो.. नव्हे तर कोट्यवधी इतकी प्रचंड आहे !
..आणि त्यामुळेच तर तंबाखू सेवनाच्या / तंबाखू व्यसनाच्या दुष्परिणामास बळी पडणाऱ्यांची आणि तंबाखूच्या दीर्घकालीन सेवनाच्या परीणामी दरवर्षी मृत्युमुखी पडणा-या व्यक्ती / रूग्णांची संख्याही जगभरात लाखोंच्या घरात आहे. हे कटु आहे पण सत्य आहे..!
अपायकारक आहे, हे माहिती असूनही, ज्या तंबाखूची मोहिनी / आकर्षण / आवड मानवास इतक्या प्रचंड प्रमाणात आहे, त्या तंबाखू आणि मानवी शरीर यांचा, ( सुरुवातीला सहज नंतर सवय आणि मग कालांतराने ) व्यसन म्हणून विविधांगांनी नेमका कसा कसा संबंध येत जातो, ते आता पाहूया..
*(क्रमशः) (दि.12/06/2026)*
*-डॉ.अजित ज.पाटील, सांगली*
???
(ए.9877/वै.1601) |
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2026-06-12 07:37:09 |
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| 223730 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*स्वास्थ्य संवाद - ( क्र. 1601 )*
***************************
*10) तंबाखू सेवन - व्याधीला निमंत्रण*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(भाग - 29)
"""""""""'''''"""""""
*दि.31 मे - तंबाखू सेवन विरोधी दिन...*
*खरंच तंबाखू इतकी वाईट आहे का ?*
*=> तंबाखू सेवनाच्या विविध पद्धती -*
तंबाखूचा वापर अनेक पद्धतीने केला जातो. संपूर्ण जगभर या तंबाखू सेवनाच्या अंगभूत सवय असलेल्या लोकांची संख्या हजारो..लाखो.. नव्हे तर कोट्यवधी इतकी प्रचंड आहे !
..आणि त्यामुळेच तर तंबाखू सेवनाच्या / तंबाखू व्यसनाच्या दुष्परिणामास बळी पडणाऱ्यांची आणि तंबाखूच्या दीर्घकालीन सेवनाच्या परीणामी दरवर्षी मृत्युमुखी पडणा-या व्यक्ती / रूग्णांची संख्याही जगभरात लाखोंच्या घरात आहे. हे कटु आहे पण सत्य आहे..!
अपायकारक आहे, हे माहिती असूनही, ज्या तंबाखूची मोहिनी / आकर्षण / आवड मानवास इतक्या प्रचंड प्रमाणात आहे, त्या तंबाखू आणि मानवी शरीर यांचा, ( सुरुवातीला सहज नंतर सवय आणि मग कालांतराने ) व्यसन म्हणून विविधांगांनी नेमका कसा कसा संबंध येत जातो, ते आता पाहूया..
*(क्रमशः) (दि.12/06/2026)*
*-डॉ.अजित ज.पाटील, सांगली*
???
(ए.9877/वै.1601) |
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2026-06-12 07:37:09 |
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| 223728 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-12 07:37:08 |
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| 223727 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-12 07:37:07 |
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| 223726 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*आत्मचिंतन - (क्र. 2637)*
****************************
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र तथा मोक्षशास्त्र*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(*247*)
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र* अपरनाम *मोक्षशास्त्र* हा जैन तत्त्वज्ञानाचे सुंदर विश्लेषण करणारा एक अत्यंत महत्वाचा ग्रंथ / आगम / शास्त्र आहे. याचे विवेचन क्रमशः समजावून घेत आहोत -
*॥ तृतीय अध्याय ॥*
*गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्हरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरुप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगा॥*
( अध्याय 3 / सूत्र 21 )
*गंगा सिन्धु रोहित् रोहितास्या हरित् हरिकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्ण रुप्यकूला रक्ता रक्तोदा सरितः यन्मध्यगाः ॥3/21॥*
*विवेचन -*
~~~~~~
*सात क्षेत्रे आणि त्यांना विभाजित करणाऱ्या विविध नद्या याविषयी आचार्य श्री या सूत्रामध्ये वर्णन करीत आहेत.*
जी सात क्षेत्रे ( सूत्र क्र. 2/11 मध्ये ) सांगितलेली आहेत, त्या प्रत्येक क्षेत्रामधून, प्रत्येकी दोन दोन नद्या वाहतात, त्या नद्यांची नावे या सूत्रामध्ये दिलेली आहेत. ती आपण कालच्या भागात जाणून घेतली. आता ( सूत्र क्रमांक 2 / 11 मध्ये सांगितलेले सहा पर्वत आणि सूत्र क्रमांक 2/15 मध्ये ज्या सहा सरोवरांचे वर्णन केलेले आहे त्या ) सहा पर्वत, सहा सरोवरे आणि चौदा नद्यांचा काय संबंध आहे, ते एका
एकत्रित चार्टमधून पुढीलप्रमाणे जाणून घेऊया..?
*(क्रमशः) (दि.12/06/2026)*
*-डॉ.अजित ज.पाटील, सांगली*
???
(ए.9875/आ.3304) |
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2026-06-12 07:37:06 |
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| 223725 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*आत्मचिंतन - (क्र. 2637)*
****************************
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र तथा मोक्षशास्त्र*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(*247*)
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र* अपरनाम *मोक्षशास्त्र* हा जैन तत्त्वज्ञानाचे सुंदर विश्लेषण करणारा एक अत्यंत महत्वाचा ग्रंथ / आगम / शास्त्र आहे. याचे विवेचन क्रमशः समजावून घेत आहोत -
*॥ तृतीय अध्याय ॥*
*गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्हरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरुप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगा॥*
( अध्याय 3 / सूत्र 21 )
*गंगा सिन्धु रोहित् रोहितास्या हरित् हरिकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्ण रुप्यकूला रक्ता रक्तोदा सरितः यन्मध्यगाः ॥3/21॥*
*विवेचन -*
~~~~~~
*सात क्षेत्रे आणि त्यांना विभाजित करणाऱ्या विविध नद्या याविषयी आचार्य श्री या सूत्रामध्ये वर्णन करीत आहेत.*
जी सात क्षेत्रे ( सूत्र क्र. 2/11 मध्ये ) सांगितलेली आहेत, त्या प्रत्येक क्षेत्रामधून, प्रत्येकी दोन दोन नद्या वाहतात, त्या नद्यांची नावे या सूत्रामध्ये दिलेली आहेत. ती आपण कालच्या भागात जाणून घेतली. आता ( सूत्र क्रमांक 2 / 11 मध्ये सांगितलेले सहा पर्वत आणि सूत्र क्रमांक 2/15 मध्ये ज्या सहा सरोवरांचे वर्णन केलेले आहे त्या ) सहा पर्वत, सहा सरोवरे आणि चौदा नद्यांचा काय संबंध आहे, ते एका
एकत्रित चार्टमधून पुढीलप्रमाणे जाणून घेऊया..?
*(क्रमशः) (दि.12/06/2026)*
*-डॉ.अजित ज.पाटील, सांगली*
???
(ए.9875/आ.3304) |
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2026-06-12 07:37:05 |
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| 223723 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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1 *आपकी चिंता या उपदेश से भी किसी की योग्यता नहीं बदलती है।*
2 *योग्यता अपरिवर्तनीय होती है।*
3 *सच्ची दया तो आत्महित में लगना और लगाना है।*
4 *सच्चा दान अभिमान को गलाता है बढ़ाता नहीं।*
5 *किसी की निंदा आपको प्रशंसा तो नहीं दिला सकती है।*
6 *दिल जीतना हो तो दिल से काम करो।*
7 *विश्वास ही वस्तु का आभास कराता है।*
8 *तीव्र कषायि को टोकने वाले अच्छे नहीं लगते हैं।*
9 *मौके का फायदा न उठाना मूर्खता है।*
10 *सुविधा की अपेक्षा जीव को दुविधा में डाल देती है।*
(श्रेणिक जैन जबलपुर 12-6-26) |
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2026-06-12 07:37:04 |
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| 223724 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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1 *आपकी चिंता या उपदेश से भी किसी की योग्यता नहीं बदलती है।*
2 *योग्यता अपरिवर्तनीय होती है।*
3 *सच्ची दया तो आत्महित में लगना और लगाना है।*
4 *सच्चा दान अभिमान को गलाता है बढ़ाता नहीं।*
5 *किसी की निंदा आपको प्रशंसा तो नहीं दिला सकती है।*
6 *दिल जीतना हो तो दिल से काम करो।*
7 *विश्वास ही वस्तु का आभास कराता है।*
8 *तीव्र कषायि को टोकने वाले अच्छे नहीं लगते हैं।*
9 *मौके का फायदा न उठाना मूर्खता है।*
10 *सुविधा की अपेक्षा जीव को दुविधा में डाल देती है।*
(श्रेणिक जैन जबलपुर 12-6-26) |
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2026-06-12 07:37:04 |
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| 223722 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-06-12 07:37:02 |
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