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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-04-09 07:41:03 |
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| 70960 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-04-09 07:41:03 |
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| 70958 |
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11. वात्सल्य वारिधि |
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2026-04-09 07:40:55 |
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11. वात्सल्य वारिधि |
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2026-04-09 07:40:54 |
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11. वात्सल्य वारिधि |
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<a href="https://youtu.be/ZmQGsx5dF3o?si=TzxAYP6meMFnFmYR" target="_blank">https://youtu.be/ZmQGsx5dF3o?si=TzxAYP6meMFnFmYR</a> |
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2026-04-09 07:40:53 |
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11. वात्सल्य वारिधि |
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<a href="https://youtu.be/ZmQGsx5dF3o?si=TzxAYP6meMFnFmYR" target="_blank">https://youtu.be/ZmQGsx5dF3o?si=TzxAYP6meMFnFmYR</a> |
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2026-04-09 07:40:53 |
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40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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<a href="https://youtube.com/shorts/KvhpXBKOD68?si=Rwj5OduDHXmyKFlZ" target="_blank">https://youtube.com/shorts/KvhpXBKOD68?si=Rwj5OduDHXmyKFlZ</a> |
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2026-04-09 07:40:45 |
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सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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???? Wandami Matajii ???? Jai Jinendra Didi ?? |
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2026-04-09 07:39:40 |
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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*जय-जिनेन्द्र ।*
दि. ९/४/२०२६ (गुरुवार)
*छहढाला (चौथी ढाल)*
*अनर्थदण्डव्रत के भेद और उनका लक्षण-*
*काहू की धनहानि, किसी जय-हार न चिन्तै ।*
*देय न सो उपदेश, होय अघ वनज कृषी तैं ।।१२।।* (उत्तरार्ध्द)
*कर प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधै ।*
*असि धनु हल हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधै ।।*
*राग-द्वेष-करतार, कथा कबहूॅं न सुनीजै ।*
*और हु अनर्थ दंड, हेतु अघ तिन्हैं न कीजै ।।१३।।*
१. किसी के धन के नाश का, किसी की विजय का (अथवा) किसी की हार का विचार न करना (उसे अपध्यान -अनर्थदंडव्रत कहते है ।) २. व्यापार और खेती से पाप होता है; इसलिये उसका उपदेश न देना (उसे पापोपदेश-अनर्थदंडव्रत कहा जाता है । ३. प्रमाद से (बिना प्रयोजन) जलकायिक, पृथ्वीकायिक, वनस्पतिकायिक, अग्निकायिक (और वायुकायिक) जीवों का घात करना (सो प्रमादचर्या-अनर्थदंडव्रत कहलाता है । ४. तलवार, धनुष्य, हल (आदि) हिंसा होने में कारणभूत पदार्थों को देकर यश न लेना (सो हिंसादान-अनर्थदंडव्रत कहलाता है ।) ५. राग और द्वेष उत्पन्न करनेवाली कथाएॅं कभी भी नहीं सुनना (सो दु:श्रुति अनर्थदण्डव्रत कहा जाता है ।) तथा अन्य भी पाप के कारण अनर्थदंड है, उन्हें भी नहीं करना चाहिए ।
(छहढाला-४/१२,१३) |
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2026-04-09 07:39:40 |
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