| ID |
Chat ID
|
Chat Name
|
Sender
|
Phone
|
Message
|
Status
|
Date |
View |
| 75864 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
|
|
|
|
2026-04-11 04:04:51 |
|
| 75863 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
|
|
|
|
2026-04-11 04:04:50 |
|
| 75861 |
40449689 |
? विद्या शरणम ०१ ? |
|
|
*_साधर्मी बंधुओं सादर जय जिनेंद्र।_*
*दिनांक—11-04-2026*
*_दिन—शनिवार_*
*_तिथि— वैशाख कृष्ण नवमी_*
*_पर्व— देवाधिदेव 1008 श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान का ज्ञान कल्याणक पर्व_*
*_आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।_*
*?????????*
? *_सभी जीवों का आने वाला समय मंगलमय हो सभी रोज मंदिर जी जाकर अभिषेक एवं कल्याणक की पूजन अवश्य करें_*
?
????????? |
|
2026-04-11 04:03:33 |
|
| 75862 |
40449689 |
? विद्या शरणम ०१ ? |
|
|
*_साधर्मी बंधुओं सादर जय जिनेंद्र।_*
*दिनांक—11-04-2026*
*_दिन—शनिवार_*
*_तिथि— वैशाख कृष्ण नवमी_*
*_पर्व— देवाधिदेव 1008 श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान का ज्ञान कल्याणक पर्व_*
*_आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।_*
*?????????*
? *_सभी जीवों का आने वाला समय मंगलमय हो सभी रोज मंदिर जी जाकर अभिषेक एवं कल्याणक की पूजन अवश्य करें_*
?
????????? |
|
2026-04-11 04:03:33 |
|
| 75860 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
|
|
|
|
2026-04-11 03:58:36 |
|
| 75859 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
|
|
|
|
2026-04-11 03:58:35 |
|
| 75857 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
|
|
।। द्रव्यानुयोग।।
!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
॥श्री इष्टोपदेश॥
मूल संस्कृत गाथा
(पंडित आशाधरजी)
मंगलाचरण
परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।
इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥
मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण ।
यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः
तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥
मोही जीव आने वाली विपत्तियों को भी नहीं देखता --
विपत्तिमात्मनो मूढः, परेषामिव नेक्षते दह्यमान-मृगाकीर्णवनान्तर - तरुस्थवत् ॥14॥
पर की विपदा देखता, अपनी देखे नाहिं
जलते पशु जा वन विषै, जड़ तरूपर ठहराहिं ॥१४॥
अन्वयार्थ : जिसमें अनेकों हिरण दवानल की ज्वाला से जल रहे हैं, ऐसे जंगल के मध्य में वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य की तरह यह संसारी प्राणी दूसरों की तरह अपने ऊपर आनेवाली विपत्तियों का ख्याल नहीं करता है।
आशाधरजी : धनादिक में आसक्ति होने के कारण जिसका विवेक नष्ट हो गया है, ऐसा यह मूढ़ प्राणी चोरादिक के द्वारा की जानेवाली, धनादिक चुराये जाने आदिरूप अपनी आपत्ति को नहीं देखता है, अर्थात् वह यह नहीं ख्याल करता कि जैसे दूसरे लोग विपत्तियों के शिकार होते हैं, उसी तरह मैं भी विपत्तियों का शिकार बन सकता हूँ। इस वन में लगी हुई यह आग इस वृक्ष को और मुझे भी जला देगी। जैसे ज्वालानल की ज्वालाओं से जहाँ अनेक मृगगण झुलस रहे हैं / जल रहें हैं, उसी वन के मध्य में मौजूद वृक्ष के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी यह जानता है कि ये तमाम मृगगण ही घबरा रहे हैं- छटपटा रहे हैं, एवं मरते जा रहे हैं, इन विपत्तियों का मुझसे कोई संबंध नहीं हैं, मैं तो सुरक्षित हूँ। विपत्तियों को सम्बन्ध दूसरों की सम्पत्तियों से हैं, मेरी सम्पत्तियों से नहीं है ॥१४॥
फिर भी शिष्य का कहना है कि हे भगवन् ! क्या कारण है कि लोगों को निकट आई हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जबाब देते हैं 'लोभात्' लोभ के कारण, हे वत्स । धनादिक की गृद्धता / आसक्ति से धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि -- |
|
2026-04-11 03:47:13 |
|
| 75858 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
|
|
।। द्रव्यानुयोग।।
!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
॥श्री इष्टोपदेश॥
मूल संस्कृत गाथा
(पंडित आशाधरजी)
मंगलाचरण
परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।
इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥
मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण ।
यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः
तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥
मोही जीव आने वाली विपत्तियों को भी नहीं देखता --
विपत्तिमात्मनो मूढः, परेषामिव नेक्षते दह्यमान-मृगाकीर्णवनान्तर - तरुस्थवत् ॥14॥
पर की विपदा देखता, अपनी देखे नाहिं
जलते पशु जा वन विषै, जड़ तरूपर ठहराहिं ॥१४॥
अन्वयार्थ : जिसमें अनेकों हिरण दवानल की ज्वाला से जल रहे हैं, ऐसे जंगल के मध्य में वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य की तरह यह संसारी प्राणी दूसरों की तरह अपने ऊपर आनेवाली विपत्तियों का ख्याल नहीं करता है।
आशाधरजी : धनादिक में आसक्ति होने के कारण जिसका विवेक नष्ट हो गया है, ऐसा यह मूढ़ प्राणी चोरादिक के द्वारा की जानेवाली, धनादिक चुराये जाने आदिरूप अपनी आपत्ति को नहीं देखता है, अर्थात् वह यह नहीं ख्याल करता कि जैसे दूसरे लोग विपत्तियों के शिकार होते हैं, उसी तरह मैं भी विपत्तियों का शिकार बन सकता हूँ। इस वन में लगी हुई यह आग इस वृक्ष को और मुझे भी जला देगी। जैसे ज्वालानल की ज्वालाओं से जहाँ अनेक मृगगण झुलस रहे हैं / जल रहें हैं, उसी वन के मध्य में मौजूद वृक्ष के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी यह जानता है कि ये तमाम मृगगण ही घबरा रहे हैं- छटपटा रहे हैं, एवं मरते जा रहे हैं, इन विपत्तियों का मुझसे कोई संबंध नहीं हैं, मैं तो सुरक्षित हूँ। विपत्तियों को सम्बन्ध दूसरों की सम्पत्तियों से हैं, मेरी सम्पत्तियों से नहीं है ॥१४॥
फिर भी शिष्य का कहना है कि हे भगवन् ! क्या कारण है कि लोगों को निकट आई हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जबाब देते हैं 'लोभात्' लोभ के कारण, हे वत्स । धनादिक की गृद्धता / आसक्ति से धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि -- |
|
2026-04-11 03:47:13 |
|
| 75855 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
|
|
।। द्रव्यानुयोग।।
!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
॥श्री इष्टोपदेश॥
मूल संस्कृत गाथा
(पंडित आशाधरजी)
मंगलाचरण
परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।
इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥
मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण ।
यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः
तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥
मोही जीव आने वाली विपत्तियों को भी नहीं देखता --
विपत्तिमात्मनो मूढः, परेषामिव नेक्षते दह्यमान-मृगाकीर्णवनान्तर - तरुस्थवत् ॥14॥
पर की विपदा देखता, अपनी देखे नाहिं
जलते पशु जा वन विषै, जड़ तरूपर ठहराहिं ॥१४॥
अन्वयार्थ : जिसमें अनेकों हिरण दवानल की ज्वाला से जल रहे हैं, ऐसे जंगल के मध्य में वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य की तरह यह संसारी प्राणी दूसरों की तरह अपने ऊपर आनेवाली विपत्तियों का ख्याल नहीं करता है।
आशाधरजी : धनादिक में आसक्ति होने के कारण जिसका विवेक नष्ट हो गया है, ऐसा यह मूढ़ प्राणी चोरादिक के द्वारा की जानेवाली, धनादिक चुराये जाने आदिरूप अपनी आपत्ति को नहीं देखता है, अर्थात् वह यह नहीं ख्याल करता कि जैसे दूसरे लोग विपत्तियों के शिकार होते हैं, उसी तरह मैं भी विपत्तियों का शिकार बन सकता हूँ। इस वन में लगी हुई यह आग इस वृक्ष को और मुझे भी जला देगी। जैसे ज्वालानल की ज्वालाओं से जहाँ अनेक मृगगण झुलस रहे हैं / जल रहें हैं, उसी वन के मध्य में मौजूद वृक्ष के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी यह जानता है कि ये तमाम मृगगण ही घबरा रहे हैं- छटपटा रहे हैं, एवं मरते जा रहे हैं, इन विपत्तियों का मुझसे कोई संबंध नहीं हैं, मैं तो सुरक्षित हूँ। विपत्तियों को सम्बन्ध दूसरों की सम्पत्तियों से हैं, मेरी सम्पत्तियों से नहीं है ॥१४॥
फिर भी शिष्य का कहना है कि हे भगवन् ! क्या कारण है कि लोगों को निकट आई हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जबाब देते हैं 'लोभात्' लोभ के कारण, हे वत्स । धनादिक की गृद्धता / आसक्ति से धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि -- |
|
2026-04-11 03:45:36 |
|
| 75856 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
|
|
।। द्रव्यानुयोग।।
!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
॥श्री इष्टोपदेश॥
मूल संस्कृत गाथा
(पंडित आशाधरजी)
मंगलाचरण
परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।
इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥
मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण ।
यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः
तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥
मोही जीव आने वाली विपत्तियों को भी नहीं देखता --
विपत्तिमात्मनो मूढः, परेषामिव नेक्षते दह्यमान-मृगाकीर्णवनान्तर - तरुस्थवत् ॥14॥
पर की विपदा देखता, अपनी देखे नाहिं
जलते पशु जा वन विषै, जड़ तरूपर ठहराहिं ॥१४॥
अन्वयार्थ : जिसमें अनेकों हिरण दवानल की ज्वाला से जल रहे हैं, ऐसे जंगल के मध्य में वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य की तरह यह संसारी प्राणी दूसरों की तरह अपने ऊपर आनेवाली विपत्तियों का ख्याल नहीं करता है।
आशाधरजी : धनादिक में आसक्ति होने के कारण जिसका विवेक नष्ट हो गया है, ऐसा यह मूढ़ प्राणी चोरादिक के द्वारा की जानेवाली, धनादिक चुराये जाने आदिरूप अपनी आपत्ति को नहीं देखता है, अर्थात् वह यह नहीं ख्याल करता कि जैसे दूसरे लोग विपत्तियों के शिकार होते हैं, उसी तरह मैं भी विपत्तियों का शिकार बन सकता हूँ। इस वन में लगी हुई यह आग इस वृक्ष को और मुझे भी जला देगी। जैसे ज्वालानल की ज्वालाओं से जहाँ अनेक मृगगण झुलस रहे हैं / जल रहें हैं, उसी वन के मध्य में मौजूद वृक्ष के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी यह जानता है कि ये तमाम मृगगण ही घबरा रहे हैं- छटपटा रहे हैं, एवं मरते जा रहे हैं, इन विपत्तियों का मुझसे कोई संबंध नहीं हैं, मैं तो सुरक्षित हूँ। विपत्तियों को सम्बन्ध दूसरों की सम्पत्तियों से हैं, मेरी सम्पत्तियों से नहीं है ॥१४॥
फिर भी शिष्य का कहना है कि हे भगवन् ! क्या कारण है कि लोगों को निकट आई हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जबाब देते हैं 'लोभात्' लोभ के कारण, हे वत्स । धनादिक की गृद्धता / आसक्ति से धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि -- |
|
2026-04-11 03:45:36 |
|